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क्या सूचना के अधिकार का क़ानून बीमार पड़ गया?

जब राजनीतिक दल, मीडिया कोई साथ नहीं देता है तब इसी आरटीआई के सहारे ये साधारण जनता अपने हक की लड़ाई लड़ रही होती है. सतर्क नागरिक संगठन की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ सूचना आयोगों में करीब 2 लाख से ज़्यादा अपील लंबित है.

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क्या सूचना के अधिकार का क़ानून बीमार पड़ गया?
ब्रिटेन में झूठ बोलने के कारण वहां की आंतरिक सुरक्षा मंत्री अंबेर रूड को इस्तीफा दे देना पड़ा. उन्होंने संसदीय समिति से यह झूठ बोल दिया कि उनकी सरकार का बाहर से आकर बसने वाले इमिग्रेंट को निकालने का कोई लक्ष्य नहीं तय किया है लेकिन जब गार्डियन अखबार ने उन्हीं का लिखा हुआ पत्र छाप दिया जिसमें वे प्रधानमंत्री थेरिसा मे से कह रही हैं कि इमिग्रेंट को निकालना मुश्किल नहीं है. झूठ पकड़ा गया तो मंत्री जी को इस्तीफा दे देना पड़ा. जबकि वे काफी महत्वपूर्ण काम कर रही थीं और प्रधानमंत्री की करीबी मानी जाती थीं. भारत में क्या ऐसा होता है? अभी हाल ही में आपने आधार मामले में एक रिपोर्ट पढ़ी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने जब सरकार से पूछा कि हमने कब कहा था कि मोबाइल नंबर को आधार से लिंक करना अनिवार्य है. जबकि सितंबर 2017 में केंदीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ट्वीट किया था कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि मोबाइल नंबर को आधार से लिंक करना है. सुप्रीम कोर्ट ने जब पूछा गया कि टेलिकॉम विभाग के सर्कुलर में ऐसा क्यों कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मोबाइल सिम को आधार से लिंक करना है. तब सरकार के प्रतिनिधि वकील कुछ और सफाई देने लगे. मंत्री जी ने अपने ट्वीट में जो झूठ बोला था उस पर अफसोस तक ज़ाहिर नहीं किया. यह भारत है. यहां झूठ ही चलता है. भगवान, अल्लाह, गॉड सब माफ कर देते हैं. 1 मई की शाम न्यूज़ चैनलों पर प्रधानमंत्री के 15 मिनट बनाम राहुल के 15 मिनट जैसे जुमले चल रहे होंगे.

कर्नाटक चुनावों के अंतिम चरण में धुआंधार रैली की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि कर्नाटक में आपको जो भाषा पसंद हो, उस भाषा में, हिन्दी बोल सकें तो हिंदी, अंग्रेज़ी बोल सकते हैं तो अंग्रेज़ी. आपकी माताजी की मातृभाषा बोलते हैं तो मातृभाषा. आप 15 मिनट हाथ में कागज लिए बिना कर्नाटक में अपनी सरकार की अचीवमेंट कर्नाटक की जनता के सामने बोल दीजिए. 15 मिनट के भाषण के दरम्यान कम से कम 5 बार श्रीमान विश्वेसरैया जी के नाम का उल्लेख कर दीजिए. बस मीडिया में हेलडाइन बिछ गई कि मोदी ने दिया जवाब राहुल को. बिल्कुल दिया मगर क्या वही कहा जो राहुल ने कहा था. 23 अप्रैल को राहुल गांधी ने कहा था कि नीरव मोदी जी का मामला है, ललित मोदी का मामला है, विजय माल्या का मामला है, राफेल का मामला है, नरेंद्र मोदी पार्लियामेंट में खड़े होने से घबराते हैं. मैं आपको बता रहा हूं 15 मिनट वहां पर मेरी स्पीच करा दो, 15 मिनट वहां मोदी जी के सामने मेरी स्पिच करा दो, 15 मिनट में राफेल की बात करूंगा, नीरव मोदी की बात करूंगा, मोदी जी वहां पर खड़े नहीं रह पाएंगे. हमने दोनों के बयान करीब-करीब हू-ब-हू पढ़े हैं. अब आप अंतर देखिए.

राहुल ने कहा कि राफेल मामला, ललित मोदी और नीरव मोदी के मामले में मोदी जी 15 मिनट भी नहीं टिक पाएंगे. प्रधानमंत्री ने राहुल की इस चुनौती पर कुछ नहीं बोला, 15 मिनट को निकाल कर अपना 15 मिनट रख दिया और अपनी शर्तें भी. टीवी के लिए इससे अच्छा मसाला क्या हो सकता है. दोनों के ही बयान आप ग़ौर से देखेंगे तो ताली बजवाने वाले हैं. जैसे सिनेमा में पहले फ्रंट स्टॉल के लिए कुछ सीन होते थे, एक्शन सीन आते ही ताली बज जाती थी. यही अंतर आपको समझना है. न तो राहुल गांधी अपनी सरकार की उपलब्धि पर 15 मिनट बोलेंगे और न ही प्रधानमंत्री नीरव मोदी, राफेल विमान समझौता पर 15 मिनट. मगर मीडिया में और कल के तमाम हिन्दी अखबारों में आपके सामने 15 मिनट बनाम 15 मिनट की हेडलाइन परोस दी जाएगी. आपको भी आईपीएल मैच की तरह खेल से ज्यादा तमाशे पर मज़ा आएगा.

टीवी इसी तरह से आपको दर्शक बनाता है, मुद्दे को गायब कर देता है और मुद्दे के नाम पर आपके सामने मनोरंजन परोस देता है. टीवी का चरित्र ही यही है. यही पहले भी होता था, यही आज भी हो रहा है और यही कल भी होगा. टीवी के सवाल आपके सवाल बना दिए जाएंगे. आप अपने सवाल भूल जाएंगे. कोई भी इस सवाल पर बहस नहीं करेगा कि पेंशन को लेकर कांग्रेस और बीजेपी की क्या राय है. उनके बीच किस तरह की बहस है, बैंक कर्मचारियों की सैलरी को लेकर, उनके काम करने की स्थिति को लोकर कांग्रेस और बीजेपी में कैसी बहस है, आधार को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच क्या बहस है, दोनों का एंगल क्या है. जब तक आप दर्शक समूह का हिस्सा हैं, किसी भीड़ का हिस्सा हैं आपको वाकई मज़ा आएगा कि राहुल गांधी ने नहला मारा तो मोदी ने भी दहला मार दिया. ये हुआ छक्का. जैसे ही आप भीड़ या समूह से अलग होकर साठ साल की कंसो देवी की तरह अलग होते हैं, आप अकेले पड़ जाते हैं. सिस्टम आपको इस कदर तोड़ देता है कि न तो कांग्रेस आती है न बीजेपी आती है, आपकी मदद के लिए. कंसो देवी दूर दराज़ के गांवों में नहीं रहती हैं बल्कि दिल्ली में रहती हैं. पति की मौत के बाद विधवा पेंशन मिल रही थी लेकिन अचानक बंद हो गई. वो तीन साल ये यही जानने का प्रयास कर रही हैं कि उनकी पेंशन क्यों बंद हुई. 1500 रुपये की पेंशन क्यों बंद हुई यह जानने के लिए उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी. चार साल बीत गए तब सेंट्रल इंफोर्मेशन कमिश्नर ने आदेश दिया कि ग़लती कंसो देवी की नहीं है, अधिकारियों की है. मगर इसके बाद भी कंसो देवी को पेंशन नहीं मिली और न ही अधिकारियों पर जुर्माना लगा.

कंसो देवी की यह हालत क्यों हुई, क्योंकि सूचना के अधिकार के तहत सूचना दिलाने की जवाबदेही जिन संस्थाओं को दी गई है, उन संस्थाओं की इमारतें तो हैं मगर उनमें आयुक्त नहीं हैं. इसी 6 मार्च को दक्षिण दिल्ली के मुनिरका में प्रधानमंत्री मोदी ने केंद्रीय सूचना आयुक्त के फाइव स्टारनुमा मुख्यालय का उदघाटन किया. उदघाटन के वक्त मीडिया रिपोर्ट में इस पांच मंज़िला इमारत को स्टेट ऑफ दि आर्ट बिल्डिंग और पर्यावरण के अनुकूल बताया गया. मगर 60 करोड़ की लागत से बनी स्टेट ऑफ दि आर्ट बिल्डिंग में स्टेट का आर्ट देखिए कि यहां होने चाहिए 11 आयुक्त मगर चार पद खाली पड़े हैं. इस साल के अंत तक चार और रिटायर हो जाएंगे, जिनमें मुख्य सूचना आयुक्त भी हैं. आप प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर जाएंगे तो वहां एक बेहद खूबसूरत बात लिखी है कि पारदर्शिता के ज़रिए ही लोगों को बराबरी का दर्जा जिया जा सकता है. इसके बाद भी यहां 11 के 11 सूचना आयुक्त नहीं हैं. अगर यह इमारत कुछ कम खूबसूरत भी होती है, स्टेट ऑफ दि आर्ट नहीं भी होती और 11 आयुक्त होते तो कंसो देवी जैसी महिला को अपनी पेंशन की सूचना के लिए चार साल चक्कर नहीं लगाने पड़ते.

अब सोचिए केंद्रीय सूचना आयुक्त के मुख्यालय का यह हाल है तो राज्यों में क्या होगा. ह्रदयेश जोशी की रिपोर्ट बताती है कि देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां सूचना आयुक्त के दफ्तर में एक भी आयुक्त नहीं है. क्या यह देश की ज़नता के साथ मज़ाक नहीं है. नियम के अनुसार आबादी और लंबित मामलों को देखते हुए हर राज्य में 11 सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की जा सकती है. आंध्र प्रदेश को बने हुए चार साल हो गए मगर यहां एक भी आयुक्त नहीं है. केरल और उत्तर पूर्व के कई राज्यों में सिर्फ एक ही आयुक्त है. हिमाचल प्रदेश और झारखंड में तो केवल दो ही सूचना आयुक्त हैं. गुजरात, गोवा और असम में तीन-तीन सूचना आयुक्त हैं. यहां भी 8 पद ख़ाली हैं. बिहार में मात्र 4 सूचना आयुक्त हैं, यहां भी 7 पद ख़ाली हैं.

सूचना का अधिकार कोई सामान्य अधिकार नहीं है. अधिकारी जब बिना बात के जनता के काम नहीं करते हैं तो जनता इसी कानून का सहारा लेकर अपना बचाव करती है. लेकिन अगर राज्यों से लेकर दिल्ली तक आयुक्त ही नहीं होंगे तो उस ग़रीब जनता का क्या होगा जो पेंशन, राशन या अन्य तरह की सरकारी मदद के लिए यहां से वहां भटक रही होती है.

35 साल की रीना अनुसूचित जाति से हैं. तलाकशुदा हैं. तीन बच्चे साथ हैं. उन्हें स्कूल भेजना है. फीस कम हो इसके लिए जाति प्रमाण पत्र चाहिए. दिल्ली के दक्षिणपुरी की हैं. राजस्व विभाग ने कह दिया कि बच्चों के पिता का भी जाति प्रमाण पत्र चाहिए. अब वो क्या कर रही हैं, वो सीआईसी गईं. आरटीआई लगाई. दो साल हो गए, अभी तक यह नहीं बताया कि प्रक्रिया क्या है. सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो दो साल से जानकारी नहीं दे रहे हैं.

जब राजनीतिक दल, मीडिया कोई साथ नहीं देता है तब इसी आरटीआई के सहारे ये साधारण जनता अपने हक की लड़ाई लड़ रही होती है. सतर्क नागरिक संगठन की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ सूचना आयोगों में करीब 2 लाख से ज़्यादा अपील लंबित है. इसके आधार पर अंदाज़ा लगाया गया कि देश के तमाम विभागों में 50 लाख से ज्यादा मामले लंबित हो सकते हैं. मतलब सूचनाएं नहीं दी जा रही हैं या फिर देने में देरी की जा रही है. सतर्क नागरिक संगठन का अनुमान है कि बंगाल की हालत यह है कि वहां अगर आप आज आरटीआई लगाएंगे तो चालीस साल बाद आपकी अपील का निपटारा होगा.

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6 मार्च को जब दिल्ली में केंद्रीय सूचना आयुक्त के मुख्यालय का उदघाटन किया गया था तब दि प्रिंट नाम की वेबसाइट ने एक रिपोर्ट छापी थी कि दो साल से आयुक्तों की नियुक्ती नहीं हुई है. सितंबर 2016 में दो पदों के लिए विज्ञापन निकला था मगर किसी की नियुक्ति नहीं हुई. 6 मार्च को मुख्यालय के उदघाटन के वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि 'सिस्टम में जितनी ज़्यादा पारदर्शिता बढ़ती है, सूचना का प्रवाह आसान होता है, उतना ही लोगों का सरकार पर भरोसा बढ़ता है. निश्चित तौर पर सूचना के इस प्रवाह में राष्‍ट्रीय सूचना आयोग की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

जब प्रधानमंत्री भी मानते हैं कि सूचना का प्रवाह आसान होगा तो लोगों का सरकार पर भरोसा बढ़ेगा फिर कंसो देवी जैसी महिला को सूचना पाने में चार साल क्यों लग रहे हैं. क्यों दो साल से सीआईसी के मुख्यालय में आयुक्तों के चार चार पद ख़ाली हैं. यही नहीं, मीडिया रिपोर्ट पढ़ेंगे तो प्रधानमंत्री कार्यालय से आरटीआई के तहत जो सूचना मांगी जाती है उसमें से बड़ी संख्या में जवाब नहीं मिलती है, यही मिलता है कि जानकारी जमा की जा रही है.


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