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विचार
  • सेंट स्टीफ़ंस के छात्र भी उतरे जेएनयू के छात्रों के साथ
    रवीश कुमार
    सेंट स्टीफेंस के छात्रों का इस तरह से सड़क पर आना, जेएनयू, जामिया मिलिया और एएमयू के खिलाफ उस चुप्पी को तोड़ना है जिसकी तरफ इशारा कर बताया जा रहा था कि समाज में पुलिस हिंसा के प्रति समर्थन है. क्योंकि वो समाज सिर्फ अपने बहुसंख्यक धर्म के चश्मे से देख रहा है.
  • देश को 15-20 साल पीछे ले गई मोदी सरकार, GDP की दर 5 प्रतिशत
    रवीश कुमार
    2016 में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का बोगस और आपराधिक फ़ैसला लिया था. तभी पता चल गया कि उन्होंने देश की गाड़ी गड्ढे में गिरा दी है मगर झांसा दिया गया कि दूरगामी परिणाम आएंगे. तब नशा था.
  • जेएनयू और जामिया के बीच भेदभाव क्यों किया गया?
    रवीश कुमार
    इसके बाद भी 5 जनवरी की शाम को जिस दिन हिंसा हुई थी, उस दिन जेएनयू प्रशासन उस हिंसा के खिलाफ एफआईआर नहीं कराता है. दिल्ली पुलिस अपनी तरफ से स्वत: संज्ञान लेते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराती है. इस एफआईआर का कुछ हिस्सा पढ़ना चाहता हूं.
  • यूनिवर्सिटी को नज़रों के सामने बर्बाद किया गया
    रवीश कुमार
    एक्सप्रेस ने पीटीआई के हवाले से खबर लिखी है कि इन सुरक्षा गार्ड ने एडमिन ब्लॉक में प्रदर्शन में छात्रों पर हमला किया था. उन्हें घसीट कर हटाया और सामान फेंक दिए. उसमें कुछ लड़कियों को चोट भी लगी थी. वो सिक्योरिटी गार्ड 5 जनवरी की शाम कहां थे, जिन्हें जेएनयू की सुरक्षा को बेहतर करने के लिए लाया गया था और तीन साल से काम कर रहे 400 गार्ड को हटाया गया था.
  • कितने सपने कितने अरमां लाया हूँ मैं...
    रवीश कुमार
    मेरे रिटायरमेंट का टाइम आ रहा है तो थोड़ा ठेले पर अकेले चाय पीने की आदत डालनी है. काश मेरी एक बात दुनिया मान लेती कि भारत का कोई भी टीवी चैनल नहीं देखती. अपने घरों से कटवा देती. पर कोई बात नहीं. मैंने कम से कम कहा तो आपसे. फेल हो गया तो हो गया. हम कौन सा आई आई टी टॉपर थे. वैसे बहुतों ने टीवी देखना बंद कर दिया. उनका शुक्रिया.
  • एनआरसी- भटकी हुई प्राथमिकताओं की तथाकथा
    सुदीप श्रीवास्तव
    किसी एक वक्त में दुनिया के हर देश में ढेरों समस्याएं होती हैं, उनमें कुछ वास्तविक समस्याएं हैं और कुछ काल्पनिक भी. काल्पनिक समस्याएं वो होती हैं, जिनका धरातल पर कोई सिर-पैर नहीं होता, या फिर वे महज एक विचारधारा को ओढे़ रहने के कारण समाज में दिखाई देती हैं.
  • गहलोत सरकार का फ़ोकस BJP पर निशाना साधने में ही है, अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में कम है
    रवीश कुमार
    ऐसा लगता है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार का फ़ोकस बीजेपी पर निशाना साधने में ही है. अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में कम है. कोटा के जे के लोन अस्पताल का मामला एक हफ़्ते से पब्लिक में है. इसके बाद भी एक्सप्रेस के रिपोर्टर दीप ने पाया है कि इंटेंसिव यूनिट में खुला डस्टबिन है. उसमें कचरा बाहर तक छलक रहा है. क़ायदे से तो दूसरे दिन वहां की सारी व्यवस्था ठीक हो जानी चाहिए थी. लेकिन मीडिया रिपोर्ट से पता चल रहा है कि वहां गंदगी से लेकर ख़राब उपकरणों की स्थिति जस की तस है. जबकि मुख्यमंत्री की बनाई कमेटी ही लौट कर ये सब बता रही है. सवाल है कि क्या एक सरकार एक हफ़्ते के भीतर इन चीजों को ठीक नहीं कर सकती थी?
  • मेक इन इंडिया की तरह फ्लॉप होने की राह पर है उज्ज्वला, फसल बीमा और आदर्श ग्राम योजना
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अपने लॉन्च होने के साल में ही सवालों से घिर गई थी. 2016 में यह योजना लॉन्च हुई थी. प्रीमियम देने के बाद भी बीमा की राशि के लिए किसानों को कई राज्यों में प्रदर्शन करने पड़े हैं.
  • आईटी सेल वाले कोटा पर लिखा मेरा यह लेख पढ़ लें, प्रधानमंत्री को पढ़ा दें, गहलोत सरकार भी पढ़े
    रवीश कुमार
    जब सारे देश में प्राथमिक स्वास्थ्य की खस्ता हालत पर लिखता और प्रोग्राम करता हूं तो आईटी सेल का गिरोह कंबल ओढ़ कर सो जाता है. वह तभी जागता है जब किसी अपराध में शामिल कोई मुसलमान दिखता है या फिर भी वो ग़ैर भाजपा सरकार से संबंधित कोई घटना हो.
  • नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में आ गए असम के मुख्यमंत्री?
    रवीश कुमार
    तो क्या असम के मुख्यमंत्री ने नागरिकता संशोधन कानून से बग़ावत कर दी है? सोनेवाल ने कहा है कि इस क़ानून के चलते कोई भी विदेशी असम की धरती पर नहीं आ सकता. असम पुत्र होने के नाते कभी किसी विदेशी को यहां बसने नहीं दूंगा.
  • क्या 2019 में नीतीश कुमार ने अपनी पहचान समाजवादी-भाजपाई नेता की बना ली?
    मनीष कुमार
    साल खत्म होने को है. बीते साल का हर व्यक्ति अपने हिसाब से नफ़ा नुक़सान का आकलन कर रहा है. यह साल बिहार की राजनीति के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा है. ख़ासकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिनकी छवि एक समाजवादी नेता के रूप में अभी तक थी, उनके अपने कई कदमों के कारण अब एक धारणा मज़बूत होती जा रही है कि वे समाजवादी -भाजपाई हैं.
  • आदित्य ठाकरे के प्रमोशन में मां रश्मि का रोल
    स्वाति चतुर्वेदी
    आदित्य रश्मि उद्धव ठाकरे, उम्र 29 साल, महाराष्ट्र के कैबिनेट में आज शामिल किए गए. उनके पिता मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पार्टी के मामलों में भी उनके तब से बॉस हैं जब से उन्होंने शिवसेना प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली है. जूनियर ठाकरे के 'ट्रिपल-बैरल सरनेम' से सेना की राजनीति और रश्मि ठाकरे के प्रभाव के बारे में पूरी बातें सामने आती हैं, जो कि परिवार में मुख्य राजनीतिक रणनीतिकार हैं और जिन्होंने अपने बड़े बेटे के पेशेवर विकल्पों को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.
  • एक करोड़ का पैकेज भी होता होगा, लेकिन IIT वालों के लिए ज़मीनी हकीकत कुछ और है...
    अनुराग मेहरा
    मीडिया में इस तरह के हालात की कुछ ख़बरें दिखती हैं, लेकिन सब छिप जाती हैं, जब एक करोड़ से ज़्यादा तनख्वाह वाली कोई नौकरी किसी को मिल जाती है. इस रिपोर्ट में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के उस विद्यार्थी की बात की जाती है, जो कोर क्षेत्र में नौकरी करना चाहता था, लेकिन माता-पिता के ज़ोरदार दबाव में उसने बैंकिंग की नौकरी कबूल कर ली. एक और विद्यार्थी ने 30 लाख रुपये की पेशकश मिलने पर कहा, "लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझसे एक करोड़ रुपये वाले पैकेजों के बारे में कहा था, जिनके बारे में उन्होंने पढ़ा है..."
  • कौटिल्य: सत्ता हासिल करने से कहीं आगे है उनकी चाणक्य-नीति
    अमित
    हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जहां सत्ता के लिए होने वाली तिकड़मों में कौटिल्य (चाणक्य) याद आते हैं. इसे और से ठीक से पढ़िए, 'सिर्फ' सत्ता के लिए होने वाली तिकड़मों में ही चाणक्य याद आते हैं. यह ठीक है कि चाणक्य (अपनी कूटनीति और कुटिलता के कारण जो कौटिल्य भी कहलाते हैं) सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी तरक़ीब को सही मानते थे लेकिन उन्हें सिर्फ यहीं तक सीमित कर देना बहुत बड़ी नादानी/मूर्खता होगी. जो भी उन्हें नकारेगा या उन्हें हिस्सों में अपनाएगा, परिणाम भोगने होंगे. इससे पहले कि हम चाणक्य नीति पर आएं, आइए एक बार सरसरी निगाह से उनसे जुड़े इतिहास को देख लें.
  • नागरिकता कानून- सोहैल अपने बेटे को और चंपक अपनी मां एकता को ढूंढ रही है
    रवीश कुमार
    क्या दुनिया की कोई पुलिस है जो भारत की पुलिस को बता सके कि इंटरनेट चालू होते हुए कानून व्यवस्था कैसे संभाली जा सकती है? जिस तरह से बात-बात में भारत में इंटरनेट बंद होने लगा है उससे लगता है कि हमारी पुलिस को सारा काम तो आता है, लेकिन जब इंटरनेट चलता है तो वह कानून व्यवस्था नहीं संभाल पाती है.
  • रवीश कुमार का BLOG: संबित पात्रा ने पीएम मोदी को साबित किया झूठा, कांग्रेस को भी...
    रवीश कुमार
    रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश में कोई डिटेंशन सेंटर नहीं बना है. जल्द ही यह झूठ साबित हुआ. मीडिया ने दिखाया कि मोदी सरकार ने आठ मौकों पर डिटेंशन सेंटर होने की बात कही है. तब बीजेपी ने मीडिया का स्वागत नहीं किया और स्वीकार नहीं किया कि प्रधानमंत्री ने झूठ बोला है. तभी बीजेपी को ऐसे दस्तावेज़ मिले हैं, जिनसे साबित होता है कि कांग्रेस शासन के दौर में तीन डिटेंशन बने हैं. संबित पात्रा का बयान 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में छपा है.
  • क्या मुकदमों से CAA विरोधी छात्रों को डरा रही है पुलिस?
    रवीश कुमार
    नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा हुई. इस हिंसा के एक ही पहलू की बात हो रही है कि कुछ जगहों पर इसमें शामिल लोगों ने हिंसा की. लेकिन पुलिस की हिंसा पर बात नहीं हो रही है. कोई निंदा नहीं कर रहा है. एक तीसरी तरह की हिंसा है जिस पर बिल्कुल बात नहीं हो रही है. प्रेस, पुलिस या सरकार कोई नहीं कर रहा. जैसे पटना के फुलवारी शरीफ में प्रदर्शनकारियों पर सामने से जो भीड़ पत्थर चलाने आई थी, जिसकी तरफ से प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं, वो लोग कौन थे. जैसे मुज़फ्फरनगर में पूर्व सांसद सईदुज़्मा की चार कारों को जलाने वाले कौन थे.
  • क्या जनसंख्या रजिस्टर NPR से ही NRC नागरिकता रजिस्टर की शुरुआत होती है?
    रवीश कुमार
    क्या राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर NPR का वाकई NRC नागरिकता रजिस्टर से कोई संबंध नहीं है? मंगलवार को गृहमंत्री अमित शाह ने एक लंबे से इंटरव्यू में बार बार कहा कि NPR सिर्फ जनसंख्या का रजिस्टर है. उसके आधार पर जनगणना की जाती है. उसका नागरिकता रजिस्टर से कोई लेना देना नहीं है. जनसंख्या रजिस्टर तैयार किया जाता है ताकि पता चले कि देश के भीतर कौन कौन रह रहा है और उसके लिए सरकार योजनाएं बना सके. जनसंख्या रजिस्टर का नागरिकता रजिस्टर से कोई संबंध नहीं है.
  • झारखंड के चुनाव का असर नीतीश कुमार के सत्ता पर क्यों नहीं होगा?
    मनीष कुमार
    झारखंड में नए मुख्यमंत्री के रूप में हेंमत सोरेन रविवार को शपथ लेंगे, लेकिन उनके सता संभालने से पहले ये क़यास लगाये जाने लगे हैं कि आख़िर बिहार की सता पर इसका क्या असर होगा. खासकर क्या नीतीश कुमार जो अगले साल सता में पंद्रह वर्ष पूरे करेंगे और एक बार फिर जनता से जनादेश मांगेंगे. क्या उनके ऊपर बगल के राज्य के सत्ता परिवर्तन का ताप पड़ेगा? इस सवाल का जवाब आपको झारखंड और बिहार की राजनीति के तीन उदाहरण से मिल जायेगा.
  • यूपी से पुलिस बर्बरता की दहलाने वाली रिपोर्ट
    रवीश कुमार
    उत्तरप्रदेश के कई शहरों से आ रही खबरें विचलित करने वाली हैं. इन खबरों में पुलिस हिंसा की जो तस्वीर उभरी है वो भयानक है. बेशक प्रदर्शनकारियों की तरफ से भी हिंसा हुई है और पत्थर चले हैं. लेकिन ये प्रदर्शनकारी थे या नहीं, बाहरी थे या बीच के थे, इसे लेकर अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग जवाब हैं. दिल्ली का मीडिया लंबे लंबे इंटरव्यू में व्यस्त है लेकिन मुज़फ्फरनगर और बिजनौर से आती खबरें बता रही हैं कि उन इंटरव्यू की जगह इन ख़बरों को ज़्यादा जगह देने की ज़रूरत है. हमारे सहयोगी सौरभ शुक्ला दोनों ज़िलों से वापस आए हैं. लखनऊ से आलोक पांडे भी लखनऊ के हालात पर ख़बरें कर रहे हैं.
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