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अब गंगा की फिक्र किसे है?

गंगा से जुड़ी धार्मिकता सिर्फ ललकारने के काम आती है. दूसरों को ललकारने के काम आती है. गंगा के कोई काम नहीं आती है. इसीलिए कहा कि श्रद्धा अपनी जगह मगर वो गंगा के लिए नहीं है.

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अब गंगा की फिक्र किसे है?
प्रो. जी डी अग्रवाल की मौत ने साबित कर दिया है कि गंगा के नाम पर जो राजनीतिक भावुकता पैदा की जाती है वो फर्जी है. गंगा को लेकर कोई भावुकता नहीं है. न गंगा नदी के लिए और न ही गंगा मां के लिए है. प्रो. जी डी अग्रवाल गंगा के लिए स्वामी सानंद हो गए. शायद इसलिए कि इससे जुड़ी धार्मिकता गंगा के सवालों को बड़ा फलक देगी.

गंगा से जुड़ी धार्मिकता सिर्फ ललकारने के काम आती है. दूसरों को ललकारने के काम आती है. गंगा के कोई काम नहीं आती है. इसीलिए कहा कि श्रद्धा अपनी जगह मगर वो गंगा के लिए नहीं है. गंगा के नाम पर ख़ुद के लिए है. प्रो. जी डी अग्रवाल के साथी तो उनके जाने के बाद गंगा के लिए लड़ते रहेंगे मगर समाज जो दावा करता है कि वह गंगा से है, उनके बीच जी डी अग्रवाल की मौत एक मामूली ख़बर भी नहीं है. ख़बर है भी तो कोई हलचल नहीं है. यहां तक कि गंगा की अविरल धारा को लेकर संतों का समागम करने वाले धार्मिक नेताओं ने भी इस खबर को अनदेखा कर दिया है.

पर्यावरण जब पूरी दुनिया के लिए मुद्दा हो तब गंगा के सवालों को लेकर कोई 111 दिनों तक अनशन पर बैठे और जान चली जाए तब उनका निधन गंगा तो छोड़िए पर्यावरण का मुद्दा भी नहीं बना. प्रो. जी डी अग्रवाल का सवाल सिर्फ गंगा को लेकर नहीं था. वह उन पहाड़ों को लेकर था, उस पारिस्थितिकी को लेकर था जिनसे गंगा बनती है, जिनका गंगा के लिए बचा रहना बहुत ज़रूरी है.

एम्स ऋषिकेश ने 54 के करीब लोगों को उनका अंतिम दर्शन करने दिया. शुरू में कुछ देर तक प्रो. जी डी अग्रवाल के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखे जाने को लेकर विवाद हो गया. प्रो. जी डी अग्रवाल के साथ काम करने वाले चाहते थे कि उनके पार्थिव शरीर को जनता के दर्शन के लिए रखा जाए. एम्स का कहना था कि प्रो. अग्रवाल ने अपने जीवन में ही अपना देहदान कर दिया था. इसकी एक प्रक्रिया होती है. इसलिए पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए नहीं रखा जा सकता है. बाद में जब धरने पर कुछ लोग बैठ गए तो राजेंद्र सिंह और कुछ लोगों को भी अंतिम दर्शन करने दिया गया.

मातृसदन का आरोप है कि प्रो. अग्रवाल की हत्या हुई है. संदिग्ध मौत हुई है. लेकिन प्रो. अग्रवाल के परिजनों ने कहा कि उन्हें इस तरह का शक नहीं है. बर्कले के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पीएचडी की थी. आईआईटी कानपुर में पढ़ाया था. 2011 में प्रो. जी डी अग्रवाल स्वामी सानंद हो गए थे. 22 जून से गंगा के लिए उपवास पर बैठे थे. उनके पत्रों से पता चलता है कि सरकार से उनका संपर्क था और सरकार भी उनके संपर्क में थी, फिर ये स्थिति क्यों आई.

प्रो. अग्रवाल ने प्रधानमंत्री को अंतिम उपवास के दौरान तीन पत्र लिखे थे. वे प्रधानमंत्री से उम्र में बड़े होने के नाते उन्हें तुम कह कर संबोधित करते थे. 24 फरवरी और 13 जून को पत्र लिखकर बता दिया था कि गंगा को लेकर उनकी मांगे नहीं मानी गईं तो वे 22 जून से उपवास पर बैठेंगे और प्राण त्याग देंगे. 23 जून को भी एक पत्र लिखा. उसके बाद एक अंतिम पत्र लिखा 6 अगस्त 2018 को.

लिखा, 'मुझे आपसे उम्मीद थी कि आप गंगाजी के लिए दो कदम आगे बढ़ते हुए विशेष प्रयास करेंगे क्योंकि आपने आगे आते हुए गंगा पर अलग से मंत्रालय बनाया था लेकिन पिछले चार वर्षों में आपकी सरकार द्वारा किए गए सभी कार्य गंगाजी के लिए लाभकारी नहीं रहे, लेकिन उनके स्थान पर केवल कारपोरेट क्षेत्र और व्यावसायिक घरानों का लाभ देखने को मिला, अब तक आपने केवल गंगाजी से लाभ अर्जित करने के मुद्दे पर सोचा है, गंगाजी के संबंध में आपकी सभी परियोजनाओं से धारणा बनती है कि आप गंगाजी को कुछ नहीं दे रहे हैं.

3.08.2018 को केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती जी मुझसे मिलने आई थीं. उन्होंने फोन पर नितिन गडकरी जी से मेरी बात कराई. लेकिन प्रतिक्रिया की उम्मीद आपसे है, इसलिए मैंने सुश्री उमा भारती जी को कोई जवाब नहीं दिया. मेरा यह अनुरोध है कि आप निम्नलिखित चार वांछित आवश्यकताओं को स्वीकार करें, दो मेरे 13 जून को आपको लिखे पत्र में सूचीबद्ध हैं. यदि आप असफल रहे तो मैं अनशन जारी रखते हुए अपना जीवन त्याग दूंगा.

मुझे अपनी जान दे देने में कोई चिन्ता नहीं है क्योंकि गंगाजी का काम मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है. मैं आईआईटी का प्रोफेसर रहा हूं तथा मैं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं गंगाजी से जुड़ी सरकारी संस्थाओं में रहा हूं. उसी के आधार पर कह सकता हूं कि आपकी सरकार ने इन चार सालों में कोई भी सार्थक प्रयत्न गंगाजी को बचाने की दिशा में नहीं किया है.'

प्रो. अग्रवाल सीधे प्रधानमंत्री से जवाब और कार्रवाई की उम्मीद कर रहे थे. वे प्रधानमंत्री को साफ-साफ लिखते रहे कि गंगा को लेकर उनकी तमाम नीतियां कारपोरेट को फायदा पहुंचाने के लिए है. ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री प्रो. जी डी अग्रवाल को नहीं जानते थे. उन्होंने भी प्रो. जी डी अग्रवाल के निधन पर शोक जताया है. ट्वीट किया है. प्रधानमंत्री ने 2012 में भी एक ट्वीट किया था, तब भी जी डी अग्रवाल अनशन पर थे और केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी. इस ट्विट में प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा था, 'स्वामी सानंद के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं, जो अविरल, निर्मल गंगा को लेकर अनशन पर हैं. उम्मीद है केंद्र सरकार गंगा को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएगी.' यह ट्विट 19 मार्च 2012 का है.

अफसोस विपक्ष में रहते हुए जिस स्वामी के स्वास्थ्य की कामना करते थे, जब मोदी सत्ता में आए तो स्वामी सानंद यानी प्रो. जी डी अग्रवाल 111 दिनों के अनशन पर बैठे और उनकी मौत हो गई. प्रो. अग्रवाल को उम्मीद थी कि लोकसभा चुनावों में गंगा को मुद्दा बनाने वाले प्रधानमंत्री मोदी कुछ ठोस करेंगे. पहले लोकसभा चुनाव के समय और सरकार में आने के बाद गंगा और यमुना को लेकर प्रधानमंत्री के भाषणों के कुछ अंश सुनिए.

प्रधानमंत्री ने गंगा को भी मां कहा, यमुना को भी मां कहा. क्या प्रधानमंत्री मोदी उसी मथुरा में जाकर कह सकते हैं कि उन्होंने यमुना मां के पानी को साफ कर दिया. दिल्ली वाले खुद भी जाकर देख सकते हैं कि यमुना को लेकर क्या हुआ है. शुरू में गंगा को लेकर काफी गतिविधियां होती थीं. गंगा किनारे आरती होती थी. बनारस में घाट बना. मगर वहां से भी सवाल उठने लगा कि गंगा कहां साफ हुई है. शुरू में इस तरह के कार्यक्रम टीवी के स्क्रीन पर भव्यता प्रदान कर रहे थे मगर धीरे-धीरे चमक फीकी हो गई या खुद प्रधानमंत्री इस मुद्दे से आगे निकल गए. पता नहीं. लेकिन जिन्हें गंगा की चिन्ता थी वो फिर प्रधानमंत्री से सवाल करने लगे कि गंगा कहां है.

आखिर एक पर्यावरणविद को प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीद क्यों नहीं होती. सरकार में आने के बाद भी प्रधानमंत्री ने गंगा को छोड़ा नहीं. आज कल उनके भाषणों में गंगा सुनाई नहीं देती है. लेकिन 30 सितंबर 2014 को उन्होंने काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशन के मंच से भाषण देते हुए कहा था कि वे जनआंदोलन छेड़ना चाहते हैं. गंगा के लिए दुनिया के पर्यावरणविदों का आहवान करते हैं. आप खुद भी प्रधानमंत्री से पूछिए कि गंगा को लेकर वो जनआंदोलन कहां है. उनके रहते एक पर्यावरणविद की मौत कैसे हो गई.

मई 2015 में प्रधानमंत्री ने नमामी गंगे प्रोजेक्ट की घोषणा की. गंगा मंत्रालय बनाया. 6 साल के लिए 20,000 करोड़ का बजट बनाया. प्रो. अग्रवाल को प्रधानमंत्री मोदी के बनाए प्रोजेक्ट से आपत्ति थी. उन्हें लगता था कि ये सब कोरपोरेट के लिए है. 24 फरवरी को प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा उसमें तो जिस तरह से लिखा है वो प्रो. जी डी अग्रवाल जैसा ही शख्स लिख सकता है.

वो लिखते हैं, '2014 के लोक-सभा चुनाव तक तो तुम भी स्वयं मां गंगाजी के समझदार, लाडले और मां के प्रति समर्पित बेटा होने की बात करते थे पर वह चुनाव मां के आशीर्वाद और प्रभु राम की कृपा से जीतकर अब तो तुम मां के ही कुछ लालची, विलासिताप्रिय बेटे-बेटियों के समूह में फंस गए हो और उन नालायकों की विलासिता के साधन जुटाने के लिए जिसे तुम लोग विकास कहते हो, कभी जल मार्ग के नाम से बूढ़ी मां को बोझा ढोने वाला खच्चर बना डालने चाहते हो, कभी ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने किए हल का, गाड़ी का या कोल्हू जैसी मशीनों का बैल.'

गंगा कितनी साफ हुई, यह बात गंगा को मालूम होगी. वर्ना मंत्री रोज़ ट्विटर पर अपडेट करते कि आज गंगा के लिए कहां क्या हुआ. बहुत दिनों से प्रधानमंत्री के भाषणों में भी गंगा को लेकर अब तक हुए काम का ज़िक्र सुनाई नहीं देता है. मध्य प्रदेश की रैली में सुनाई दे तो फिर नर्मदा को लेकर वहां के लोग उत्साहित हो सकते हैं. सीएजी ने दिसंबर 2017 में नमामि गंगे को लेकर एक रिपोर्ट दी थी जिसमें कहा था, 'हमने 87 प्रोजेक्ट के सैंपल की जांच की थी. इनमें से 50 1 अप्रैल 2014 के बाद लांच हुए थे. इन सभी के लिए 7,992.34 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी गई थी. 2014-15 से 2016-17 के दौरान 2,615 करोड़ फंड का इस्तमाल ही नहीं हुआ. किसी प्रोजेक्ट में 8 प्रतिशत ही फंड इस्तमाल हुआ तो किसी में अधिक से अधिक 63 प्रतिशत.'

जो बड़ी टिप्पणी थी वो यह कि नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा ने आईआईटी से करार किया था मगर इसके 6 साल बाद भी कोई दूरगामी योजना बनाने में नाकाम रहा. ये सीएजी ने कहा है. गंगा में गिरने वाले गंदे पानी को साफ करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का काम भी धीमी गति से चल रहा है. दो हज़ार करोड़ से अधिक के फंड का इस्तमाल नहीं हुआ है. यह दिसंबर 2017 की रिपोर्ट है. इस साल अगस्त में डाउन टू अर्थ ने गंगा पर एक रिपोर्ट छापी थी जिसमें साफ-साफ कहा था मार्च 2019 तक गंगा को साफ करने का लक्ष्य है लेकिन गंगा को लेकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय गंगा परिषद की एक भी बैठक नहीं हुई है. अक्टूबर 2016 में यह काउंसिल बनी थी और डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट 29 अगस्त 2018 की है.

दो साल में एक भी बैठक नहीं होती है. अविकल सोमवंशी की रिपोर्ट है कि गंगा नदी में प्रदूषण को रोकने और बचाने के लिए नेशनल गंगा काउंसिल का गठन किया गया था. इसके गजट में है कि साल में एक बैठक तो होगी ही. 2009 में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (NGRBA) बनी थी जिसे भंग कर दिया गया और 7 अक्टूबर 2016 को नेशनल गंगा काउंसिल बनाया गया. मनमोहन सिंह के समय बनी अथॉरिटी की पांच बैठके हुई थीं. प्रधानमंत्री मोदी ने नई काउंसिल तो बना दी मगर दो साल में एक भी बैठक नहीं हुई. डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में है. यह भी 2014 और 2015 में उमा भारती की अध्यक्षता में NGRBA की बैठक हुई थी. जुलाई 2016 में प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में NGRBA की एक बैठक हुई थी मगर नई काउंसिल बनी तो उसके बाद दो साल तक बैठक नहीं हुई. अविकल सोमवंशी ने लिखा है कि नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के महानिदेशक को कई फोन किए मगर कोई जवाब नहीं मिला.

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आप देखेंगे कि आपके हिन्दी अखबारों में गंगा को लेकर भावुकता की बाते होंगी कि गंगा ये हैं, वो हैं मगर गंगा से जुड़ी खबरें इस तरह से विस्तार से शायद ही आपको मिलें जिस तरह से डाउन टू अर्थ ने की थी. इसिलए हिन्दी अखबार और हिन्दी चैनल देखने का तरीका बदल लीजिए. जी डी अग्रवाल का परिवार तीन पीढ़ियों से संघ का समर्थक रहा है. पर्यावरणविद रवि चोपड़ा का कहना है कि खुद जी डी अग्रवाल के संघ के नेताओं से करीबी रिश्ते थे. 12 अगस्त को मातृसदन ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी पत्र लिखा था. नितिन गडकरी ने ट्वीट किया है कि प्रो. अग्रवाल की ज़्यादातर मांगे मान ली गईं थीं मगर प्रो. जी डी अग्रवाल और नदियों को बचाने से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सहमत नहीं हैं.

आप गंगा को लेकर सरकार के किसी मंत्री का बयान सुनिए और हेमंत ध्यानी को सुनिए खुद फर्क कीजिए कि कौन क्या दावा कर रहा है और कौन क्या सवाल कर रहा है. आपको पता चलेगा कि गंगा को लेकर स्लोगन लिखने, नारे लगाने और ज़मीन पर जो हो रहा है उसमें काफी फर्क है. इस बीच हरियाणा के रहने वाले संत गोपालदास भी गंगा को लेकर अनशन पर बैठे हैं. उन्होंने भी 24 जून से बदीनाथ में अनशन शुरू कर दिया. प्रशासन ने उन्हें जोशीमठ और फिर वहां से चमेली भेज दिया. अंत में एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया और खाना खिलाया गया. इसके बाद भी त्रिवेणी घाट पर संत गोपालदास गंगा के लिए अनशन पर बैठे हैं.


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