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विचार
  • मेरा नंबर भारत का इमरजेंसी नंबर, रेल मंत्री जी कुछ काम भी कीजिए, लोगों की सुन लीजिए
    रवीश कुमार
    अच्छा भी लगता है कि लोग इस काबिल समझते हैं कि मुसीबत के वक्त फोन करने लगते हैं. बुरा लगता है कि सबके काम नहीं आ पाता हूं. दिल पर पत्थर रखते हुए इस नंबर को अब बंद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. हर फोन कॉल नए सिरे से उदास कर जाता है. आख़िर एक के बाद एक इस तरह की बातों को सुनकर कैसे खुश रहे.
  • देश भर में बीजेपी ने बनाए नए-चमचमाते दफ़्तर
    रवीश कुमार
    एक पार्टी कई सौ नए दफ्तर बना रही है. इसकी न तो कहीं चर्चा है और न ही इस पर रिपोर्ट. 19 मई 2015 की मिंट की ख़बर कहती है कि ज़मीन से नाता जोड़ने के प्रयास में और समर्थकों से फंड लेने के लिए बीजेपी कार्यालयों का एक राष्ट्रीय नेटवर्क बनाएगी. बीजेपी 630 ज़िलों में पार्टी का कार्यालय बनाने वाली है जिन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए राज्य और दिल्ली के मुख्यालय से जोड़ा जाएगा. बीजेपी के पास 280 ज़िलों में ही कार्यालय हैं और 2016 तक बाकी के 350 ज़िलों में दफ्तर बन कर तैयार हो जाएगा. जहां दफ्तर है वहां भी नया दफ्तर बना है.
  • क्या मुद्दों से भटक गई है हमारी राजनीति?
    रवीश कुमार
    सोचिए मतदाताओं का बड़ा हिस्सा रोज़गार, पानी और स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण मानता है मगर मीडिया में इसकी कितनी चर्चा है. खासकर हिन्दी के अखबारों में. इस चुनाव में आप हिन्दी के अखबारों को ध्यान से पढ़ें. देखिए कि उनके कवरेज़ में विपक्ष को कितनी जगह मिल रही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ही पार्टी के दस नेताओं के बयान से पूरा पेज भर दिया गया है. गोदी मीडिया का हाल तो आप जानते ही हैं. हमारे सहयोगी कर्मवीर ने एडीआर के चोकर साहब से बात की.
  • वैज्ञानिक कथाकार नरेंद्र मोदी का राष्ट्र को संबोधन और चुनाव आयोग का समापन
    रवीश कुमार
    इसरो और रक्षा अनुसंधान का इस्तमाल नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक हित के लिए कर रहे हैं. उनका राष्ट्र के नाम संबोधन करना और कुछ नहीं बल्कि मतदाताओं को प्रभावित करना था. वे पुलवामा के बाद ऐसा कुछ चाहते थे जिससे पांच साल की नाकामी पर चर्चा और सवाल ग़ायब हो जाएं.
  • न्यूनतम आय योजना कितनी नायाब
    सुधीर जैन
    न्यूनतम आय की गारंटी के वायदे ने भारी असर पैदा कर दिया. इसका सबूत यह कि वायदों के बड़े-बड़े खिलाड़ी भौंचक हैं. केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली को जल्दबाजी में इस योजना को ब्लफ, यानी झांसा कहना पड़ा. खैर, यह तो चुनावी माहौल में एक दूसरे की राजनीतिक मारकाट की बात है, लेकिन यह भी हकीकत है कि अपने अनुभवी लोकतंत्र में नागरिक अब जागरूक हो चला है.
  • चुनाव 2019 - मतदाता का हल्का होना लोकतंत्र का खोखला हो जाना है
    रवीश कुमार
    मैं फील्ड में कभी यह सवाल नहीं करता कि आप किसे वोट देंगे. इस सवाल में मेरी दिलचस्पी नहीं होती है. मैं यह ज़रूर देखना चाहता हूं कि एक मतदाता किस तरह की सूचनाओं और धारणाओं से ख़ुद को वोट देने के लिए तैयार करता है. बाग़पत ज़िले के कई नौजवानों से मिला. शहरी नौजवानों की तरह किसी ने कहा नहीं या फिर जताया नहीं कि वे मुझे जानते हैं. मैं ऐसे ही नौजवानों के बीच जाना चाहता था जो मुझे ठीक से नहीं जानते हों.
  • दलितों-आदिवासियों का एक बड़ा पक्षधर चला गया
    प्रियदर्शन
    मार्च खत्म होते-होते मौत ने जैसे अपने बही खाते का आखिरी हिसाब वसूल लिया- हिंदी की जानी-मानी लेखक, संपादक और संचयनकर्ता रमणिका गुप्ता को अपने साथ ले गई. पीछे छूट गए हमारी तरह के पेशेवर श्रद्धांजलि लेखक- यह बताने के लिए कि इस साल अर्चना वर्मा, कृष्णा सोबती और नामवर सिंह के बाद हिंदी के साहित्याकाश को हुई चौथी क्षति है और यह जोड़ने के लिए कि 89 को छूती उम्र में रमणिका गुप्ता का निधन शोक का नहीं, एक जीवन की संपूर्णता को महसूस करने का विषय है.
  • 'हैप्पीनेस' के छलावे से सावधान, 140वें स्थान पर कैसे हो सकता है भारत...?
    डॉ विजय अग्रवाल
    अब, जब संयुक्त राष्ट्र की सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन्स नेटवर्क ने वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2019 जारी की है, इस छोटी सी, किन्तु बहुत वजनदार घटना पर विचार किया जाना बेहद ज़रूरी है. इसमें सबसे पहला सवाल 'खुशहाली' की परिभाषा पर ही उठाया जाना चाहिए. क्या बैरल में रहने वाले डियोजेनेस को इस रिपोर्ट के अनुसार किसी भी कोण से खुश व्यक्ति कहा जा सकता है...? विश्वविजेता से भी वह जो मांगता है, वह है धूप, जो यूं ही बहुतायत में उपलब्ध है, और जो खुशहाली के इंडेक्स से परे है. डियोजेनेस के उत्तर का क्या प्रभाव उस 23-वर्षीय नौजवान पर पड़ा होगा, क्या खुशहाली की गणना करते समय इसकी उपेक्षा की जानी चाहिए...?
  • गैर-कानूनी चुनावी रथ, रोड शो और बाइक रैलियां- सारे चौकीदार चुप क्यों
    विराग गुप्ता
    भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत असीमित अधिकार मिले हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. विक्रम सिंह ने चुनाव आयोग को 3 लीगल नोटिस देने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके रोड-शो और बाइक रैली पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की.
  • हमारी पार्टियों के लिए बेरोज़गारी कोई मुद्दा है?
    रवीश कुमार
    2019 के चुनाव में बेरोज़गारी की बात बहुत हो रही है, मगर इस पर न तो सरकार की तरफ से कुछ ठोस आ रहा है और न ही विपक्ष की तरफ से. पक्ष और विपक्ष की उदासीनता के बीच बेरोज़गारों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे अपने मुद्दों का क्या करें. 20 मार्च के इंडियन एक्सप्रेस में जे मजूमदार की खबर छपी है. इस खबर के अनुसार वर्क फोर्स यानी काम करने वालों की तादाद में तेज़ी से गिरावट आई है. पांच साल पहले की तुलना में इस वक्त कम लोग काम पर लगे हुए हैं. 1993-94 के बाद पहली बार आई कार्य बल में गिरावट आई है.
  • पहली बार सियासी बातचीत में छाया 'चौकीदार'
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 मार्च को देश भर के असली चौकीदारों से बात करेंगे. शाम साढ़े चार बजे यह बातचीत होगी. दावा किया जा रहा है कि 25 लाख चौकीदारों को संबोधित किया जाएगा. 31 मार्च को उन चौकीदारों से भी बात करेंगे जो ट्विटर पर बने हैं. इसका मतलब यह हुआ कि बीजेपी चौकीदार वाले अभियान को लेकर गंभीर है. तो हमने सोचा कि उन 25 लाख चौकीदारों में से झारखंड में 10,000 चौकीदारों का हाल पहले ही बता दें, जिन्हें कई महीनों से सैलरी नहीं मिली है. कुछ ज़िलों में नवंबर से सैलरी नहीं मिली है तो कुछ ज़िलों में जनवरी के बाद सैलरी नहीं मिली है. हर त्योहार से पहले इनकी यही खबर होती है कि दिवाली से पहले वेतन नहीं मिला तो फीकी रहेगी दिवाली और होली से पहले वेतन नहीं मिला तो फीकी रहेगी होली.
  • 2014 का चायवाला 2019 में चौकीदार हुआ!
    रवीश कुमार
    चुनाव शुरू हो चुका है. अभी तक कैच लाइन का पता नहीं है. बल्कि कैच लाइन वालों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है. हो सकता है अभी आगे के लिए बचा कर रखा हो, मगर जो आ रहा है उसमें मज़ा नहीं आ रहा है. 2014 का चुनाव याद कीजिए. 'अच्छे दिन आने वाले हैं' कैंपेन चल पड़ा था. इस कैंपेन की चुनाव के दौरान धुलाई नहीं हो सकी. उस स्लोगन के बहाने जो लिखा गया, जो गाया गया मतदाता के बड़े वर्ग का वो गीत बनता चला गया. कायदे से स्लोगन तो यही हो सकता था कि अच्छे दिन आ गए हैं, अब आगे बहुते अच्छे दिन आने वाले हैं. विपक्ष ने भी अच्छे दिन कहां है, पूछ-पूछ कर पुराना कर दिया है और सत्ता पक्ष भी इससे बोर हो गया होगा. तभी तो पहले 'मोदी है तो मुमकिन' है लॉन्च हुआ. अगर वो जुबान पर चढ़ा होता तो 'हां मैं भी चौकीदार हूं' लॉन्च नहीं होता.
  • सोचिएगा, समझिएगा, दुनिया में हिन्दुस्तान की भद्द न पिटवाइएगा
    राकेश कुमार मालवीय
    परीक्षा में पास होने के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत अंक होने चाहिए. हमने पिछली लोकसभा में 34 प्रतिशत ऐसे सांसदों को चुन लिया, जिन्होंने अपने घोषणा पत्र में स्वयं पर कोई न कोई आपराधिक मामला दर्ज होना घोषित किया था. 2019 में एक बार फिर यही राजनेता आपके सामने वोट मांगने के लिए आ खड़े हुए हैं.
  • क्‍या भारत में हर समस्‍या के लिए जवाहर लाल नेहरू जिम्‍मेदार हैं?
    रवीश कुमार
    भारत ने अपनी समस्याओं को पहचान लिया है. सारी समस्याओं का एक ही नाम है, नेहरू. भारत में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसकी जड़ में नेहरू नहीं हैं. अगर नेहरू नहीं हैं तो वह समस्या नहीं हैं. दुनिया के पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने अकेले दम पर इतनी समस्याएं पैदा करी हैं.
  • अब तक कहां छिपे बैठे हैं चुनावी मुद्दे
    सुधीर जैन
    अनुमान यह लगता है कि इस बार के चुनाव में किसानों और देश के युवावर्ग के दुख या संकट को कम करने के लिए व्यावहारिक योजना पेश करने की होड़ मचेगी. खासतौर पर मौजूदा सरकार की बेदखली की कोशिश करने वाले विपक्ष के नेताओं में यही होड़ मचेगी कि कौन सबसे ज्यादा विश्वसनीय तरीके से अपनी योजनाएं पेश कर पाता है.
  • यूपी में भाजपा के लोग सुबह-शाम मोदी नाम केवलम क्यों कर रहे?
    मनीष कुमार
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में वापस आने की संभावना चुनाव घोषित होने के पहले हफ़्ते में प्रबल दिख रही है. जबकि ये भी सच है कि इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा के शीर्ष नेता से कार्यकर्ता तक मानकर चल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में सीटों को संख्य कम होगी. वह पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में आधी भी हो सकती है. लेकिन इसके बावजूद एक महीने या 45 दिन पहले तक जो भाजपा उत्तर प्रदेश में हाशिये पर डबल डिजिट के लिए संघर्ष कर रही थी वह अब खेल में वापसी कर चुकी है.
  • क्‍या हम चीन की ओर से आंख मूंद रहे हैं?
    रवीश कुमार
    चीन के कारण आतंकी संगठन जैश के मुखिया मसूद अज़हर फिर से ग्लोबल आतंकी घोषण नहीं हो सका. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिति की 1267 प्रतिबंध कमेटी की सुनवाई में चीन ने चौथी बार तकनीकि कारणों के आधार पर मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी नहीं होने दिया.
  • चीन को लेकर अभी-अभी देखा गया एक सपना, सपने में सुना मोदी का भाषण
    रवीश कुमार
    हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा. अब चीन को पिचकारी से मार देंगे. होली के पहले जितनी भी पिचकारियां आई हैं, मैं हर देशभक्त से अपील करूंगा कि वह सिर्फ तीन चीज़ें लेकर सीमा पर पहुंचे. एक बाल्टी पानी, रंग और चीन की पिचकारी. इसके बाद हम सब पिचकारी से ही चीन की सेना को ज़ुकाम करा देंगे. छींकते छींकते चीन की बोलती बंद हो जाएगी.
  • भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद से प्रियंका गांधी की मुलाकात के क्या हैं मायने
    रवीश कुमार
    मंगलवार को गांधीनगर में अपने पहले राजनीतिक भाषण के बाद अगले दिन प्रियंका गांधी मेरठ चली आईं. उनका मेरठ आना पहले राजनीतिक भाषण से कहीं ज़्यादा राजनीतिक था. उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले इस मुलाकात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकेंगे. भीम आर्मी के नेता चंशेखर आजाद से अभी तक बड़े नेता दूरी बना कर चल रहे थे. कारण यह था कि चंद्रशेखर की अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा है और संगठन है. लगातार जेल में रहने और भाषण देने से रोके जाने के कारण चंद्रशेखर का सियासी व्यक्तित्व भी स्वायत्त हो चुका है.
  • लो ये नोटबंदी फिर जवाब मांगने लगी?
    राकेश कुमार मालवीय
    एक अखबार के पहले पन्ने पर यह खबर है कि नोटबंदी के निर्णय पर देश का रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया सहमत नहीं था. नोटबंदी के ढाई घंटे पहले तक भी इस निर्णय पर सवाल किए गए थे और शंका जताई गई थी कि जिस लक्ष्य को लेकर यह फैसला लिया जा रहा है वह इससे हासिल नहीं होगा! यानी काला धन के लौटने पर आशंका जताई गई थी. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन से यह बात ऐन चुनाव के वक्त एक बार फिर सामने आ गई है. हालांकि मुख्यधारा के अखबारों ने इस खबर को कोई खास तवज्जो नहीं दी.
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