महामारी, आर्थिक तंगी और स्कूलों की मनमानी फीस से जूझ रहे हैं नोएडावासी

वैश्विक महामारी और देश में लगभग दो महीने से चल रहे लॉकडाउन की वजह से कई लोग मानसिक और आर्थिक परेशानियों का भी सामना कर रहे हैं.

महामारी, आर्थिक तंगी और स्कूलों की मनमानी फीस से जूझ रहे हैं नोएडावासी

निजी शिक्षण संस्थान मनमाने ढंग से फीस भी वसूलते हैं और बेहिसाब मुनाफा भी कमाते हैं

संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) में कहा गया है कि कोई भी शिक्षण संस्थान न कैपिटेशन फी ले सकता है, न अनावश्यक मुनाफाखोरी कर सकता है, लेकिन वह अपने संस्थान को जीवित रखने और बेहतर सुविधाएं देने लिए फीस से कमाई कर सकते हैं. परंतु हमारे देश में निजी शिक्षण संस्थान मनमाने ढंग से फीस भी वसूलते हैं और बेहिसाब मुनाफा भी कमाते हैं. पेंसिल, रबर, कॉपी-किताब से लेकर स्कूल यूनिफॉर्म, जूते, बेल्ट, बैग इत्यादि मनमाने दामों पर जबरन बेचे जाते हैं और उनसे मोटा मुनाफा कमाया जाता है. वैश्विक महामारी और देश में लगभग दो महीने से चल रहे लॉकडाउन की वजह से कई लोग मानसिक और आर्थिक परेशानियों का भी सामना कर रहे हैं. तालाबंदी के कारण बड़ी संख्या में लोग बेरोज़गार भी हुए हैं, बहुतों के वेतन में भी भारी कटौती हुई है और छोटे से लेकर बड़े व्यवसायों तक को भारी नुकसान हुआ है, जिसका असर उनकी रोज़मर्रा की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ रहा है. लोगों को EMI से लेकर बच्चों की स्कूल फीस तक भरना भारी पड़ रहा है. देश के सभी स्कूल व शिक्षण संस्थान पिछले दो महीनों से बंद हैं और लगभग सभी स्कूल ऑनलाइन माध्यम से बच्चों को पढ़ा रहे हैं.

इसी बीच, गौतमबुद्ध नगर में अभिभावक स्कूलों द्वारा मनमाने ढंग से मांगी जा रही फीस का विरोध कर रहे हैं. अभिभावकों का आरोप है कि स्कूलों द्वारा फीस की जो मांग की जा रही है, उसमें पारदर्शिता नहीं है, स्कूल फीस की विस्तृत जानकारी नहीं दे रहे हैं. स्कूल कम्पोजिट फीस मांग रहे हैं, जिसमें ट्यूशन फीस के अलावा अन्य शुल्क भी जुड़े होते हैं - जैसे, वार्षिक फीस, एक्टिविटी फीस, स्पोर्ट्स फीस, कंप्यूटर फीस, एयर कंडीशनर चार्जेज़ जैसे अनेक छिपे शुल्क होते हैं और इनका हिस्सा 25-30 फीसदी तक का होता है. ऑल नोएडा स्कूल पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष यतेंद्र कसाना का कहना है कि स्कूल बंद होने कारण बच्चे जब अन्य सुविधाएं प्राप्त ही नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें फीस में क्यों जोड़ा जा रहा है. वहीं कई परिवार ऐसे भी हैं, जिनकी आमदनी ज़्यादा प्रभावित हुई है. उनकी मांग है लॉकडाउन में जब स्कूल ही बंद हैं, तो कम से कम तीन महीने की फीस तो माफ होनी चाहिए. एसोसिएशन का कहना है कि स्कूल उन्हें यह दलील दे रहे हैं कि वे टीचर्स की सैलरी कहां से देंगे. इस पर पेरेंट्स का कहना है कि स्कूल बैंकों में जमा रिज़र्व्ड फंड्स का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते हैं.

अभिभावक वंदना सचदेवा का कहना है, "यह समय एमरजेंसी से कम नहीं... बिज़नेस बिल्कुल बंद हैं और वेतन में भी कटौती हो रही है... ऐसे में स्कूल ट्यूशन फीस के ऊपर दूसरे चार्जेज़ भी मांगेंगे, तो कैसे चलेगा... ऑनलाइन एक्टिविटी के नाम पर हमसे जो शुल्क लिए जा रहे हैं, कृपया न लें..."

अन्य अभिभावक कपिल अग्रवाल ने कहा, "कोविड-19 महामारी के चलते मेरी मासिक आय मे 30 फीसदी की कटौती हुई है, जिससे मेरी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है... ऐसे में स्कूल द्वारा कम्पोजिट फीस की आड़ में ट्यूशन फीस से अधिक फीस लेना तर्कसंगत नहीं है... मेरा स्कूल प्रशासन से अनुरोध है कि अभिभावकों की स्थिति समझकर सिर्फ ट्यूशन फीस लें..."

पेरेंट्स का यह भी कहना है कि कम्पोजिट फीस में पारदर्शिता खत्म होने से यह मालूम नहीं चल पाता है कि स्कूल ने अंदर ही अंदर फीस में कोई बढ़ोतरी की भी है या नहीं. पेरेंट्स का आरोप है कि स्कूल से फीस की विस्तृत जानकारी मांगने पर वे ईमेल-पत्रों आदि का जवाब तक नहीं दे रहे हैं.

कम्पोजिट फीस के विरोध में अभिभावक संघों ने जिलाधिकारी, विधायक, सांसद और यहां तक कि मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर भी बड़ी संख्या में अपनी शिकायतें दर्ज की हैं. सोशल मीडिया के ज़रिये भी अभिभावक अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन सारी कोशिशों के बावजूद अभी तक कोई राहत नहीं मिली है.

इससे पहले, तालाबंदी के चलते उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी निजी स्कूलों के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए थे, जिनमें कहा गया था कि स्कूल शैक्षणिक वर्ष 2020-21 के लिए फीस में किसी भी तरह की बढ़ोतरी नहीं कर सकते, स्कूल एक साथ तीन महीने की फीस देने के लिए अभिभावकों को बाध्य नहीं कर सकते, स्कूल ट्रांसपोर्ट फीस नहीं ले सकते और न ही किसी छात्र-छात्रा को ऑनलाइन शिक्षा से वंचित रख सकते हैं. स्कूलों द्वारा इन दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी रखा गया था, जिसमें फीस वापसी के साथ पांच लाख रुपये तक अधिकतम जुर्माना और स्कूल की मान्यता के साथ-साथ विकास निधि की अनुमति वापस लिए जाने की बात कही गई थी. इसके बाद एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स ऑफ यूपी व एक अन्य की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई, जिसमें गैर-सहायताप्राप्त स्कूलों को फीस न बढ़ाने के आदेश को चुनौती दी गई. इसमें यूपी आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई. हाईकोर्ट ने एडवोकेट जनरल को नोटिस जारी कर सरकार से इस संबंध में 18 जून तक जवाब मांगा है.

पेरेंट्स का कहना है कि यदि सरकार से उन्हें कोई मदद नहीं मिलती है, तो वे कोर्ट में गुहार लगाएंगे. वहीं दिल्ली समेत कई राज्य पहले ही निजी स्कूलों को कड़े दिशानिर्देश दे चुके है कि वे तालाबंदी के समय न फीस बढ़ा सकते हैं, और केवल ट्यूशन फीस ही ले सकते हैं. यहां तक कि एक ही स्कूल की नोएडा और दिल्ली की ब्रांच की फीस में लगभग 30 फीसदी का अंतर हमें देखने को मिला, जिससे साफ पता चलता है दिल्ली सरकार ने निजी स्कूलों पर फीस वृद्धि को लेकर सख्त नियम और कायदे लागू किए हुए हैं. लोगों का कहना है कि आज जब हर तबका इस संकट की घड़ी में एक दूसरे के साथ सहयोग करने में जुड़ रहा है, ताकि एक दूसरे के नुकसान में हिस्सेदारी ले सके, तो स्कूलों को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए.

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(विपुल पांडेय NDTV इंडिया में सीनियर प्रोड्यूसर हैं और Prime Time से जुड़े हैं... )

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