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माया के लिए अब अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे

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माया के लिए अब अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे

प्रतीकात्मक फोटो.

माया नाम है. सिर्फ नाम में ही ग्लैमर है. वैसे भी बीवियां ग्लैमरस मेड को रखती कहां हैं! बंगाल की है. बांग्लादेशी नहीं है, हिंदू है. पिछली वाली की तरह नहीं है जिसने काम के लिए हिंदू नाम रखा हुआ था. एक दिन हाथ से शीशे का ग्लास छूटा तो मुंह से निकल आया-हाय अल्लाह. खैर इससे हमें फर्क नहीं पड़ता है. वो हमारे यहां अगले एक साल तक काम करती रही.

बात माया की हो रही थी. 55-56 साल की है माया. नोटबंदी के ऐलान के बाद दो दिन काम पर आई ही नहीं. तीसरे दिन आई तो चेहरा लटका हुआ था. काफी कुरेदने के बाद पत्नी को बताया कि गांव में उसने पैसा छुपाकर रखा है. यह पैसा उसने तब के लिए रखा है जब हाथ-पांव चलने बिल्कुल बंद हो जाएं. पति पहले ही चल बसा है. एक बेटी है जिसकी शादी कर चुकी है. बेटी और दामाद भी नोएडा के ही गेझा गांव में रहते हैं लेकिन माया उनसे अलग कमरा लेकर रहती है. नाती-नातिन की देखभाल की जिम्मेदारी माया पर ही है. बेटी-दामाद के काम पर निकलने के पहले माया को घर वापस पहुंचना पड़ता है. लिहाजा वह सुबह 9 बजे तक ही दो घरों में काम कर पाती है.

कहती है कि बेटी भी लालची है और दामाद शराब में पैसे उड़ा देता है. जब बेटी-दामाद अभी नहीं पूछते तो आगे क्या करेंगे. आगे भीख मांगने की नौबत न आ जाए इसके लिए माया ने पैसे इकट्ठे किए थे. परेशानी इस बात की थी कि उसके पास बैंक में खाता नहीं है. वह अकेले बंगाल जा नहीं सकती थी. इसी उधेड़बुन में कुछ और दिन निकल गए. काम पर भी कभी आ रही थी, कभी नहीं. हमने नई कामवाली ढूंढनी शुरू भी कर दी थी. एक हफ्ते बाद आई तो चेहरे की परेशानी उदासी में बदल चुकी थी. माया को बेटी और दामाद को पैसे के बारे में आखिरकार बताना ही पड़ा. बताते ही वे बंगाल रवाना हो गए. माया को नहीं ले गए. वहां जाकर उन्होने फोन भी बंद कर लिए. माया फिर परेशान थी. एक दिन हमारे फोन से कोशिश की तो कॉल लग गया. फोन पर माया बांग्ला में चिल्ला रही थी. पत्नी बांग्ला समझती है. पता चला कि माया के पैसे से उन्होंने गांव में जमीन खरीद ली है. माया की दुनिया उजड़ गई. भविष्य की उम्मीदें टूट चुकी हैं. माया को हमने 'डिजिटल' कर भी दिया तो भी क्या फायदा. सब कुछ तो लुट चुका है. बेटी और दामाद अब तक गांव से नहीं लौटे हैं. माया कहती है कि अब भीख ही मांगना पड़ेगी. हालात बेहतर भी हो जाएं तो क्या, माया जैसों की हालत तो अब कभी नहीं सुधरने वाली. उसके लिए अब अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे. माया माफ करने के मूड में नहीं है. उसने हंसना भी छोड़ दिया है.

बात आलोचना के लिए आलोचना की नहीं है. बात कुछ दिनों की परेशानी की भी नहीं है. बात है कि इस नोटबंदी की मार से समाज का सबसे निचला तबका कभी उबर पाएगा? इस महा-परिवर्तन के मंथन में सबसे ज्यादा पिस कौन रहा है? सवाल है कि क्या कालेधन वाले सचमुच फंस रहे हैं? अर्थशास्त्री तो नहीं हूं लेकिन एक सीधी सी बात जेहन में आई थी. भारत में 51,870 पेट्रोल पंप हैं. इनमें से ज्यादातर राजनेताओं और रसूखदारों या फिर उनके रिश्तेदारों के पास हैं. गैस एजेंसियां भी इन जैसों के पास ही हैं. 500-1000 के पुराने नोट यहां पर करीब 3 हफ्ते तक चले. क्या यहां जमकर वारे-न्यारे नहीं हुए?

साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 640,867 गांव हैं. देश की 68.84 फीसदी आबादी गांवों में रहती है.  26% लोग गरीबी रेखा के अंतरराष्ट्रीय मानक से नीचे रहते हैं. इनसे आप स्मार्टफोन चलाने और कैशलेस बनने की बात कर रहे हैं. अरे मित्रो, इनके पास दो जून का खाना जुटाना भी मुश्किल होता है. कइयों के पास एक जोड़ी से ज्यादा कपड़े तक नहीं होते. नहाने के बाद घंटों तौलिया पहनकर कपड़े सूखने का इंतजार करते हैं. गांवों में रहने वालों की बात तो छोड़िए दिल्ली में हमारे ऑफिस के एटीएम की लाइन में लगा 20 फीसदी स्टाफ पैसे निकालने के लिए दूसरे की मदद ले रहे हैं. कागज के टुकड़े पर पिन नंबर लिखकर रखे होते हैं. ऐसे में 'डिजिटल ट्रांजेक्शन" कितना सुरक्षित है समझा जा सकता है.

महानगरों में रहने वाले मुझ जैसों को नोटबंदी से कोई बड़ी परेशानी नहीं है. पहले से ही नेट और मोबाइल बैंकिंग का इस्तेमाल करते रहे हैं. ऑफिस के एटीएम पर दो घंटे दो-तीन बार लाइन में लगे तो पैसे निकल गए. फिर डेबिट और क्रेडिट कार्ड भी है. बगल में सुपर स्टोर है. काम चल रहा है. लेकिन नुक्कड़ वाले से फल-सब्जी खरीदना छोड़ दिया है. फुचके के लिए 20 रुपये के बेशकीमती नोट नहीं निकल रहे. यहां किसका नुकसान हो रहा है. रेहड़ी-पटरी वालों के सामने सन्नाटा है तो मॉल के सुपर स्टोर में फल-सब्जियों के लिए लाइनें लग रही हैं.

ऐसा नहीं है कि लोग "डिजिटल बस" पर चढ़ना सीख नहीं रहे हैं. कल ही बड़े बच्चे के लिए आरडी शर्मा की किताब लेने गया हुआ था. वहां दुकानदार से एक ग्राहक पेटीएम का इस्तेमाल सीख रहे थे. हमारी सोसाइटी में प्रोविजन स्टोर चलाने वाला कपिल त्यागी भी स्वाइप मशीन ले ही आया है. लेकिन खुश नहीं है. खासकर दूध के कारोबार में "प्रॉफिट मार्जिन" इतना कम है कि कार्ड का कमीशन देने के बाद उसे घाटा उठाना पड़ रहा है.

देश के लिए बलिदान गांवों से आए सिपाही ही देते रहे हैं, इस बार भी कीमत ग्रामीण भारत को ही चुकाना है, अर्बन इंडिया 'कोप' कर गया लगता है. या फिर व्हाट्सऐप जोक की सच मानें तो आदत पड़ती जा रही है.

फिलहाल मीर तकी मीर का एक शेर जरुर याद आ रहा है-

इब्तदा-ए-इश्क रोता है क्या,
आगे-आगे देखिए होता है क्या.


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संजय किशोर एनडीटीवी के खेल विभाग में एसोसिएट एडिटर हैं...
 
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