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विचार
  • हमारा नेता कैसा हो – नॉर्थईस्ट का जवाब, ‘टशनी’ हो...
    संजय किशोर
    'मॉर्निंग वॉक' के समय 'वॉक' कम, 'टॉक' ज़्यादा होने लगा है. पहले यह बीमारी 'काउ बेल्ट' तक सीमित थी, जहां हर चर्चा राजनीति से शुरू होकर राजनीति पर खत्म होती है. इसलिए भी, क्योंकि छोटे शहरों में भागमभाग कम है और समय ज़्यादा. फुर्सत ही फुर्सत. लिहाज़ा, चाय की चुस्की के साथ राजनीति पर बहसबाज़ी सबसे पसंदीदा शगल है.
  • शिक्षा का डिमोनेटाइजेशन होगा यह
    डॉ विजय अग्रवाल
    इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण उस समय मिला था, जब अजीत जोगी नवनिर्मित प्रदेश छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने इंजीनियरिंग और मेडिकल में जाने के लिए प्रवेश परीक्षाओं की व्यवस्था को हटा दिया था. ऐसा करते ही करोड़ों कमाने वाले कोचिंग संस्थानों के हाथ के तोते उड़ गए थे.
  • नौकरी देने से क्यों बचती है सरकार?
    रवीश कुमार
    नौकरी सीरीज़ का 24वां अंक आप देख रहे हैं. झारखंड, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र के छात्र लगातर हमें भांति-भांति की परीक्षाओं में होने वाली देरी और धांधली के बारे में लिख रहे हैं. हमने कई बार कहा है कि हमारे पास संसाधनों की कमी है. बहुत सी परीक्षाओं को हम कवर भी नहीं कर पाए हैं, लेकिन कोशिश है कि सबका ज़िक्र हो जाए और नौकरी सीरीज़ एक ऐसा डेटा बैंक बन जाए जिसे देखते ही आपको भारत में नौकरियां देने वाले आयोगों की रिपोर्ट मिल जाए.
  • राजनीतिक रूप से मूर्ख बनने से पहले आर्थिक रूप से शिक्षित बनो 
    रवीश कुमार
    38 विलफुल डिफॉल्टरों के 500 करोड़ रुपये का एनपीए write off कर दिया गया है. इसका मतलब यह हुआ कि बैंक ने अपने मुनाफे से एनपीए के खाते में पैसा डाला और एनपीए के खाते में नुकसान कम दिखने लगा. इसका मतलब यह नहीं हुआ कि जिसने लोन लिया था, उसे माफ कर दिया गया. 'बिज़नेस स्टैंडर्ड' ने यह ख़बर 6 नंबर के पन्ने पर कहीं कोने में छापी है, जबकि पहले पन्ने पर पहली ख़बर बैंकों के एनपीए पर ही है. एनपीए मतलब नॉन परफॉर्मिंग असेट्स, यानी जो लोन लिया गया है, वह चुकाया नहीं गया. हम यह कभी नहीं जान पाएंगे कि एक तरह की माफी का आधार क्या रहा होगा. राजनीतिक पसंद या कुछ और.
  • लेनिन भारतीय नहीं थे, लेकिन क्या गांधी या बुद्ध सिर्फ भारत के हैं...?
    प्रियदर्शन
    सरकार बनने से पहले कम्युनिस्टों के साथ हिंसा की ख़बरें आ रही हैं. मूर्ति गिराई जा रही है. यह भारत को भारत नहीं रहने देना है. अफगानिस्तान और सीरिया में बदलना है. जो लोग मार्क्सवाद के शव के चारों तरफ खुशी से प्रेतनृत्य कर रहे हैं, उन्हें इस ध्वंस से डरना चाहिए. यह ध्वंस भारतीय परम्परा नहीं है. लेनिन की मूर्ति गिराने वाले वही लोग हैं, जो दूसरी जगह गोडसे की मूर्ति लगाते हैं. लेनिन मिट जाए और गोडसे बच जाए - कम से कम यह भारत नहीं चाहेगा.
  • ध्यान दीजिए – शिक्षा प्रणाली आपको शिक्ष‍ित बना रही है, वयस्क नहीं...
    अनिता शर्मा
    कहते हैं सिनेमा वही दिखाता है, जो समाज में हो रहा होता है. मतलब सिनेमा हमें आईना दिखाता है... शायद ठीक एक सेल्फी की तरह, जिसमें हम खुद को देखते हैं. तो इस लिहाज़ से इसे खूबसूरत या मनमाफिक बनाने के लिए लगाए जाने वाले फिल्टर हुए सेंसर बोर्ड.
  • डूबते कर्ज़ की बातों से पीएनबी घोटाले को ढकने की कोशिश?
    सुधीर जैन
    क्या इसे बैंकों की हालत हद से ज्यादा नाज़ुक होने का ऐलान माना जाए? सोमवार को रविशंकर प्रसाद की प्रेस कॉन्फ्रेंस से लगा तो ऐसा ही. भले ही उनके अपने मंत्रालय का इससे ज्यादा लेना देना नहीं है लेकिन उनकी सरकारी हैसियत सरकार के प्रवक्ता से कम नहीं है.
  • नौजवानों के करियर से खेलते चयन आयोग
    रवीश कुमार
    हम नौकरी सीरीज़ के 23वें अंक पर आ गए हैं. यात्रा आगे भी जारी रहेगी. अगर सारे राज्यों से डेटा मंगाएं तो पता चलेगा कि लाख से ज़्यादा नौकरियां कोर्ट केस में फंसी हैं. ज़रूरी नहीं कि कोर्ट के कारण ही लंबित हों, कई बार जांच पूरी न होने के कारण भी ये नौकरियां फंसी हुई हैं.
  • कितनी बड़ी थी 'हवा हवाई'...?
    प्रियदर्शन
    'इंगलिश-विंगलिश' और 'मॉम' में वह बिल्कुल केंद्रीय भूमिकाओं में थीं और लोग उम्मीद कर रहे थे कि वह कुछ और कामयाब फिल्मे देंगी.लेकिन मीडिया ने उनकी मौत का जिस तरह तमाशा बनाया, उसके दो बुरे नतीजे हुए. एक तो यह कि एक पारिवारिक हादसा - जो बहुत दिल तोड़ने वाला था - एक सनसनीखेज क्राइम केस में बदलता नज़र आया. दूसरा यह कि श्रीदेवी के अभिनय या योगदान का जो उचित मूल्यांकन होना चाहिए था, वह संभव नहीं हुआ. इसकी जगह अचानक बहुत फिल्मी किस्म का छाती-पीटू दृश्य नज़र आया, जिसमें श्रीदेवी 'भूतो न भविष्यतो' जैसी दिखाई पड़ने लगीं. मगर सच क्या है.
  • कमाल की बात : ''मदीने में मनाई होली...''
    कमाल खान
    सूफ़ी फ़क़ीर शाह नियाज़ लिखते हैं ,”होली होय रही है अहमद जियो के द्वार…हज़रत अली का रंग बनो है, हसन-हुसैन खिलाड़….'' उनके कलाम में तो पैगंबर मोहम्मद साहिब के नवासे हसन और हुसैन रंग खेल रहे हैं. और गुज़रे ज़माने की गायिका गौहर जान ने तो गाया है …”मेरे हज़रत ने मदीने में मनाई होली” होली को लेकर इससे बड़ी बात क्या हो सकती है.
  • नौकरी सीरीज का 22वां अंक : सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं की सुस्ती टूटी?
    रवीश कुमार
    नौकरी सीरीज़ का 22वां अंक आप देखने जा रहे हैं. सिस्टम के भीतर सड़न और मौसम नहीं बदलता है. सरकार बदलती है जो बादलों की तरह उड़ती हुई आती है और धूप छांव खेलती हुई चली जाती है. जिस सिस्टम के कमरों में बैठने के लिए नेता सारा ज़ोर लगा देते हैं वही अब पूछते हैं कि नौजवान सरकार की नौकरी के भरोसे क्यों बैठे हैं. सरकार यह नहीं कहती है कि हमारा भरोसा मत रखो, हम नौकरी नहीं देंगे, उल्टा भरोसा रखने वाले से ही पूछती है कि ये तो बताओ की तुम हम पर भरोसा क्यों करते हो. नौजवानों ने कभी पूछा नहीं कि तुम भी तो बताओ कि सरकार में जाने के लिए फिर क्यों दिन रात मरते हो. सवालों के दौर में इस राजनीति के पास कोई आइडिया नहीं बचा है. वह लगातार थीम की तलाश में है जिसपर बहस हो सके.
  • जहां पेट्रोल पंपों के ज़रिये हो रहा है जेल सुधार...
    डॉ वर्तिका नन्दा
    तेलंगाना जाने की एक बड़ी वजह उन पेट्रोल पंपों को देखना था जो कि जेल-सुधार की नई कहानी लिख रहे हैं. वैसे तो मॉडल प्रिजन मैन्यूल में देश भर की जेलों को लेकर सुधार के कई रास्ते सुझाए गए हैं लेकिन उन पर अमल कम ही जेलें कर पाई हैं. इनमें तेलंगाना की जेलों ने एक अनूठी मिसाल कायम की है.
  • आप दोबारा आइये, चौबारा आइये मगर मुझे मत डराइये
    रवीश कुमार
    फोन कीजिए मगर अपनी भावुकता हम पर मत लादिए. हमें पता है इस सिस्टम ने आपको कहीं का नहीं छोड़ा है. लेकिन यह उचित नहीं है कि आप फोन पर रोने लगें, कहने लगे कि हमें न्याय नहीं दिलाएंगे तो जान दे देंगे. एक दो फोन चलता है, जब संख्या बढ़ जाती है तो फोन रखने के बाद सांस अटकी रहती है कि दूसरी तरफ की आवाज़ खामोश तो नहीं हो गई.
  • मध्‍यप्रदेश में सत्ता का 'सेमीफाइनल' और कांग्रेस की जीत के मायने
    राकेश कुमार मालवीय
    लगातार तीन विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की विजयी पताका फहरा रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए इसे सबसे ज्यादा अहम बताया जा रहा था तो सत्ता से दूर बैठी कांग्रेस इसके जरि‍ए अपने लिए भरपूर 'ऑक्सीजन' की तलाश कर रही थी. इससे पहले कांग्रेस ने चित्रकूट का उपचुनाव भी जीता था. यह जीत कांग्रेस के साथ ही सिंधिया के गढ़ में ज्‍योति‍रादि‍त्‍य को मजबूती दे गई. इन परि‍णामों के आधार पर अब मध्यप्रदेश में चुनावी चौसर की रणनीति‍ तय होने वाली है.
  • बैंकरों पर बैंकिंग के अलावा बाकी बोझ क्यों?
    रवीश कुमार
    दक्षिण कोरिया की संसद ने एक कानून बनाया है जिसके बाद अब वहां के लोग एक सप्ताह में 68 घंटे की जगह 52 घंटे ही काम करेंगे. आप सोच रहे होंगे कि मैं दक्षिण कोरिया की बात क्यों बता रहा हूं. वो इसलिए बता रहा हूं कि भारत के सरकारी बैंकों में काम करने वाले 90 फीसदी लोग सुबह 10 बजे से लेकर रात के 9 बजे तक काम करते हैं. टारगेट और ट्रांसफर की तलवार से उनसे इतना काम कराया जाता है. इसमें आप शनिवार और रविवार के भी 20 घंटे जोड़ लेंगे तो यह दक्षिण कोरिया के पहले वाले 68 घंटे से भी 2 घंटा ज़्यादा है, यानी 70 घंटे काम करते हैं आपके सरकारी बैंकर.
  • मेरे हिस्से की श्रीदेवी
    संजय किशोर
    अस्सी के दशक के शुरुआती साल थे. बाज़ार में VHS नया-नया आया था. आज जैसे हर गली और नुक्कड़ पर सेल-फ़ोन की दुकानें हैं. ठीक उसी तरह वीडियो पार्लर कुकुरमुत्तों की भांति मानों रातो-रात उग आए थे. धक्के खाकर बदमिजाज ब्लैकिए से महंगे टिकट खरीदने की बजाए, 10 रुपये में पूरा परिवार घर के सुकून में पूरी फ़िल्म देख रहा था. जो वीसीआर-वीडियो कैसेट्स रिकॉर्डर खरीद नहीं पाए वे भाड़े पर ले आते और 3 से 4 फ़िल्म एक ही रात में देख जाते.
  • श्रीदेवी मृत्यु प्रकरण :  48 घंटे के सस्पेंस का मौका क्यों बना ?
    सुधीर जैन
    श्रीदेवी मृत्यु प्रकरण में आखिर मामला खत्म होने की खबर आ गई. लेकिन देश दुनिया में इस दौरान रहस्य और सनसनी फैलती रही. क्या इस स्थिति से बचा जा सकता था? इस मामले ने क्या हमें इतना जागरूक कर दिया है कि आगे ऐसे किसी मामले में हम फिजूल की सनसनी और विवादों में नहीं उलझा करेंगे.
  • क्या बैंकों में दिखता है स्वच्छ भारत अभियान?
    ख़बर न्यूज़ डेस्क
    भले ही आप मुझे न देखें लेकिन टीवी कम देखिए. बहुत से लोग अब सोशल मीडिया पर उन चैनलों की करतूत को लेकर लतीफा बना रहे हैं. एक तो पहले श्रीदेवी की दुखद मौत हुई उसके बाद हर चैनल ने श्रीदेवी को अपने अपने हिसाब से मारा और उसे देखने वाले हर दर्शक ने लतीफा बनाकर अपने अपने हिसाब से मारा. आप समझ तो रहे ही होंगे कि टीवी के पास आपकी संवेदनशीलता ख़त्म करने की कितनी ताकत है. कोई पहला मौका तो नहीं है, इस तरह से न्यूज़ चैनल हज़ार बार कर चुके हैं और आगे भी करते रहेंगे. पर एक सवाल आप खुद से पूछिए क्या वाकई आपने तय कर लिया है कि ख़ुद और समाज को बर्बाद कर देना है. 
  • परीक्षा से लेकर नतीजों तक इतनी देरी क्यों?
    रवीश कुमार
    नौकरी सीरीज़ के 19वें अंक में आपका स्वागत है. मुझे लगता था कि बेरोज़गार एक सामूहिक शब्द है. इस शब्द के इस्तेमाल से सभी बेरोज़गारों के कान खड़े हो जाते हैं. लेकिन नौकरी सीरीज़ के दौरान सैकड़ों मैसेज से गुज़रते हुए लगा कि युवा अपनी नौकरी, अपनी परीक्षा को लेकर अलग-अलग समूह में बंटे हैं. एक समूह का दूसरे समूह की बेरोज़गारी या परेशानी से कोई मतलब नहीं है. रेलवे का बेरोज़गार, बीपीएससी की परीक्षा के बेरोज़गार से अलग है और दोनों का एक दूसरे से कोई मतलब नहीं है. यही पैटर्न आप हर दो समूह के भीतर देखेंगे.
  • एक साल में कहां गायब हो गए 63 हजार बच्चे?
    राकेश कुमार मालवीय
    नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट में मिसिंग चिल्ड्रन के बारे में जो आंकड़े आते हैं उनमें सबसे ज्‍यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एक साल में इस सेक्शन के तहत गायब होने वाले बच्चों की संख्या में 63407 बच्चे और जुड़ गए हैं.
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