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विचार
  • छठ पर विशेष : येल यूनिवर्सिटी के म्यूज़ियम में कैसे पहुंची बिहार से सूर्य की कलाकृति 
    रवीश कुमार
    क्या छठ  (Chhath Puja) का संबंध बौद्ध परंपराओं से रहा होगा? जिस तरह से छठ में पुजारी की भूमिका नगण्य है, उससे यह मुमकिन लगता है. क्या छठ बौद्ध परंपरा है जिसे बाद में सबने अपनाया. मेरी यह टिप्पणी बिना इतिहास के संदर्भों से मिलान किए हुए है, इसलिए कुछ भी आधिकारिक नज़रिए से नहीं कह रहा.
  • क्या भारत में पत्रकारों के सवालों पर अंकुश नहीं?
    रवीश कुमार
    अमरीका में मध्यावधि चुनाव के नतीजे आए हैं. उन नतीज़ों पर अलग से चर्चा हो सकती है, होनी भी चाहिए लेकिन एक बात की चर्चा हिन्दुस्तान के पत्रकारों के बीच ज़्यादा है. उनके बीच भी है जो भारत की मीडिया को गोदी मीडिया में बदलते हुए देख रहे हैं.
  • रौशनी के अंधेरे में अल्पमत-अल्पसंख्यक सा अकेला खड़ा रहा सुप्रीम कोर्ट
    रवीश कुमार
    सुप्रीम कोर्ट का आदेश व्यावहारिक नहीं था. सरकार अगर आदेशों को लागू न करे तो सुप्रीम कोर्ट का हर आदेश ग़ैर व्यावहारिक हो सकता है. एक दिन ये नेता यह भी कह देंगे कि सुप्रीम कोर्ट का होना ही व्यावहारिक नहीं है. हमें जनादेश मिला है, फैसला भी हमीं करेंगे. पटाखे न छोड़ने का आदेश 23 अक्तूबर को आया था मगर भीड़ की हिंसा पर काबू पाने का आदेश तो जुलाई में आया था. कोर्ट ने ज़िला स्तर पर पुलिस को क्या करना है, इसका पूरा खाका बना दिया था. फिर भी दशहरे के बाद बिहार के सीतामढ़ी में क्या हुआ.
  • राम मंदिर का मुद्दा फिर क्यों गर्माने लगा है?
    रवीश कुमार
    2019 से पहले 1992 आ रहा है बल्कि आ चुका है. इंतज़ार अब इस बात का है कि प्रधानमंत्री नरेंद मोदी कब 1992 के इस सियासी खेल में उतरते हैं. 2014 में प्रधानमंत्री की उम्मीदवार के तौर पर नरेंद मोदी के भाषणों को याद कीजिए, क्या आपको कोई भाषण याद आता है जो मुख्य रूप से राम मंदिर पर केंद्रित हो.
  • क्या कहता है कर्नाटक...
    मनोरंजन भारती
    कनार्टक में पांच सीटों पर उपचुनाव हुए हैं जिनमें से चार सीटों पर कांग्रेस-जेडीयू गठबंधन ने जीत दर्ज की है. कर्नाटक में विधानसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हुए जिसमें जामकंडी सीट को कांग्रेस के न्यामागौड़ा ने करीब 40 हजार वोटों से जीता. जबकि रामनगरम की सीट को मुख्यमंत्री की पत्नी अनिता कुमारास्वामी ने एक लाख वोटों के जीता.
  • राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में फोन बांटने का खेल क्या है?
    रवीश कुमार
    हमारे वक्त की राजनीति को सिर्फ नारों से नहीं समझा जा सकता है. इतना कुछ नया हो रहा है कि उसके अच्छे या बुरे के असर के बारे में ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो रहा है. समझना मुश्किल हो रहा है कि सरकार जनता के लिए काम कर रही है या चंद उद्योगपतियों के लिए.
  • बड़े डिफॉल्टरों पर आरबीआई इतना मेहरबान क्यों?
    रवीश कुमार
    भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल को उन लोगों के नाम बताने में क्या परेशानी है जिन्होंने 50 करोड़ से लेकर 1 लाख करोड़ तक के लोन नहीं चुकाए हैं. भारतीय रिज़र्व बैंक कौन होता है उनकी इज्ज़त या साख की चिन्ता करने वाला वो भी जो बैंक का लोन नहीं चुका रहे हैं.
  • क्या सरकार की नज़र भारतीय रिज़र्व बैंक के रिज़र्व पर है?
    रवीश कुमार
    भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 2010 में अर्जेंटीना के वित्त संकट का हवाला क्यों दिया कि केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच जब विवाद हुआ तो केंद्रीय बैंक के गवर्नर से इस्तीफा दे दिया और फिर वहां आर्थिक तबाही मच गई. एक समझदार सरकार अपने तात्कालिक सियासी फायदे के लिए एक ऐसी संस्था को कमतर नहीं करेगी जो देश के दूरगामी हितों की रक्षा करती है.
  • क्या एबीवीपी तय करेगा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर?
    रवीश कुमार
    हमने कब ऐसे भारत की कल्पना कर ली कि किस यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर कौन होगा यह सत्ताधारी दल का छात्र संगठन अखिल विद्यार्थी परिषद तय करेगा और यूनिवर्सिटी मान लेगी. क्या आप वाकई ऐसा भारत चाहते थे, चाहते थे तो इस बात को खुलकर क्यों नहीं कहा या क्यों नहीं कहते हैं कि यूनिवर्सिटी में या तो पढ़ाने के लिए प्रोफेसर ही नहीं होंगे और अगर होंगे तो वही होंगे जिसकी मंज़ूरी एबीवीपी की चिट्ठी से मिलेगी.
  • नीतीशजी अब कार्रवाई में चूके तो आपका ‘इक़बाल‘ नहीं रह जाएगा
    मनीष कुमार
    बिहार के मुख्यमंत्री के पास दो पूंजी हैं एक सुशासन और दूसरा उनकी व्यक्तिगत ईमानदार नेता की छवि जो भ्रष्टाचार और गलत कमाई से कोसों दूर रहता है. लेकिन सुशासन बाबू नीतीश कुमार को शुक्रवार को उनके ही दो पुलिस कर्मियों ने वह भी उनके नाक तले राजधानी पटना में चुनौती दी, जब एक महिला पुलिसकर्मी की डेंगू से हुई मौत के बहाने जमकर हंगामा किया गया.
  • शाहरुख खान: रोमांस अभी बाकी है  मेरे दोस्त !!
    मनीष शर्मा
    यह वह समय था, जब भाग्य शाहरुख से चार कदम आगे चल रहा था! जरा कल्पना कीजिए अगर शाहरुख की साइन की पहली फिल्म दिल आशना है पहले रिलीज हो जाती होती, तो क्या होता? यह करीब 1988 का समय था, जब हेमा मालिनी प्रोडक्शन हाउस से शाहरुख के पड़ोसी के घर फोन आया
  • भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में दखल क्यों?
    रवीश कुमार
    जब स्वदेशी जागरण मंच भारतीय रिजर्व बैंक को सलाह देने लगे कि उसे क्या करना है तो इसका मतलब यही है कि भारत में ईज ऑफ डूइंग वाकई अच्छा हो गया है. नोटबंदी के समय नोटों की गिनती में जो लंबा वक्त लगा, रिज़र्व बैंक ने सामान्य रिपोर्ट में नोटबंदी पर दो चार लाइन लिख दी, तब किसी को नहीं लगा कि उर्जित पटेल को इस्तीफा दे देना चाहिए. बल्कि तब रिजर्व बैंक को भी नहीं लगा कि सरकार हस्तक्षेप कर रही है. उसकी स्वायत्तता पर हमला हो रहा है. सबको उर्जित पटेल अर्जित पटेल लग रहे थे. अब उर्जित पटेल का इस्तीफा भी मांगा जा रहा है और उनके भी इस्तीफा देने की ख़बर आ रही है. 
  • गैर कांग्रेसवादियों का कांग्रेस के पक्ष में आना क्या कहता है...
    मनोरंजन भारती
    राहुल गांधी और चंद्रबाबू नायडू का एक साथ आना फोटो खिंचवाना और साथ साथ संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करना ये अपने आप में देश के मौजूदा हालात को बयान करने के लिए काफी है...साथ ही इस तस्वीर से कांग्रेस के तमाम सर्मथकों ने भी राहत की सांस ली होगी...यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि तेलुगू देशम पार्टी जैसे दलों का जन्म ही कांग्रेस विरोध के चलते हुआ था...
  • क्या हम पटेल के विचारों की ऊंचाई भी छू पाएंगे?
    रवीश कुमार
    आज सरदार का दिन है. जन्मदिन है. हम सबके सरदार दुनिया में सबसे ऊंचे हो गए हैं. जन्मदिन पर सरदार को एक नई सोहबत मिली है. दुनिया की ऊंची प्रतिमाओं की सोहबत मिली है. अब उनकी तुलना जिन प्रतिमाओं से होगी उनमें उनकी प्रतिमा नहीं है, जिनके साथ और जिनके पीछे सरदार सरदार बने रहे. मतलब सरदार गांधी और नेहरू से अलग इन प्रतिमाओं की सोहबत में भी खूब चमक रहे हैं. फकत 3000 करोड़ से ही सरदार पटेल की प्रतिमा दुनिया में सबसे ऊंची हो गई. 3000 करोड़ सुनकर अफसोस न करें. सोचें कि आपने स्कूल कॉलेज या अस्पताल के लिए कब संघर्ष किया. कब लाइब्रेरी की मांग की.
  • ठीकरा फुड़वाने के लिए रिजर्व बैंक अपना सिर तैयार रखे...
    सुधीर जैन
    देश की माली हालत को लेकर रहस्य पैदा हो गया है. रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच कुछ चल पड़ने की खबरें हैं. क्या चल रहा है? ये अभी नहीं पता. उजागर न किए जाने का कारण यह है कि आम तौर पर रिजर्व बैंक और सरकार के बीच कुछ भी चलने की बातें तब तक नहीं की जातीं जब तक सरकार कोई फैसला न ले ले. लेकिन हैरत की बात ये है कि सरकार ने आश्चर्यजनक रूप से रिजर्व बैंक के बारे में एक बयान जारी किया है. कुछ गड़गड़ होने का शक पैदा होने के लिए इतना काफी से ज्यादा है. 
  • संवैधानिक संस्थाओं की साख बची रहने दें जेटली जी 
    प्रियदर्शन
    यह 2015 का साल था जब वित्त मंत्री अरुण जेटली राज्यसभा की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहे थे. उनका कहना था कि जनता की चुनी हुई लोकसभा के पारित विधेयकों पर राज्यसभा को सवाल उठाने का हक़ नहीं है. तब लोकसभा के स्पीकर रहे सोमनाथ चटर्जी ने भी इसकी आलोचना की थी और कांग्रेस सांसद मधुसूदन मिस्त्री ने जेटली के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किया था. दिलचस्प यह है कि अरुण जेटली तब यह बात कह रहे थे जब वे ख़ुद लोकसभा चुनाव हारकर राज्यसभा की मार्फ़त संसद में आए और मंत्री बने.
  • सीबीआई के बाद अब आरबीआई की बारी?
    अखिलेश शर्मा
    क्या सीबीआई के बाद अब सरकार ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई के कामकाज में भी दखल की तैयारी कर ली है? क्या आरबीआई की आजादी खतरे में है? ये सवाल इसलिए क्योंकि आरबीआई के कामकाज में दखल के आरोपों के बाद सरकार को अब सफाई देने के लिए सामने आना पड़ा है. खबरें ये भी है कि सरकार ने इतिहास में पहली बार आरबीआई कानून की धारा सात के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कमजोर बैंकों के लिए नकदी मुहैया कराने, छोटे और मध्यम उद्योग को कर्ज देने और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए नकदी जैसे मुद्दों पर आरबीआई को कहा है.
  • चुनावों पर नक्सली साया...
    निधि कुलपति
    एक कैमरामैन मारा गया....दो जवान भी...न्यूजरूम में खबर गूंजी ही थी की टीवी स्क्रीन पर फ्लैश होने लगा......छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नीलवाया में नक्सली हमले में तीन लोग मारे गए... न्यूजरूम में आवाजें कुछ ऊंची हो रही थी...जिसको जो भी  जानकारी मिल रही थी दे रहा था...वो दूरदर्शन से था...नाम अच्युतानंद साहू था...वह ओडिशा से था... अरे, उसके आखरी फेसबुक पोस्ट को देखो...कुछ समय पहले ही शादी हुई थी...खबरों की दुनिया में रहने से लगातार अच्छी बुरी खबर आती रहती है, लेकिन दुख को अपनाने की शायद एक आदत सी हो जाती है..
  • जब येल यूनिवर्सिटी की क्लास में बैठे रवीश कुमार...
    रवीश कुमार
    मैंने हार्वर्ड में भी एक क्लास किया था. तीन घंटे की क्लास थी, मगर एक घंटे से कम बैठा. प्रोफेसर ने झट से अनुमति दे दी थी. उस क्लास में पहली बार देखा कि कई देशों से आए छात्रों की क्लास कैसी होती है. वैसे येल के ही GENDER AND SEXUALITY STUDIES की प्रोफेसर इंदरपाल ग्रेवाल ने भी न्योता दिया कि आप मेरी भी क्लास में आ जाइए, लेकिन तब समय कम था. प्रोफेसर ग्रेवाल नारीवादी मसलों पर दुनिया की जानी-मानी प्रोफेसर हैं. फेमिनिस्ट हैं. मेरी बदकिस्मती.
  • कोलंबिया जर्नलिज्म स्कूल का एक सफर
    रवीश कुमार
    1912 में जब हम अपनी आज़ादी की लड़ाई की रूपरेखा बना रहे थे तब यहां न्यूयार्क में जोसेफ़ पुलित्ज़र कोलंबिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज़्म की स्थापना कर रहे थे. सुखद संयोग है कि 1913 में गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में प्रताप की स्थापना कर रहे थे. तो ज़्यादा दुखी न हों, लेकिन यह संस्थान पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए दुनिया भर में जाना जाता है.
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