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  • सीबीआई की पार्वती और पारो में किसे चुनेंगे देवदास हुजूर...
    रवीश कुमार
    आपने फिल्म देवदास में पारो और पार्वती के किरदार को देखा होगा. नहीं देख सके तो कोई बात नहीं. सीबीआई में देख लीजिए. सरकार के हाथ की कठपुतली दो अफ़सर उसके इशारे पर नाचते-नाचते आपस में टकराने लगे हैं. इन दोनों को इशारे पर नचाने वाले देवदास सत्ता के मद में चूर हैं. नौकरशाही के भीतर बह रहा गंदा नाला ही छलका है. राजनीति का परनाला वहीं गिरता है, जहां से उसके गिरने की जगह बनाई गई होती है. चार्जशीट का खेल करने वाली सीबीआई अपने ही दफ़्तर में एफआईआर और चार्जशीट का खेल खेल रही है. महान मोदी कैलेंडर देख रहे हैं, ताकि किसी महान पुरुष की याद के बहाने भाषण देने निकल जाएं.
  • मोदी के बाद योगी, बढ़ता जा रहा प्रभाव
    अखिलेश शर्मा
    बीजेपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तेजी के साथ दूसरे सबसे बड़े चुनाव प्रचारक के रूप में उभर रहे हैं. गुजरात, त्रिपुरा और कर्नाटक में योगी आदित्यनाथ से चुनाव प्रचार कराने के बाद अब बीजेपी ने तीन हिंदी भाषी राज्यों के चुनावों में भी योगी आदित्यनाथ को आगे कर दिया है. बीजेपी के मुताबिक योगी आदित्यनाथ पीएम मोदी के चुनाव मैदान में कूदने से पहले जमीन तैयार करेंगे.
  • सीबीआई में चल रही उठापटक पर बिहार के नेताओं की निगाहें क्यों टिकीं?
    मनीष कुमार
    भले सीबीआई के इतिहास में एक निदेशक आलोक वर्मा और अतिरिक्त निदेशक राकेश अस्थाना के बीच जारी वर्चस्व की लड़ाई में पूरे देश के नेता और पुलिस अधिकारी हर दिन के घटनाक्रम पर नज़र लगाए बैठे हैं लेकिन बिहार में ये एक मुद्दा बनता जा रहा है.
  • बिहार में चचा बनाम भतीजा
    मनोरंजन भारती
    बिहार में आखिरकार एनडीए के दलों के बीच गठबंधन हो गया. इस समझौते में सबको खुश करने की कोशिश जरूर की गई है खासकर जेडीयू को. लगता है कि बीजेपी आलाकमान फिलहाल नीतीश कुमार को नाराज नहीं करना चाहती है. यही वजह है कि बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी जीती सीटें भी जेडीयू के लिए छोड़ दी हैं.
  • फिल्मों में झलकते राजनीतिक आशय
    डॉ विजय अग्रवाल
    'स्त्री', 'सुई-धागा' और 'मंटो', इन तीनों फिल्मों में एक बात जो एक-सी है, वह है - नारी की शक्ति और उसके अधिकारों की स्वीकृति. 'स्त्री' भले ही एक कॉमेडी थ्रिलर है, लेकिन उसमें स्त्री के सम्मान और शक्ति को लेकर समाज की जितनी महीन एवं गहरी परतें मिलती हैं, वह अद्भुत है. यही कारण है कि भूत-प्रेत जैसी अत्यंत अविश्वसनीय कथा होने के बावजूद उसने जबर्दस्त कलेक्शन किए.
  • मधुमेह रोगियों के पांव जल्दी ही बहुत खूबसूरत होंगे, जमीन पर रखने लायक!
    रवीश कुमार
    सन 1701 में येल यूनिवर्सिटी की बुनियाद पड़ी थी. चार सौ साल की यात्रा पूरी करने वाली इस यूनिवर्सिटी की आत्मा ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड में बसती है, जबकि है अमरीका के न्यू हेवन शहर में. यहां दो दिनों से भटक रहा हूं. आज भटकते हुए बायो-मेकेनिक्स की प्रयोगशाला में पहुंचा. यहां तीन भारतीय छात्र नीलिमा, निहव और अली हमारे पांव और उंगलियों की स्थिरता और उसके जरिए लगने वाले बल के बीच संतुलन का अध्ययन कर रहे हैं.
  • 'प्रधानसेवक' ही भारत के 'प्रधान इतिहासकार' घोषित हों...
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री इसीलिए आज के ज्वलंत सवालों के जवाब देना भूल जा रहे हैं, क्योंकि वह इन दिनों नायकों के नाम, जन्मदिन और उनके दो-चार काम याद करने में लगे हैं. मेरी राय में उन्हें एक 'मनोहर पोथी' लिखनी चाहिए, जो बस अड्डे से लेकर हवाई अड्डे पर बिके. इस किताब का नाम 'मोदी-मनोहर पोथी' हो.
  • क्या आजकल मुख्यमंत्री के गांव में रात बिताने का भी नहीं होता असर...?
    राकेश कुमार मालवीय
    मुख्यमंत्री ने इस गांव में रात बिताने के बाद माना था कि इस इलाके में भयंकर गरीबी है. उन्होंने कहा था कि वह चुनाव होने के कारण उस वक्त कोई घोषणा नहीं कर सकते, लेकिन चुनाव के बाद पूरी सरकार लेकर जाएंगे और इलाके की तस्वीर बदल देंगे. इलाके की जनता ने इस वादे के बाद भी यहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) को नहीं जिताया. जिस गांव ने मुख्यमंत्री की मेज़बानी की, उस गांव की तस्वीर भी नहीं बदल सकी. प्रधानमंत्री आवास योजना इसका एक उदाहरण मात्र है, और यह गांव कई और योजनाओं से भी अछूता है.
  • अमृतसर ट्रेन हादसा : फिर वही सियासत, मुआवजा और एक अदद जांच आयोग
    प्रभात उपाध्याय
    र 10 माह के उस मासूम का दर्द और दलबीर सिंह के परिवार की पीड़ा का कौन 'खरीदार' होगा. और आप भी यह मुगालते पालना बंद करिये कि सिस्टम, सरकार, विभाग और नेताओं के लिए आपकी पीड़ा का कोई महत्व-मायने है. यह ज्यादा सियासत, थोड़ा मुआवजा और एक अदद आयोग से अधिक कुछ नहीं है.
  • ब्‍लॉग : अनिल मानहानि अंबानी की जय हो...
    रवीश कुमार
    अब समझा रफाल विमान सौदे पर प्रधानमंत्री क्यों चुप हैं? कहीं मां अम्बे के आशीर्वाद से सच निकल गया तो अंबानी जी मानहानि न कर दें. अनिल अंबानी की मानहानि न हो इसलिए प्रधानमंत्री तमाम आरोप झेल गए मगर एक शब्द नहीं बोले. इंतज़ार कर रहे होंगे कि एक ही झोंके में कई चुनाव जीत जाएं फिर जयकारे के बीच हुंकार भर कर निकल जाएंगे. कह देंगे कि जनता ने बोल दिया, हम क्या बोलें.
  • यूपी पुलिस ख़ुद को भंग कर बीजेपी से पार्षद बन जाए
    रवीश कुमार
    मेरठ से आए एक वीडियो को देख रहा हूं. बीजेपी पार्षद दारोग़ा की गर्दन दबोच देते हैं. फिर लगातार पांच बार ज़ोर ज़ोर से मारे जा रहे हैं. मां बहन की गालियां दे रहे हैं. उनका साथी दारोग़ा का कॉलर पकड़ कर पटक देता है.
  • अमृतसर रेल हादसा : राम भरोसे सिस्टम में मानव वध का अपराधी कौन?
    विराग गुप्ता
    अमृतसर में रेल हादसे के बाद मुख्यमंत्री और केन्द्रीय रेल मंत्री विदेशी दौरों को रद्द करके भारी चिंता व्यक्त की है. विजयदशमी को रावण दहन के दिन हुई इन मौतों से यह फिर साबित हुआ कि राम भरोसे चल रहे देश में इन्सानों की जान की कोई कीमत नहीं है। देश में ट्रेन से कटकर मौत के सबसे बड़े हादसे के लिए किसकी जवाबदेही है और कौन है अपराधी?
  • क्या लोकपाल सर्च कमेटी की मेंबर अरुंधति भट्टाचार्य रिलायंस समूह की स्वतंत्र निदेशक हो सकती हैं?
    रवीश कुमार
    जो लोकपाल चुनेगा वही रिलायंस की कंपनी में निदेशक भी होगा? अगर यह सही है तो वाकई यह कहने का वक्त है, हम करें तो क्या करें. वाह मोदी जी वाह.
  • 3800 आरोपियों वाले व्यापम घोटाले पर प्रधानमंत्री मोदी बोल सकते हैं?
    रवीश कुमार
    लखनऊ की डॉक्टर मनीषा शर्मा ने इसी महीने आत्महत्या कर ली. मनीषा मध्यप्रदेश के व्यापम मामले में गिरफ़्तार हो चुकी थीं और उन्हें सीबीआई के बुलाने पर ग्वालियर भी जाना था मगर ज़हर का इंजेक्शन लगा लिया. उन पर किसी और छात्र के बदले इम्तिहान देकर पास कराने के आरोप थे. आत्महत्या के कारणों की प्रमाणिक बातें नहीं आईं हैं क्योंकि मीडिया अब भारत के इतिहास के सबसे बड़े परीक्षा घोटाले में दिलचस्पी नहीं लेता है. व्यापम मामले से जुड़े कितने लोगों की इन वजहों से मौत हो गई फिर भी इसे लेकर चुप्पी है.
  • 'फिर राम याद आए, क्या चुनाव नजदीक आए'?
    अखिलेश शर्मा
    इन्हें फिर राम याद आए हैं. पूछो क्या चुनाव नजदीक आए हैं. यह वो आरोप है जो विपक्ष आरएसएस और बीजेपी पर हमेशा लगाता रहा है. लेकिन पिछले एक महीने में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने चार बार राम मंदिर का नाम लेकर एक तरह से विपक्ष के आरोप की पुष्टि ही की है.
  • जब सब मोदी नाम की आंधी के खौफ में थे, तब लिखा था अकबर के नाम पत्र
    रवीश कुमार
    6 जुलाई 2016 को अकबर के नाम पत्र लिखा था. तब सब मोदी नाम की आंधी के ख़ौफ़ में थे. उन्हें लगता था कि मोदी जिसे छू देंगे वो हीरा बन जाएगा. तब लोग चुप रहे, लगा कि अकबर कोई क़ाबिल शख़्स है जिसकी तलाश मोदी के मुस्तकबिल है. मैं जानता था अकबर क्या है, क्यों अकबर को लेकर सवाल करना चाहिए. आप चाहें तो उस पत्र को पढ़ सकते हैं. 
  • मोबाइल उत्पादन के नाम पर झांसेबाज़ी, ONGC का ख़ज़ाना ख़ाली, निर्यात भी घटा
    रवीश कुमार
    भारत की मुद्रा दुनिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली चार मुद्राओं में शामिल है. जेटली यह नहीं बता रहे हैं कि मज़बूत नेता और एक दल की बहुमत की सरकार होने के बाद भी आर्थिक हालत पांच साल ख़राब क्यों रही लेकिन अभी से डराने लगे है कि गठबंधन की सरकार आएगी तो भारत की आर्थिक स्थिति ख़राब हो जाएगी. क्या अभी के लिए गठबंधन की सरकार दोषी है?
  • इलाहाबाद के बाद अब अकबर को बदलने का वक़्त आ गया है
    रवीश कुमार
    सोलह महिला पत्रकारों का आरोप सामान्य घटना नहीं है. सबके आरोप में कई बातें सामान्य हैं. पता चलता है कि अकबर मनोरोगी की हद तक अकेली लड़की को बुलाकर हमला करते थे. होटल के कमरे में काम के बहाने बुलाने पर ज़ोर देते थे. कमरे में शराब पीने के लिए बर्फ़ निकालने और गिलास में शराब डालने की बात करते थे.
  • क्या एमजे अकबर इस्तीफ़ा ना देने पर अड़ गए हैं?
    रवीश कुमार
    विदेश राज्य मंत्री मुबशिर जावेद अकबर ने पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया है. वकालतनामे में 97 वकीलों का नाम देखने के बाद भी दो महिलाएं और सामने आईं हैं. स्वाति गौतम ने क्विंट में और तुसीता पटेल ने स्क्रॉल डॉट इन में अकबर के साथ अपने अनुभव को लिखा है. उम्मीद थी कि कानूनी कार्रवाई के बाद अकबर को लेकर महिलाओं के लेख आने बंद हो जाएंगे, मगर ऐसा नहीं हुआ. लग रहा था अब जिन्हें लिखना था उन्होंने लिख लिया है. बाकी नहीं लिखेंगी. एक दिन में दो महिलाओं के लेख आने के बाद कहा नहीं जा सकता है कि कल कोई लेख नहीं आएगा. कल कोई प्रसंग नहीं आएगा.
  • ऑपरेशन कमल इन गोवा...
    मनोरंजन भारती
    गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर की लगातार बिगड़ती बियत के बाद बीजेपी ने यह फैसला किया है कि अब वह गोवा में एक नया मुख्यमंत्री बनाएगी. उसने अपने सरकार के बहुमत के लिए कांग्रेस के दो विधायकों का भी इस्तीफा भी करा दिया. गोवा जैसे छोटे से राज्य में अपनी सरकार बनवाने के लिए इतनी बड़ी मशश्कत करना यह दिखाता है कि बीजेपी छोटे से छोटे राज्य में अपनी सरकार बनवाने को लेकर कितनी गंभीर है. बीजेपी ने यही फॉर्मूला उत्तर पूर्व के कई राज्यों में अपनाया जहां बीजेपी के विधायकों की संख्या काफी कम है, मगर जोड़-तोड़ करके उन्होंने सरकार बनाई, यानी किसी भी हालत में किसी और पार्टी को सरकार नहीं बनाने देना है भले ही बीजेपी को उस राज्य में बहुमत न हो या वह सबसे बड़ी पार्टी भी न हो.
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