NDTV Khabar
होम | ब्लॉग

ब्लॉग

विचार
  • क्या आपको आपके हिन्दी के अख़बार ने ये सब बताया?
    रवीश कुमार
    नोटबंदी ने लघु व मध्यम उद्योगों की कमर तोड़ दी है. हिन्दू मुस्लिम ज़हर के असर में और सरकार के डर से आवाज़ नहीं उठ रही है लेकिन आंकड़े रोज़ पर्दा उठा रहे हैं कि भीतर मरीज़ की हालत ख़राब है. भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार मार्च 2017 से मार्च 2018 के बीच उनके लोन न चुकाने की क्षमता डबल हो गई है.
  • यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा भी बोगस निकला, आप फिर उल्लू बने
    रवीश कुमार
    यूनिफॉर्म सिविल कोड की इस वक्त न ज़रूरत है और न ही यह अनिवार्य है. यह राय भारत के क़ानून आयोग की है. पिछले शुक्रवार को कानून आयोग ने परिवार कानून सुधार पर अपनी तरफ से एक चर्चा-पत्र जारी किया है. आयोग का पक्ष है कि समुदायों के बीच समानता की जगह समुदायों के भीतर स्त्री और पुरुष के बीच समानता होनी चाहिए.
  • बंदरों से निजात पाने का सबसे शानदार नुस्खा !
    शरद शर्मा
    को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा के वृंदावन में बंदरों से निजात पाने का शानदार नुस्खा बताया. बंदरों के हमलों से बचने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा-वृंदावन वासियों को सुझाव दिया कि वे हनुमान जी की नियमित पूजा करें व हनुमान चालीसा का पाठ करें, जिससे बंदर उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएंगे.
  • क्या तेल के बढ़ते दाम पर लगेगी रोक?
    रवीश कुमार
    क्या आपको पता है कि भारत का रुपया क्यों लगातार कमज़ोर हो रहा है, आजकल भारत का रुपया गिरने में हर दिन इतिहास बना रहा है. 31 अगस्त को बाज़ार बंद होने पर एक डॉलर था 70 रुपये 99 पैसे. कहां तो इसे श्री श्री रविशंकर के अनुसार 40 रुपये के आस पास होना चाहिए था मगर अब यह 70 रुपये 99 पैसे पर पहुंच गया है. इसका सबसे बुरा असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है.
  • भारत के अंगने में चीन का क्या काम?
    अखिलेश शर्मा
    भारत की सियासत में चीन का क्या काम? लेकिन गाहे-बगाहे हर बात में चीन का जिक्र कुछ वैसे ही हो रहा है जैसे अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में रूस का हुआ था. वैसे बात अभी वहां तक नहीं पहुंची है और न ही किसी ने वैसे आरोप लगाए हैं लेकिन हर बात में चीन का जिक्र कई सवाल खड़े जरूर कर रहा है.
  • लोकसभा चुनाव 2019 : सुशासन बाबू की मजबूरी
    मनोरंजन भारती
    साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है, मगर बिहार में राजनैतिक उठापटक चालू है. मगर अगले लोकसभा चुनाव के लिए जो फॉर्मूला दिया जा रहा है उसमें बीजेपी 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि बीजेपी के पास 22 सांसद हैं. जेडीयू 12 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जिसके पास 2 सांसद हैं.
  • असहमति को 'सेफ्टी वॉल्व' कहे जाने के मायने...
    सुधीर जैन
    पुलिस ने जिन विद्वानों को दबिश डालकर पकड़ लिया था, उन्हें वापस उनके घर छोड़कर आना पड़ा. लेखकों, कवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर यह रोक सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हो पाई. गौरतलब है कि भारतीय न्याय व्यवस्था की एक-एक बात संजोकर रखी जाती है. अदालतों के आदेशों को इतिहास की अलमारी में संगवाकर रखा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने इन विद्वानों की गिरफ्तारी पर रोक लगाकर उसे नज़रबंदी में तब्दील करने का जो अंतरिम आदेश दिया, वह भी इतिहास में सुरक्षित रखा जाएगा. यह आदेश जिनके खिलाफ है, वे कह सकते हैं कि यह आदेश अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन इस मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने एक दार्शनिक वाक्य भी बोला है - असहमति लोकतंत्र का 'सेफ्टी वॉल्व' है... यह सार्थक वाक्य इतिहास में ज़रूर जाएगा. इतना ही नहीं, अदालत ने अपराधशास्त्रियों और न्यायशास्त्रियों को सोच-विचार का एक विषय भी दे दिया है.
  • एशियाड के हीरो : संयम के साथ संघर्ष की दास्तानें
    मनोरंजन भारती
    स्वप्ना बर्मन पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी की रहने वाली ..पिता आटो चलाते थे फिर 2003 में दिल की बीमारी की वजह से बिस्तर पकड़ लिया..मां चाय बगान में काम करती हैं.
  • हिंदी का पाठक जब बनेगा सबसे अच्छा पाठक
    रवीश कुमार
    लोग पढ़ने की क्षमता कई कारणों से खोते जा रहे हैं. इसलिए उनके लिए सुबह की राम राम जी की जगह गुलाब के फूल, दो कप चाय और पहाड़ के पीछे से उगते सूरज से गुडमार्निंग भेजा जाता है. जो लोग मुश्किल से पढ़ने की साधना में लगे हैं, वो व्यापक समाज के अपढ़ होने की इस प्रक्रिया से बेचैन हैं.
  • अर्बन नक्सल के नाम पर मामला कारपोरेट लूट की दलाली खाने का है...
    सरकार की कोई भी विकास परियोजना में बाधा डालने में नक्सली सबसे आगे होते हैं. साथ में नक्सलियों और टिम्बर/कोयला/खनिज/तेंदू पत्ता माफिया के बीच सांठ-गांठ बन गई है. कई जगहों पर नक्सली कमांडर इन माफिया और कंपनियों से ‘हफ़्ता’ लेकर उनकी रक्षा करते हैं. कोई गांववाला इनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है तो उसे गद्दार बोलकर मार दिया जाता है.
  • प्राइम टाइम : नाकाम रही नोटबंदी?
    रवीश कुमार
    याद कीजिए नोटबंदी की वो लाइनें. खासकर महिलाएं जिनके पास अपना जमा किया हुआ पैसा था, वो सब पतियों और पिताओं के हाथ चला गया. एक झटके में किसी बुरे वक्त के लिए बचा कर रखे गए पैसे निकाल कर देने पड़े क्योंकि वे अब वे अवैध हो चुके थे. बाद में वे पैसे लौट कर पत्नियों और बेटियों के हाथ आए या नहीं, वहीं बता सकती हैं मगर महिलाओं से लेकर आम किसानों तक लाइन में लग गए. अपना पैसा जमा कराने.
  • सुप्रीम कोर्ट ही है आसरा...
    मनोरंजन भारती
    यह जानना चाहते हैं कि क्या ये पांच लोग सचमुच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साज़िश रच रहे थे, या ये गिरफ्तारियां चुनावी रणनीति का हिस्सा हैं.
  • एशियन गेम्‍स में भारत के प्रदर्शन ने जगाई उम्‍मीद...
    मनोरंजन भारती
    दो खेल ऐसे हैं जिनमें काफी प्रगति हुई है वह है शूटिंग और बैडमिंटन. मगर अब एथलेटिक्स ने लोगों को यह उम्‍मीद दी है कि आने वाला समय एथलीटों का होने वाला है. खासकर दुती चंद, हेमा दास और नीरज चोपड़ा, मंजीत सिंह, जिन्‍सन जॉनसन जैसे लोगों से काफी उम्मीदें हैं. इस सब के पीछे फेडरेशन और सरकार की मेहनत साफ दिख रही है.ओलिंपिक में पदक जीतने वाले एक पूर्व खिलाड़ी का खेल मंत्री होना भी एक बहुत बड़ा कारण है. राज्‍यवर्धन राठौड़ का गेम्स विलेज में खिलाड़ि‍यों को अपने हाथ से खाना परोसने की तस्वीर भी वायरल हो रही है.
  • नोटबंदी के समय उल्लू बने लोग हाज़िर हों, 99.3 पैसा बैंक में आ गया है
    रवीश कुमार
    कल्पना कीजिए, आज रात आठ बजे प्रधानमंत्री मोदी टीवी पर आते हैं और नोटबंदी के बारे में रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट पढ़ने लगते हैं. फिर थोड़ा रूक कर वे 8 नवंबर 2016 का अपना भाषण चलाते हैं, फिर से सुनिए मैंने क्या क्या कहा, उसके बाद रिपोर्ट पढ़ते हैं. आप देखेंगे कि प्रधानमंत्री का गला सूखने लगता है. वे खांसने लगते हैं और लाइव टेलिकास्ट रोक दिया जाता है. वैसे कभी उनसे पूछिएगा कि आप अपने उस ऐतिहासिक कदम के बारे में क्यों नहीं बात करते हैं?
  • क्या चौकीदार जी ने अंबानी के लिए चौकीदारी की है?
    रवीश कुमार
    उपरोक्त संदर्भ में चौकीदार कौन है, नाम लेने की ज़रूरत नहीं है. वर्ना छापे पड़ जाएंगे और ट्विटर पर ट्रोल करने लगेंगे कि कानून में विश्वास है तो केस जीत कर दिखाइये. जैसे भारत में फर्ज़ी केस ही नहीं बनता है और इंसाफ़ झट से मिल जाता है. आप लोग भी सावधान हो जाएं. आपके ख़िलाफ़ कुछ भी आरोप लगाया जा सकता है. अगर आप कुछ नहीं कर सकते हैं तो इतना तो कर दीजिए कि हिन्दी अख़बार लेना बंद कर दें या फिर ऐसा नहीं कर सकते तो हर महीने अलग अलग हिन्दी अख़बार लें, तभी पता चलेगा कि कैसे ये हिन्दी अख़बार सरकार की थमायी पर्ची को छाप कर ही आपसे महीने का 400-500 लूट रहे हैं. हिन्दी चैनलों का तो आप हाल जानते हैं. मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं. इसके लिए आपको 28 और 29 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतिका चोपड़ा की ख़बर बांचनी होगी. आप सब इतना तो समझ ही सकते हैं कि इस तरह की ख़बर आपने अपने प्रिय हिन्दी अख़बार में कब देखी थी.
  • भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार गिरफ़्तार
    रवीश कुमार
    जब सरकारें आपको कम्युनिस्ट बताकर गिरफ्तार करने आने लगे तो समझ लेने का वो आखिरी वक्त होता है कि अब आपकी कोई हैसियत नहीं है. जब टीवी चैनल अर्बन नक्सल और कम्युनिस्ट बताकर देश का दुश्मन टाइम बहस करने लगें तो समझ लेने का आखिरी वक्त होता है कि अब नौकरी से लेकर पढ़ाई पर बात नहीं होगी. अब आपकी बात ही नहीं होगी और जो भी होगी उस प्रोपेगैंडा के हिसाब से होगी, जिसे मैं अक्सर थीम एंड थ्योरी कहता हूं. जिसे लेकर एक तरफ विरोधी या सवाल करने वालों को कुचला जा सके और दूसरी तरफ सवाल न उठे इसका इंतज़ाम किया जा सके. थीम एंड थ्योरी के तहत तीन मूर्ति में किस किस की मूर्ति लगेगी बहुत कमज़ोर टॉपिक था. इसलिए आज एक नया टॉपिक न्यूज़ मीडिया के मार्केट में लांच हो गया है, जिसके सहारे धीरे-धीरे मीम बनकर आपके व्हाट्सऐप में आने लगेगा. आप लाठियां खाते रहें कि सरकारी नौकरी में बहाली कब होगी मगर आपके सारे रास्ते बंद हो चुके हैं.
  • सरकारी नौकरियों की भर्ती में सालों क्यों लगते हैं?
    रवीश कुमार
    हर दिन सोचता हूं कि अब नौकरी सीरीज़ बंद कर दें. क्योंकि देश भर में चयन आयोग किसी गिरोह की तरह काम कर रहे हैं. उन्होंने नौजवानों को इस कदर लूटा है कि आफ चाह कर भी सबकी कहानी नहीं दिखा सकते हैं. नौजवानों से फॉर्म भरने कई करोड़ लिए जाते हैं, मगर परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. देश में कोई भी खबर होती है, ये नौजवान दिन रात अपनी नौकरी को लेकर ही मैसेज करते रहते हैं. मेरी नौकरी, मेरी परीक्षा का कब दिखाएंगे. परीक्षा देकर नौजवान एक साल से लेकर तीन साल तक इंतज़ार कर रहे हैं तो कई बार फॉर्म भरने के बाद चार तक परीक्षा का पता ही नहीं चलता है. यह सीरीज़ इसलिए बंद करना ज़रूरी है क्योंकि समस्या विकराल हो चुकी है. जब भी बंद करने की सोचता हूं किसी नौजवान की कहानी सुनकर कांप जाता हूं. तब लगता है कि आज एक और बार के लिए दिखा देते हैं और फिर सीरीज़ बंद नहीं कर पाता. 
  • क्यों न रिपोर्टिंग ही बंद हो जाए, क्यों न आप अख़बार ही कल से बंद कर दें
    रवीश कुमार
    मुज़फ्फरपुर बालिका गृह कांड से संबंधित अब किसी भी मामले की रिपोर्टिंग नहीं होगी. पटना हाईकोर्ट ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर यह बंदिश लगा दी है. पहले हो चुकी जांच और आगे होने वाली जांच से संबंधित कोई ख़बर ही नहीं छपेगी. हाईकोर्ट के इस आदेश पर एडिटर्स गिल्ड ने चिन्ता जताई है.
  • ये नफरत आपको दंगाई बना रही है, हमारी मोहब्बत आपको इंसान बनाएगी
    रवीश कुमार
    हम तुम्हारी हर झूठ पर भारी पड़ते हैं, भांडा फोड़ देते हैं और इस तरह आप धीरे-धीरे बदलते चले जाएंगे. नफरतों से सामान्य होना कितना सहज हो चुका है. मैं केरल नहीं गया. जाता तो गलत नहीं होता. उसके बाद भी किसी मदद करने वाले के चेहरे पर मेरा चेहरा लगाकर इस तरह से पेश किया जा रहा है ताकि कम दिमाग के लोग मान बैठे कि केरल जाना या बाढ़ पीड़ितों की मदद करना गलत है. कम दिमाग वालों में ऐसी मूर्खता होगी ही इसी भरोसे धारणा फैक्ट्री से ऐसी सामग्री बनाई जाती है. सोचिए जिसकी जगह मेरा चेहरा लगा है वह कितना अच्छा होगा. अपने कंधे पर एक बच्चे को बिठाकर ले जा रहा है. यह उस बंदे का अपमान है. हम समाज में ऐसे लोगों को तैयार कर रहे हैं जो इस तरह के झांसे में आ रहे हैं.
  • अटल के नाम पर योजनाओं की बरसात
    रवीश कुमार
    अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद अचानक से उनके नाम पर कई चीज़ें खुलने लगी हैं. यहां अटल वहां अटल. हमने अखबारों में छपी खबरों के आधार पर, नेताओं द्वारा की गई मांग के आधार पर एक सूची बनाई है. हमारे सहयोगियों ने भी यह सूची बनाने में मदद की है. दिल्ली के अखबार में छत्तीसगढ़ का विज्ञापन आता है कि नया रायपुर का नाम अटल नगर रख दिया गया है.
«1234567»

Advertisement