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विचार
  • मुद्रा लोन से 7 करोड़ स्वरोज़गार पैदा हुआ, अमित शाह को ये डेटा कहां से मिला मोदी जी...
    रवीश कुमार
    यह न तंज है और न व्यंग्य है. न ही स्लोगन बाज़ी के लिए बनाया गया सियासी व्यंजन है. रोज़गार के डेटा को लेकर काम करने वाले बहुत पहले से एक ठोस सिस्टम की मांग करते रहे हैं जहां रोज़गार से संबंधित डेटा का संग्रह होता रहा हो. लेकिन ऐसा नहीं है कि रोज़गार का कोई डेटा ही नहीं है.
  • नौकरी की जंग लड़ते जवान-नौजवान, सरकार से मिला भरोसा कब पूरा होगा?
    रवीश कुमार
    लाखों अर्धसैनिक बल सेना की तरह समान पेंशन और वेतन की मांग को लेकर सड़क पर हैं, यूपी के 8000 बीटीसी शिक्षक नियुक्ति पत्र मिलने के इंतज़ार में धरने पर बैठे हैं, इन्हीं के साथ 4000 उर्दू शिक्षक नियुक्ति पत्र के इंतज़ार में सड़क पर हैं, पौने दो लाख शिक्षा मित्र समय से वेतन मिलने और 10,000 से 40,000 होने की मांग को लेकर दर दर भटक रहे हैं.
  • ड्रग्स माफ़िया के आगे अमरिंदर सरकार बेबस?
    रवीश कुमार
    जो पुलिस पंजाब में नशे के तस्करों पर लगाम लगाती अब सरकार उसी की जांच करेगी कि पुलिस में से कितने नशे के ग़ुलाम हो चुके हैं. पुलिस ही नहीं पंजाब के सरकारी कर्मचारियों की जांच होगी कि वे नशा लेते हैं या नहीं. सरकार को भी सरकार से लड़ना पड़ रहा है.
  • केएल राहुल: नए आक्रमण का नया राजकुमार!
    मनीष शर्मा
    केएल राहुल ने पिछले करीब एक-दो सालों में अपने ऊपर जर्बदस्त काम किया. एक वक्त राहुल के छक्के सीमारेखा पार नहीं कर पाते थे. कोच से बात की, तो जवाब आया-‘स्टेडियम से बाहर गेंद पहुंचाने का लक्ष्य लेकर काम करो’, नतीजा सामने है. टॉप एज (बल्ले का बाहरी किनारा), फ्लिक से गेंद सीमारेखा से कहीं आगे गिर रही है
  • कितना कारगर होगा सोशल मीडिया की 'स्वच्छता' का अभियान?
    अखिलेश शर्मा
    सोशल मीडिया पर फैलता अफवाहों का जाल समाज के ताने-बाने को बुरी तरह से तहस-नहस कर रहा है. लोग आंखें मूंद कर व्हाट्सऐप या ऐसे ही दूसरे प्लेटफॉर्मस पर आई झूठी बातों, फर्जी खबरों और अफ़वाहों पर भरोसा कर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं.
  • एक जैसे है रंगभेद और जातिवाद...
    कादम्बिनी शर्मा
    मेरी आंखें बार-बार भर आ रही थीं. उन पुरानी तस्वीरों, अखबार की कतरनों को देख-पढ़ कर सिहर जा रही थी. ये अमेरिकी इतिहास का सबसे डरावना और शर्मनाक पन्ना है. अमेरिका के अलबामा राज्य के मौंटगोमरी शहर में 26 अप्रैल, 2018 को खोला गया लेगेसी म्यूज़ियम ठीक उस जगह पर बना है जहां एक गोदाम में अफ्रीकी-अमेरिकी गुलामों को रखा जाता था.
  • आम चुनाव 2019 : BJP की चुनौती
    मनोरंजन भारती
    2019 जैसे-जैसे नज़दीक आता जा रहा है, राजनैतिक हालात भी बदलते जा रहे हैं... कहा जा रहा है कि बिहार में नीतीश कुमार BJP से खुश नहीं हैं, और इसकी वजह है सीटों के बंटवारे को लेकर बयानबाजी... मगर अब देखते हैं कि 2014 से लेकर अब तक जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें BJP और उसके सहयोगी दलों की क्या हालत रही है.
  • सरकार दिखा रही है अदृश्य रोज़गार के अप्रत्यक्ष आंकड़े...
    सुधीर जैन
    अपनी केंद्र सरकार बेरोज़गारी के मोर्चे पर बुरी तरह फंसी है. अब तक तो यह कहकर काम चल जाया करता था कि रोज़गार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब सरकार के कार्यकाल का लगभग सारा समय ही गुज़र गया है, सो, अचानक ये दावे किए जाने लगे हैं कि सरकार ने कितने करोड़ लोगों को रोज़गार दे दिया.
  • हमारे जंगल का समाज
    जंगलों को जब बहुत क़रीब से देखो तो वो जंगल नहीं लगते, एक समाज सा लगते हैं इंसानी समाज से ज़्यादा व्यवस्थित, ज़्यादा उदार, ज़्यादा सभ्य. हमारे समाज में अपनी ज़रूरत से ज़्यादा खाने की भूख होती है लेकिन जंगल का समाज उतना ही उपभोग करता है जितनी पेट इजाज़त देता है. इस जंगली समाज का क़रीब से अध्ययन करते हुए हमें कई दिलचस्प बातें पता चलती हैं. ऐसी ही एक जानकारी संक्षेप में आपसे बांटना चाहती हूं. 
  • फीफा विश्वकप में इस बार अप्रवासियों का है बोलबाला
    मनोरंजन भारती
    फुटबॉल के लिहाज से ये अप्रवासी यूरोप के लिए वरदान से काम नहीं हैं. जहां तक देशों की बात करें, तो फ्रांस और स्विट्रजलैंड की आधी टीम अप्रवासियों से ही बनी है. 
  • दिल्ली में अधिकारों को लेकर खींचतान अब ख़त्म होगी?
    रवीश कुमार
    दिल्ली को राज्य तो नहीं मिला मगर कौन राज करेगा उसका हिसाब आज साफ हो गया. लेफ्टिनेंट गवर्नर के सहारे दिल्ली सरकार न चलने देने का जो खेल दो साल से चला है, उस खेल को सही ठहराने के तमाम तर्कों के कंकाल आपको टीवी चैनलों के आर्काइव में मिल जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले से भले कुछ न बदले ऐसा कहने वाले वही कह सकते हैं, जिन्हें अब भी भरोसा है कि कभी विधायकों की सदस्यता खत्म करने की चाल से तो कभी गवर्नर के बहाने दिल्ली में खेल अब भी खेला जाएगा. फिर भी लंबे समय के लिए दिल्ली के संवैधानिक आसमान पर छाई धुंध छंट गई है. अब दिल्ली का वक्त इस सवाल को लेकर बर्बाद नहीं होगा कि मुख्यमंत्री सरकार चलाएंगे या लेफ्टिनेंट गवर्नर.
  • क्या साफ हो गया कि दिल्ली का 'बॉस' कौन?
    मनोरंजन भारती
    कोर्ट ने कहा है कि एलजी दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं, मगर यह भी कोर्ट ने साफ कर दिया कि अराजकता और तानाशाही के लिए भी कोई जगह नहीं है और जमीन और कानून व्यवस्था एलजी के पास ही रहेगा. लेकिन क्या यह साफ हो गया है कि दिल्ली का बॉस कौन है..?
  • फीफा वर्ल्ड कप : अंतिम 16 की जंग
    मनोरंजन भारती
    फीफा वर्ल्ड कप अब क्वार्टर फाइनल के दौर में है. आठ सबसे अच्छी टीमें यहां तक पहुंची हैं जिसमें उरूग्वे का मुकाबला फ्रांस से, ब्राजील भिड़ेगी बेल्जियम से तो रूस खेलेगी क्रोसिया से और इंग्लैंड बनाम स्वीडन होगा. कई बड़े खिलाड़ियों की टीम इस वर्ल्ड कप से बाहर हो गई हैं.
  • शिक्षामित्रों की समस्या का समाधान कैसे निकले?
    रवीश कुमार
    यह कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, हर प्रदेश में ऐसी कहानी होगी जहां कर्मचारी कई साल तक सरकार के अलग-अलग विभागों में काम करने के बाद बाहर फेंक दिए जाते हैं. 10 साल, 20 साल सरकार के यहां नौकरी करने के बाद बाहर फेंक दिए गए ये लोग सचिवालयों और ज़िलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना देते हुए नज़र आते हैं. ऐसा नहीं है कि ये अदालतों से नहीं जीतते, जीतने के बाद भी इनकी नियुक्ति नहीं होती है और अगर हार गए तो कोर्ट के फैसले का बहाना बनाकर हमेशा के लिए इनकी सुनवाई बंद कर दी जाती है.
  • 2019 का मुद्दा- मोदी हटाओ बनाम सुशासन और विकास
    अखिलेश शर्मा
    पीएम मोदी कहते हैं कि महागठबंधन की तुलना 1977 और 1989 से करना ठीक नहीं है क्योंकि 77 में विपक्ष आपातकाल के खिलाफ एक हुआ था तो वहीं 89 में बोफोर्स के भ्रष्टाचार के खिलाफ.
  • 'संजू' क्यों राजू हिरानी की सबसे कमज़ोर फ़िल्म है...
    प्रियदर्शन
    'संजू' फिल्म का खलनायक कौन है...? राजू हिरानी के मुताबिक वह प्रेस, जो सूत्रों के मुताबिक या प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर अफ़वाहों को ख़बरों की तरह पेश करता है. मीडिया से इस शिकायत को फिल्म में इतनी अहमियत दी गई है कि फिल्म का अंत बाकायदा एक गाने से होता है, जिसमें मीडिया का मज़ाक बनाया गया है. यह सच है कि मीडिया कई बार गैरज़िम्मेदार ढंग से पेश आता रहा है. वह कई बार अपनी ताक़त के नकली गुमान में रहता है. कई बार दूसरे ताकतवर लोग भी उसका यह भरम बनाए रखने में मददगार होते हैं. कई बार यह लगता है कि इन ताकतवर लोगों को ईमानदार नहीं, एक बेईमान मीडिया ही चाहिए, समझदार नहीं, सनसनी वाला मीडिया ही चाहिए.
  • कौन और क्यों उकसा रहा है इस भीड़ को?
    रवीश कुमार
    जिस भीड़ के ख़तरे के बारे में चार साल से लगातार आगाह कर रहा हूं, वो भीड़ अपनी सनक के चरम पर है या क्या पता अभी इस भीड़ का चरम और दिखना बाकी ही हो. कभी गौ रक्षा के नाम पर तो कभी बच्चा चोरी की अफवाह के नाम पर किसी को घेर लेना, मार देना, आसान होता जा रहा है.
  • पीएम पद- विपक्ष में एक अनार, दो बीमार
    अखिलेश शर्मा
    विपक्षी पार्टियों के नेताओं में प्रधानमंत्री पद के लिए होड़ और दौड़ शुरू हो गई है. कम से कम बयानबाजी के दौर से तो ऐसा ही लगता है. कहते हैं एक अनार सौ बीमार, लेकिन प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर फिलहाल तो एक अनार दो बीमार की बात ही लगती है.
  • दिल्ली में पेड़ों की कटाई : आसमान में दावे, ज़मीन पर सच्चाई
    शरद शर्मा
    दिल्ली में बीते हफ़्ते पेड़ों की कटाई पर खूब चर्चा रही. हज़ारों पेड़ काटे जाने की ख़बर सुर्खियों में आई तो सरकार पर तोहमत आई. लिहाज़ा सरकार ने भी लंबे लंबे दावे करके ये बताने की कोशिश कि सब ठीक है, हल्ला मचाना गलत है. लेकिन सरकार के दावों और ज़मीनी हक़ीक़त में कितना अंतर होता है ये मैंने भी तब जाना जब सरकार के हवाई दावों की तह में गया.
  • मंदसौर की घटना के बहाने चुप्पी पूछने का खेल खेलने वालों का इरादा क्या है?
    रवीश कुमार
    बलात्कार की हर घटना हम सबको पिछली घटना को लेकर हुई बहस पर ला छोड़ती है. सारे सवाल उसी तरह घूर रहे होते हैं. निर्भया कांड के बाद इतना सख़्त कानून बना इसके बाद भी हमारे सामने हर दूसरे दिन निर्भया जैसी दर्दनाक घटना सामने आ खड़ी होती है.
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