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बंगाल में फिर एक बार ममता सरकार की संभावना!

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बंगाल में फिर एक बार ममता सरकार की संभावना!

ममता बनर्जी (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास का अब तक का सबसे लंबा विधानसभा चुनाव अंतिम चरण के मतदान के साथ बृहस्पतिवार को संपन्न हो गया। इस बात में कोई संदेह नहीं कि 2016 का विधानसभा चुनाव अब तक का न केवल सबसे निष्पक्ष था बल्कि इस चुनाव में किसी दल को न तो अपने विरोधियों को डराने का मौका मिला न ही चुनाव आयोग पर हाथ पर हाथ रखकर मूकदर्शक बने रहने का आरोप लगाने का बहाना मिला। चुनाव आयोग ने साबित कर दिया कि अगर वह चाहे तो चुनाव में धांधली मुश्किल ही बही बल्कि असंभव है।

लेकिन सवाल है कि इस चुनाव में जीत आखिर किसकी होगी और पलड़ा किसका और किन करणों से भारी रहा?  निश्चित रूप से कांग्रेस और वामपंथी दलों में तालमेल होने के बाद तृणमूल की मुश्किल बढ़ी और चुनाव में उसे कड़ी टक्कर आखिरी चरण तक झेलना पड़ी। लेकिन तृणमूल अगर एक बार फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार में वापस आ जाए तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।

सबसे पहले तृणमूल की कमियों की चर्चा कर लेते हैं। तृणमूल कांग्रेस को शारदा और चुनाव के ऐन मौके पर अपने बड़े नेताओं के नारदा स्टिंग जैसे मुद्दे से रूबरू होना पड़ा। इनके कारण उनके विरोधियों को बैठे बिठाए प्रचार में एक बड़ा मुद्दा मिल गया। फिर कोलकाता शहर में बीचोंबीच एक फ्लाईओवर का गिर जाना तृणमूल के लिए मुश्किलों का कारण बना। इसके अलावा कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी नेताओं की गुटबाजी अपने चरम पर थी। लेकिन इसके ममता अपने विरोधियों पर पूरे चुनाव में भारी दिखी। उसका कारण था नारदा और शारदा का प्रभाव ग्रामीण इलाकों में नगण्य था। ग्रामीण इलाकों में सड़क निर्माण, बिजली की अच्छी उपलब्धता, छात्राओं को साइकल और दो रुपये में एक किलो चावल जैसे कार्यक्रम का प्रभाव ग्रामीण  इलाकों में व्यापक दिखा। फिर ममता बनर्जी खुद महिला मतदाताओं की पहली पसंद दिखीं। इस सबसे ऊपर तृणमूल ने पिछले पांच वर्षों  के दौरान अपने कैडर की एक ऐसी फौज तैयार की जो कांग्रेस-वाम एकता पर भारी दिखी।

हालांकि कांग्रेस-वामपंथी एकता के कारण मुस्लिम मतदाता, भले वे उर्दू बोलने वाले मुस्लिम हों या बंगाली मुसलमान, तृणमूल के प्रति उनका 2011 की तरह झुकाव नहीं दिखा। मुस्लिम मतदाताओं के वोट दोनों तरफ गए। हालांकि तृणमूल को मुस्लिम मतदाताओं के वोट अधिक मिले हैं। वामपंथी-कांग्रेस ने तालमेल तो किया लेकिन केरल के चुनाव के कारण शुरू में संयुक्त सभा करने में हिचकिचाहट दिखाई। बाद में राहुल और पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य एक मंच पर आए, लेकिन तब तक मतदान के चार चरण हो चुके थे। इस गठबंधन के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इनके पास ममता बनर्जी के मुकाबले कोई एक चेहरा नहीं था। इसके कारण सरकार के खिलाफ तमाम मुद्दे होने के बावजूद यह अपने परंपरागत वोटों के अलावा नए मतदाताओं, तृणमूल के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब नहीं हो पाए।
   
इस चुनाव में जीत या हार इस बात पर भी निर्भर करेगा कि भाजपा द्वारा 2014 के लोकसभा चुनाव में हासिल 17 प्रतिशत वोट में से ममता या विरोधी सेंध लगाकर कितना वोट अपनी तरफ ला पाए हैं। जीत किसी की हो या हार, कोई  भी यह शिकायत नहीं कर सकता कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए या  चुनाव में धांधली हुई।

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मनीष कुमार एनडीटीवी इंडिया में एक्जिक्यूटिव एडिटर के पद पर कार्यरत हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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