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विचार
  • रेल भर्ती के हों या यूपी पुलिस भर्ती के, कब तक होगा ऐसा
    रवीश कुमार
    सरकारी नौकरी से संबंधित समस्याओं को देखकर लगता है कि एक समस्या खुद नौजवान भी हैं. अलग-अलग भर्ती परीक्षा के नौजवान अपनी परीक्षा के आंदोलन में तो जाते हैं मगर दूसरी परीक्षा के पीड़ित नौजवानों से कोई सहानुभूति नहीं रखते.
  • सपना देखा हरियाणा के द‍लीप सिंह ने, पूरा किया दीपा कर्माकर ने
    रवीश कुमार
    एक अच्छे पाठक और दर्शक को हर किरदार में प्रवेश कर उसे महसूस करना चाहिए. अपनी ज़िंदगी से निकल दूसरे की ज़िंदगी में प्रवेश करना ही पाठक होना है. वरना कहानी की डोर छूट जाती है. विमल मोहन और दिग्विजय सिंह देव की किताब हाथ में आई तो पुरानी याद भी कहीं से निकल आई.
  • लड़कियों को लेकर समाज में इतनी हिंसा क्यों?
    रवीश कुमार
    बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ. यह नारा आपको अब हर टैम्पो ट्रक के पीछे दिख जाता है. अक्सर इस नारे में हमारा ज़ोर बेटियों के पढ़ाने पर होता है लेकिन ज़ोर होना चाहिए पहली लाइन पर. बेटी बचाओ पर. किससे बचाओ और क्यों बचाओ. क्या यह नारा इसलिए नहीं है कि हमारा समाज बेटियों को गर्भ में मारने वाला रहा है और गर्भ से बेटियां बाहर भी आ गईं तो सड़कों पर जला कर मार देता है या बलात्कार से मार देता है
  • किसानों की क़र्ज़ माफ़ी पर हंगामा, बैंकों को एक लाख करोड़ पर चुप्पी क्यों?
    रवीश कुमार
    क्या आपको पता है कि बैंकों को फिर से 410 अरब रुपये दिए जा रहे हैं? वित्त मंत्री जेटली ने संसद से इसके लिए अनुमति मांगी है. यही नहीं सरकार ने बैंकों को देने के लिए बजट में 650 अरब का प्रावधान रखा था. बैंकों की भाषा में इसे कैपिटल इन्फ्लो कहा जाता है। सरकार बैंकों को एक साल में 1 लाख करोड़ रुपये क्यों देना चाहती है?
  • जवाबदेही के घेरे में सोशल मीडिया
    अखिलेश शर्मा
    क्या सरकार सोशल मीडिया पर घेराबंदी की तैयारी कर रही है? यह सवाल इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अफ़वाहों और फर्जी खबरों को रोकने के लिए सरकार ने इन कंपनियों के साथ न सिर्फ विचार-विमर्श शुरू कर दिया है बल्कि पुराने नियमों को बदलने के लिए नए नियमों का खाका भी उनके साथ साझा किया है.
  • राजीव गांधी को 'भारत रत्न' - सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो
    विराग गुप्ता
    जनता पार्टी ने पद्म सम्मानों को खत्म किया, तो अब BJP पहल करे : पद्म सम्मानों की शुरुआत नेहरू सरकार ने 1955 में की थी, जिस पर सदैव विवाद होते रहे हैं. आचार्य जेबी कृपलानी ने पद्म सम्मानों को खत्म करने के लिए 1969 में लोकसभा में बिल पेश किया, जिसे इंदिरा सरकार ने नहीं स्वीकारा. कृपलानी के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 18 से अंग्रेज़ी शासनकाल के दौर के सम्मान ख़त्म हो गए थे, जिन्हें नेहरू ने पद्म सम्मान के तौर पर पिछली खिड़की से लागू कर दिया.
  • 87,500 किताबों का संग्रह करने वाला नायाब हिन्दुस्तानी
    रवीश कुमार
    वह दुनिया के महानतम पाठकों और पुस्तक प्रेमियों में से एक रहा होगा. उसके जीवन में ऐसा कोई लम्हा किताबों के बग़ैर नहीं गुज़रा होगा. उसका जीवन अपने समय के व्यस्त जीवन में रहा होगा. उस वक्त बिजली तो होगी नहीं, ज़ाहिर है वह दिन के उजाले में पढ़ता होगा. 
  • उसे डर नहीं लगता, गुस्सा आता है
    प्रियदर्शन
    आमिर खान के बाद देश के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी को भी लोगों ने नहीं बख्शा. बार-बार उनके अलग-अलग व्यवहार को राष्ट्रविरोधी साबित करने की कोशिश हुई. वे सारी कोशिशें निराधार निकलीं. बाद में जब हामिद अंसारी बहुत शालीन लहजे में इस बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा किया तो उन पर भी हमले शुरू हो गए.
  • क्या सरकार आपको देख रही है?
    रवीश कुमार
    अगर आपको पता चले कि कोई आपकी बातचीत सुन रहा है, स्मार्टफोन का डेटा किसी और के पास जा रहा है, सोशल मीडिया पर जो लिख रहे हैं उस पर सुरक्षा एजेंसियां नज़र रखती हैं तो क्या आप सहज रहेंगे. भारत ही नहीं पूरी दुनिया में डेटा प्राइवेसी का मामला गंभीर हो गया है. खासकर जब भी यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आता है तब यह मसला और भी गंभीर हो जाता है.
  • क्या आपको नौकरी मिल रही है?
    रवीश कुमार
    मुख्यमंत्री कमलनाथ के बयान के बहाने आपने देखा कि भारत के कई राज्यों में उद्योगों में 70 से 90 प्रतिशत स्थानीय लोगों को रोज़गार देने की नीति है. मगर हमारे पास यह देखने का आंकड़ा नहीं है कि इस नीति से स्थानीय लोगों को कितना रोजगार मिला और वह रोज़गार उस राज़्य के कुल बेरोज़गारों का कितना प्रतिशत था.
  • प्रधानमंत्री जी मोबाइल कंपनियां 120 हो गई हैं तो रोज़गार कितनों को मिला...
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया है कि 2014 के पहले मोबाइल बनाने वाली सिर्फ 2 कंपनियां थीं. आज मोबाइल मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों की संख्या 120 हो गई है. अगर 120 कंपनियां हो गई हैं तो फिर निर्यात होने लगा होगा या फिर आयात घट गया होगा. सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ भारत में बनने लगा होगा जिसके कारण रोज़गार पैदा हुआ होगा.
  • 35 लाख लोगों की नौकरी गई और विज्ञापन पर ख़र्च हुआ 5000 करोड़
    रवीश कुमार
    उन 35 लाख लोगों को प्रधानमंत्री सपने में आते होंगे, जिनके एक सनक भरे फैसले के कारण नौकरियां चली गईं. नोटबंदी से दर-बदर हुए इन लोगों तक सपनों की सप्लाई कम न हो इसलिए विज्ञापनों में हज़ारों करोड़ फूंके जा रहे हैं.
  • नौकरियों को लेकर नौटंकी बंद हो, ठीक-ठीक बात करें अमित शाह और कमलनाथ
    रवीश कुमार
    SSC CHSL 2016 की परीक्षा पास करने के बाद 614 नौजवानों को मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज़ में ज्वाइनिंग नहीं हो रही थी. 16 फरवरी, 2018 को रिजल्ट आ गया था. पांच महीने बाद इन्हें कमांड का आवंटन हुआ, मगर उसके बाद भी नियुक्तिपत्र का पता नहीं चला. फरवरी से सितंबर आ गया, साधारण घरों के ये नौजवान दिल्ली आकर भटकने लगे. 12 सितंबर के 'Prime Time' में हमने इनकी व्यथा दिखाई.
  • रोजगार के मुद्दे पर हमारी सरकारें कितनी गंभीर?
    रवीश कुमार
    नौजवानों का सबसे बड़ा इम्तिहान यह है कि वे नौकरी को लेकर किए जा रहे किसी भी वादे और बहस को लेकर भावुक न हों. न तो कांग्रेस की तरफ से भावुक हों न बीजेपी की तरफ से. आपने नौकरी सीरीज़ के दौरान देखा है कि किस तरह देश के कई राज्यों में चयन आयोगों ने नौजवानों को अपमानित और प्रताड़ित किया है.
  • इंसाफ का लंबा इंतजार क्या सजा नहीं? पुणे का मोहसिन शेख हत्याकांड याद कीजिए
    रवीश कुमार
    क्या वाकई हम इंसाफ़ की बात करते हैं या इंसाफ के नाम पर कांग्रेस बनाम बीजेपी करते हैं. दंगों और नरसंहारों के इंसाफ की बात जब भी आती है वह वहां भी पहुंचती है जहां इसकी बात नहीं होती है. उसकी आवाज़ पुणे में भी गूंज रही है और अलवर में भी और बुलंदशहर में भी.
  • 1984, 2002, 1993 और 2013 के नरसंहारों पर चोट दे गया है दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला
    रवीश कुमार
    2002 की बात को कमज़ोर करने के लिए 1984 की बात का ज़िक्र होता था अब 1984 की बात चली है तो अदालत ने 2013 तक के मुज़फ्फरनगर के दंगों तक का ज़िक्र कर दिया है. सबक यही है कि हम सब चीखें चिल्लाएं नहीं. फैसले को पढ़ें और प्रायश्चित करें.
  • कभी न कभी हर दंगाई का इंसाफ होगा
    प्रियदर्शन
    1984 की हिंसा और 2002 के दंगों में एक दुखद साम्य है. दोनों मामलों में राज्य के देखते-देखते हज़ारों लोग घरों से निकालकर सड़कों पर मार दिए गए, उन्हें ज़िंदा जलाया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया. 18 साल के अंतर पर हुए इन दो हत्याकांडों में इंसाफ को लगातार राजनीति ने स्थगित रखा. महज दो साल के राजनीतिक अनुभव पर प्रधानमंत्री बन गए राजीव गांधी ने तब यह हैरान करने वाला बयान दिया था - "एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती कुछ हिलती ही है..." यह वक्तव्य भले नादानी में दिया गया हो, लेकिन आने वाले दिनों में तमाम दंगाइयों को बड़ी निस्पृह क्रूरता के साथ बचाया गया, जिसका गुनाह कांग्रेस सरकार पर जाता है.
  • रफाल मामले में क्या सरकार को वाकई क्लीनचिट मिल गई?
    रवीश कुमार
    अदालत ने यह कहीं नहीं लिखा है कि अब इन सवालों का जवाब कहीं और से न अदालत से नहीं लिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच का फैसला है. इस बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ थे. चार याचिकार्ता थे, जिनके बारे में जान लेते हैं कि वे अलग-अलग याचिकाओं में अदालत से क्या चाहते थे.
  • 'मोदी बनाम कौन' पूछने वालों को तेजस्वी यादव का जवाब
    तेजस्वी यादव
    पांच राज्यों के परिणाम (मैं खुद को सिर्फ तीन बड़े हिन्दी-भाषी राज्यों तक नहीं बांध रहा हूं, जहां जनता ने BJP के 15 साल के शासन को कतई खत्म कर दिया, और तेलंगाना और मिज़ोरम में तो गंभीरता से लिया तक नहीं) इस बात के सबूत हैं कि वोटर अब खोखले वादों से ऊब चुके हैं, और जुमलों के पार की सच्चाई देख सकते हैं.
  • फेसबुक, व्हॉट्सऐप, गूगल और ट्विटर से भारत में चुनावी सफलता
    विराग गुप्ता
    कांग्रेस के शशि थरूर ने भारत में सोशल मीडिया के राजनीतिक इस्तेमाल की शुरुआत की थी, जिस पर बाद में BJP ने आधिपत्य जमा लिया. नवीनतम रिपोर्टों के मुताबिक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में व्हॉट्सऐप, फेसबुक, गूगल और ट्विटर का जमकर इस्तेमाल हुआ, जिसमें कांग्रेस ने अब फिर बढ़त हासिल कर ली है. राज्यों में चुनाव से पहले सेन्टर फॉर एकाउन्टेबिलिटी एंड सिस्टेमिक चेंज (CASC) संस्था ने विस्तृत सुझाव देकर चुनाव आयोग से 2013 के नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की अपील की थी. इसके जवाब में चुनाव आयोग ने फेसबुक और ट्विटर को पत्र लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. केंद्रीय कानून और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी सोशल मीडिया कंपनियों को भारतीय चुनावों में हस्तक्षेप नहीं करने की अनेक चेतावनी दी हैं, परंतु इन सभी चेतावनियों से बेख़बर सोशल मीडिया कंपनियों का भारतीय चुनावों में दखल बढ़ता ही जा रहा है, जो अगले आम चुनाव में संकट का सबब बन सकता है.
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