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विचार
  • ‘शीतयुद्ध‘ के नये संस्करण का आगाज
    डॉ विजय अग्रवाल
    अमेरिका ने सन् 2016 में 'अमेरीका फर्स्ट' का नारा देने वाले ट्रम्प को अपना राष्ट्रपति चुनकर दुनिया को साफ-साफ बता दिया था कि ''विश्व का नेतृत्व करने में अब उसकी कोई रुचि नहीं रह गई है.''
  • धार्मिक पर्वों का इस्तेमाल कट्टरता के लिए क्यों?
    रवीश कुमार
    न तो राम का नाम लेने पर रोक है न रामनवमी का जुलूस निकालने पर. इससे पहले कि कई ज़िले जल उठे, यहां रुक कर सवाल करना ज़रूरी है कि कहीं रामनवमी के नाम पर गांव कस्बों और छोटे शहरों में सांप्रदियकता का उन्माद फैलाने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है.
  • डोकलाम पर शायद आखिरी पन्ना लिखा नहीं गया...
    कादम्बिनी शर्मा
    डोकलाम में भारतीय और चीनी सेना आमने सामने थी. पीछे से हर कूटनीतिक कोशिश की जा रही थी इस बेहद तनावपूर्ण स्थिति को सुलझाने की. ये स्थिति दो महीनों से भी ज्यादा तक बनी रही. आखिर अचानक 28 अगस्त 2017 को दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट गईं. कहा गया कि मामला सुलझा लिया गया है. लेकिन तब से लेकर अब तक बयानों का जो सिलसिला है उससे तो यही लगता है कि स्थिति साफ होने की बजाय उतनी ही धुंधली है जितनी पहले दिन थी.
  • ग़रीबों की जगह ना दिल में, ना शहरों में
    रवीश कुमार
    शहर वही सबसे अच्छा होता है जो सबके लिए होता है. जिसकी हर जगह पर सबका दावा होता है. मुंबई को लोगों ने बनाया क्योंकि मुंबई पर सबका दावा था. दावा है. मुंबई के फुटपाथ की कहानी फिल्मों में और साहित्य में घर के रूप में आती है, एक ठिकाने के रूप में जहां से उठकर कोई आसमान में सितारा बन जाता है.
  • टीबी को घेर लि‍या है 'नि‍जीकरण की बीमारी' ने
    राकेश कुमार मालवीय
    यह भी तय कि‍या जाना चाहि‍ए कि यदि 2025 तक देश से टीबी खत्‍म हो रहा है तो क्‍या उसे इस तेज गति से अपना दायरा फैला रहीं और लोगों को गरीबी में धकेल रहीं नि‍जी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं ले जाएंगी, या इसका रास्‍ता स्‍वास्‍थ्‍य बीमा के जरि‍ए खोजा जाएगा, जि‍सका एक वि‍श्‍लेषण यह भी कहता है कि यह सार्वजनि‍क स्‍वास्‍थ्य सेवाओं के लि‍ए घातक ही साबि‍त होगा.
  • जन्मदिन पर महादेवी का स्मरण : मोतियों की हाट और चिनगारियों का एक मेला
    प्रियदर्शन
    कई अर्थों मे महादेवी वर्मा हिंदी की विलक्षण कवयित्री हैं. उनमें निराला की गीतिमयता मिलती है, प्रसाद की करुण दार्शनिकता और पंत की सुकुमारता- लेकिन इन सबके बावजूद वे अद्वितीय और अप्रतिम ढंग से महादेवी बनी रहती हैं. उनके गीतों से रोशनी फूटती है, संगीत झरता है.
  • ईवीएम पर बहस पार्ट-2: बैलेट के बाद EVM से बिहार के लोगों ने ली राहत की सांस!
    मनीष कुमार
    साल 2000 तक बिहार में हर चुनाव बैलेट पेपर से हुए, लेकिन हर चुनाव में जीत का मुख्य आधार सामाजिक समीकरण ही रहे. हालांकि, यह भी सच है कि उम्मीदवार अपनी जीत के लिए बैलेट पेपर को लूटने के प्रयास करते रहे. हालात ऐसे थे कि अगर पार्टी सता में होती तो प्रशासन का साथ मिलता, लेकिन विपक्ष में रहने पर गोलीबारी, चुनाव में अथाह खर्चे आदि करना एक नियमित अनिवार्य प्रक्रिया थी, जिसे नजर अंदाज करना चुनाव से पहले घुटने टेकने के समान था. इसलिए मतदान के दिन हिंसा, गोली चलना, बम विस्फोट एक आम बात थी. शायद ही कोई एक ऐसा चुनाव हो जब लोकतंत्र के नाम पर बूथ लूटने में बीस लोगों से कम जाने गयी हो. 
  • क्या सुरक्षित मातृत्व को गंभीरता से नहीं लेतीं सरकारें
    राकेश कुमार मालवीय
    अब से तकरीबन 12 साल बाद जब देश में मातृत्व स्वास्थ्य की समीक्षा की जाएगी तो यह देखा जाएगा कि इस संबंध में देश ने अपना आंकड़ा कितना दुरुस्त किया. उसके लिए यह भी जरूरी होगा कि इस विषय पर लगातार और गंभीर काम किए जाएं. आखिर देश में विकास के मानक केवल जीडीपी से ही नहीं तौले जाने चाहिए. देशवासियों का गुणवत्तापूर्ण जीवन सेहत और स्वास्थ्य इसमें बहुत महत्वपूर्ण हैं और यह तभी संभव है जब विकास की दिशा सही तय हो.
  • क्या आप डेटा चोरी का मतलब समझते हैं ? 
    रवीश कुमार
    फेसबुक ने डेटा लीक किया है. इसे लेकर उस भारत में बहस हो रही है जो बिना सोचे समझे लाइन में लगकर आधार कार्ड बनवा रहा है. जहां लोग न प्राइवेसी का मतलब समझते हैं और न डेटा की डकैती का खेल. आधार नंबर का डेटा पांच फुट चौड़ी और 13 फीट ऊंची दीवार के बीच सुरक्षित है. इसे कोई भेद नहीं सकता, ऐसा दावा करने वाली सरकार के पास अगर सुरक्षा के इतने ही मज़बूत इंतज़ाम हैं तो क्या वह बता सकती है कि उसने लोगों की निजी जानकारी को चुराने के कौन से मामले पकड़े हैं.
  • बैंकरों का विरोध प्रदर्शन, आखिर क्यों बैंकर बेचें बीमा पॉलिसी?
    रवीश कुमार
    पिछले दो साल से बैंक से संबंधित ख़बरों को दिलचस्पी से पढ़ता रहा हूं. चेयरमैनों के इंटरव्यू से बातें तो बड़ी बड़ी लगती थीं लेकिन बैंक के भीतर की वे समस्याएं कभी नहीं दिखीं जो बैंकर के जीवन में बहुत बड़ी हो गई हैं. बैंक सीरीज़ के दौरान सैकड़ों बैंकरों से बात करते हुए हमारी आज की ज़िंदगी को वो भयावह तस्वीर दिखी जिसे हम जानते हैं, सहते हैं मगर भूल गए हैं कि ये दर्द है. इसे एक हद के बाद सहा नहीं जाना चाहिए.
  • केजरीवाल की माफी - पीएम पद की लॉन्चिंग तो नहीं  
    विराग गुप्ता
    गडकरी मुकदमे के दौरान बेलबॉण्ड देने की बजाय जेल जाने वाले केजरीवाल को अचानक अदालतों से डर क्यों लगने लगा...? मानहानि के अधिकतर मुकदमों में केजरीवाल को अदालत में व्यक्तिगत तौर पर पेश होने से छूट मिली है, तो फिर उनका समय कैसे बर्बाद हो रहा है.
  • कई साल गुज़र जाते हैं परीक्षा के इंतज़ार में?
    रवीश कुमार
    नौकरी सीरीज़ का 30वां अंक है. नेता और नौजवान आमने सामने हैं. नेता अपना मंच चुन लेते हैं और युवाओं पर भाषण दे देते हैं, नौजवान जब अपना मैदान चुनता है तो उनके बीच कोई नेता नज़र नहीं आता है. इस देश में आदमी का नंबर बन गया है मगर कितनी नौकरी मिलती है, कितनों की जाती है, इसका कोई ठोस आंकड़ा नहीं है. इसलिए गोलमोल की बात कर नेता गोलमाल कर जाते हैं.
  • ईवीएम पर बहस समय की बर्बादी क्यों है?
    मनीष कुमार
    इन दिनों पूरे देश में एक बार फिर से EVM पर बहस शुरू हो गई है. खासकर कांग्रेस महाधिवेशन के बाद जिसमें फिर से बैलेट पेपर के माध्यम से चुनाव कराने की मांग की गई है. कई क्षेत्रिय दलों ने यह मांग पहले से कर रखी है. लेकिन अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मेरे हिसाब से ये बहस बेमानी है. क्योंकि बिहार, जहां बैलेट और बुलेट का संघर्ष जगव्यापी रहा है, वहां ईवीएम से गरीब और वंचित समाज के लोग ज्यादा निर्भिक होकर मतदान करते हैं. बिहार हो या उतर प्रदेश या कोई अन्य राज्य, अभी चुनाव में जीत-हार आपके सामाजिक समीकरण , चुनाव अभियान के नेतृत्व और आपके संगठन की शक्ति तय करते हैं. लेकिन पिछले क़रीब तीन दशक के बिहार चुनाव परिणामों पर नजर दौड़ाएंगे तो यह दूध का दूध और पानी का पानी साबित हो जाएगा. 
  • विश्व खुशहाली रिपोर्ट ने मटियामेट कर दी हमारी छवि
    सुधीर जैन
    दुनिया की हर राजनीतिक व्यवस्था का एक ही लक्ष्य होता है कि उसकी जनता या प्रजा की खुशहाली बढ़े या बदहाली कम हो. लोकतांत्रिक व्यवस्था तो इसी मकसद से ईजाद हुई थी कि उसके सभी नागरिकों की खुशहाली सुनिश्चित हो सके. हर सरकार बदहाली कम करने का नारा लेकर आती है. मौजूदा सरकार इस मामले में कुछ अलग नारा लेकर आई थी, अच्छे दिन या खुशहाली ला देने का नारा. हालांकि, खुशहाली का मापने का विश्वसनीय पैमाना किसी ने नहीं बना पाया. इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने पूरी दुनिया के अलग अलग देशों में खुशहाली को आंकना शुरू किया. छह साल से संयुक्त राष्ट्र हर साल इस तरह का आकलन करवा रहा है और बाकायदा एक सूचकांक के जरिए एक रिपोर्ट बनती है जो यह बताती है कि किस देश में खुशहाली का क्या स्तर है. इस साल का यह विश्व खुशहाली सूचकांक दो दिन पहले ही जारी हुआ है. चौंकाने और बुरी तरह से झकझोर देने वाली बात यह है कि दुनिया कि 156 देशों में हमारे देश की खुशहाली का नंबर 133वां आया है. यानी औसत से बहुत ही नीचे. पिछले साल से भी 11 नंबर नीचे. इस विश्व रिपोर्ट ने हमें डेढ़ सौ देशों के बीच सबसे बदहाल 25 देशों के संग बैठा दिया है.
  • मैं वही पुरबिहा हूं जहां भी हूं
    प्रियदर्शन
    35 साल पहले लिखी गई कविता ‘मांझी का पुल’ में हल चलाते और खैनी की तलब के वक़्त रुक कर मांझी के पुल पर नज़र डालते लालमोहर की मृत्यु की ख़बर इस संग्रह में आती है। कभी सन 47 को याद करते हुए नूर मियां का जिक्र छेड़ने वाले केदारनाथ सिंह इस संग्रह में गफ़ूर मियां से मिलने और उनकी तस्वीर लेने की गुज़ारिश करते हैं जिनकी शतायु हो चुकी झुर्रियों में एक पूरी बस्ती बसती है।
  • क्यों कॉलेजों को नहीं मिलती सुविधाएं?
    रवीश कुमार
    यूनिवर्सिटी सीरीज़ धीरे-धीरे लौटती रहेगी. 27 अंक पर हमने छोड़ा था, अब 28वें से शुरू कर रहा हूं जो यहां से नए तरीके से चलेगी. एक नेता ने कहा है कि हिन्दुओं को मंदिर के लिए शहादत देनी पड़ेगी. उस नेता ने कब कहा कि हिन्दुओं के पढ़ाई लिखाई अस्पताल के लिए हम प्रतिनिधि शहादत देंगे. ये जिस शहादत की बात कर रहे हैं क्या आपको लगता है कि इसमें अच्छे घरों के लोग जाएंगे.
  • सरकारी बैंकों में पैसा नहीं, सरकार का झूठ जमा है...
    रवीश कुमार
    अनगितन बैंकरों ने अपने नैतिक संकट के बारे में लिखा है. वे अपने ज़मीर पर झूठ का यह बोझ बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. मुद्रा लोन लेने वाला नहीं है मगर बैंकर पर दबाव डाला जा रहा है कि बिना जांच पड़ताल के ही किसी को भी लोन दे दो. मैं दावा नहीं कर रहा मगर बैंकरों के ज़मीर की आवाज़ के ज़रिए जो बात बाहर आ रही है, उसे भी सुना जाना चाहिए.
  • विज्ञान मंत्री के दावे से खड़ा एक बखेड़ा
    सुधीर जैन
    इस साल की विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री के दिए भाषण की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. आमतौर पर ऐसे आयोजनों को आजकल एक औपचारिकता ही माना जाता है. इसीलिए मीडिया में ऐसे भाषणों को ज्यादा तरजीह मिलना बंद हो चला था.
  • नीतीश चच्‍चा, आप 67 के हैं और मैं 28 का, क्‍या हुआ? - तेजस्‍वी यादव
    उन्होंने कहा, 'केवल मैं ही नहीं, आप देखेंगे कि केंद्र सरकार सभी जांच एजेंसियों को कैसे समाजवादी पार्टी और बसपा के नेताओं के खिलाफ लगा देती है.'
  • परीक्षा व्यवस्था पर क्यों उठते हैं सवाल?
    रवीश कुमार
    नौकरी सीरीज़ का 29वां अंक हाज़िर है. दिल्ली में एसएससी मुख्यालय के बाहर हज़ारों छात्र धरने पर बैठे हैं तो पटना की सड़कों पर दारोगा की परीक्षा को लेकर लाठी खा रहे हैं. राजस्थान के अखबारों में वहां हो रही सिपाही की भर्ती को लेकर प्रश्न पत्रों के लीक होने की खबरें छप रही हैं. भारत में ईमानदार परीक्षा व्यवस्था का होना बहुत ज़रूरी है.
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