'अक्रॉस द लाइन' खेलने की कोशिश में 'विकेट' न गंवा बैठें नवजोत सिद्धू

'अक्रॉस द लाइन' खेलने की कोशिश में 'विकेट' न गंवा बैठें नवजोत सिद्धू

नवजोत सिंह सिद्धू (फाइल फोटो)

पिछले महीने राज्‍यसभा की सदस्‍यता से इस्‍तीफा देने वाले नवजोत सिंह सिद्धू का सियासी करियर 'मंझधार' में फंसा नजर आ रहा है. क्रिकेटर से कमेंटेटर और फिर राजनेता बने सिद्धू ने सिद्धांतों का हवाला देते हुए जब बीजेपी से किनारा किया था तो उनके इस 'मोहभंग' पर किसी को हैरानी नहीं हुई थी.

बादल सरकार के खिलाफ बेहद मुखर थे सिद्धू
प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्‍व वाली पंजाब सरकार के खिलाफ सिद्धू बेहद मुखर थे और इस सरकार में सहयोगी अपनी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा रहे थे. 2014 के आम चुनाव में जब अमृतसर सीट से सिद्धू की जगह अरुण जेटली को टिकट दिया गया तो इन रिश्‍तों की खटास और बढ़ी. ऐसे में स्‍वाभाविक है कि जेटली के चुनाव हारने पर आरोपों के कुछ 'छीटें' सिद्धू पर भी आए.

इस्‍तीफा देकर बड़ा धमाका कर डाला
अलगाव की ओर बढ़ रहे इन रिश्‍तों को लेकर बीजेपी के सामने दुविधा बस यह थी कि वह पंजाब में विधानसभा चुनाव के मौके पर सिद्धू जैसे कुशल वक्‍ता को गंवाना नहीं चाह रही थी. वक्‍तव्‍य कला के धनी सिद्धू अपने जुमलों से लोगों को बांधने की क्षमता रखते हैं. पंजाब में अकाली-बीजेपी गठबंधन के लिए यह चुनावी समर बेहद मुश्किल है. ऐसे में बीजेपी हाईकमान ने सिद्धू को राज्‍यसभा सदस्‍यता देकर संतुष्‍ट करने का प्रयास किया. लेकिन सिद्धू तो सिद्धू ठहरे. राज्‍यसभा से इस्‍तीफा देकर उन्‍होंने बड़ा धमाका कर डाला. बाद में एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में अपना पक्ष रखते हुए उन्‍होंने कहा, 'मैंने इस्तीफा दिया क्योंकि मुझसे कहा गया कि पंजाब की तरफ मुंह नहीं करोगे. आखिर मैं अपनी जड़, अपना वतन कैसे छोड़ दूं.'

बोले, मुझसे पंजाब से दूर रहने को कहा गया
बीजेपी नेतृत्‍व पर निशाना साधते हुए सिद्धू ने कहा 'चार इलेक्शन जीतने के बाद राज्यसभा सीट देकर कहा जाता है कि सिद्धू पंजाब से दूर रहो, लेकिन पंछी भी शाम को घोंसले में लौटता है. राष्ट्रभक्त पक्षी भी अपने पेड़ नहीं छोड़ते. दुनिया की कोई भी पार्टी पंजाब से ऊपर नहीं है और कोई भी नफा-नुकसान हो उसे झेलने के लिए नवजोत सिंह सिद्धू तैयार है. निजी स्वार्थों के लिए उन लोगों को नहीं छोड़ सकता, जिन्होंने मुझे वोट दिया.' हालांकि सिद्धू के इस बयान के बाद बीजेपी ने साफ किया कि पूर्व क्रिकेटर को कभी भी पंजाब से दूर रहने को नहीं कहा गया. पार्टी से जुड़े सूत्रों की मानें तो सिद्धू की महत्‍वाकांक्षा काफी बढ़ गई थी. चूंकि पंजाब में अकाली-बीजेपी गठबंधन को इस समय आम आदमी पार्टी और कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिल रही है, ऐसे में उन्‍होंने किसी 'दूसरी नाव' में सवारी करने का मन बनाया.

'आप' में एंट्री की बात अटकी,  मंझधार में सियासी करियर
चर्चाएं थीं कि सिद्धू, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ज्‍वाइन कर सकते हैं. यह भी कहा गया कि वह 15 अगस्‍त को 'आप' में शामिल हो जाएंगे. बहरहाल अब चर्चाएं हैं कि सिद्धू के 'आप' में प्रवेश को लेकर बात अटक गई है. आम आदमी पार्टी के सूत्रों के अनुसार, सिद्धू चाहते हैं कि उन्‍हें और पत्नी को टिकट देने के साथ उन्‍हें सीएम के चेहरे के रूप में पेश किया जाए. 'आप' सिद्धू की पत्नी को टिकट देने को तैयार है. लेकिन पार्टी के संविधान के हिसाब से एक ही परिवार के दो लोग चुनाव नहीं लड़ सकते. सिद्धू को 'आप' इसलिए भी टिकट नहीं दे सकती, क्योंकि वे रोड रेज के एक मामले में गैर-इरादतन हत्या के दोषी हैं.

बहरहाल सच्‍चाई जो भी हो, यह साफ है कि बीजेपी छोड़ने के बाद सिद्धू अब दोराहे पर खड़े हैं. 'आप' से बात बिगड़ने के बाद उनके कांग्रेस का 'हाथ' थामने की भी अटकलें जोर पकड़ रही हैं. पंजाब के पूर्व सीएम कैप्‍टन अमरिंदर सिंह के बयान के बाद इन अटकलों को बल मिला है. कैप्‍टन ने कहा था कि सिद्धू का कांग्रेस से पुराना रिश्ता रहा है, क्योंकि उनके पिता स्वर्गीय भगवंत सिद्धू पटियाला के जिला कांग्रेस कमेटी में थे. कुूल मिलाकर टीम इंडिया के प्रारंभिक बल्‍लेबाज के तौर पर 'कॉपी बुक' स्‍टाइल में खेलने वाले सिद्धू को सियासी पारी में 'अक्रॉस द लाइन' खेलना भारी पड़ गया है. अक्रॉस द लाइन खेलने की इस कोशिश कहीं वे अपना विकेट (यानी जनाधार) ही न गंवा बैठें...

-आनंद नायक एनडीटीवी ख़बर में डिप्टी एडिटर हैं

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