NDTV Khabar
होम | ब्लॉग

ब्लॉग

विचार
  • 35 लाख लोगों की नौकरी गई और विज्ञापन पर ख़र्च हुआ 5000 करोड़
    रवीश कुमार
    उन 35 लाख लोगों को प्रधानमंत्री सपने में आते होंगे, जिनके एक सनक भरे फैसले के कारण नौकरियां चली गईं. नोटबंदी से दर-बदर हुए इन लोगों तक सपनों की सप्लाई कम न हो इसलिए विज्ञापनों में हज़ारों करोड़ फूंके जा रहे हैं.
  • नौकरियों को लेकर नौटंकी बंद हो, ठीक-ठीक बात करें अमित शाह और कमलनाथ
    रवीश कुमार
    SSC CHSL 2016 की परीक्षा पास करने के बाद 614 नौजवानों को मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज़ में ज्वाइनिंग नहीं हो रही थी. 16 फरवरी, 2018 को रिजल्ट आ गया था. पांच महीने बाद इन्हें कमांड का आवंटन हुआ, मगर उसके बाद भी नियुक्तिपत्र का पता नहीं चला. फरवरी से सितंबर आ गया, साधारण घरों के ये नौजवान दिल्ली आकर भटकने लगे. 12 सितंबर के 'Prime Time' में हमने इनकी व्यथा दिखाई.
  • रोजगार के मुद्दे पर हमारी सरकारें कितनी गंभीर?
    रवीश कुमार
    नौजवानों का सबसे बड़ा इम्तिहान यह है कि वे नौकरी को लेकर किए जा रहे किसी भी वादे और बहस को लेकर भावुक न हों. न तो कांग्रेस की तरफ से भावुक हों न बीजेपी की तरफ से. आपने नौकरी सीरीज़ के दौरान देखा है कि किस तरह देश के कई राज्यों में चयन आयोगों ने नौजवानों को अपमानित और प्रताड़ित किया है.
  • इंसाफ का लंबा इंतजार क्या सजा नहीं? पुणे का मोहसिन शेख हत्याकांड याद कीजिए
    रवीश कुमार
    क्या वाकई हम इंसाफ़ की बात करते हैं या इंसाफ के नाम पर कांग्रेस बनाम बीजेपी करते हैं. दंगों और नरसंहारों के इंसाफ की बात जब भी आती है वह वहां भी पहुंचती है जहां इसकी बात नहीं होती है. उसकी आवाज़ पुणे में भी गूंज रही है और अलवर में भी और बुलंदशहर में भी.
  • 1984, 2002, 1993 और 2013 के नरसंहारों पर चोट दे गया है दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला
    रवीश कुमार
    2002 की बात को कमज़ोर करने के लिए 1984 की बात का ज़िक्र होता था अब 1984 की बात चली है तो अदालत ने 2013 तक के मुज़फ्फरनगर के दंगों तक का ज़िक्र कर दिया है. सबक यही है कि हम सब चीखें चिल्लाएं नहीं. फैसले को पढ़ें और प्रायश्चित करें.
  • कभी न कभी हर दंगाई का इंसाफ होगा
    प्रियदर्शन
    1984 की हिंसा और 2002 के दंगों में एक दुखद साम्य है. दोनों मामलों में राज्य के देखते-देखते हज़ारों लोग घरों से निकालकर सड़कों पर मार दिए गए, उन्हें ज़िंदा जलाया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया. 18 साल के अंतर पर हुए इन दो हत्याकांडों में इंसाफ को लगातार राजनीति ने स्थगित रखा. महज दो साल के राजनीतिक अनुभव पर प्रधानमंत्री बन गए राजीव गांधी ने तब यह हैरान करने वाला बयान दिया था - "एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती कुछ हिलती ही है..." यह वक्तव्य भले नादानी में दिया गया हो, लेकिन आने वाले दिनों में तमाम दंगाइयों को बड़ी निस्पृह क्रूरता के साथ बचाया गया, जिसका गुनाह कांग्रेस सरकार पर जाता है.
  • रफाल मामले में क्या सरकार को वाकई क्लीनचिट मिल गई?
    रवीश कुमार
    अदालत ने यह कहीं नहीं लिखा है कि अब इन सवालों का जवाब कहीं और से न अदालत से नहीं लिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच का फैसला है. इस बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ थे. चार याचिकार्ता थे, जिनके बारे में जान लेते हैं कि वे अलग-अलग याचिकाओं में अदालत से क्या चाहते थे.
  • 'मोदी बनाम कौन' पूछने वालों को तेजस्वी यादव का जवाब
    तेजस्वी यादव
    पांच राज्यों के परिणाम (मैं खुद को सिर्फ तीन बड़े हिन्दी-भाषी राज्यों तक नहीं बांध रहा हूं, जहां जनता ने BJP के 15 साल के शासन को कतई खत्म कर दिया, और तेलंगाना और मिज़ोरम में तो गंभीरता से लिया तक नहीं) इस बात के सबूत हैं कि वोटर अब खोखले वादों से ऊब चुके हैं, और जुमलों के पार की सच्चाई देख सकते हैं.
  • फेसबुक, व्हॉट्सऐप, गूगल और ट्विटर से भारत में चुनावी सफलता
    विराग गुप्ता
    कांग्रेस के शशि थरूर ने भारत में सोशल मीडिया के राजनीतिक इस्तेमाल की शुरुआत की थी, जिस पर बाद में BJP ने आधिपत्य जमा लिया. नवीनतम रिपोर्टों के मुताबिक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में व्हॉट्सऐप, फेसबुक, गूगल और ट्विटर का जमकर इस्तेमाल हुआ, जिसमें कांग्रेस ने अब फिर बढ़त हासिल कर ली है. राज्यों में चुनाव से पहले सेन्टर फॉर एकाउन्टेबिलिटी एंड सिस्टेमिक चेंज (CASC) संस्था ने विस्तृत सुझाव देकर चुनाव आयोग से 2013 के नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की अपील की थी. इसके जवाब में चुनाव आयोग ने फेसबुक और ट्विटर को पत्र लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. केंद्रीय कानून और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी सोशल मीडिया कंपनियों को भारतीय चुनावों में हस्तक्षेप नहीं करने की अनेक चेतावनी दी हैं, परंतु इन सभी चेतावनियों से बेख़बर सोशल मीडिया कंपनियों का भारतीय चुनावों में दखल बढ़ता ही जा रहा है, जो अगले आम चुनाव में संकट का सबब बन सकता है.
  • वक्त कमलनाथ का और धीरज सिंधिया के हिस्से में
    रवीश कुमार
    आज जो भी हुआ उसे बैठक नहीं, उठक-बैठक कहा जाना चाहिए. कांग्रेस को तीन मुख्यमंत्री चुनने में तीन दिन लग गए. लीजिए अब देखिए. अचानक आठ बजे के बाद राहुल ट्वीट करते हैं और लियो टॉल्सटॉय को बीच में ले आते हैं. मगर ट्वीट में खुद बीच में दिख रहे हैं और एक तरफ सिंधिया और एक तरफ कमलनाथ दिख रहे हैं. लिखा है कि धीरज और वक्त दो शक्तिशाली लड़ाके हैं.
  • भगोड़े विजय माल्या ने सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी बधाई, तो लोगों ने किया ट्रोल
    ख़बर न्यूज़ डेस्क
    भगोडे विजय माल्या ने कांग्रेस नेता सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को ट्वीट कर दी बधाई तो ट्रोलर्स ने घेर लिया.
  • शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाने की क्या रही वजह?
    रवीश कुमार
    शक्तिकांत दास 2015-17 के दौरान आर्थिक मामलों के सचिव थे और उन्हीं के कार्यकाल में नोटबंदी लागू हुई थी. नवंबर से दिसंबर 2016 के बीच करीब-करीब हर दिन शक्तिकांत दास की प्रेस कॉन्फ्रेंस होती थी और वे नोटबंदी के लागू किए जाने को लेकर नए-नए नियम बनाते थे. सूचना देते थे. जब जनता नोट बदलने को लेकर समस्याओं से घिरी थी तब वे नए-नए आइडिया लेकर आते थे.
  • मोदी का विकल्प कैसे बनेंगे राहुल?
    प्रियदर्शन
    पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद राहुल गांधी ने जो वक्तव्य दिया, वह लगातार आक्रामक होती जा रही राजनीतिक संस्कृति में बहुत शिष्ट हस्तक्षेप कहा जा सकता है. अमूमन पिछली सरकारों की विफलताओं का ढोल बजाने की रिवायत छोड़कर उन्होंने माना कि पहले से चले आ रहे अच्छे कामों को वे आगे बढ़ाएंगे. उनके पूरे वक्तव्य में अहंकार की जगह विचार झांक रहा था- इस सवाल से जुड़ा हुआ कि आगे क्या करना है और कैसे करना है?
  • यह हार बीजेपी के साथ-साथ मीडिया की भी है, लेकिन जीत कांग्रेस की नहीं किसानों की हुई है
    सुशील कुमार महापात्र
    जिन किसानों ने बीजेपी को वोट दिया था आज वो परेशान है .अनाज का सही MSP नहीं मिल रहा है. किसान आज सड़क पर प्रदर्शन कर रहा है. अपना हक मांग रहा है. पांच राज्यों के चुनाव परिणाम यह दर्शाती है कि लोग बीजेपी से खुश नहीं है. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी की बड़ी हार है. तीनों राज्यों में बीजेपी की सरकार थी. यह हार सिर्फ बीजेपी की नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी है. 
  • क्या उर्जित पटेल सरकार का दबाव झेल नहीं पाए?
    रवीश कुमार
    इस बीच आप सीबीआई का हाल देख चुके हैं. जिस सवाल के साथ 2018 का साल शुरू हुआ था लगता है उस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला है. साल के ख़त्म होने पर नहीं मिला है. कौन है जिसके इशारे पर या जिसके शौक के लिए भारत की इन तमाम संस्थाओं की साख को दांव पर लगाया जा रहा है. उर्जित पटेल जो हमेशा सरकार के दबाव में काम करने वाले गवर्नर के तौर पर ही देखे गए, अचानक क्या हुआ कि वे दबाव से निकलने के लिए तड़प उठे.
  • एक विस्मृत विचारक और चौथी औद्योगिक क्रांति
    डॉ विजय अग्रवाल
    अब, जबकि वर्ष 2018 अपने अंत के करीब है, मन में मौजूद एक विचित्र किस्म के खालीपन की चुभन का एहसास निरंतर तीखा होता जा रहा है. दिमाग इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की जद्दोजहद में कुछ ज्यादा ही बेचैन है कि क्या सचमुच में मानव जाति की सामूहिक स्मृति इतनी अधिक कमजोर है कि वह डेढ़-दो सौ साल पहले की ऐसी बातों को अपनी दिमागी स्लेट से ऐसे मिटा दे, मानो कि उसका अस्तित्व कभी रहा ही न हो. बावजूद इसके कि वह घटना, वह व्यक्ति ऐसा क्रांतिकारी हो कि उसके बाद अभी तक उसका कोई भी सानी न हो.
  • पांच राज्यों के चुनाव 2019 का सेमीफाइनल क्यों हैं?
    प्रियदर्शन
    सिद्धांततः हर चुनाव अलग होता है और भारत जैसे विविधता भरे देश में एक चुनाव को दूसरे का सेमीफाइनल बताना मीडिया का सरलीकरण भर हो सकता है. इसके अलावा ऐसे अनुभव भी रहे हैं जब राज्यों में हारने वाली पार्टियां केंद्र में जीत गई हों. वर्ष 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजे अपने पक्ष में देखकर ही अटल सरकार ने समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए और हार गई.
  • अलविदा प्रोफ़ेसर मुशीरूल हसन
    रवीश कुमार
    अख़बार और जर्नल उनके लेख से भरे रहते थे. एक दुर्घटना के बहाने ज़िंदगी उन्हें पर्दे के पीछे ले गई. ज़माने तक उनका लिखा पढ़ने को नहीं मिला. लोग भूलने लगे.
  • बिहार से लेकर यूपी की परीक्षाओं को लेकर क्यों परेशान हैं छात्र
    रवीश कुमार
    ऐसा लगता है कि सरकारें ज़िद पर अड़ी हैं कि हम इन चयन आयोगों में कोई बदलाव नहीं करेंगे. हर परीक्षा विवादों से गुज़र रही है. प्रश्न पत्र लीक होने से लेकर रिश्वत लेकर नौकरी देने के आरोपों और किस्सों ने नौजवानों की रातों की नींद उड़ा दी. सिस्टम का अपने प्रति इस तरह अविश्वास पैदा करते जाना उसके लिए सही नहीं होगा.
  • केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के नाम खुला खत...
    राजबाई ने बताया कि उनके पति किसी असंगठित क्षेत्र में काम करते थे. तीन साल पहले उनकी मौत हो गई. पेंशन के रूप में राजबाई को सिर्फ 300 रुपये मिलते हैं. 80 साल की उम्र में भी राजबाई दूसरों के खेत में काम करके गुजारा कर रही हैं.
«12345678»

Advertisement