अब यस बैंक के खाताधारकों पर संकट का साया

इस बैंक ने कई कंपनियों में पैसे लगाए थे, कई निवेशकों के पैसे इस बैंक में लगे हैं. इसके संकट में आने से पूरा एक चक्र भी संकट में आता है. अभी तो हम इस संकट का चेहरा लाइन में लगे खाताधारकों में देख रहे हैं जो इसके 1000 से अधिक ब्रांचों के बाहर लाइन में खड़े हैं.

सिर्फ इतना कह देने से कि खाताधारकों को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, यस बैंक के खाताधारकों को यकीन नहीं हुआ. सुबह हुई तो कई शहरों में यस बैंक के ब्रांच के बाहर खाताधारकों की भीड़ लग गई. प्राइवेट सेक्टर का यह चौथा बड़ा बैंक है. इस बैंक ने दो लाख करोड़ लोन दिए हैं जिसका बड़ा हिस्सा डूब रहा है, जो शायद वापस न आए. मक्वायरी रिसर्च ने लिखा है कि इस बैंक का कोई वैल्यू नहीं है. क्योंकि नेटवर्थ है 25000 करोड़ है. बैंक द्वारा दिए गए लोन का एक बड़ा हिस्सा वापिस आ नहीं सकता इसलिए बैंक का अब कोई मोल नहीं रह जाता. यही नहीं इस बैंक ने कई कंपनियों में पैसे लगाए थे, कई निवेशकों के पैसे इस बैंक में लगे हैं. इसके संकट में आने से पूरा एक चक्र भी संकट में आता है. अभी तो हम इस संकट का चेहरा लाइन में लगे खाताधारकों में देख रहे हैं जो इसके 1000 से अधिक ब्रांचों के बाहर लाइन में खड़े हैं. सितंबर 2019 में पंजाब एंड महाराष्ट्र कोपरेटिव बैंक के खाताधारकों की हालत देखने के बाद यस बैंक के खाताधारकों को सिर्फ यह कह देने से नींद नहीं आने वाली थी कि वे परेशान न हों. रिज़र्व बैंक इसका पुनर्गठन कर रहा है. प्राइवेट सेक्टर बैंक में यह चौथे नंबर का बैंक है. इसकी हालत यहां पहुंच जाएगी बैंक का अध्ययन करने वाले जानते थे. वे 2018 और उससे पहले से भी लिखने लगे थे. ओडिशा के एक मंत्री ने कहा है कि यस बैंक में पुरी के जगन्नाथ मंदिर का भी पैसा जमा है. इस बैंक में लार्ड जगन्नाथ के नाम से 592 करोड़ रुपया जमा है.

इसलिए 6 मार्च की सुबह यस बैंक की शाखाओं के बाहर खाताधारकों की कतार लंबी होने लगी. इनके चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं लेकिन इनकी समस्या पर टीवी के डिबेट में आश्वासन देने वाले चेहरे पर ग़ज़ब की शांति और सौम्यता बिखरी हुई थी. शायद उनमें से किसी का पैसा यस बैंक में नहीं रहा होगा. शाखाओं के बाहर यह कतार बता रही है कि डिजिटल बैंकिंग ने बैंक के काम को कैशलेस और फैसलेस बनाने का जो दावा किया था वो ऐसे वक्त में हवा हो गया है. लोगों को वापस ब्रांच में ही आना पड़ा क्योंकि डिजिटल प्लेटफार्म ने काम करना बंद कर दिया. इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग बंद हो गया. डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड बंद हो गया. खाताधारकों को ब्रांच के बाहर पांच-पांच घंटे लाइन में लगना पड़ा. एक दिन की छुट्टी लेकर तब जाकर 50,000 रुपये मिले. जबकि रिज़र्व बैंक ने कहा था कि 30 दिनों की बात ह. खाताधारकों का पैसा सुरक्षित है. यस बैंक को रिज़र्व बैंक ने अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया है. उसके प्रबंधन को हटा कर नया प्रशासन नियुक्त कर दिया गया है. शुक्रवार को शेयर बाज़ार में यस बैंक के शेयरों की कीमत में भी भारी गिरावट आ गई. इससे यश बैंक के निवेशकों का भी भारी नुकसान हो गया. 29 मार्च 2019 को यस बैंक के एक शेयर की कीमत 276 रुपये थी, एक साल के भीतर एक शेयर की कीमत गिर कर 16 रुपये पर पहुंच गई. ग्राहक और निवेशक दोनों को झटका लगा. रिजर्व बैंक के आदेश के अनुसार मेडिकल और शिक्षा की ज़रूरतों के हिसाब से खाताधारकों को अधिक निकासी की छूट मिल सकती है.

कंपनियों में काम करने वाले लोग मील कार्ड का इस्तमाल करते हैं. कंपनियां टैक्स बचाने के लिए अपने कर्मचारियों को मील कार्ड देती है. इससे वो घर के राशन, पित्ज़ा वगैरह की खरीदारी करते हैं. इसके लिए उनकी सैलरी से पैसा कट जाता है. अब वो भी इस नए संकट में फंस गया है. मील कार्ड वाले कार्ड धारकों को मैसेज आए हैं कि अगली सूचना तक वो इस कार्ड का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. यही नहीं, यस बैंक में कई कंपनियों के कर्मचारियों की सैलरी अकाउंट है. अब उन्हें भी कम सैलरी से संतोष करना होगा. मगर जिनका बिजनेस है वो क्या करेंगे, कैसे अपने बिजनेस का भुगतान करेंगे. दिल्ली के मयूर विहार के पेट्रोल पंप मालिक अजय बंसल की कंपनी की पूंजी फंस गई है.

सरकारी बैंकों का निजीकरण यह कह कर किया जाता है कि प्राइवेट सेक्टर बेहतर करते हैं. लेकिन प्राइवेट सेक्टर इस तरह से भरभरा जाए तब फिर नींद टूटती है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ही बताया कि यस बैंक का संकट 2017 में ही रिज़र्व बैंक और भारत सरकार की नज़र में आ गया था. तब से इसके भीतर बदलाव का प्रयास किया जा रहा है. प्रमोटर को हटाया गया. नया सीईओ लाया गया. बाद में नया प्रशासक लाया गया. सवाल है कि 2017 से लेकर 2020 के बीच हालात बेहतर क्यों नहीं हुए, यह बैंक संकट में ही क्यों फंसा रहा. निर्मला सीतारमण ने बताया कि 2014 से पहले ही यस बैंक का पैसा कुछ कंपनियों में फंसा था.

वित्त मंत्री ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में विस्तार से नहीं बताया कि उन्होंने अनिल अंबानी की कंपनी, एस्सल ग्रुप, दीवान हाउसिंग डेवलपमेंट कारपोरेशन, वोडाफोन का नाम क्यों लिया, इन कंपनियों को यस बैंक ने लोन दिया था, जो एनपीए बन गया यानी लोन वापस नहीं आ सका. इसे दो तरह से समझना चाहिए. ठीक है कि यस बैंक की तरफ से लोन देने में रिस्क का मूल्यांकन नहीं हुआ होगा, लेकिन इन कंपनियों को अपना रिस्क तो पता होगा, क्या उन्होंने लोन हासिल करने में कोई हेराफेरी की. वित्त मंत्री ने यह भी नहीं बताया कि क्या सारा लोन 2014 का ही था जो एनपीए हुआ. द वायर में एम के वेणु ने लिखा है कि यस बैंक का एनपीए 50,000 करोड़ से भी ज्यादा है. वेणु ने जो डेटा ट्वीट किया है उससे पता चलता है कि यस बैंक की देनदारी 2015 के बाद से तेज़ी से बढ़ती है. 2014 में 55,000 करोड़ की देनदारी थी यानि इतना लोन दिया था. 2015 में 75,000 करोड़ की देनदारी हो गई. 2016 में 98,000 करोड़ की देनदारी हो गई. 2017 में 1 लाख 32 हज़ार करोड़ की देनदारी हो गई. 2018 में 2 लाख 3 हज़ार करोड़ की देनदारी हो गई. 2019 में 2 लाख 41 हज़ार करोड़ की देनदारी हो गई.

वित्त मंत्री ने कहा कि 2017 से ही भारतीय रिज़र्व बैंक यस बैंक को मॉनिटर कर रहा था. फिर इस दौरान उस बैंक ने एक लाख करोड़ का अतिरिक्त लोन कैसे दे दिया. जबकि वित्त मंत्री ने कहा कि कर्ज़ देने में प्रक्रियाओं का पालन नहीं हो रहा था, जोखिमों का मूल्याकंन नहीं हो रहा था. यह सब जब हो रहा था तब रिज़र्व बैंक किस तरह से मॉनिटरिंग कर रहा था.

आखिर बैंकों पर निगरानी की क्या व्यवस्था है कि यस बैंक जैसा बड़ा बैंक अपने देनदारी का सही हिसाब नहीं दे रहा था. वो एनपीए का पूरा हिसाब नहीं दे रहा था. यही नहीं जब निगरानी हो रही थी तब राणा कपूर नाम का प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी बेच कर कैसे निकल गया, वित्त मंत्री ने ही कहा है कि सितंबर 2019 में प्रमोटर ने स्टॉक बेच दिया. हम बैंक व्यवस्थाओं की जटिलताओं को नहीं जानते तो हो सकता है कि सवालों में कुछ कमी हो लेकिन सहज बुद्धि से लगता है कि जब 2017 से रिज़र्व बैंक निगरानी कर रहा था, जून 2019 से खुद वित्त मंत्री निगरानी कर रही थीं तब कैसे प्रमोटर अपना हिस्सा बेच कर निकल गए.

ये प्रमोटर राणा कपूर के ट्वीट हैं. इसमें वे एलान कर रहे हैं कि मोदीनोमिक्स उफान पर है उसने अपनी रफ्तार पकड़ ली है. नोटबंदी के तीसरे दिन ही राणा कपूर फैसले को महान बताने में लगे थे. इन चेहरों के सर्टिफिकेट से माहौल बन रहा था कि काफी बड़े लोग इन फैसलों की तारीफ में लगे हैं. तब लोगों को समझ नहीं आया होगा कि यही बड़े लोग उनकी पूंजी का डिब्बा गोल कर रहे हैं. एक दिन उनका यह ट्वीट खंडहर में पीपल के सूखे पत्ते की तरह उड़ रहा होगा और आम आदमी बैंक के बाहर लाइन में लगा होगा अपने ही पैसे को निकालने के लिए. 2014 में राणा कपूर ने लाइव मिंट के लिए एक लेख लिखा था कि अगर वे वित्त मंत्री होते तो क्या होता. छह साल बाद आप दर्शकों को बताने की ज़रूरत नहीं है कि राणा कपूर वित्त मंत्री होते तो क्या करते. वो भले कुछ न करते लेकिन आप अपनी जमा पूंजी गंवा कर दीवालिया होकर टीवी का डिबेट देख रहे होते.

अमरीका का एक बड़ा बैंक है, वेल्स फार्गो. इसके संकट को लेकर कई रिसर्च पेपर आपको इंटरनेट पर मिलेंगे. दूसरे तीसरे पैराग्राफ में इस बात का ज़िक्र मिलेगा कि कैसे मीडिया में इस बैंक के प्रमुख को हीरो बनाया जा रहा था. उन्हें बैंकर ऑफ दि ईयर का पुरस्कार दिया जा रहा था. जैसे भारत में भी साल में अनगिनत बार इस तरह के पुरस्कार कार्यक्रम होते ही रहते हैं. उस बैंक की रैंकिंग अमरीका के सातवें प्रतिष्ठित बैंक की हो रही थी. किसी को भनक नहीं थी कि इन पुरस्कारों और रैंकिंग के गेम के पीछे जनता के पैसे का गेम हो रहा था. मई 2019 में रिजर्व बैंक ने डिप्टी गवर्नर आर गांधी को यस बैंक के बोर्ड में नियुक्ति की थी. मई 2019 से लेकर फरवरी 2020 तक डिप्टी गवर्नर की क्या भूमिका थी. वही बता सकते हैं कि यस बैंक ने जुलाई सितंबर की तिमाही के बाद अपने नतीजे जारी करने बंद कर दिए थे. क्यों ऐसा हुआ था, रिजर्व बैंक की क्या भूमिका था? आम लोगों का जीवन रुक गया है.

इन तमाम संकटों की कहानी शुरू होती है 2018 के साल से जब इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को लोन देने वाली कई वित्तिय कंपनियां डूबने लगती हैं. उनका पैसा जहां लगा था वो डूबा. उनमें जिनका पैसा लगा था उनका डूबा. जैसे दिवान हाउंसिग फाइनेंसिंग कारपोरेशन, हाउंसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रा लिमिटेड. इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के डूबने या संकट में आने के नतीजों को आप यस बैंक या पीएमसी बैंक के संकट से अलग नहीं कर सकते हैं. आपको याद होगा. सितंबर 2019 में. याद कीजिए. पंजाब एंड महाराष्ट्र कोपरेटिव बैंक के खाताधारकों पर भी इसी तरह की रोक लगी थी. हज़ारों लोग सड़कों पर आ गए. तब रिजर्व बैंक ने कहा था कि खाताधारक 10,000 रुपए ही निकाल सकेंगे. उसके बाद 20,000 रुपया महीना हुआ और उसके बाद 50,000 रुपये प्रति महीना हुआ. मुमकिन है कि उनके ही संघर्ष के कारण यस बैंक के खाताधारकों को 30 दिन के लिए 50,000 निकालने की छूट मिली है.

पीएमसी बैक के खाताधारकों की ज़िंदगी बदल गई थी. कई महीनों तक वे सड़कों पर रहे. उनके बीच के कई लोगों की जान सदमे के कारण चली गई. ज़िंदगी रुक गई. यस बैंक के लाखों खाताधारकों को पीएमसी बैंक के खाताधारकों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

पीएमसी बैंक के खाताधारक अब मीडिया के स्पेस से गायब हो चुके हैं. लेकिन उनका संघर्ष भी उसी तरह से जारी है. वे आज भी सीमित मात्रा में पैसे निकाल पा रहे हैं. सरकारी दावे के अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक खाताधारकों ने पीएमसी बैंक से अपना पैसा निकाल लिया है लेकिन जिनका नहीं निकला है वो सितंबर से लेकर अभी तक हर महीने पचास हज़ार से ही काम चला रहे हैं.

एक परिवार का चार लोगों का पैसा पीएमसी बैंक में है. उस परिवार के बुज़ुर्ग दंपत्ति का डेढ़ करोड़ पीएमसी में जमा है. एक हफ्ते पहले बुज़ुर्ग दंपत्ति में से एक का ब्रेन स्ट्रोक हुआ था. सीनियर सिटिजन को अधिकतम एक लाख निकालने की अनुमति है. वे अपना ही पैसा तिल तिल कर निकाल रहे हैं. एक और दंपत्ति ने हमें बताया कि उनके और पति का 16 लाख रुपया पीएमसी बैंक में है. सीनियर सिटीजन होने के नाते महीने में एक लाख निकाल पा रहे हैं. पति की हार्ट सर्जरी होने वाली है. डाक्टर ने तीन चार लाख का खर्च बताया है. इन दोनों ने रिजर्व बैंक को अप्लिकेशन दिया है. अक्तूबर 2019 में ही दिया था मगर उनका कहना है कि अभी तक रिज़र्व बैंक से जवाब नहीं आया है.

रिजर्व बैंक के अनुसार यस बैंक को बचाने के लिए स्टेट बैंक हिस्सेदारी खरीदेगा. जिस यस बैंक में पैसा लगाने के लिए कोई निवेशक नहीं आया, सवाल है कि क्या स्टेट बैंक उसका बोझ उठाने में सक्षम होगा? मीडिया में कई रिसर्च पढ़ने से यही पता चला कि यस बैंक ने जिन कारपोरेट को कर्ज दिया है वो बड़ा हिस्सा चुकाने की स्थिति में नहीं है. आने वाले समय में और भी लोन डिफॉल्ट होंगे. यानी जो लोन चुकाना है वो नहीं चुकेगा. फिलहाल बैंक ने लोन देने पर रोक लगा दी है तो बैंक अपनी कमाई कैसे करेगा. बैंक लोन से ही तो कमाते हैं. फिलहाल अब 30 दिन का ही इंतज़ार करना होगा तब तक इसके खाताधारकों को रिजर्व बैंक और वित्त मंत्री के आश्वासनों पर भरोसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

भारत सरकार ने बैंकों में जमा पैसे का बीमा बढ़ा दिया है. पांच लाख रुपये तक का बीमा है. वित्त मंत्री ने यह भी कहा है कि यस बैंक में जो कर्मचारी हैं उनकी नौकरी और सैलरी एक साल तक के लिए सुरक्षित है. जो लोग यह समझ रहे थे कि इस बैंक में नौकरी कई साल के लिए सुरक्षित है वो अब कम से कम एक साल के सुरक्षित महसूस कर सकते हैं. मुश्किल समय है उनके लिए भी.

 
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