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विचार
  • दिल्ली दंगा- बेकरी से लेकर रेडिमेड  गारमेन्ट्स को निशाना बनाने की कोशिश
    रवीश कुमार
    उत्तर पूर्वी दिल्ली की आबादी करीब 26 लाख होनी चाहिए. 23 लाख मतदाता हैं. यहां आबादी की बसावट का पैटर्न इस तरह से नहीं है कि बहुसंख्यक एक जगह बसते हों और अल्पसंख्यकों की बसावट उससे दूर कहीं किसी एक जगह पर हो. उत्तर पूर्वी दिल्ली में एक ही गली में हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं. ऐसा भी है कि एक गली में मुसलमान है, तो बगल की गली में हिन्दू हैं. ऐसा है कि दोनों के मोहल्ले कहीं कहीं साफ-साफ अलग-अलग हैं. कुल मिलाकर देखेंगे तो यहां की बसावट मिली जुली बसावट है.
  • रेल मंत्री जी को कोई जगा सकता है तो प्रभु राम ही, नहीं तो परीक्षा का काम तमाम ही समझें
    रवीश कुमार
    पिछले साल 28 फ़रवरी को रेलवे ने 35000 भर्ती का विज्ञापन निकाला. 500 रुपये देकर फार्म भरे हुए एक साल हो गए हैं. अभी तक परीक्षा नहीं हुई है. यही नहीं उसके पहले लोको पायलट की जो परीक्षा हुई थी, उसकी भी प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई है. कई लोगों की नियुक्तियां नहीं हुई हैं.
  • मंकी मैन के दौर में पहुंच गई दिल्ली, खरगोश बन कर उछलती कूदती रही
    रवीश कुमार
    दिल्ली बीमार है. बार-बार बिस्तर से उठ कर देखने लगती है कि नर्स आई कि नहीं. डॉक्टर साहब कब आएंगे. हर सेकेंड लगता है कि ईसीजी ड्रॉप कर रहा है. बीमार के तिमारदार अस्पताल के कोरिडोर में टहल रहे हैं. शाम होते ही दनादन फोन आने लगे.
  • एक साल में रेलवे NTPC भर्ती परीक्षा की तारीख तय नहीं कर सकी आर्टिकल 370 हटाने और CAA लाने वाली सरकार
    अर्चित गुप्ता
    इस बार का लोकसभा चुनाव युवाओं के लिए कई वादे लेकर आया था. चुनावी प्लैटफॉर्म पर नौकरी की रेल दोड़ा कर सरकार अपने कार्यकाल में एक बड़ी उपलब्धि जोड़ने की तैयारी में थी. लेकिन सरकार इसमें कितनी सफल रही ये सिर्फ रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन करने वाले ढाई करोड़ से ज्यादा उम्मीदवारों को ही मालूम हैं. चुनाव से पहले रेल मंत्री पीयूष गोयल ने रेलवे में 2 लाख से ज्यादा भर्तियां करने की घोषणा की.
  • दिल्ली के दंगों में जाति, मजहब से ऊपर भी कई इंसान दिखे
    रवीश कुमार
    दिल्ली दंगों के बीच जब दंगाइयों को मज़हब और राजनीति के हिसाब से बांटकर देखा जा रहा है तभी ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने सनक के इस भयंकर दौर में भी बंटने और बांटने की राजनीति से इनकार कर दिया. दिल्ली दंगे को कवर करने गए कई पत्रकारों ने लिखा है कि हिन्दू और मुसलमान के बीच ऐसा भयंकर दंगा कभी नहीं देखा. उन्हें लगा है कि भरोसे की हर दीवार ढहा दी गई है. लेकिन उन्हीं खंडहरों से ऐसी कहानियां भी निकलकर आ रही हैं जो यकीन पैदा करती हैं कि दिल्ली अपनी इस ग़लती पर अफ़सोस करेगी और भरोसे की नई दीवार भी बनेगी.
  • दिल्ली में मेरे लिए ये भारी रात थी
    दिल्ली नहीं, हमारा दिल जल रहा है, हम जल रहे हैं और हमारे रिश्ते जल रहे हैं. जहां बचपन से हर कौम के लोगों को साथ रहते, खुशियां-गम बांटते देखा, उन लोगों को ऐसे लड़ते देखना बहुत मुश्किल है. ये वो दिल्ली है जिसने भेदभाव किए बिना हर किसी को आसरा दिया, अपना सहारा दिया. आज उसी दिल्ली में लोगों को अपनी पहचान बताने में डर लग रहा है. मैंने कभी सोचा नहीं था कि कभी दंगे के डर का सामना मुझे भी करना पड़ेगा. लेकिन कल रात मुझे डर लगा, बहुत डर लगा.
  • दिल्ली तो बस एक नई प्रयोगशाला है
    प्रियदर्शन
    दिल्ली और देश में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए न भारतीय जनता पार्टी को कोसें और न ही संघ परिवार को. ये सब अपने लक्ष्यों को लेकर बहुत ईमानदार संगठन हैं- लक्ष्य तक पहुंचने के लिए चाहे जितनी बेईमानी कर लें. एक समुदाय के प्रति अपने भाव इन्होंने कभी नहीं छुपाए और यह इरादा भी कभी नहीं छुपाया कि सत्ता में आने के बाद वे इस देश के बहुसंख्यकवाद को नई ताक़त देंगे. धारा 370 हटाने की बात हो, राम मंदिर निर्माण की बात हो, तीन तलाक़ की बात हो, एनआरसी की बात हो- सब बीजेपी के घोषणापत्र में पहले से दर्ज है. बल्कि कई बार इस आधार पर उनकी खिल्ली उड़ाई गई कि वे सत्ता में आने के बाद अपना एजेंडा भूल जा रहे हैं. अब वे अपना घोषित एजेंडा पूरा कर रहे हैं तो इस पर आप दुखी हो सकते हैं, हैरान नहीं.
  • दिल्ली की हिंसा पर काबू पाने में इतना समय क्यों लगा?  
    रवीश कुमार
    बड़े नेता बोलने लगे हैं हेडलाइन अब बड़ी होने लगेगी और आम लोगों की तकलीफें छोटी होने लग जाएंगी. उनके बयानों से जगह भर जाएगी और जिनकी दुकानें जली हैं, घर वाले मारे गए हैं और जो अस्पताल के बिस्तर पर ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हैं उनके लिए जगह कम बचेगी.
  • धर्म साबित करने के लिए 'रुद्राक्ष' दिखाया, जान बचाने के लिए गिड़गिड़ाया - अब ऐसी हो गई है दिल्ली
    सौरभ शुक्ला
    ख़बरों की कवरेज के लिहाज़ से बिल्कुल आम दिन की तरह शुरू हुआ था मंगलवार, लेकिन खत्म होते-होते मेरी ज़िन्दगी का सबसे डरावना दिन बन गया...
  • दिल्‍ली में इस हिंसा को क्‍यों बढ़ने दिया गया?
    रवीश कुमार
    मंगलवार को दिल्ली शांत नहीं हो सकी है. जैसे ही लगता है कि हालात सामान्य हो रहे हैं, कहीं और से हिंसा और घायलों की खबरें आने लगती हैं. इस हिंसा को नहीं रोक पाने के लिए कौन ज़िम्मेदार है. यह सवाल गृहमंत्री अमित शाह से शुरू होता है, फिर पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक पर जाता है फिर उप राज्यपाल और फिर मौके पर तैनात पुलिस पर पहुंचते ही दोनों पक्षों में बंट जाता है, जो अपना संतुलन खो चुके हैं और पथराव से लेकर गोलीबारी पर उतर आए हैं.
  • आज दिल्ली लुभा नहीं रही, डरा रही है - जाफराबाद-मौजपुर की आंखों देखी कहानी, रिपोर्टर की ज़ुबानी
    परिमल कुमार
    सोमवार दोपहर लगभग 12 बजे मौजपुर चौक के सामने देखते ही देखते दोनों तरफ के लोग उबाल में आ गए और पत्थरबाज़ी शुरू. दो-तरफ़ा. पुलिस थी, पर मूक बनी रही. हालात बिगड़ने से पहले संभल सकते थे. इसके गवाह मैं और अंग्रेज़ी से मेरी सहयोगी सुकीर्ति भी रहीं. तस्वीर उतार रहे हमारे कैमरापर्सन सुशील राठी को फौरन कैमरा बंद करने की धमकी मिली. मौके को उन्होंने-हमने भांपा, और कैमरा बंद कर दिया.
  • ट्रंप का भारत दौरा और दिल्ली में ये हिंसा!
    रवीश कुमार
    ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक हाईप्रोफाल राष्ट्रीय मेहमान भारत आया हो और भारत की राजधानी दिल्ली में दंगे हो रहे हों. ये और बात है कि इस हिंसा की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी अब के मीडिया समाज में किसी की नहीं होती है, फिर भी ये बात दुखद तो है ही कि हम किस तरह की राजधानी दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं.
  • राजद्रोह जैसा आरोप लगाना कुछ ज्यादा नहीं है?
    रवीश कुमार
    एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूं. यह कहानी आपको याद दिलाएगी कि हम कहां से कहां आ गए हैं. यह हालत हो गई है कि उस मुल्क का नाम सुनते ही इस मुल्क के होश उड़ने लगे हैं. जो अधिकारी अपना काम शायद ही कभी ठीक से कर पाते हों वो तुरंत केस दर्ज कर हीरो बन जाते हैं. राजद्रोह ही लगता है इस वक्त का सबसे प्रचलित अपराध है. पब्लिक लड़की के घर भी चली जाती है और पत्थर मारने लगती है. हम बंगलूरू की अमूल्या को लेकर ही बात करना चाहते हैं.
  • हौसलों के पांव, उपलब्धियों के रन, दंतेवाड़ा में धराशायी हो रही हैं धारणाएं
    तारन प्रकाश सिन्‍हा
    कभी नक्सल हिंसा ग्रस्त रहा दंतेवाड़ा जिला भी मड्डाराम की तरह अपने हौसले से उपलब्धियां हासिल कर रहा है.
  • क्या समिति और NGO से चलने लगा है विदेश मंत्रालय
    रवीश कुमार
    एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार की ज़ुबान फिसल गई और उन्होंने नागरिक अभिनंदन समिति का नाम ले लिया.
  • क्या है फेक न्यूज का नया सरगना डीप फेक वीडियो?
    रवीश कुमार
    झूठ के पैर नहीं होते लेकिन टेक्नालॉजी ने झूठ को ताकतवर बना दिया है. अभी ही हम जैसे लोग परेशान हैं कि जो बात कहीं नहीं होती वो भी तस्वीर के साथ लिखकर वायरल हो रहा होता है. आल्ट न्यूज़ जैसी साइट वायरल तस्वीर और वायरल वीडियो के पीछे का झूठ तो पकड़ लेते हैं लेकिन वो उन सभी के पास नहीं पहुंच पाता है जिनके व्हाट्स ऐप के इनबाक्स में झूठ पहुंचा होता है.
  • क्या ऐसे ट्रंप की नजरों से छुप जाएगी गरीबी?
    रवीश कुमार
    अभी तो माहौल जम रहा था कि अमेरिका से राष्ट्रपति ट्रंप का जहाज़ उड़ेगा और न्यूज़ चैनलों पर ईवेंट कवरेज का मजमा जमेगा..सूत्रों के हवाले से खूब हलवे बनाए जाएंगे, कुछ बातों का पता होगा, कुछ का पता ही नहीं होगा लेकिन तभी आज ट्रंप साहब ने होली जैसे बन रहे मूड को बिगाड़ दिया. उन्हें सोचना चाहिए था कि हम कुछ न पता चले उसके लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं. जबकि हमें पता है कि ट्रंप साहब के पास ड्रोन कैमरा है. इसके बाद भी हमने दीवार बनाई ताकि गरीबों का घर न दिखे. अब ट्रंप साहब कार से उतरकर ड्रोन तो उड़ाएंगे नहीं. इस दीवार से अलग एक और दीवार है. मोटेरा स्टेडियम की तरफ. उस बस्ती की दीवार को रंगा जा रहा है, ईस्टमैन कलर वाले लुक में.
  • क्या कोरोना वायरस से लड़ने के लिए दुनिया और भारत सक्षम हैं?
    रवीश कुमार
    न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि उनका विश्लेषण बताता है कि कोरोना वायरस के कारण चीन में करीब 15 करोड़ की आबादी सरकारी पाबंदी में है कि वे अपने घरों से कितने दिनों में और कितनी देर के लिए घर से बाहर निकल सकते हैं. घर से बाहर निकलने पर उनके शरीर का तापमान चेक होता है, डॉक्टर चेक कर एक प्रमाण देता है, फिर परिचय पत्र दिखाना होता है तब कोई सोसायटी से बाहर अपने पड़ोस में जा पाता है. एक समय में घर से एक ही आदमी बाहर जा सकता है. वो भी रोज़ नहीं.
  • पुरुष-प्रधान, पिछड़ी सोच का परिचायक है अरविंद केजरीवाल का बासी कैबिनेट
    आशुतोष
    भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने दिल्ली में प्रचार में जान लगा दी थी. वह अपनी वोट हिस्सेदारी छह फीसदी बढ़ाने में कामयाब रही. बेशक उनका प्रचार अभियान बेहद अनैतिक और नकारात्मक था, लेकिन वोट शेयर में बढ़ोतरी इस तथ्य का संकेत है कि अभियान का असर पड़ा.
  • हमारे देश में क़ानून का डर कितना बचा है?
    रवीश कुमार
    जस्टिस अरुण मिश्रा ने टेलिकॉम मामले की सुनवाई के समय कह दिया कि इस देश में कोई कानून नहीं बचा है. बेहतर है इस देश में रहा ही नहीं जाए, बल्कि यह देश ही छोड़ दिया जाए. मैं विक्षुब्ध हूं. लग रहा है कि इस कोर्ट के लिए काम ही न करूं. कोर्ट की नाराज़गी इस बात को लेकर थी कि टेलिकॉम मंत्रालय के डेस्क अफसर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी. ज़ाहिर सी बात है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर कोई अफसर रोक लगा सकता है.
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