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विचार
  • स्मृतिशेष मंगलेश डबराल: ‘इसी रात में अपना घर है’
    प्रियदर्शन
    भाषा या कविता के इस व्यर्थता-बोध के बावजूद यह एहसास जाता नहीं कि अंततः रास्ता कोई और नहीं है. मंगलेश डबराल कविता न लिखते तो क्या करते? विकट और विराट ईश्वरों और दरिंदों के मुक़ाबले वे अपनी मनुष्यता का संधान न करते तो क्या करते. अन्याय को पहचानने का सयानापन कई जगह से मिल सकता है, लेकिन अन्याय से आंख मिलाने का साहस और अन्याय न करने का मनुष्योचित विवेक अगर सबसे ज़्यादा कहीं से मिल सकता है तो वह कविता है.
  • किसान प्रतिज्ञा : यहीं डटे रहेंगे, यहीं बोएंगे, यहीं का खाएंगे...
    रवीश कुमार
    एनसीपी नेता शरद पवार ने कहा है कि केंद्र सरकार को कृषि कानून वापस ले लेना चाहिए. झारखंड के मुख्य मंत्री हेमंत सोरेने ने कहा है कि वे भी किसान आंदोलन का समर्थन करते है. हेमंत सोरेन का कहना है कि कानून के बहाने किसी उद्योगपति के छिपे हुए फायदे की बात सामने आने पर किसानों का आक्रोश स्वाभाविक है.  भारतीय कबड्डी टीम के खिलाड़ी भी किसान आंदोलन में सेवा कर रहे हैं. कबड्डी टीम के कप्तान किसानों के कपड़े धोते नज़र आए. 
  • आंदोलनकारी किसानों को गद्दार, खालिस्तानी बताने वाले कौन?
    रवीश कुमार
    इसी साल जनवरी में ठीक यही हो रहा था जब लाखों लोग नागरिकता कानून के विरोध में दिल्ली और देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे थे. बीजेपी के नेता, मंत्री, प्रवक्ता, कार्यकर्ता गोली मारने के नारे लगाने लगे और पाकिस्तानी और गद्दार बताने लगे. गोदी मीडिया के स्टूडियो में घंटों चलने वाले डिबेट के दम पर इन नारों के सहारे मिडिल क्लास इंडिया के बीच एक सहमति बनाई गई और उसकी आड़ में आंदोलन को कुचल दिया गया.
  • सरकार के प्रस्ताव को ठुकराने वाले किसान क्या अंबानी-अडानी से लड़ पाएँगे ?
    रवीश कुमार
    किसानों ने रिलायंस और अडानी के विरोध का एलान कर बता दिया है कि गाँवों में इन दो कंपनियों की क्या छवि है. किसान इन दोनों को सरकार के ही पार्टनर के रूप में देखते हैं.
  • किसानों को मनाने की सरकार की कोशिशें नाकाम
    रवीश कुमार
    9 दिसंबर की दोपहर सरकार ने 20 पन्नों का प्रस्ताव भेजा. प्रस्ताव तो एक दो पंक्ति में लिखा था मगर भूमिका से पन्ने भरे हुए थे. सरकार ने अपने लिखित प्रस्ताव में कहा कि वे समर्थन मूल्य पर लिखित आश्वासन देने के लिए तैयार हैं. किसानों की मांग यह भी थी कि समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी का कानून बनाया जाए. लेकिन किसान आंदोलन सिर्फ MSP को लेकर नहीं हो रहा है. सरकार ने तीनों कानूनों को वापस लेने के बजाए एक नए बनने वाले कानून को वापस लेने की बात ज़रूर कह दी.
  • इस चाल में तो ममता बनर्जी पर भारी पड़ गए अमित शाह
    स्वाति चतुर्वेदी
    किसी एक व्हॉट्सऐप मैसेज से इतनी नाराज़गी और गुस्सा शायद ही कभी देखा गया हो, जितना उस मैसेज से हुआ, जो कल रात तृणमूल कांग्रेस नेता सुवेंदु अधिकारी ने भेजा, और जिसमें कहा गया, "मुझे क्षमा कीजिए, मैं (तृणमूल कांग्रेस में) जारी नहीं रख पाऊंगा..." यह मैसेज कथित रूप से ममता बनर्जी की पार्टी के वरिष्ठ नेता तथा सांसद सौगत रॉय को भेजा गया था.
  • कांग्रेस के तमाम सूत्र हैं ख़ामोश, तूफ़ान से पहले का सन्नाटा है ये?
    उमाशंकर सिंह
    दरअसल अहमद पटेल की कोरोना वायरस की चपेट में आकर हुई असामयिक मृत्यु ने पार्टी नेताओं को कई स्तर पर झकझोर दिया है. भावनात्मक स्तर पर भी और राजनीतिक स्तर पर भी. पटेल के जाने के बाद पार्टी में एक शून्य पैदा हुआ है. यही शून्य पार्टी के भीतर एक तूफ़ान ला सकता है. ख़ामोशी उसकी पूर्वपीठिका हो सकती है. 
  • हैदराबाद में ओवैसी पर निशाना साध रही BJP- एक गोपनीय उद्देश्य?
    स्वाति चतुर्वेदी
    कोई भी चुनाव इतना छोटा नहीं है कि उसे नजरअंदाज किया जाए. मोदी-शाह युग में भाजपा के लिए तो कतई नहीं. हर चुनाव सहयोगियों को परखने, तैयार करने या उनकी ताकत खत्म करने का अवसर है. यह विस्तार, विस्तार और ज्यादा विस्तार है.
  • अहमद पटेल और सोनिया गांधी क्यों थे परफेक्ट टीम : वीर सांघवी की कलम से
    वीर सांघवी
    पटेल गुजरात से आए राजनेता थे, जो राष्ट्रीय पटल पर पहली बार तब दिखे थे, जब राजीव गांधी ने 1985 में उन्हें अपने तीन संसदीय सचिवों में स्थान दिया.
  • 'अहमद भाई राजनेताओं के भी राजनेता थे'
    स्वाति चतुर्वेदी
    अहमद पटेल सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद संकटमोचक थे, उनके राजनीतिक सचिव और एकमात्र कांग्रेसी नेता थे, जिन पर उन्होंने भरोसा किया था. वह गांधी परिवार के लिए 24x7 (चौबीसों घंटे, सातों दिन) उपलब्ध थे. उन्हें कभी भी बुलाया जा सकता था.
  • राहुल गांधी के लिए गद्दी संभाले रखना सोनिया गांधी के लिए हुआ मुश्किल
    स्वाति चतुर्वेदी
    दशकों तक गांधी परिवार की एकछत्र भूमिका के चलते कांग्रेस को राजनैतिक दल के स्थान पर पारिवारिक संगठन की तरह चलाए जाने का आरोप लगाने का अवसर आलोचकों को मिलता रहा. यह आप्रासंगिक-सा हो गया कि कांग्रेस चुनाव कब जीतेगी. अब, पार्टी मशीनरी का अभाव तथा मतदाताओं व पार्टी के ही एक हिस्से द्वारा गांधी परिवार के नेतृत्व को खारिज कर दिया जाना उजागर हो चुका है.
  • कैसे नरेंद्र मोदी ने बिहार चुनाव में नीतीश को निपटाने के चक्कर में तेजस्वी और चिराग को नेता बना दिया
    मनीष कुमार
    बिहार के चुनाव परिणाम की हर जगह, हर व्यक्ति अपने तरह से विवेचना कर रहा है. लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि नीतीश कुमार इस बार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा को पराजित कर कुर्सी पर नहीं बैठे हैं बल्कि एक बार फिर वे अपने सहयोगी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रचे चक्रव्यूह को भेदकर निकले हैं.
  • बिहार चुनाव : कांग्रेस से नुकसान, क्या कहता है गणित
    मनोरंजन भारती
    बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की सरकार ना बन पाने पर उसका सारा ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ा जा रहा है. कांग्रेस को लेकर कहा जा रहा लिखा जा रहा है उसने महागठबंधन को नीचे की ओर खींचा है. इसलिए कांग्रेस के नजरिए से इस विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करना जरूरी है.
  • 'हमलोग आ गए हैं', 4 बजे सुबह फोन कर बोले नीतीश कुमार
    स्वाति चतुर्वेदी
    शनिवार को एग्जिट पोल सर्वे ने जो भविष्यवाणी की थी, चुनावी नतीजे उसके पूरी तरह विपरीत थे. एग्जिट पोल में तेजस्वी यादव के वैभवशाली जीत की संभावना जताई गई थी, जिसने हेलिकॉप्टर के जरिए इस चुनाव में करीब ढाई सौ यानी लगभग हर विधानसभा इलाके में एक चुनावी रैली की थी.
  • क्या नीतीश अपने तरकश से अंतिम तीर चला चुके हैं?
    मनोरंजन भारती
    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूर्णिया के धमदाहा की रैली में अपने उम्मीदवार के लिए वोट मांगते हुए कहा कि आज चुनाव का आखिरी दिन है और परसों चुनाव है और ये मेरा भी अंतिम चुनाव है.. अंत भला तो सब भला..
  • मायावती ने लिया पक्ष, राज्यसभा में बड़ी कामयाबी हाथ लगी-भाजपा को बड़ा फायदा
    स्वाति चतुर्वेदी
    मायावती का बड़ा दलित समर्थन भाजपा के उत्तर प्रदेश में दोबारा जीत की योजना में मदद कर सकता है. उत्तर प्रदेश के साथ पश्चिम बंगाल पर भाजपा का सबसे बड़ा फोकस है. यह बेहद सुनियोजित और समय का ध्यान रखते हुए किया गया है.
  • कितना दम है सरकारी नौकरी के चुनावी वादे में? 
    अखिलेश शर्मा
    बिहार के विधानसभा चुनाव में इस बार नौकरियों और रोजगार का मुद्दा छाया हुआ है. आरजेडी के दस लाख सरकारी नौकरियों के वादे को खूब प्रचार मिल रहा है और बीजेपी को भी इसके जवाब में अगले पांच साल में चार लाख नौकरियों और 15 लाख रोजगार का वादा करना पड़ा है.
  • पुलवामा, फ़वाद चौधरी का बयान और हिंदुस्तान
    प्रियदर्शन
    पाकिस्तान के कैबिनेट मंत्री फ़वाद चौधरी ने अपनी संसद में कह दिया है कि पुलवामा हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ था. भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने और उसमें सक्रिय हिस्सेदारी निभाने का आरोप पाकिस्तान पर पुराना है और गाहे-ब-गाहे उसके सबूत भी मिलते रहते हैं. मगर पहली बार संसद में किसी मंत्री का यह बयान एक अलग अहमियत रखता है.
  • प्रधानमंत्री की मगही और भाषाओं का दर्द
    प्रियदर्शन
    बिहार में पटना की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मगही बोलने की कोशिश करते नज़र आए. बिहार की तीन प्रमुख भाषाओं में मगही कुछ लटपटाई हुई सी भाषा है. उसमें न भोजपुरी वाली अक्खड़ता है और न मैथिली वाला माधुर्य, बल्कि इसकी जगह एक घरेलूपन है जिसमें प्रेम और क्रोध दोनों एक सीमा के भीतर ही प्रगट होते हैं.
  • हम साथ-साथ हैं! चिराग पर क्यों चुप हैं प्रधानमंत्री
    मनोरंजन भारती
    बिहार के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री 6 रैलियां कर चुके हैं. पहली रैली से ही जेडीयू नेताओं को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री चिराग पासवान पर कुछ बोलेंगे, मगर प्रधानमंत्री की 6 रैलियों के बाद भी जेडीयू के नेता ये जानने की कोशिश में लगे हैं कि चिराग पासवान को लेकर प्रधानमंत्री के मन में क्या है.
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