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तिब्बत में एनडीटीवी इंडिया : चीन ने बदल दी तस्वीर

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तिब्बत में एनडीटीवी इंडिया : चीन ने बदल दी तस्वीर
तिब्बत से लौटकर कादम्बिनी शर्मा :

कहते हैं दुनिया में कहीं भी जाओ, किसी भी देश में, किसी भी प्रांत में, चेहरा मोहरा बदलता जाता है, भाषाएं परंपराएं बदलती जाती हैं, लेकिन इंसान वही रहता है। एक जैसे ही सुख-दुख, प्यार-नफरत का एहसास। एक जैसी ही इच्छाएं, एक शांत बेहतर जीवन की हसरत।

तिब्बत जाकर मुझे भी इस पर विश्वास हो गया। तिब्बत के अंदर से कहीं ज्यादा बाहर से तिब्बत के बारे में खबरें आती रही हैं जिन्हें सुन, देख, पढ़ हम इस जगह के बारे में अपनी धारणाएं बनाते रहे हैं। हाँ मैं भी। तिब्बत जाऊंगी कभी ये सोचा ज़रूर था, लेकिन ये उन इच्छाओं की तरह ही था जिनके बारे में हम ये भी सोचते हैं कि ये तो कभी होने वाला नहीं। और वहाँ जाकर रिपोर्ट करने को मिलेगा, ये तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

दिल्ली के चीनी दूतावास के अधिकारियों से जब भी बातचीत हुई तिब्बत का ज़िक्र ज़रूर आया और हर बार उन्होंने ये ही कहा कि आप खुद जाकर देखें।

आम तौर पर हम तिब्बत के बारे में क्या सोचते हैं, एक ये बेहद खूबसूरत जगह है। दो, चीन ने इस पर कब्ज़ा किया है और तिब्बतियों की हालत बेहद खराब है। कई जगह बौद्ध भिक्षुओं ने खुद को जला लिया है, विरोध में। तीन, ऐसे हालात में 14वें दलाई लामा को तिब्बत छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।

धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार चलती है। लेकिन भारत अब तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है। जब तिब्बत जाने की इजाज़त हमें मिली तो ये सारी चीजें दिमाग में थीं और हमने कई बार पूछा कि क्या किसी चीज़ की रिपोर्टिंग पर कोई बंदिश है, जवाब आया नहीं।

आप समझ सकते हैं कि मेरे मन में कितनी तरह की बातें घूम रही होंगीं क्योंकि जब तक मैं और मेरे सहयोगी उमाशंकर सिंह बीजिंग जाने वाले हवाई जहाज़ में बैठ नहीं गए। मुझे भरोसा नहीं हुआ कि हम तिब्बत जा पाएंगे।

अगले दिन बीजिंग से चार घंटे की उड़ान के बाद हम तिब्बत की धरती पर थे। एअरपोर्ट पर भले ही चेकिंग ज़बर्दस्त रही हो, लेकिन जो लोगों की भीड़ दिखी वो ज़रूर बता रही थी कि या तो पहले से पाली हुई धारणाएं गलत थीं या हालात बदल गए थे। बीजिंग की दिल्ली जैसी गर्मी और उमस हम देख चुके थे और चीनी लोगों का तांता समझ में आ रहा था। यूरोपियन भी अच्छी संख्या में थे।
अक्सर किसी भी जगह के हालात सामान्य होने का बैरोमीटर होता है, सैलानियों का आना। ल्हासा के बारे में लागातार सुनते रहे थे, पढ़ भी रहे थे, जाने के पहले, लेकिन हमारा पहला पड़ाव शनन प्रिफेक्चर था। जिस चीज़ में अंतर का सबसे पहले एहसास होता है वो है, सड़कों की हालत। चमचमाती धूप और चमचमाती साफ अच्छी सड़कें। मन में चलता रहा कि अपने देश में इसी एक चीज़ को देख-देख कर हम कितना कुढ़ते, चिढ़ते, पकते रहते हैं।

खैर शनन में पहले हम एक गाँव में गए। तिब्बत की जनसंख्या कम है, इसलिए ऐसा नहीं है कि हर जगह भीड़ नज़र आती है, लेकिन जैसा हमारे यहाँ छोटी जगहों में होता है, कैमरा कौतूहल जगाता ही है। भाषा की समस्या थी, लेकिन भाव की नहीं। वैसे ही उम्रदराज़ महिलाएं, हँसती हुई, कुछ चेहरा छिपाती हुईं, कुछ कैमरे की नज़र से भाग निकलती हुईं। वहीं, पुरुष कुछ शक की नज़र से देखते हुए, कुछ बड़ी गंभीरता से और कुछ बच्चे।

अलग था, अगर कुछ तो गाँव − घर बड़े सलीके से बनाए हुए खूबसूरत, तिब्बती तरीके से बनाए हुए। पर फिर मन ने कहा− चीनी इसे मॉडल विलेज बता रहे हैं। कम से कम इतना तो होना ही था। वो क्या है ना कि यह मेरी पहली तिब्बत यात्रा थी, तो मन में ये द्वंद्व लगातार था कि जो सामने है, उसे मानूं या जो अब तक सुनते आए हैं वो ढूँढूं। आगे की यात्रा में वो गाँव भी दिखा जो इतना समृद्ध नहीं लगा, लेकिन चीनी अधिकारी साफ तौर पर मान रहे थे कि अभी एक तिहाई प्रिफेक्चर ही इस तर्ज़ पर बनाया जा सका है। कई चीज़ें देखीं इसके अलावा भी।

हस्तशिल्प केंद्र जो देखने में तो ज़रा सा था, लेकिन वहाँ की चीज़ों को जो कीमत मिलती है, सुन कर तो मैं चकरा गई। दिमाग में तुलना लागातार जारी थी कि अपने यहाँ इतनी तरजीह दी जाती ऐसा मार्केटिंग होता तो क्या बात होती। तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर अभी भी वहां के 90 फीसदी लोग भरोसा करते हैं और वैसे ही अस्पताल बनवाया गया है, पैसे दिए गए हैं। देख तिब्बत रही थी, लेकिन संदर्भ भारत के एक आम नागरिक की तरह अपना गुण दोष सोच रहा था।

शनन से ल्हासा तक का सफर भी आँखें खोलने वाला था। एक तरफ ब्रह्मपुत्र नदी, दूसरी तरफ ऊंचे-ऊँचे पहाड़ और बीच में सरसराती सड़क− कभी खुले आसमान के नीचे तो कभी पहाड़ के बीचोंबीच बनी सुरंगों से होते हुए। इस विशाल नदी को नमन तो किया, पर ये भी सोचा कि आपको भी साध ही लिया चीनियों ने। साध नहीं लिया तो और क्या है, ट्रेनों का, सड़कों का जाल प्रकृति के खड़े किए हर चुनौती के बावजूद।

अगर आप ये मानते हैं कि चीन ने तिब्बत पर अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए ये जाल बिछाया है, तो ये भी मानना होगा कि इसके लिए पैसा पानी की तरह बहाया गया है और इनका फायदा तिब्बतियों को भी है। हर तस्वीर के दो रुख तो होते ही हैं।  
हम हफ्तेभर पहले ही खुले ल्हासा−शिगात्से रेलवे लाइन पर भी पहुँचे। 251 किलोमीटर लंबी ये ट्रेन लाइन चिंघाई−तिब्बत रेल लाईन का ही हिस्सा है। अभी वैसे तो यहाँ से एक ही ट्रेन चलती है। सुबह यहाँ से चलती है और शाम को उधर से लौटती है। लेकिन, इंतज़ाम ऐसे की अगर सवारी सौ गुणा बढ़ भी जाए तो शायद ही कोई दिक्कत होगी।

इतना कुछ होने के बाद भी जो एक चीज़ मुझे बड़ी रोचक लगी वो ये कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट की ये कहानी यहीं पर खत्म होती नहीं दिखती। जैसा हाल कॉमनवेल्थ गेम्स के वक्त दिल्ली का दिखता था, वैसा ही नज़ारा हर जगह दिखता रहा और इमारतें और सड़कें बनती जा रही हैं। हमने इस पर चीनी अधिकारियों से सवाल भी किया। पूछा कि इस तरह का निर्माण क्या पर्यावरण के लिए खतरनाक नहीं। लेकिन पता चला कि इस जगह पर निर्माण के लिए पर्यावरण माणक काफी कठिन हैं। तब भी हैरत तो होती है।

दूसरी तरफ ल्हासा है, जिसकी कहानी बिल्कुल अलग है। एक टूरिस्ट स्पॉट सा ही है। सड़कों पर भीड़-भाड़ चहल पहल। और शोटोन फेस्टिवल यानि दही के त्योहार के कारण भी बाज़ारों में काफी गहमागहमी थी। आगे बढ़ने से पहले आपको बता दूँ कि मोल भाव में अगर कोई भारतीयों को टक्कर दे सकता है तो वो चीनी ही हैं। इस शहर में पोटाला पैलेस जो राजनीति सत्ता का केंद्र हुआ करता था और जहां छठे को छोड़ कर 13वें तक सभी दलाई लामा दफन हैं या नोर्बूलिका जो एक विशालकाय बाग है और जहाँ पर 14वें दलाई लामा का समर पैलेस या ग्रीष्म निवास। सब आम लोगों के लिए खोल दिए गए हैं।

सैलानियों के लिए ये आकर्षण का केंद्र तो हैं ही, तिब्बत के आम लोगों के लिए ये आस्था का केंद्र भी हैं। आँखें भले ही कुछ शिकवे करती हों बात ज़ुबां पर नहीं आती। पूरी आज़ादी है, यहाँ आकर दंडवत करने की, अगरबत्ती दिखाने की और इस आज़ादी से शायद कुछ सुकून है, घावों पर कुछ मरहम भी लगा है। और शायद चीन की मंशा भी यही है। एक दो लोग टूटी फूटी हिंदी में हमसे पूछ भी लेते हैं इंडिया और शक्ल पर एक मुस्कान आ जाती है। उनके भी हमारे भी।  

कहने को और भी बहुत कुछ है। लेकिन वो सब तस्वीरों के साथ हमारे खास कार्यक्रम में। दुनिया की छत से… जल्द ही...

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