मिहिर गौतम की कलम से : निर्भया के तीन साल, लेकिन क्या खत्म हो पाए सवाल...?

मिहिर गौतम की कलम से : निर्भया के तीन साल, लेकिन क्या खत्म हो पाए सवाल...?

निर्भया कांड के विरोध में प्रदर्शन करते युवा (फाइल फोटो)

एक के बाद एक कई शर्मनाक घटनाएं टीवी चैनलों और अख़बारों में सुर्खियां बनती रहीं, लेकिन गुस्सा फिर नहीं दिखा... क्या हमने मान लिया कि यह सब कुछ नहीं रुकेगा, या हम पूरी तरह निराश हो गए हैं... यह एक बड़ा सवाल है, जो हम सबके बीच लगातार बना हुआ है, और तब तक बना रहेगा, जब तक देश की आधी आबादी खुद को असुरक्षित महसूस करती रहेगी...

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शायद ही कोई दिन ऐसा हो, जब अख़बार के पन्ने पलटें और बलात्कार से जुड़ी कोई ख़बर न हो... तीन साल पहले दिल्ली उस गुस्से की गवाह बनी, जो ज़रूरी था... एक मासूम के साथ दिल्ली की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसने सबका सिर शर्म से झुका दिया था... दिल्ली के विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक हज़ारों युवा सड़कों पर निकल आए थे... पुलिस की लाठियों, डंडों से बेपरवाह वे युवा सबके लिए सुरक्षित देश मांग रहे थे... ऐसा देश, जहां लड़कियां बाहर निकलने में न डरें... लेकिन हुआ क्या...? एंटी रेप लॉ मज़बूत हुआ, लेकिन वह सब नहीं रुका, जिसकी उम्मीद सभी ने की थी...

पिछले एक हफ़्ते में तीन ख़बरों ने काफी परेशान किया... एक मासूम को सरेशाम उठा लिया गया, फिर उसके साथ बंधक बनाकर बलात्कार हुआ और आखिरकार गोली मारकर कुएं में फेंक दिया गया... यह सब कुछ राजधानी दिल्ली से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर हुआ... मामले के आरोपी बेशक पकड़ लिए गए हों, लेकिन सवाल यह उठता है कि जब लड़की लापता हुई तो पुलिस ने उसे खोजने की कोशिश की भी या नहीं...

दूसरी ख़बर पश्चिम बंगाल से दिल्ली लाकर बेची गई एक नाबालिग की है... वह ज़ुल्म का शिकार होती रही, एक जगह से दूसरी जगह बेची जाती रही, लेकिन किसी को भी उस पर तरस नहीं आया... अब वह एक अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही है... क्या वाकई पुलिस नहीं जानती, आखिर कौन चलाता है देह का यह धंधा...? क्या वाकई सिस्टम में जिन्हें ज़िम्मेदारी दी गई है, उन्हें नहीं पता कि मानव तस्करी का रैकेट बढ़ता जा रहा है... अगर इन्हें नहीं पता तो ऐसे सिस्टम, ऐसे लचर लोगों को बदलिए, और अगर जानते हुए भी कार्रवाई नहीं की तो इन्हें हटाइए...

तीसरी ख़बर भी एक नाबालिग के साथ गैंगरेप की है... उसे भी अगवा किया गया और ख़बरों की मानें तो छह घंटे तक आरोपी उसे गाड़ी में एक जगह से दूसरी जगह ले जाते रहे और बलात्कार करते रहे... एक कॉन्स्टेबल ने शक होने पर गाड़ी रुकवाई, तब जाकर लड़की की जान बच सकी, और आरोपी पकड़े गए... यह सब कुछ वहां हो रहा है, जिसे सबसे सुरक्षित जगह होना चाहिए, यानी देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास का इलाका...

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लेकिन इन ख़बरों से भी बुरा यह है कि अब सिर्फ ख़बरें आती हैं, उन पर गुस्सा नहीं आता... हम इन्हें पढ़कर यह कहते हुए आगे बढ़ जाते हैं कि बाहर संभलकर निकलना चाहिए... लेकिन अगर हालात आज भी 2012 जैसे ही हैं, तो आखिर बदला क्या...? क्या पुलिस की लाठियां सहकर भी आवाज़ बुलंद करने वाले हार गए और आपराधिक मानसिकता के लोग जीत गए...? यह सवाल नहीं, चुनौती है - हम, आप, सबके सामने... उस बहादुर लड़की को, जिसने हम सबको झकझोरा था, यह समझाया था कि 21वीं सदी में भी यह देश असुरक्षित है, उसे सच्ची श्रद्धांजलि तो यही होगी कि समाज से ऐसे लोगों को हटाया जाए...

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