UPA-2 पर भारी दो साल पुरानी मोदी सरकार, लेकिन विकास की गति पर ब्रेक लगाते कुछ बेबुनियाद मुद्दे

UPA-2 पर भारी दो साल पुरानी मोदी सरकार, लेकिन विकास की गति पर ब्रेक लगाते कुछ बेबुनियाद मुद्दे

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ पीएम मोदी (फाइल फोटो)

नरेंद्र मोदी जब 26 मई 2014 को भारत के 15वें प्रधानमंत्री बने, तो देश के बड़े हिस्से में खुशियां मनाई जा रही थी। इनमें खास तौर से देश का युवा वर्ग शामिल था, जिन्होंने बीते लोकसभा चुनाव में मोदी  का ज़बरदस्त समर्थन किया। अच्छे दिन का नारा लगाकर देश भर में चुनाव प्रचार करने वाले नरेंद्र मोदी की ज़बरदस्त लहर ने देश में कांग्रेस राज्य ख़त्म किया। कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और साल 2009 के चुनाव में 206 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी महज़ 44 सीटों पर सिमट गई। वहीं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को 2009 के चुनाव में 116 सीटों के मुकाबले बीते लोकसभा चुनाव में 282 सीटें मिलीं। लोगों को लगा की नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में अच्छे दिन आ जाएंगे, महंगाई घटेगी, भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा, सारे भ्रष्टाचारी जेल में डाल दिए जाएंगे, देश भर में विकास का एक नया इतिहास लिखा जाएगा और विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस आ जाएगा।

नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री 26 मई यानि गुरुवार को दो साल पूरे कर लिए। इस मौके पर प्रधानमंत्री और एनडीए के सभी मंत्री पूरे देश में जगह-जगह कार्यक्रम कर अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं। देश के सभी न्यूज़ चैनल और अख़बार भी सरकार के कामकाज़ का रिपोर्ट कार्ड छाप रहे हैं। आइए देखते हैं प्रधानमंत्री मोदी ने इन दो सालों में यूपीए की तुलना में देश को क्या दिया-
 
प्रधानमंत्री मोदी के बीते पांच दिनों के कामकाज़ पर नज़र डालें तो 22 मई को वह तेहरान गए और 23 की रात को वापस आए। 24 और 25 मई को दिल्ली में कुछ बैठकें की और फिर 26 मई को सहारनपुर में एक बड़ी रैली को संबोधित किया। 27 मई को शिलॉन्ग में एक ट्रैन का उद्घाटन करने के अलावा कई कार्यक्रमों में शिरकत भी की। नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, शायद ही किसी दिन वो 7 रेसकोर्स रोड स्थित अपने आलीशान आवास में चैन से बैठे हों। अभी बीते पांच राज्यों के चुनाव में रोज़ाना प्रधानमंत्री दो तीन रैलियां करते थे, साथ ही संसद सत्र में भी मौजूद रहते थे और बैठकों में भी बराबर से हिस्सा लेते थे। पीएम मोदी के करीबी कई मंत्रियों का कहना है कि वह चार घंटे से ज़्यादा नहीं सोते हैं। इससे पहले लगातार दस साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह बेहद कम बोलते थे और शांत स्वाभाव के थे। उनके मुकाबले मोदी बेहद चुस्त, तेज़ तर्रार और मेहनती प्रधानमंत्री मामूल पड़ते हैं।
 
आंकड़ें बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था चीन को पछाड़कर 7.6 की दर से आगे बढ़ रही है। डॉलर के मुकाबले रुपया मज़बूत हुआ है और महंगाई दर घटकर लगभग आधी हो गई है। इंश्योरेंस, रेलवे, कॉर्पोरेट, डिफेंस सहित 12 सेक्टरों में विदेशी निवेश के चलते अर्थव्यवस्था और मज़बूत हुई है, जबकि यूपीए की सरकार में अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.5 थी और एक समय रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले घटकर 70 के पार चली गई थी। प्रधानमंत्री मोदी के अब तक के शासनकाल में सोने के दाम नियंत्रित रहे, जबकि यूपीए के ‎समय सोने के दाम लंबे समय तक 30,000 के पार रहे थे। इससे साफ़ ज़ाहिर है कि बीते दो साल में मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था को और मज़बूत किया है।

प्रधानमंत्री मोदी की ऐतिहासिक योजनाएं जैसे गंगा सफाई अभियान, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान, मेक इन इंडिया, प्रधानमंत्री जन धन योजना, स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटी योजना को जमकर सराहा गया और इन योजनाओं को सफल बनाने के लिए सरकार तेज़ी से काम कर रही है। इस एनडीए सरकार ने सफलतापूर्वक कोयला आवंटन एवं स्पेक्ट्रम आवंटन कराए, जबकि इन्हीं आवंटनों में यूपीए सरकार को लाखों करोड़ के घोटाले करने का आरोप झेलना पड़ा था।  सरकार को दो साल हो गए हैं, लेकिन अब तक किसी भी तरह का कोई घोटाला सामने नहीं आया है। इस तथ्यों पर नजर डालने से यह प्रतीत होता है कि पीएम मोदी ने कांग्रेस के मुकाबले देश को एक साफ़ सुथरी सरकार दी है।
 
'मैक्सिमम गवर्नेंस- मिनिमम गवर्नमेंट' की सोच रखने वाले नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में 65 मंत्री हैं और इनमें से कुछ मंत्रियों के काम को काफी सराहा गया है। सुरेश प्रभु के रेल मंत्रालय, पीयूष गोयल ने पिछड़े इलाकों तक में बिजली मुहैया कराने और नितिन गडकरी ने अब तक प्रतिदिन औसतन 31 किलोमीटर की दर से सड़क निर्माण कराकर ज़बरदस्त प्रदर्शन किया है। वहीं कृषि के क्षेत्र में भी केंद्रीय सरकार द्वारा कई सराहनीय कदम उठाया गए हैं। सुषमा स्वराज का विदेश मंत्रालय एवं मनोहर पर्रिकर का रक्षा मंत्रालय भी आए दिन अच्छे कारणों से अख़बारों की सुर्खियों में बना रहता है। हालांकि इन सबके बीच स्मृति ईरानी का मानव संसाधन विकास मंत्रालय आईआईटी, आईआईएम व केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर शिकंजा कसने के कारण सबसे ज़्यादा विवादित रहा। फिर भी मनमोहन सिंह की सरकार के मुकाबले मोदी सरकार अब तक बेहद कारगर रही और सिंह की अपेक्षा मोदी जी का अपने मंत्रियों के साथ संवाद भी काफी बेहतर रहा है।  
 
पीएम मोदी ने इन दो सालों में करीब चालीस देशों की यात्रा की है। भारतीय प्रधानमंत्री के करिश्माई व्यक्तित्व के चलते आज वह ओबामा के बाद ट्विटर पर फॉलो किए जाने वाले दुसरे सबसे बड़े नेता हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस सहित कई बड़े देशों से आज भारत के बेहद निकट संबंध हैं। जबकि मनमोहन सिंह की कमज़ोर छवि के कारण उन्हें यूके की टाइम्स मैगज़ीन ने Under Achiever यानि 'नाकामयाब प्रधानमंत्री' तक का खिताब दिया था। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा नवाज़ शरीफ से लाहौर जाकर मुलाकात करने के बावजूद भी दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव बने रहे और पठानकोट हमले में कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन देकर पाकिस्तान ने भारत की पीठ पर फिर से छूरा घोंपने का काम किया है। वहीं चीन और नेपाल से भी भारत के रिश्ते में कई बार खटास देखी गई।
 
इन दो वर्षों में देश के 11 राज्यों में चुनाव हुए, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गए। महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, असम और जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, जबकि दिल्ली और बिहार के चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। राज्य सभा में बहुमत न होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम बिल जीएसटी लटका हुआ है। इस बिल के पास होते ही महंगाई कम होने एवं अर्थव्यवस्था के और मज़बूत होने के आसार हैं।

इन सारे मापदंडों पर दो साल पुरानी मोदी सरकार पांच साल के यूपीए के कार्यकाल पर भारी पड़ती दिखती है, लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर मोदी सरकार को भारी विवादों एवं देश और दुनिया भर से नाराज़गी का सामना करना पड़ा। बीफ बैन, घर वापसी, गौ रक्षा जैसे आंदोलनों ने पूरी दनिया में सरकार की किरकिरी कराई। मोदी सरकार के कुछ मंत्री व सांसदों ने आए दिन सांप्रदायिक बयान दिए, लेकिन उन पर लगाम लगाने के लिए कोई ख़ास कार्रवाई नहीं हुई। जेएनयू सहित कई विश्वविद्यालयों में बीजेपी से जुड़े कई संगठनों ने जमकर उत्पात मचाया। राम मंदिर जैसे मुद्दों ने बीजेपी और पीएम के विकास के मुद्दों को दबाने की कोशिश की। कुछ दिन देश में असहिष्णुता की हवा भी खूब तेज़ चली। इसलिए पीएम और पार्टी को चाहिए की साम्प्रदायिक बयानबाज़ी और बीफ बन जैसे मुद्दों से लोगों के खाने पीने की आज़ादी पर ग्रहण लगाने की बजाए, सर्फ विकास का नारा पकड़ कर चले। काले धन पर सख्ती बरतने का दावा करने वाले मोदी सरकार अब तक विजय माल्या और ललित मोदी पर नरम दिखाई दी है।

अपने कंधे पर बीजेपी का पूरा  बोझ उठाए प्रधानमंत्री को झुकाने के लिए कई राजनीतिक दल एक हो गए हैं। सोशल मीडिया पर रोज़ाना मोदी भक्त और मोदी विरोधियों के बीच जंग छिड़ी रहती है। लेकिन सही सवाल यह है की क्या दो साल काफी है इस सरकार के रिपोर्ट कार्ड बनाने के लिए? कई लोग कहते हैं की जनता और देश के बुद्धजीवियों को मोदी जी को पांच साल काम करने का मौका देना चाहिए और फिर उनके कार्यकाल का लेखजोखा तैयार करना चाहिए।

नीलांशु शुक्ला NDTV 24x7 में ओबी कन्ट्रोलर हैं...

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