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कई साल गुज़र जाते हैं परीक्षा के इंतज़ार में?

भारत में बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है और बेरोज़गारी पर ही बात नहीं हो रही है. चुनाव आने वाला है और युवाओं को बेवकूफ बनाने के लिए ऐलान किया जा रहा है कि तीन-चार लाख बहाली करेंगे.

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कई साल गुज़र जाते हैं परीक्षा के इंतज़ार में?

नौकरी सीरीज़ का 30वां अंक है. नेता और नौजवान आमने सामने हैं. नेता अपना मंच चुन लेते हैं और युवाओं पर भाषण दे देते हैं, नौजवान जब अपना मैदान चुनता है तो उनके बीच कोई नेता नज़र नहीं आता है. इस देश में आदमी का नंबर बन गया है मगर कितनी नौकरी मिलती है, कितनों की जाती है, इसका कोई ठोस आंकड़ा नहीं है. इसलिए गोलमोल की बात कर नेता गोलमाल कर जाते हैं. भारत में बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है और बेरोज़गारी पर ही बात नहीं हो रही है. चुनाव आने वाला है और युवाओं को बेवकूफ बनाने के लिए ऐलान किया जा रहा है कि तीन-चार लाख बहाली करेंगे. हो यह रहा था कि सरकारों ने नौकरियां देनी बंद कर दी थीं या कम कर दी थीं, अब सरकारों के पास तीन से चार लाख भर्ती करने का ढांचा ही नहीं है. इसलिए चार लाख बहाली का ऐलान पहली ख़बर तो है मगर किसी को पता नहीं कि बहाली कब होगी. रेलवे में ही जो भर्ती निकलती है उसे पूरा होने में औसतन 2 से 4 साल लग जाते हैं. हमने नौकरी सीरीज़ के तहत देखा है कि कोई परीक्षा दो से तीन साल से पहले पूरी ही नहीं होती. सबको बीच रास्ते में इधर उधर भटका दिया जाता है. इसलिए नौजवान परेशान है. वो कब तक बर्दाश्त करेगा. हर तरह का भाषण सुन चुका है मगर परीक्षा व्यवस्था में बदलाव दिखाई नहीं देता है.

आने वाले महीनों में चार से पांच लाख भर्ती वाली ख़बरों की हेडलाइन आपको खूब मिलेगी मगर नौकरी मिलते मिलते हेडलाइन ग़ायब हो चुकी होगी. इसलिए सतर्क रहें, सवाल ये करें कि क्या आप छह महीने के भीतर बहाली की प्रक्रिया पूरी करेंगे तो हम ताली बजाएंगे वर्ना आपसे सवाल करेंगे. हेडलाइन मैनेजमेंट से बेरोज़गारी दूर नहीं होती है न स्लोगन में स्वर्ग होता है. आप नौकरी सीरीज़ का कोई भी एपिसोड निकाल कर देख लीजिए ndtv.in पर नौकरी सीरीज़ के तीसों अंक मिल जाएंगे. एक ही जगह एक ही साथ.


मंगलवार 20 मार्च को मुंबई के सेंट्रल रेलवे लाइन पर हज़ारों की संख्या में रेलवे अप्रेंटिस आ धमके. साढ़े तीन घंटे तक इस ट्रैक पर आवाजाही रुक गई. इसके कारण मुंबई के यात्रियों को काफी तकलीफ का सामना करना पड़ा. किसी को रोक कर आप अपने लिए रास्ता नहीं बना सकते इसलिए अच्छा होता इस तरह से रेल की पटरी पर आंदोलन नहीं होता. आप ये न समझें कि ये सभी मुंबई या महाराष्ट्र के हैं. इस आंदोलन के पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात से भी नौजवान मुंबई गए थे. 12 मार्च को इन्होंने ऑल इंडिया रेलवे ज़ोन के महाप्रबंधक को पत्र लिखा था कि वे चाहते हैं कि रेलवे जिन्हें ट्रेनिंग देती है उन्हें पहले की तरह ट्रेनिंग के बाद नौकरी पर रख ले. हुआ यह है कि पिछले साल जून मे रेलवे ने नीति बनाई कि अपने अप्रेंटिस के लिए 20 प्रतिशत ही सीट रिज़र्व रहेगी, बाकी को खुली प्रतियोगिता का सामना करना होगा. नौजवान चाहते हैं कि एक तो अप्रेंटिंस की बहाली कम हो गई है, वे ट्रेनिंग के बाद से इस इंतज़ार में थे कि रेलवे काम पर रखेगी क्योंकि इन्हें तो ट्रेनिंग मिली हुई है, अगले दिन से काम करने लगेंगे. तीन घंटे के बाद जब लिखित आश्वासन मिला कि दो दिनों बाद फैसला लिया जाएगा तब इन्होंने धरना समाप्त किया. पुलिस ने इन पर लाठी चार्ज किया और इनकी तरफ से भी पत्थर चले.

क्या यह बात तर्कसंगत नहीं है कि रेलवे ने जिन्हें एक से तीन साल की ट्रेनिंग दी है, ट्रेनिंग के लिए प्रतियोगिता परीक्षा से ही इनका चुनाव किया है, तो रेलवे को इन्हें काम भी देना चाहिए क्योंकि इन्हें ट्रेनिंग तो रेल का पहिया बनाने की मिली है, ये बाहर अपनी दुकान भी नहीं खोल सकते हैं. क्या आपको इस बात में दम नहीं लगता है. आप जानते हैं कि रेलवे में 2 लाख 20 हज़ार पद ख़ाली हैं, मंत्रालय ने रेलवे पर संसद की स्थाई समिति से कहा है कि सारे पदों को भरने का इरादा नहीं है. कुछ पदों को आउटसोर्स किए जाने पर भी विचार चल रहा है. अगर सारे पद भरे जाने लगे तो ये 20 हज़ार भी घंटे भर में एडजस्ट हो सकते हैं.

हमारे सहयोगी सुनील कुमार सिंह और सोहित मिश्र मंगलवार की घटना को कवर कर रहे थे. ऐसा नहीं है कि सरकार को इनके प्रदर्शन की जानकारी नहीं थी. 12 मार्च को रेलवे अप्रेंटिस ने कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में बीजेपी ऑफिस के सामने धरना दिया था और येदियुरप्पा भी इनसे मिलने आए थे. कहा कि वे रेल मंत्री से बात करेंगे.

नौजवानों ने येदियुरप्पा के आश्वासन पर धरना समाप्त कर दिया. मगर उसके बाद कुछ नहीं हुआ तो वे 19 मार्च से उसी शहर में रेलवे के डआरएम के दफ्तर के बाहर धरने पर बैठ गए हैं. इनका दावा है कि 2000 से अधिक नौजवान वहां के धरने में शामिल हो चुके हैं. वैसे वे भारत भर में बेरोज़गार अप्रेंटिस की संख्या 20,000 बताते हैं. ज्यादातर 2010, 2012, 2014, 2016 के पास आउट हैं. इस बीच 2016 के साल में मुंबई में 699 और गोरखपुर में 45 और नार्दन रेलवे में 13 अप्रेंटिंस रखे गए हैं मगर बाकी बेरोज़गार घूम रहे हैं. येदियुरप्पा ने जब आश्वासन दिया और इन नौजवानों ने ऑल इंडिया रेलवे ज़ोन के महाप्रबंधन को सूचना दे दी तब भी इनकी मांग पर सुनवाई नहीं हुई.

दरअसल नौजवान जब आंदोलन करते हैं तो सरकारें सोचती हैं कि इन्हें कौन कवर करेगा. दो दिन हंगामा करेंगे और फिर मीडिया किसी सांसद के सांप्रदायिक बयान को लेकर व्यस्त हो जाएगा. ज़रूर इन नौजवानों को रेल नहीं रोकनी चाहिए थी लेकिन क्या इनकी बात किसी को सुननी नहीं चाहिए थी?

पिछले अगस्त ये रेलवे अप्रेंटिस दिल्ली आए थे. 10 अगस्त से 21 अगस्त के बीच जंतर मंतर पर जमा हुए. इनकी जेब में पैसे नहीं थे. हालत खराब हो गई. कुछ तो पहले दो तीन दिन में ही बीमार हो गए. बाद में गुरुद्वारा रकाबगंज की तरफ से इनके खाने पीने का इंतज़ाम कराया गया तब जाकर ये आंदोलन पर डटे रहे. तभी मैं इनके बीच गया था और समझने का प्रयास किया था कि ये क्या मामला है. ये सभी काले कपड़े में आए थे ताकि मीडिया के कवरेज के हिसाब से विजुअल एलिमेंट भी बन सकें मगर कोई मीडिया नहीं आया. क्या आप एक नागरिक के तौर पर इसका हिसाब रखना चाहेंगे कि वोट देने के बाद जब सरकार के सामने जनता आवाज़ उठाती है तो वह सरकार उनकी आवाज़ सुनती है या नहीं. अगस्त 2017 से पहले ये जनवरी 30-31 2017 को भी आंदोलन कर चुके थे. उससे भी पहले दिसंबर 2016 में आंदोलन कर चुके थे. आप ही बताइये, जिस रेलवे से ट्रेनिंग ली हो, वही रेलवे नौकरी न दे, और जब सवाल करे तो किसी को फर्क न पड़े, क्या ऐसा होना चाहिए. हमने जब पिछले साल दिखाया था तब इन्हें यकीन नहीं हुआ था कि प्राइम टाइम में कोई दिखा सकता है. आज सब हमारे सहयोगी सुनील कुमार सिंह इनसे बात करने गए तो नौजवान भावुक हो गए. देखिए अगर मीडिया समाज के खिलाफ हो जाता है तो आदमी कितना असहाय हो जाता है. आज का गोदी मीडिया जनता के खिलाफ हो गया है.

आप जानते हैं कि रेलवे ने इस साल करीब 90,000 भर्तियां निकाली हैं. मगर आप यह नहीं जानते कि इन भर्तियों को पूरा करने का ढांचा है भी या नहीं और कितने साल में ये भर्तियां पूरी होंगी. क्या आप यह भी जानते हैं कि रेलवे के पास 2 लाख 20 हज़ार से अधिक वेकेंसी है. मगर रेलवे ने संसद की स्थाई समिति से कहा है कि उसका इरादा सभी पदों को भरने का नहीं है. बाकी पदों को आउटसोर्स यानी ठेके पर भरे जाने का विकल्प देखा जा रहा है. आज अगर रेलवे सभी 2 लाख 20 हज़ार पदों की बहाली का ऐलान भी कर दे तो भी वह दो तीन साल से पहले इस भरती को पूरी नहीं कर सकती है.

रेल मंत्री कहते हैं कि 20 प्रतिशत रिज़र्व रखने की नीति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनी है लेकिन अप्रेंटिंस कहते हैं कि रेलवे की अपनी बनाई हुई नीति है. अब इस पर हमारी कोई राय नहीं क्योंकि मेरे पास तथ्य नहीं हैं. बस एक पत्र है. इस वक्त भारत में बेरोज़गारी, नौकरी, परीक्षा प्रणाली की जर्जर हालत के अलावा कोई बड़ी ख़बर नहीं है. अगर ये ख़बर पहले पन्ने पर नहीं है तो युवाओं को अखबार पढ़ना छोड़ देना चाहिए. टीवी देखना बंद कर देना चाहिए. आप सोचिए आगरा के बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी के छात्रों पर क्या बीत रही होगी, रिज़ल्ट नहीं आया है लिहाज़ा जो भर्ती निकली है उसके लिए अप्लाई भी नहीं कर सकते. वे भी कितना हिन्दू मुस्लिम डिबेट देखेंगे. दिन भर आगरा से हताश मायूस छात्रों का फोन आ रहा है कि हमारा रिज़ल्ट निकलवा दीजिए. क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चों को भी यही सज़ा मिले और किस बात की सज़ा मिले. हम एक सिपाही का इम्तहान नहीं करा पा रहे हैं, बिना चोरी और धांधली के.

20 मार्च को ही राजस्थान मेुं सिपाही भर्ती परीक्षा पूरी तरह निरस्त कर दी गई. राजस्थान सरकार ने 18 अक्टूबर 2017 को 5500 सिपाहियों की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला था. सामान्य छात्रों के लिए 400, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 300 रुपए की फीस थी. इतना पैसा देकर चार महीने बाद जब मार्च 2018 में इम्तहान होता है तो वह नकल के कारण रद्द हो जाती है. इसी तरह हर परीक्षा निकलने के वक्त हेडलाइन बनती है, रद्द होने के वक्त हेडलाइन बनने के बाद धीरे-धीरे गायब हो जाती है. युवाओं का कितना समय बर्बाद हुआ है. राजस्थान पत्रिका ने लिखा है कि 16 लाख अभ्यर्थी प्रभावित होने जा रहे हैं. 15 मार्च के भास्कर में खबर छपी है कि मुख्यमंत्री ने तय किया है कि इस साल दिसबंर तक सारी भर्ती पूरी हो जाएगी. आप देखते चलिए कितनी भर्ती पूरी होती है.

जब हम 5500 पदों पर बहाली समय से बिना चोरी के नहीं करा सकते तो क्या 90,000 या 1 लाख पदों की बहाली बिना तीन चार साल के हो सकती है. कई बार लगता है कि सरकारें ही ऐसी ढील छोड़ देती हैं कि मामला रद्द होता रहे, रद्द न हो तो मुकदमे में फंसता रहे. आईएनएलडी के सांसद दुष्यंत चौटाला ने श्रम मंत्री से सवाल पूछा है कि पिछले तीन साल में बेरोज़गारी की वृद्धि दर क्या है, उस दौरान नौकरी देने का क्या लक्ष्य था, उसमें कितनी सफलता प्राप्त हुई है. तो जवाब दिया गया है कि सरकार द्वारा कोई लक्ष्य नहीं रखा गया है. तथापि, रोज़गार सृजन एवं नियोज‍नीयता में सुधार करना सरकार की प्रमुख प्राथमिकता रही है. इस जवाब के साथ बहुत सारी नीतियां गिना दी गईं हैं, वही मुद्रा योजना से लेकर स्किल इंडिया तक. मगर उनके कारण कितनों को रोज़गार मिला इसका कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है. क्या सरकार के पास बताने लायक आंकड़े नहीं हैं या फिर आंकड़े है ही नहीं. ये तो अगले चुनाव के स्लोगन से ही पता चलेगा.

महाराष्ट्र के अलग अलग शहरों से ये लड़के कई बार मुंबई का चक्कर लगा चुके हैं. 19 मार्च को एनडीटीवी मुंबई के दफ्तर पहुंच गए. फिर 20 मार्च को भी आए. ये बच्चे दिल्ली आकर प्राइम टाइम के लिए अपनी कहानी बताना चाहते थे मगर इनके पास दिल्ली आने तक के लिए पैसे नहीं थे इसलिए ये मुंबई स्थित हमारे दफ्तर गए. करीब 450 की संख्या में ये छात्र महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड महाजेनको में अपनी नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं. 2014 में डिप्टी एग्ज़िक्यूटिव इंजीनियर के 212 पद का विज्ञापन निकला था, जिसके लिए 17000 छात्रों ने अप्लाई कर दिया. 500 रुपये देकर फार्म भरा था. 11 जनवरी 2015 में लिखित परीक्षा ली गई. 20 मार्च 2015 को रिज़ल्ट आया. 450 लोग पास हुए. जब लगा कि सरकारी नौकरी मिल जाएगी तो इन्होंने पुरानी नौकरी छोड़ दी. कोई भी छोड़ देगा क्योंकि सरकारी नौकरी जो मिली थी. लेकिन एक छात्र ने 4 जून 2016 को केस कर दिया. इन छात्रों ने केस करने वाले छात्र से संपर्क किया, उसे समझाया कि सरकार तो सिर्फ डेट लेकर चली जाती है, मुकदमा तो लड़ती नहीं है और तुम्हारे चलते हमारा जीवन बर्बाद हो गया तो उस लड़के ने जूलाई 2017 में केस वापस ले लिया. अब इनकी ज्वाइनिंग की सारी अड़चनें दूर हो गई थी. लेकिन उसके बाद सात महीने से ज़्यादा समय हो चुके हैं मगर इनकी ज्वाइनिंग नहीं हुई है. अदालत का निर्णय इनके पक्ष में ही आया है इसके बाद भी ज्वाइनिंग नहीं हुई है.

इसका कोई हिसाब है कि सात महीने से ये ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं, यहां वहां भटक रहे हैं, अव्वल आपने दुनिया में कही सुना है कि सब कुछ क्लियर हो जाने के बाद सात सात महीने तक ज्वाइनिंग नहीं हो रही है. स्टाफ सलेक्शन कमिशन का भी यही हाल है. अभी भी हज़ारों छात्रों को अगस्त 2017 में परीक्षा पास करने के बाद ज्वाइनिंग लेटर नहीं मिला है. सीएजी के सहायक ऑडिटर के लिए हज़ार के करीब छात्र ज्वाइनिंग लेटर का इंतज़ार कर रहे हैं. इन बच्चों के साथ ये नाइंसाफी बर्दाश्त कैसे की जा सकती है. स्टाफ सलेक्शन कमिशन के बाहर छात्र कई बार परीक्षआओं में धांधली को लेकर बड़ा आंदोलन कर चुके हैं. संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट भी आई है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टाफ सलेक्शन कमिशन पर 2,220 कोर्ट केस हैं. तो सवाल आता है कि कोर्ट में केस की सुनवाई तेज़ गति से हो इसका प्रयास होना चाहिए क्योंकि इससे नौजवानों की ज़िंदगी बर्बाद हो रही है. सिम्पल बात है, फिर आप जजों की वेकैंसी का हाल सुनेंगे तो आज खाना नहीं खा पाएंगे लगेगा ही नहीं कि स्लोगन के अलावा कुछ हो भी रहा है.

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संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि दस साल में एसएससी के जिम्मे बीस गुना से अधिक छात्रों की परीक्षा लेने की ज़िम्मेदारी आ गई है. 2008-09 के दौरान एसएससी के इम्तहानों में करीब दस लाख छात्रों ने हिस्सा लिया था. 2016-17 में एसएससी के इम्तहानों में शामिल छात्रों की संख्या बढ़कर 2 करोड़ हो गई. लेकिन इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को संभालने के लिए कर्मचारियों की संख्या जस की तस है. दस साल से आयोग के कर्मचारियों की स्वीकृत पदों की संख्या 481 पर ही अटकी है. इसमें से भी इस वक्त 115 पद ख़ाली हैं यानी 24 प्रतिशत पद ख़ाली हैं. यह आयोग अपने भीतर कर्मचारियों को समय से नहीं भर पाता है.

दो करोड़ छात्र एसएससी के इम्तहानों में शामिल होते हैं. इसके कारण दो करोड़ छात्रों की ज़िंदगी प्रभावित होती है फिर भी इसके छात्रों की समस्याओं को मीडिया कवरेज़ नहीं मिलता था. नौकरी सीरीज़ और इनके अपने आंदोलन के कारण आज आप एसएससी के बारे में जानते हैं मगर आप देखिए कि बेरोज़गारी बढ़ाने के लिए सरकार ने ही सारा इंतज़ाम किया हुआ है. अगर इस पर चर्चा नहीं होगी तो यह कैसे बदलेगा. कब बदलेगा.


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