NDTV Khabar
होम | ब्लॉग

ब्लॉग

विचार
  • उन्नाव कांड अपराध शास्त्र के नजरिए से
    सुधीर जैन
    उन्नाव कांड की खबर देश भर में फैल रही है. बलात्कार कांड में पीड़ित लड़की के पिता की बेरहम पिटाई से मौत के बाद तो कोई कितनी भी कोशिश कर लेता, इस कांड की चर्चा को दबाया ही नहीं जा सकता था. वैसे आमतौर पर ऐसे मामलों की चर्चा जिले स्तर पर ही निपट जाती है. लेकिन यह कांड जल्द ही पूरे प्रदेश में फैला और देखते ही देखते इसने पूरे देश में सनसनी फैला दी.
  • बच्ची से दरिंदगी करने वालों का बचाव क्यों?
    रवीश कुमार
    हम कहां जा रहे हैं, यह जानने से पहले हम कहां आ पहुंचे हैं, ज़रा रुक कर देख लेना चाहिए. जम्मू के कठुआ में बलात्कार के मामले में हमारे समाज ने अपना नक़ाब ख़ुद ही उतार दिया है. हम बेटियों की परवाह करते हैं यह ढोंग भी अपने आप सामने आ गया है. कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बारे में ही सुन लेंगे तो आपको यकीन हो जाएगा कि आप एक मरे हुए समय में जीने का भरम पाल रहे हैं.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या RTI में गलत सूचनाएं भी दी जा रही हैं? 
    रवीश कुमार
    सूचना आपको बदल देती है. ग़लत सूचना से आप दंगाई बन जाते हैं जैसे आपने देखा कि उत्तराखंड के अगस्त्यमुनि में कैसे लोग ग़लत सूचना के कारण दंगाई में बदल गए और दुकानों को जला आए. अगर उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत सही जानने का दावा किया होता, कोशिश की होती तो वे अपराधी बनने से बच सकते थे और किसी की दुकानें नहीं जलतीं.
  • छोले-भटूरे, पकौड़े और बिरयानी
    प्रियदर्शन
    लगातार स्थूल होती जा रही हमारी राजनीति बहुत सूक्ष्म प्रश्नों पर विचार करने की आदत या तो बना नहीं सकी, या पूरी तरह छोड़ चुकी है. वह प्रतीकों की राजनीति करती है, मगर प्रतीकों का महत्व नहीं समझती.
  • आंदोलनों का चिंतित करने वाला स्वरूप
    डॉ विजय अग्रवाल
    एक सभ्य समाज में संदिग्धता के लिए कोई जगह नहीं होती. फिर भी यदि कोई व्यक्ति विशेष संदिग्ध हो जाये, तो चलेगा. यदि कोई संस्था संदिग्ध हो जाये, तो एक बार वह भी ढक जायेगा. लेकिन यदि कोई जनान्दोलन, और वह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में, संदिग्ध हो जाये, तो इसे चलाते रहना व्यवस्था के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक हो जाता है.
  • हम नफ़रत फैलाने वालों के शिकार क्यों बन रहे हैं?
    रवीश कुमार
    अब भी वक्त है, आप घरों से निकलकर समाज के छोटे-छोटे हिस्सों को दंगाई बनाने के इस प्रोजेक्ट के खिलाफ आवाज़ उठाइये. बहुत देर हो चुकी है और यह देरी बढ़ती जा रही है. हर जगह एक भीड़ खड़ी है, जिसे व्हाट्स अप के ज़रिए वीडियो और ऑडियो का इशारा मिलते ही वो दंगाई में बदल जाती है.
  • राहुल का उपवास या उपवास का उपहास?
    प्रियदर्शन
    क्या एक घंटे या चंद घंटों के उपवास को उपवास मानेंगे? दलित उत्पीड़न के विरुद्ध देश भर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं से उपवास रखने की अपील करने वाले राहुल गांधी राजघाट पर एक बजे अनशन के लिए पहुंचे. थोड़ी देर बाद उनका अनशन ख़त्म हो गया.
  • नौकरी सीरीज का 32वां भाग : बेरोजगारों का दर्द आखिर कौन समझेगा ? 
    रवीश कुमार
    भारत में बेरोज़गारों की न तो संख्या किसी को मालूम है और न ही उनके जीवन के भीतर की कहानी. हमारे लिए बेरोज़गार हमेशा नाकाबिल नौजवान होता है जो मौके की तलाश में एक ही शहर और एक ही कमरे में कई साल तक पड़ा रहता है. कई बार तो लोग इसलिए भी बेकार कहते हैं कि वह सरकारी नौकरी की तलाश कर रहा है. सरकार चलाने के लिए नेता मारा मारी किए रहते हैं लेकिन जब कोई नौजवान उसी सरकार में अपने लिए संभावना की मांग करता है तो उसे फालतू समझा जाने लगता है. आप या हम हर शहर में बेरोज़गारों की रैली देखते हैं, नज़र घुमा लेते हैं. वे हफ्तों से धरने पर बैठे रहते हैं उनकी परवाह कोई नहीं करता है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : देश का किसान और जवान है परेशान 
    रवीश कुमार
    मुद्दों की मारामारी में आगरा से एक किसान का फोन आता है कि अक्तूबर के महीने में आलू के जो बीज बोए थे उनका उत्पादन काफी कम हुआ है. वे पहले से बर्बादी का सामना कर रहे थे मगर इस बार मार और पड़ गई है. टीवी का जो चरित्र हो गया है और दर्शकों की पसंद जिस तरह से बन गई है, उसके बीच आलू किसान की हालत पर आप चर्चा करेंगे तो किसकी दिलचस्पी होगी. क्या ऐसा हो सकता है कि अफरीदी और आलू को जोड़ कर चर्चा की जाए ताकि बहुत सारे प्रवक्ता ऑफिस के बाहर लाइन लगाकर खड़े हो जाएं कि हम भी बोलेंगे हम भी बोलेंगे. इस समस्या का समाधान आखिर कब निकलेगा.
  • एससी/एसटी कानून पर विवाद- सरकार और सुप्रीम कोर्ट गलत क्यों?
    विराग गुप्ता
    एससी/एसटी एक्ट के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों से पल्ला झाड़ने की कोशिश में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अजब बयान दिया, कि केन्द्र सरकार इस मामले में औपचारिक पक्षकार ही नहीं थी.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : बाबाओं को राज्यमंत्री बनाना ठीक है?
    रवीश कुमार
    कभी फुर्सत हो तो सोचिएगा कि चुनाव आते ही नेता मठों और बाबाओं के यहां दौरे क्यों करते हैं, क्या चुनाव के बाद ये बाबा लोग आपकी नौकरी से लेकर शिक्षा की समस्या को लेकर संसद से लेकर सड़क पर आवाज़ उठाते हैं.
  • फ़ेक न्यूज़ से सही मंशा के साथ निपटने की ज़रूरत
    रवीश कुमार
    भारत के प्रधानमंत्री ने सूचना व प्रसारण मंत्रालय के उस फैसले को वापस ले लिया जिसके विरोध में मंगलवार सुबह से पत्रकारों के बीच हलचल थी. सोमवार शाम को सूचना व प्रसारण मंत्रालय की तरफ से एक प्रेस रीलीज जारी होती है कि अगर किसी पत्रकार को फेक न्यूज़ गढ़ते हुए या उसके फैलाने में भागीदार पाया गया तो उसकी सरकारी मान्यता हमेशा के लिए रद्द कर दी जाएगी.
  • फेक न्यूज : गाइडलाइन टल गई है, ख़तरा नहीं टला है
    प्रियदर्शन
    अच्छा हुआ कि सरकार ने फेक न्यूज़ पर सूचना-प्रसारण मंत्रालय की नई गाइलाइन वापस ले ली. वरना ऐसी गाइडलाइन याद दिलाती हैं कि सरकारें जब प्रेस से असुविधा महसूस करती हैं.
  • देशभर में दलितों का उठ पड़ना
    सुधीर जैन
    दलितों ने भारत बंद की अपील की थी. सरकार को लग रहा होगा कि एक प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन खत्म हो जाएगा. लेकिन ये तो पूरे देश में सनसनीखेज ढंग से उठ पड़ा.
  • क्‍या सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्‍ट को कमजोर नहीं किया है?
    रवीश कुमार
    आज़ादी के बाद दलित राजनीति का एक बड़ा पक्ष रहा है बिना हिंसा के आंदोलन, आज वो टूट गया. हिंसा किसने की, कैसे हुई इसका आधिकारिक पक्ष आता रहेगा मगर तस्वीरों में जो दिख रहा था, वह दलित आंदोलन का हिस्सा कभी नहीं रहा.
  • हैप्पीनेस वाले एमपी में बुजुर्ग खुश, युवा उदास
    राकेश कुमार मालवीय
    2001 से 2015 के बीच देश में हर दिन छह लोगों ने बेरोजगारी के कारण अपनी जान दी. यदि इसमें गरीबी के कारण को और शामि‍ल कर लें तो 13 लोगों ने हर दि‍न खुद अपनी मौत को गले लगाया. भयावह संख्याओं की इस पृष्ठभूमि को जेहन में रखते हुए देखिए कि अब बजाए नई नौकरियां पैदा करने के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाई जा रही है.
  • केजरीवाल की माफ़ी का मज़ाक न बनाएं
    प्रियदर्शन
    अरविंद केजरीवाल का इन दिनों लगातार मज़ाक उड़ाया जा रहा है. उनके माफ़ीनामों पर तरह-तरह के चुटकुले चल रहे हैं. लोग कह रहे हैं- वीर सावरकर का रिकॉर्ड वीर केजरीवाल तोड़ देंगे. सावरकर ने एकाधिक बार अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी थी- केजरीवाल उनसे आगे निकल जाएंगे. माफ़ीनामे के सवाल पर उनकी पार्टी टूटते-टूटते बची. 
  • CBSE के अलावा SSC, MPPCS, UPPCS, BPSC, HSSC, RRB भी ज़रूरी मुद्दे हैं...
    रवीश कुमार
    कर्मचारी चयन आयोग में सब कुछ ठीक नहीं है. छात्र जब मांग कर रहे हैं तो उनकी बात को सुना जाना चाहिए. एसएससी की परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या करोड़ में तो होगी ही. इनका कोई नेता नहीं है. संगठन भी नहीं है. न ही विश्वविद्यालयों में चुनाव जीतने वाली एनएसयूआई या एबीवीपी इनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व करती है. फिर भी ये हर बार हज़ारों की संख्या में दिल्ली आकर प्रदर्शन कर रहे हैं.
  • क्या बिहार में भड़की हिंसा नीतीश कुमार की 'सुशासन बाबू' वाली छवि पर लगा रही है दाग?
    मनीष कुमार
    बिहार से इन दिनों अच्छी ख़बर नहीं आती. एक बार फिर राज्य नेगेटिव ख़बरों के कारण अब ज़्यादा सुर्ख़ियां बटोरता है.
  • प्राइम टाइम का असर, उत्तराखंड में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में फीस वृद्धि वापस
    रवीश कुमार
    उत्तराखंड सरकार और वहां के प्राइवेट मेडिकल कॉलेज का शुक्रिया. उनसे एक ऐसा अपराध होते होते बचा है जो एक दिन उनके लिए ही नैतिक बोझ बन जाता. अपने नागरिकों से आर्थिक ज़्यादती करना ठीक नहीं है. जिस तरह से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने वहां के तीन प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में 400 प्रतिशत की फीस वृद्धि का फैसला वापस लिया है, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए.
«123456»

Advertisement