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  • ब्लॉग :  क्या नीतीश कुमार अब अपनी ही पार्टी जेडीयू के लिए 'कामचलाऊ' नेता बन गए हैं
    मनीष कुमार
    क्या बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड अपने सुप्रीमो नीतीश कुमार को अब 'कामचलाऊ' और 'अस्थायी'  मानती है. ये सवाल सोमवार को पार्टी दफ़्तर के बाहर लगाए गये नए होर्डिंग के बाद लोग पूछ रहे हैं.  रविवार शाम , पटना में पार्टी दफ़्तर के बाहर नए होर्डिंग लगाए गए जिसमें नारा  था , ‘क्यूं करे विचार ठीके तो है नीतीश कुमार’.  निश्चित रूप से जिसने भी स्लोगन लिखा होगा उसमें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ख़ासकर नीतीश कुमार के क़रीबी आरसीपी सिंह के सहमति से  ही ये होर्डिंग लगायी होगी. लेकिन पार्टी के ही नेताओं को लगता है ये नारा लोगों को पच नहीं रहा. ठीके का मतलब बिहार की राजनीति और गांव घर में यही होता हैं कि वो बहुत अच्छे तो नहीं लेकिन ठीक ठाक कामचलाऊ हैं.
  • वीसी को सीवी चाहिए तो प्रो रोमिला थापर को दे देनी चाहिए
    रवीश कुमार
    यह शुभ संकेत है. रोमिला थापर की सीवी को लेकर जिज्ञासा पैदा होना बेहद शुभ संकेत है. लक्स अंडर गार्मेंट का विज्ञापन था. जब लाइफ़ में हो आराम तो आइडिया आता है. तो आइडिया आ गया होगा. चल गुरु, एक मीटिंग में कंसल्ट करते हैं. फिर रोमिला थापर को इंसल्ट करते हैं. उनसे उनकी सीवी मांगते हैं. पता तो करें कि कोई प्रो रोमिला थापर कैसे बनता है. कितनी किताबें लिखता है. कितनी किताबें पढ़ता है. इस टॉपिक पर चर्चा भी ख़ूब होगी. बेरोज़गारी, मंदी, कश्मीर और असम सब ठिकाने लग जाएंगे. सवाल करने वालों को गूगली दे दी जाए.
  • हिन्दी मीडिया के 'डिटेंशन सेंटर' में बंद हैं हिन्दी प्रदेशों के नौजवान, असम और कश्मीर पर चर्चा ही कहां हैं
    रवीश कुमार
    सूचना और ज्ञान के सार्वजनिक महत्व के मामलों में हिन्दी प्रदेश अभिशप्त हैं. मीडिया के ज़रिए इस प्रदेश को अ-सूचित रखा जाता है. आप हिन्दी के चैनलों और अख़बारों के कंटेंट का विश्लेषण कर सकते हैं. बल्कि ख़ुद ही चेक कीजिए तो अच्छा रहेगा. कश्मीर में इतनी बड़ी घटना हो गई मगर हिन्दी मीडिया की मुख्यधारा ने उसे बहुलता और विवधता के साथ पाठकों के सामने नहीं रखा. किसी को कश्मीर पर कुछ पता नहीं है लेकिन सबके पास हां या ना में राय है. वही हाल असम को लेकर. हिन्दी मीडिया में असम को लेकर कितनी रिपोर्टिंग है? आप जिन अख़बारों को रोज़ सुबह उठ कर पढ़ते हैं क्या उनका संवाददाता महीने भर से या साल भर से नागरिकता के मसले को कवर कर रहा है? ज़ाहिर है हिन्दी प्रदेश के पाठकों का राजनीतिक स्तर भीड़ और हंगामा से ही ऊपर उठता और गिरता रहता है. मैं बाकी प्रदेशों का नहीं जानता. हो सकता है वहां भी यही हाल हो.
  • डिजिटल अर्थव्यवस्था का अराजक विस्तार और आर्थिक मंदी
    विराग गुप्ता
    कई साल पहले दिल्ली में अनेक शॉपिंग मॉल तो बन गए, पर उनमें दुकानदारों और ग्राहकों की भारी कमी थी. मॉल के बिल्डरों की शक्तिशाली लॉबी ने राजनेताओं और जजों के बच्चों को अपना पार्टनर बना लिया. उसके बाद अदालती फैसले के नाम पर दिल्ली में सीलिंग का सिलसिला शुरू हो गया. तीर निशाने पर लगा और मॉल्स में दुकानदार और ग्राहक दोनों आ गए. अब वक्त बदल गया है. देश के असंगठित क्षेत्र और छोटे उद्योगों के सामने डिजिटल कंपनियों की पावरफुल लॉबी है.
  • क्या मीडिया 5 प्रतिशत जीडीपी की सच्चाई छिपा रहा है?
    रवीश कुमार
    सड़क पर बेरोज़गारों की फौज पुकार रही है कि काम नहीं है, दुकानदारों की फौज कह रही है कि मांग रही है और उद्योग जगत की फौज पुकार रही है कि न पूंजी है, न मांग है और न काम है. नेशनल स्टैस्टिकल ऑफिस के आंकड़ों ने बता दिया कि स्थिति बेहद ख़राब है. छह साल में भारत की जीडीपी इतना नीचे नहीं आई थी. तिमाही के हिसाब से 25 तिमाही में यह सबसे ख़राब रिपोर्ट है.
  • आर्थिक मोर्चे पर लगातार लुढ़कती सरकार को क्यों चाहिए कश्मीर कश्मीर
    रवीश कुमार
    यह ज़रूरत है कि मोदी सरकार राजनीतिक रूप से भयंकर सफल सरकार है इसलिए भी आप इस सरकार को हर वक्त राजनीति करते देखेंगे. यह कहते भी सुनेंगे कि वह राजनीति नहीं करती है. कश्मीर उसके लिए ढाल बन गया है. इस तरह के विश्लेषण लिखते लिखते साढ़े पांच साल गुज़र गए.
  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग : एक मजदूर की जुबानी, तमिलनाडु के कपड़ा मिल की कहानी
    रवीश कुमार
    यह कपड़ा सिलाई की कंपनी है, इस दूसरी मंजिल वाले डिपार्टमेंट में 80 से 100 लोग काम करते थे. अब 10 से 15 लोग हीं बच गए हैं. मैं बिहार के अररिया जिला के फारबिसगंज प्रखण्ड का रहने वाला हूं, मेरे जैसे कई और लोग हैं बिहार के अलग-अलग हिस्से से. यह कंपनी तमिलनाडु के तिरूप्पूर शहर में है.
  • पटना हाईकोर्ट में जज के फैसले से सनसनी क्यों?
    रवीश कुमार
    पटना हाई कोर्ट में आज अप्रत्याशित हुआ. जस्टिस राकेश कुमार के फैसले को 24 घंटे के भीतर 11 जजों की बेंच ने निरस्त कर दिया. जस्टिस राकेश कुमार से इस वक्त सारा काम ले लिया गया है. वो किसी केस की सुनवाई नहीं कर रहे हैं. इस फैसले में ऐसा क्या था कि सुबह-सुबह 11 जजों की बैठक हुई और पूरे फैसले को निरस्त किया. जस्टिस राकेश कुमार पूर्व आईएएस अधिकारी केपी रमैय्या की अग्रिम ज़मानत के मामले में सुनवाई कर रहे थे. 23 मार्च 2018 को हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत की याचिका ठुकरा दी थी.
  • खतरनाक चीजों की सूची
    प्रियदर्शन
    पिछले कुछ दिनों में भारत में जो 'न्यू नॉर्मल' बनाया गया है, उसका असर बहुत सारी चीज़ों पर पड़ा है. ऐसे में यह ज़रूरी है कि ख़तरनाक चीज़ों की एक सूची बनाई जाए जिनसे हम सब बच सकें. इस सूची में सबसे ताज़ा प्रविष्टि दुनिया के महानतम उपन्यासों में गिने जाने वाले लियो टॉल्स्टॉय के 'वार एंड पीस' की है. इस उपन्यास को महाराष्ट्र पुलिस ने ख़तरनाक माना है. इसे भीमा कोरेगांव केस में गिरफ़्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ता वर्नेन गोंजाल्वेस के ख़िलाफ़ सबूत के तौर पर पेश किया गया है. आदरणीय बॉम्बे हाइकोर्ट ने भी गोंजाल्वेस से पूछा कि वे ऐसी किताब क्यों पढ़ते हैं जो किसी दूसरे देश के युद्ध के बारे में है.
  • कश्मीर में जब तीन महीने में 50,000 भर्तियां हो सकती हैं तो बाकी राज्यों में क्यों नहीं
    रवीश कुमार
    उन्होंने यह नहीं बताया कि 50,000 पदों में से ज़्यादातर किस प्रकार के पद हैं, चतुर्थ श्रेणी के हैं या मध्य श्रेणी के हैं. दो से तीन महीने के भीतर भर्ती अभियान पूरा करने की बात कर रहे हैं. भारत के हाल-फिलहाल के इतिहास में कहीं भी दो से तीन महीने के भीतर 50,000 भर्तियों की प्रक्रिया पूरी हुई होगी. लेकिन टीवी पर बोलना ही है तो कमी क्यों रखी जाए. हेडलाइन भी तो बनेगी कि तीन महीने में होंगी 50,000 भर्तियां.
  • रवीश कुमार का ब्लॉग: बजट में पैसे नहीं, विकास की अपार घोषणाएं!
    रवीश कुमार
    मोदी सरकार ने फ़ैसला किया है कि अगले तीन साल में 75 नए मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे. 24 हजार करोड़ की राशि ख़र्च होगी. 75 नए कॉलेजों से मेडिकल में सीटों की संख्या 15,700 बढ़ जाएगी. सूचना प्रसारण मंत्री ने बताया कि पांच साल में 82 मेडिकल कॉलेज सेट-अप किए गए हैं. 75 नए मेडिकल कॉलेज उन ज़िलों में खोले जाएंगे, जहां पर मेडिकल कॉलेज नहीं है. प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि पिछले पांच साल में 82 नए मेडिकल कॉलेजों को मंज़ूरी दी है और 45,000 सीटें नई बढ़ाई हैं. इसमें एमबीबीएस और पोस्ट ग्रेजुएशन की भी सीटें शामिल हैं. अब अगले तीन साल में 75 मेडिकल कॉलेजों को मंज़ूरी दी गई है.
  • जम्मू कश्मीर को लेकर कोर्ट, सरकार और सियासत में घमासान
    रवीश कुमार
    श्रीनगर में राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा कि छह महीने के भीतर कश्मीर में इतना विकास होगा कि उस पार का कश्मीर आहें भरेगा. 50 नए डिग्री कॉलेज खुलेंगे और 50,000 पद दो से तीन महीने में भरे जाएंगे. राज्यपाल मलिक ने बताया कि इंटरनेट की सेवा देर से बहाल होगी, क्योंकि उसका इस्तेमाल आतंक के लिए हो रहा है. मोबाइल फोन के बारे में स्थिति के हिसाब से फैसला लिया जाता रहेगा और लैंडलाइन सेवा हर जगह बहाल कर दी गई है.
  • शिनजियांग डायरी 2: उइघर मुस्लिम कितने मुक्त
    कादम्बिनी शर्मा
    इससे उन्हें डीरैडिकलाज़ करने में आसानी होती है और वो कोई ना कोई काम सीख कर सरकार की दी आर्थिक मदद के ज़रिए एक सामान्य चीनी नागरिक के तौर पर जीवनयापन कर सकते हैं. सुनने में बुरा नहीं लगता, जब तक कि आप जाकर खुद इन सेंटरों में रह रहे लोगों से बात नहीं करते. बात करने के बाद अधिकारियों की बात सिर्फ दलील लगने लगती है. कम से कम मुझे यही लगा.
  • कश्मीर का टॉनिक पीकर फार्म भरने में मदहोश हिन्दी प्रदेश का युवा
    रवीश कुमार
    कश्मीर में 20 दिन से संचार व्यवस्था ठप होने को सही ठहराने के नशे में भूल गया है कि वही राज्य उसके साथ भी कश्मीर की तरह बर्ताव कर रहा है. परीक्षा की मामूली त्रुटियों की सुनवाई नहीं है. सब जगह जा रहा है, मगर कोई सुन नहीं रहा है. संचार व्यवस्था से खुद वंचित है. पहले इन्हें हिन्दू-मुस्लिम नेशनल सिलेबस का कोर्स कराया गया और अब ये खुद भी उसी ज़ुबान में अपने हालात बयान करने लगे हैं.
  • क्या सरकार के दबाव में है भारतीय रिज़र्व बैंक?
    रवीश कुमार
    भारतीय रिजर्व बैंक 1 लाख 76 हजार 51 करोड़ रुपये भारत सरकार को देगा. यह पैसा रिजर्व बैंक की आकस्मिक निधि और सरप्लस का है जिसे अंग्रेज़ी में कंटीजेंसी फंड कहते हैं. 1949 में भारतीय रिज़र्व बैंक अपने मौजूदा स्वरूप में आता है, और तब से लेकर आज तक उसके इतिहास में इतना पैसा कभी रिजर्व बैंक से भारत सरकार को नहीं गया है.
  • शिनजियांग डायरी 1 : उइघर मुस्लिम कितने मुक्त
    कादम्बिनी शर्मा
    मैं 16 अगस्त की शाम चीन के उइघर मुस्लिमों के सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश उइघर ऑटोनोमस प्रोवंस की राजधानी उरमुची शहर पहुंची. यह खुद चीन की सरकार के आमंत्रण पर था. मकसद था पश्चिमी मीडिया में उइघरों के बारे में चीन की दमनकारी नीतियों की 'सच्चाई' दिखाना. मैं भी लगातार इस तरह की खबरें देख-सुन और पढ़ रही थी. मन में कई सवाल थे और खुद पड़ताल करने की इच्छा.
  • ट्रंप के हाथ पर हाथ मारकर बहुत बड़ा कूटनीतिक मैदान मार लिया नरेंद्र मोदी ने
    उमाशंकर सिंह
    इसमें कोई दो राय नहीं कि जब एक कूटनीतिक संवाद होता है, तो उसमें आपसी व्यवहार और भाव-भंगिमा का अपना महत्व होता है. राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की अंग्रेज़ी को शानदार बताया, तो उस मौके का अपनी तरह से इस्तेमाल करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उनके हाथ को ताकत लगाकर अपनी ओर खींचा और फिर उस पर एक ज़ोरदार थपकी रख दी. इसके ज़रिये उन्होंने दिखा दिया कि वह किस तरह की पर्सनल कैमिस्ट्री लेकर चलते हैं, और किस तरह हर मौके को अपने हिसाब से ढालकर अपना दबदबा दिखाते हैं.
  • सवालों में अर्थव्यवस्था और स्वदेशी पर विचार
    राकेश कुमार मालवीय
    सौ साल के विकास के बाद आज जब हर दिन बाजार में मंदी की खबरें हमें डराती हैं, हर दिन नौकरी जाने की खबरें अखबार के पन्नों पर अंदर डर-डरकर, छिपा-छिपाकर छापी जाती हों, शेयर बाजार के उठती-गिरती रेखाओं से धड़कनें सामान्य गति से नहीं चल रही हों, उन परिस्थितियों में क्या केवल सरकार के राहत पैकेज भर को एक उचित इलाज माना जाना चाहिए, जैसा वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने दो दिन पहले प्रस्तुत किया और गिरते बाजार को राहत देने की कोशिश की. निश्चित ही आज की परिस्थितियों में सौ साल पहले की गांधी की बातें आपको अप्रासंगिक लग सकती हैं, लेकिन पूंजीवाद को अपनाकर भी यदि आप आज अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत होने के बारे में आश्वस्त नहीं हैं, तो एक बार यह भी जरूर सोचिएगा कि गांधी सौ साल पहले क्या कुछ कह रहे थे.
  • रवीश कुमार का ब्लॉग: फेसबुक पोस्ट के बाद बिहार सरकार ने दारोगा परीक्षा की पात्रता में किया बदलाव
    रवीश कुमार
    बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग ने दारोगा परीक्षा फ़ॉर्म भरने की पात्रता में बदलाव कर दिया है. अब जिनके पास बीए की डिग्री 1 अगस्त 2019 तक आई होगी, वे भी भर सकेंगे. इससे लाखों छात्रों को लाभ हुआ है.
  • पत्रकार परिसर के मुन्ना टेलर को नया जीवन दे गए जेटली
    अखिलेश शर्मा
    दोनों में न कोई रिश्ता, न कोई बातचीत. फर्क यह कि आज जेटली नहीं रहे और मोहम्मद मुन्ना टेलर हंसी-खुशी अपने बच्चों के साथ जीवन काट रहा है. लेकिन जेटली नहीं होते तो शायद मोहम्मद मुन्ना आज का दिन नहीं देख पाता.
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