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मुंबई भगदड़ : यह महज हादसा नहीं, गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हो

ऐसा नहीं है कि रेल प्रशासन को परेल और एलफिंस्टन स्टेशन पर साल दर साल बढ़ रही भीड़ की जानकारी नहीं थी.

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मुंबई भगदड़ : यह महज हादसा नहीं, गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हो
एलफिंस्टन स्टेशन के पादचारी पुल (फुटओवर ब्रिज) पर शुक्रवार को हुई भगदड़ में 22 लोगों की मौत के बाद दादर पुलिस स्टेशन में एडीआर यानी कि दुर्घटना से मौत का मामला दर्ज हुआ है. हालांकि मेरा ऐसा मानना है कि इस मामले में पश्चिम रेलवे प्रशासन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. वहां के संकरे पुल पर लोगों की भीड़ को चढ़ने और उतरने में रोज की मशक्कत को देखकर कोई भी आसानी से अंदाजा लगा सकता था कि कभी भी यहां भगदड़ हो सकती है और उसका अंजाम क्या होगा? जब ये हादसा हुआ तकरीबन उसी दौरान मैं एलफिंस्टन रेल स्टेशन पर ही चर्चगेट की तरफ बने नए पादचारी पुल पर था. अचानक से शुरू हुई तेज बारिश की वजह से लोग उस पुल पर ही खड़े होकर बारिश रुकने का इंतजार कर रहे थे. जैसे-जैसे स्टेशन पर दूसरी लोकल आती भीड़ और बढ़ती जा रही थी. आलम ये था कि बाहर से स्टेशन पर आने के लिए यात्रियों को पुल पर सीढ़ियां चढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी और जाने वाले बारिश में भीगने के डर से पुल से उतर नहीं रहे थे. जो जहां था, वहीं खड़ा था और परेशान भी, क्योंकि दफ़्तर पहुंचने में देर हो रही थी.

कुछ लोग आगे बढ़ने के लिए शोर भी मचा रहे थे. टेलीविजन पत्रकार होने के नाते मुझे अचानक से अपना फर्ज याद आया और पुल के किनारे खड़े होकर अपने मोबाइल से तस्वीर लेने के लिए आगे बढ़ा. इस पर एक बुजुर्ग नाराज होकर भुनभुनाए, 'आ गया भीड़ बढ़ाने.' उन्हें किसी तरह समझाया और मोबाइल से बारिश लोगों लोगों की भीड़ शूट करने लगा. शायद कोई यकीन नहीं करे, लेकिन भीड़ और हालात देखकर उस समय मेरे मन में ये ख्याल आया था कि अगर कहीं भगदड़ मच गई या पुल इतनी भीड़ का भार सह नहीं पाया तो? ये सोचकर शरीर में हल्की सी कंपन हुई और फिर मैं सामान्य हो गया. बिना ये जाने कि उसी स्टेशन के दूसरी तरफ के पादचारी पुल पर भगदड़ हो चुकी है. मैंने भीड़ का वीडियो बनाया और उसे अपलोड किया. इस बीच बारिश कम हुई और भीड़ छंटनी शुरू हुई और मैं भी 3 मिनट दूर ही इंडिया बुल्स के अपने दफ्तर में पहुंचा.

अभी दफ्तर में कदम रखा ही था कि एनडीटीवी अकॉउंट डिपार्टमेंट के मेरे सहयोगी आदिनाथ साखरकर का फोन आया कि परेल स्टेशन से लगे पुल पर करंट लगने से भगदड़ मच गई हुई है. वहां बड़ी संख्या में पुलिस पहुंची है. कुछ लोग मरे भी हैं, ऐसा लोग बता रहे हैं. ये सुनते ही उल्टे पैर मैं तुरंत स्टेशन की तरफ भागा. वहां तब भी अफरातफरी का माहौल था. घायलों को टैक्सी और एम्बुलेंस में भरकर अस्पताल भेजा जा रहा था. वहां का मंजर बहुत ही दर्दनाक था. जैसे-तैसे अपनी भावनाओं पर काबू कर मैं रिपोर्टिंग में जुट गया. मतलब साफ है जब मेरे जैसा एक आम आदमी एलफिंस्टन के पादचारी पुल की भीड़ देखकर हादसा होने का अंदाजा लगा सकता है, तो रेलवे के अधिकारी क्यों नही लगा सकते?

पत्रकार संतोष आंधले ने तो कुछ दिन पहले ही हादसे वाले पुल पर ही लोगों की भीड़ का फोटो लेकर ट्वीट के जरिये हादसे की आशंका जताई थी. शिवसेना के सांसद अरविंद सावंत खुद पत्र लिखकर रेल प्रशासन को अवगत करा चुके थे. हादसे के बाद उसी पुल से फूल मार्केट में रोजाना जाने वाले यात्रियों ने भी बताया कि पुल पर रोज सुबह शाम भीड़ रहती हैं. बड़ी मुश्किल से हम अपना सामान लेकर चढ़ और उतर पाते हैं. बार-बार शिकायत भी की गई है, लेकिन रेल प्रशासन सुनता ही नहीं. कुछ लोगों ने बताया कि परेल स्टेशन पर 5 साल पहले ही तकरीबन एक करोड़ खर्च कर पुल बनाया गया है, लेकिन वो सिर्फ दो प्लेटफॉर्म को जोड़ता है. अगर उसे पश्चिम फूल मार्केट वाले रास्ते से जोड़ दिया गया होता तो आज ये नौबत नहीं आती.

मैं खुद साल 1993 से एलफिंस्टन स्टेशन पर आता-जाता रहा हूं. उस समय 'दोपहर का सामना' में रिपोर्टिंग करता था, तब सिर्फ सुबह और शाम के समय मिल मजदूरों और रेलवे कर्मियों के लिए खास लोकल ट्रेन के समय ही भीड़ होती थी. धीरे-धीरे मिलें बंद होती गईं, और उनकी जगह गगनचुम्बी इमारतों में कॉर्पोरेट दफ्तरों ने ले ली. नतीजा अमूमन खाली रहने वाले दोनों रेलवे स्टेशनों पर भीड़ बढ़ती गई. एक समय आ गया था कि दोनों स्टेशनों के बीच से पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाले अंग्रेजों के जमाने के बने फ्लाईओवर पर चढ़कर स्टेशन के बाहर निकलने लिए बने पुल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों पर भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि उस पर चढ़ने के लिए 3 से 5 मिनट का समय लगने लगा. धक्का-मुक्की और जेब कटने की शिकायतें आम हो गई थीं.

ऐसा नहीं है कि रेल प्रशासन को परेल और एलफिंस्टन स्टेशन पर साल दर साल बढ़ रही भीड़ की जानकारी नहीं थी. उसे पूरी जानकारी थी इसलिए पिछले कुछ सालों में एलफिंस्टन पर दक्षिण की तरफ एक पादचारी पुल बनाया गया और उत्तर की तरफ हादसे वाला पुल भी अभी 10 साल पहले ही पुराने पुल से जोड़कर बनाया गया था. लेकिन भीड़ की तुलना में ये दोनों ही पुल नाकाफी रहे.

हादसे के बाद देर शाम खुद पश्चिम रेलवे ने एक प्रेस रिलीज जारी कर दावा किया कि परेल और एलफिंस्टन स्टेशन को जोड़ने के लिए पुराने पुल के समानान्तर ही 12 मीटर चौड़े एक और पुल बनाने की योजना पहले ही पास हो चुकी है और उसका टेंडर भी निकाला जा चुका है. मतलब ये कि रेल प्रशासन यहां की बढ़ती भीड़ और होने वाली अनहोनी की आशंका से भली-भांति परिचित था. लेकिन उसे पुल बनाने के लिए जितनी तेजी दिखानी चाहिए थी, उतनी तेजी नहीं दिखाई. फिर क्यों ना रेल प्रशासन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हो? ये सिर्फ हादसा नहीं, जान-बूझकर लोगों को रोज मौत के मुंह में भेजने से कम नहीं है. गैर-इरादतन हत्या का मामला यानी कि धारा 304 A जिसमें मंशा नहीं, जानकारी जरूरी होती है... और जो रेल प्रशासन को थी.

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सुनील सिंह, एनडीटीवी के मुंबई ब्यूरो में कार्यरत हैं

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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