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विचार
  • भारत को कठघरे में खड़ा करने में नाकामयाब चीन सबक ले
    कादम्बिनी शर्मा
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के कहने पर कश्मीर पर बुलाई गई क्लोज्ड डोर बैठक बेनतीजा रही. बेनतीजा इसलिए कि अधिकतर देशों ने ये साफ कर दिया कि वे कश्मीर के मामले को अंतरराष्ट्रीय नहीं द्विपक्षीय मुद्दा समझते हैं. तो कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पाकिस्तान और चीन की एक और कोशिश नाकाम हो गई. भारत ने इस बैठक पर तीखी प्रतिक्रिया जताई है.
  • दविंदर सिंह के साथ साठगांठ में और क़ौन-कौन?
    रवीश कुमार
    जम्मू कश्मीर पुलिस ने अपने डीएसपी दविंदर सिंह को बर्खास्त करने की सिफारिश की है. कड़ी कार्रवाई के नाम पर यही ब्रेक्रिंग न्यूज़ है. इसके पहले कड़ी कार्रवाई यह हुई थी कि गिरफ्तार डीएसपी को निलंबित किया गया था. क्या आप इसी सूचना का इंतज़ार कर रहे थे या आतंकियों के साथ गिरफ्तार डीएसपी के बारे में आप कुछ और जानना चाहते हैं? जो अफसर आतंक के आरोप में जेल में है, वो निलंबित रहे या बर्खास्त हो क्या फर्क पड़ता है?
  • दशक में कुछ नहीं बदला, शाहीन बाग और अन्ना आंदोलन एक ही जैसे
    शाहीन बाग़ का महज़ नाम ले लेने से लगभग युद्ध छिड़ उठता है. प्रशासन की आंखों की किरकिरी बनी हुई हैं शाहीन बाग़ में धरने पर बैठी महिलाएं. और अब शाहीन बाग़ महज़ एक जगह का नाम नहीं रह गया, शाहीन बाग नागरिकता कानून के विरोध का एक प्रतीक बन चुका है. ऐसे ही आंदोलन अब देश भर के कई शहरों में शुरू हो गए हैं. यह किसी भी सरकार को तनाव में लाने के लिए काफी है. और इसको लेकर मोदी सरकार का नाखुश होना लाज़मी है.
  • आतंकवादियों से क्या नाता रहा डीएसपी देविंदर सिंह का?
    रवीश कुमार
    मुझे हैरानी हो रही है कि डीएसपी दविंदर सिंह की आतंकवादियों के साथ गिरफ्तारी से लोग हैरान हैं. दरअसल हैरानी इसलिए कि बार-बार मना करने के बाद भी बहुत लोग आतंकवाद को मज़हब की निगाह से ही देखते हैं. आतंक को दूसरे सवालों और संबंधों के साथ नहीं देखते हैं?
  • मुसलमान को ‘तुम लोग’ कहने वाली पुलिस हिंदू को ‘चोर’ बना देती है
    रवीश कुमार
    मनोज साह 1984 से खिलौना बेच रहे हैं. बुलाया तो पहले कहा दाम नहीं चाहिए, ऐसे ही ले लीजिए. इतना बोलते ही रोने लगे. दोनों आंखों से लोर टपकने लगा. तभी लोग गेंद खरीदने आ गए तो उनसे अपनी आंखें छिपाने लगे. उनके जाने के बाद उनका रोना फिर शुरू हो गया. मनोज ने बताया कि उनके दादा की दो बीघा जमीन थी, किसी ने अपने नाम से जमाबंदी करा ली. मतलब अपने नाम से करा ली. जब मनोज ने विरोध किया तो पुलिस से मिलकर चोरी के आरोप में जेल में बंद करा दिया. किसी तरह जमानत पर बाहर आए. मगर पुलिस वाला उनके परिवार को तंग करता है. बच्चों को मारता है.
  • योगी जी युवाओं पर बिल्कुल ध्यान न दें, परीक्षा बंद कर दें, नौकरी भी
    रवीश कुमार
    आखिर किस लहज़े में लिखा जाए कि सरकार युवाओं की सुनें. यूपी का युवा रात को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में जेएनयू और दीपिका की फ़र्ज़ी बातें पढ़कर सोता है. जागता है तो रवीश कुमार याद आता है. फिर सैकड़ों मैसेज आने लगते हैं लेकिन दोपहर बाद बंद हो जाता है. आईटी सेल को हिन्दू-मुस्लिम का डोज़ बढ़ा देना चाहिए. अगर मुसलमानों की आबादी वाले पोस्ट बढ़ा दिए जाएं तो युवा दस साल और बेरोजगार रहने के लिए तैयार हो सकते हैं. बल्कि आबादी नियंत्रण के नाम पर जो बोगस क़ानून का प्रोपेगैंडा रचा जा रहा है उससे यूपी या किसी भी हिन्दी प्रदेश के युवाओं को फंसाकर बेरोज़गार रखा जा सकता है. सारे मंत्री इसी पर लेक्चर दें, देखिए लोग कैसे नशे में झूमते हैं. इसमें आरक्षण का भूत भी अचूक काम करेगा.
  • किस तरफ़ जा रही है JNU हिंसा की जांच?
    रवीश कुमार
    दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच की प्रेस कांफ्रेस में कहानी 5 जनवरी की हिंसा से ज्यादा 4 जनवरी की थ्योरी पर पहुंचती है, जिसके सहारे जेएनयू प्रशासन बार बार दावा करता है कि लेफ्ट के छात्रों ने सर्वर रूप को क्षतिग्रस्त किया और मारपीट की. जो प्रशासन की शुरू से लाइन रही है. 4 जनवरी की हिंसा का न तो स्केल वैसा था और अगर वैसा था तो उसकी एफआईआर कराने का ख्याल जेएनयू प्रशासन को 5 जनवरी की हिंसा के बाद ही क्यों आया, इसका जवाब नहीं मिला.
  • अपने ही देश के आठ राज्यों में नहीं जा पा रहे हैं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री
    रवीश कुमार
    वैसे क्या आपको पता है कि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों की कश्मीर नहीं गए हैं. भाषण तो बड़ा दिया था कि कश्मीर के लोग हमारे हैं. हम गले लगाएंगे लेकिन अभी तक जाने का वक्त नहीं मिला.
  • योगी जी, 2016 की सिपाही भर्ती का क्या हुआ?
    रवीश कुमार
    राजनीति में पूरा जीवन लगा देने के बाद कोई मुख्यमंत्री बनता है. मैं समझना चाहता हूं कि फिर काम क्यों नहीं किया जाता है. सिर्फ़ दिखने या दिखाने लायक़ योजनाओं पर ही ज़ोर नहीं लगाना चाहिए. आपकी सरकार है. आख़िर कब नौकरियों के सिस्टम को बेहतर करेंगे.
  • मुम्बई में मृत छात्र आंदोलन को ज़िंदा करने के लिए शुक्रिया TISS और IIT Bombay
    5 जनवरी को जेएनयू में छात्रों पर हुए हिंसक हमले से जहां पूरा देश हैरान था, तो वहीं मुम्बई में ऐसा कुछ हुआ जो पिछले कुछ सालों में कभी नहीं हो पाया था. लोग इस हमले का विरोध करने गेटवे ऑफ इंडिया पर जमा होने लगे, वो भी रात 12 बजे.
  • क्यों नरेंद्र मोदी के लिए पहले से कहीं ज़्यादा खतरनाक हो गए हैं अरविंद केजरीवाल
    आशुतोष
    ऐसा लगा, जैसे मुस्लिमों ने AAP का साथ छोड़ दिया है, और अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर AAP की अस्पष्ट नीतियों के चलते वे कांग्रेस की ओर लौट रहे हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस फिर गुटबाज़ी और अंदरूनी कलह की ओर चली गई.
  • योगी जी अपने मंत्रियों से कहिए लोक पत्र देखा करें
    रवीश कुमार
    इतना लिखने के बाद भी कोई नहीं कहता कि हम सांप्रदायिक थे, मगर इसके झांसे से निकल रहे हैं. निकला नहीं जा रहा है, आप मदद कीजिए. या किसी को बुरा भी नहीं लगता कि हम सांप्रदायिक नहीं हैं, आपने ऐसा क्यों लिखा. तब मैं पूछता कि फिर यूनिवर्सिटी हिंसा को लेकर इस पत्र में एक पंक्ति क्यों नहीं है. अगर आप हिंसा के समर्थन में हैं तो वही लिखिए. कम से कम आपकी ईमानदारी तो झलकेगी.
  • सेंट स्टीफ़ंस के छात्र भी उतरे जेएनयू के छात्रों के साथ
    रवीश कुमार
    सेंट स्टीफेंस के छात्रों का इस तरह से सड़क पर आना, जेएनयू, जामिया मिलिया और एएमयू के खिलाफ उस चुप्पी को तोड़ना है जिसकी तरफ इशारा कर बताया जा रहा था कि समाज में पुलिस हिंसा के प्रति समर्थन है. क्योंकि वो समाज सिर्फ अपने बहुसंख्यक धर्म के चश्मे से देख रहा है.
  • देश को 15-20 साल पीछे ले गई मोदी सरकार, GDP की दर 5 प्रतिशत
    रवीश कुमार
    2016 में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का बोगस और आपराधिक फ़ैसला लिया था. तभी पता चल गया कि उन्होंने देश की गाड़ी गड्ढे में गिरा दी है मगर झांसा दिया गया कि दूरगामी परिणाम आएंगे. तब नशा था.
  • जेएनयू और जामिया के बीच भेदभाव क्यों किया गया?
    रवीश कुमार
    इसके बाद भी 5 जनवरी की शाम को जिस दिन हिंसा हुई थी, उस दिन जेएनयू प्रशासन उस हिंसा के खिलाफ एफआईआर नहीं कराता है. दिल्ली पुलिस अपनी तरफ से स्वत: संज्ञान लेते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराती है. इस एफआईआर का कुछ हिस्सा पढ़ना चाहता हूं.
  • यूनिवर्सिटी को नज़रों के सामने बर्बाद किया गया
    रवीश कुमार
    एक्सप्रेस ने पीटीआई के हवाले से खबर लिखी है कि इन सुरक्षा गार्ड ने एडमिन ब्लॉक में प्रदर्शन में छात्रों पर हमला किया था. उन्हें घसीट कर हटाया और सामान फेंक दिए. उसमें कुछ लड़कियों को चोट भी लगी थी. वो सिक्योरिटी गार्ड 5 जनवरी की शाम कहां थे, जिन्हें जेएनयू की सुरक्षा को बेहतर करने के लिए लाया गया था और तीन साल से काम कर रहे 400 गार्ड को हटाया गया था.
  • कितने सपने कितने अरमां लाया हूँ मैं...
    रवीश कुमार
    मेरे रिटायरमेंट का टाइम आ रहा है तो थोड़ा ठेले पर अकेले चाय पीने की आदत डालनी है. काश मेरी एक बात दुनिया मान लेती कि भारत का कोई भी टीवी चैनल नहीं देखती. अपने घरों से कटवा देती. पर कोई बात नहीं. मैंने कम से कम कहा तो आपसे. फेल हो गया तो हो गया. हम कौन सा आई आई टी टॉपर थे. वैसे बहुतों ने टीवी देखना बंद कर दिया. उनका शुक्रिया.
  • एनआरसी- भटकी हुई प्राथमिकताओं की तथाकथा
    सुदीप श्रीवास्तव
    किसी एक वक्त में दुनिया के हर देश में ढेरों समस्याएं होती हैं, उनमें कुछ वास्तविक समस्याएं हैं और कुछ काल्पनिक भी. काल्पनिक समस्याएं वो होती हैं, जिनका धरातल पर कोई सिर-पैर नहीं होता, या फिर वे महज एक विचारधारा को ओढे़ रहने के कारण समाज में दिखाई देती हैं.
  • गहलोत सरकार का फ़ोकस BJP पर निशाना साधने में ही है, अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में कम है
    रवीश कुमार
    ऐसा लगता है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार का फ़ोकस बीजेपी पर निशाना साधने में ही है. अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में कम है. कोटा के जे के लोन अस्पताल का मामला एक हफ़्ते से पब्लिक में है. इसके बाद भी एक्सप्रेस के रिपोर्टर दीप ने पाया है कि इंटेंसिव यूनिट में खुला डस्टबिन है. उसमें कचरा बाहर तक छलक रहा है. क़ायदे से तो दूसरे दिन वहां की सारी व्यवस्था ठीक हो जानी चाहिए थी. लेकिन मीडिया रिपोर्ट से पता चल रहा है कि वहां गंदगी से लेकर ख़राब उपकरणों की स्थिति जस की तस है. जबकि मुख्यमंत्री की बनाई कमेटी ही लौट कर ये सब बता रही है. सवाल है कि क्या एक सरकार एक हफ़्ते के भीतर इन चीजों को ठीक नहीं कर सकती थी?
  • मेक इन इंडिया की तरह फ्लॉप होने की राह पर है उज्ज्वला, फसल बीमा और आदर्श ग्राम योजना
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अपने लॉन्च होने के साल में ही सवालों से घिर गई थी. 2016 में यह योजना लॉन्च हुई थी. प्रीमियम देने के बाद भी बीमा की राशि के लिए किसानों को कई राज्यों में प्रदर्शन करने पड़े हैं.
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