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विचार
  • नंदकिशोर आचार्य को साहित्य अकादेमी सम्मान की ख़बर के बहाने
    प्रियदर्शन
    इस साल अपने कविता संग्रह 'छीलते हुए अपने को' के लिए साहित्य अकादेमी से सम्मानित नंदकिशोर आचार्य बीते तीन वर्षों में अकादेमी सम्मान प्राप्त हिंदी के सबसे युवा लेखक हैं- महज 74 साल के. वरना बीते साल यह सम्मान 75 साल की चित्रा मुद्गल को मिला और उसके पहले वाले साल 86 साल के रमेश कुंतल मेघ को.
  • आईटी सेल की दुकान ही चलती है रवीश कुमार के नाम से
    रवीश कुमार
    2014 के बाद नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता को आई टी सेल और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी की जो राजनीतिक संस्कृति गढ़ी है उसका एक ही काम है दिमाग़ को विकल्पहीन और तर्कहीन बना देना.
  • प्रदर्शन हिंसक हो तो असली उद्देश्य खो जाता है
    रवीश कुमार
    अगर हिंसा से प्रदर्शनों को नहीं बचाया जा सकता है तो बेहतर है प्रदर्शनों से दूर रहा जाए. कुछ समय के लिए पीछे हटने में कोई नुकसान नहीं है. बाहरी ने किया और अज्ञात लोगों ने किया इन कारणों और बहानों से कोई फायदा नहीं है. या फिर प्रदर्शन पर जाने से पहले इस बात को सुनिश्चित करें कि हिंसा की कोई संभावना न हो. नारों में उग्रता न हो और पता हो कि रैली बुलाने वाला कौन है.
  • नागरिकता कानून क्‍यों डराता है?
    प्रियदर्शन
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह बार-बार दुहरा रहे हैं कि नागरिकता क़ानून का असर किसी भारतीय नागरिक पर नहीं पड़ेगा. तथ्य के तौर पर यह बात सही भी है. जो क़ानून बनाया गया है, वह तीन देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उन अल्पसंख्यक घुसपैठियों के लिए है जो 2014 से पहले भारत आ गए हैं. इसका कोई वास्ता यहां रहने वाले अल्पसंख्यकों से नहीं है.
  • जामिया में जो हुआ वह भारतीय स्टेट का नया चेहरा है, अब बेनकाब हो रहा है...
    रवीश कुमार
    जब भी यह दृश्य धुंधला (ब्लर) होता था अतीत का इतिहास साफ (क्लीयर) हो जाता था. जब अतीत का इतिहास धुंधला होता था, सामने बन रहा इतिहास साफ दिखने लगता था. अगर आपने व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से इतिहास की पढ़ाई नहीं की है तो मेरी बात आसानी से समझ जाएंगे. उम्मीद है हाथ ऊपर कर लाए गए छात्र ख़ुद को अपमान के जाल में फंसने नहीं देंगे और समझ सकेंगे कि यह भारतीय स्टेट का नया चेहरा है. और उस चेहरे से नकाब हटना शुरू हुआ है.
  • जामिया नगर में रविवार की हिंसा कैसे भड़क गई?
    रवीश कुमार
    लोगों को तय करना है कि आईटी सेल के तर्कों के हिसाब से सोचना है या अपने हिसाब से सोचना है. अभी कहा जा रहा है कि जामिया के छात्रों को बहकाया गया है, छात्रों का काम पढ़ना है, प्रदर्शन करना नहीं है. क्या आप वाकई यह मानते हैं कि छात्र सिर्फ बहकावे और उकसावे पर प्रदर्शन कर रहे हैं? पढ़ाई को लेकर जब दिल्ली यूनिवर्सिटी के एडहॉक शिक्षक प्रदर्शन करते हैं तब तो कोई नहीं बोलता. देश भर के करोड़ों नौजवान सरकारी नौकरी की परीक्षा और यूनिवर्सिटी की परीक्षा को लेकर भी आंदोलन करते हैं, लाठियां खाते हैं. कोई ध्यान नहीं देता है.
  • अर्थव्यवस्था ICU में, छात्र ICU में, नौजवान ICU में, मौज तो बस आई टी सेल की है
    रवीश कुमार
    आप जानते हैं कि अर्थव्यवस्थाओं की ज़रूरत हर दिन बदल रही है. आज किया गया सुधार कल पुराना पड़ जाता है. दुनिया में कब कौन सा देश कैसी नीति लेकर आ जाए और प्रतिस्पर्धा की शर्तें बदल दे पता नहीं मगर अमिताभ कांत को सब पता है.
  • जामिया यूनिवर्सिटी के साथ इतनी बर्बरता मत करो
    रवीश कुमार
    दिल्ली पुलिस, जामिया मिल्लिया के साथ ऐसा मत कीजिए. अंतरात्मा भी कोई चीज़ होती है. आदेश ही सब नहीं होता है. छात्रों की तरफ़ से जो वीडियो आए हैं उसमें आपकी क्रूरता झलकती है. प्लीज़ ऐसा मत कीजिए. एक बस की आग का सहारा लेकर ऐसा नहीं करना था.
  • क्यों नहीं यूपी-बिहार में पाक, अफ़ग़ान और बांग्लादेश के हिन्दुओं को बसाया जाए?
    रवीश कुमार
    मैं एक बात का प्रस्ताव करना चाहता हूं. अगर असम में रह रहे हिन्दू बांग्लादेशी प्रवासियों से उनकी पहचान को ख़तरा है तो इन्हें यूपी और बिहार में बसा दिया जाए. दो मिनट में झगड़ा ख़त्म हो जाएगा. बिहार को पुराना बंगाल तो नहीं मिल सकता कुछ अच्छे बंगाली मिल जाएंगे. बिहार और यूपी की उदारता इसे ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार भी कर लेगी.
  • अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर का हाथ मिलाना, नजर में दिल्ली; कहीं और है निशाना!
    शरद शर्मा
    दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के लिए आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और देश के मशहूर पेशेवर राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने हाथ मिला लिया है. यानी दिल्ली चुनाव में प्रशांत किशोर आम आदमी पार्टी के लिए प्रचार करेंगे. आम आदमी पार्टी की तरफ से बताया गया है कि प्रशांत किशोर वॉलिंटियर यानी स्वैच्छिक रूप से पार्टी का प्रचार करेंगे इसका सीधा मतलब यह है कि आम आदमी पार्टी/दिल्ली की केजरीवाल सरकार और प्रशांत किशोर में कोई आर्थिक डील नहीं हुई है.
  • नागरिकता कानून के विरोध में सड़कों पर नागरिक असम से केरल तक
    रवीश कुमार
    नागरिकता कानून के विरोध में नागरिकों का बड़ा समूह देश के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर उतर आया है. सभी प्रदर्शनों को कवर करना मुश्किल है क्योंकि इनका स्केल इतना बड़ा है और संगठनों की संख्या बहुत अधिक है. यह प्रदर्शन पूर्वोत्तर, खासकर असम में जाकर भाषा और संस्कृति का सवाल लेता है तो दक्षिण में भी यह तमिल प्रश्न बन जाता है. लेकिन समस्त भारत में इसके विरोध का व्यापक स्वरूप इस बात पर जाकर टिकता है कि यह कानून धर्म के आधार पर भेदभाव करता है. सरकार ने बार-बार संसद में कहा कि यह भेदभाव नहीं है लेकिन इसके बाद भी सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों की तस्वीरें बता रही हैं कि इन्हें रिजेक्ट करने का एक ही तरीका है. इनका कवरेज ही न हो लेकिन अगर आप इन प्रदर्शनों की तस्वीरों में झांककर देखें तो बहुत कुछ दिखता है.
  • बलात्कार क्या वाकई आपको डराता है...?
    प्रियदर्शन
    बलात्कार कोई हल्का अपराध नहीं है. वह इस मायने में बाकी अपराधों से अलग है कि वह एक पूरे समुदाय की अस्मिता पर हमले की तरह आता है. इसलिए बलात्कार को लेकर किसी भी तरह की हल्की बात किसी संवेदनशील आदमी को चोट पहुंचाती है. बलात्कार पर राजनीति भी चोट पहुंचाने वाली चीज़ है. दुर्भाग्य से पिछले तमाम वर्षों में यह राजनीति लगातार जारी है.
  • मोदी-शाह के CAB में मुस्लिमों के लिए क्यों नहीं है जगह...?
    ऑनिन्द्यो चक्रवर्ती
    वर्ष 1993 में, एक बांग्लादेशी लेखिका ने, जिन्हें अपने मुल्क में लोकप्रिय होने के बावजूद बाहर ज़्यादा लोग नहीं जानते थे, अपना चौथा उपन्यास प्रकाशित किया. इस उपन्यास में एक ऐसे हिन्दू परिवार की कहानी थी, जिसका बांग्लादेश के प्रति लगाव उस साम्प्रदायिक हिंसा की वजह से कम होता चला गया, जिसका सामना उन्हें करना पड़ा. यह उपन्यास 'लज्जा' दुनियाभर में बेस्टसेलर बना, लेकिन अपने ही वतन में इस पर पाबंदी लगी.
  • क्या असम के प्रदर्शनों को न दिखाने के लिए सूचना मंत्रालय ने सुझाव भेजा है?
    रवीश कुमार
    आदेश जिस वक्त आया उस वक्त असम के लोग सड़कों पर थे. नागरिकता कानून पास होने के पहले से असम की यूनिवर्सिटी में ज़बरदस्त विरोध हो रहा था. असम के अलावा पूर्वोत्तर के दूसरे इलाकों में भी इस कानून का विरोध हो रहा है.
  • नागरिकता संशोधन बिल से खुश हैं ये शरणार्थी
    रवीश कुमार
    गुवाहाटी में प्रदर्शन तेज़ हो गया. शाम तक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कर्फ्यू लगाना पड़ा. कर्फ्यू अनिश्चितकालीन समय के लिए लगाया गया है. सचिवालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ है. शाम तक जब प्रदर्शनकारी नहीं हटे तो कर्फ्यू लगाना पड़ा. गुवाहाटी के अन्य इलाकों में भी प्रदर्शन होते रहे. राज्य सचिवालय के बाहर बस में आग लगा दी गई है. सचिवालय जाने के रास्ते को घेरा गया. खबरें आ रही हैं कि सचिवालय के कर्मचारी भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हैं. मुख्यमंत्री के काफिले को रास्ता बदलना पड़ा है.
  • जिस विचारधारा ने देश को बांटा है
    प्रियदर्शन
    राजनीति जब इतिहास की गलियों में उतरती है तो बहुत कीचड़ पैदा करती है. वह अपने तात्कालिक इरादों को इतिहास के तथ्यों पर थोपने की कोशिश करती है और जब पाती है कि इतिहास उसके खयालों और प्रस्तावों की तस्दीक नहीं कर रहा है तो अपनी ज़रूरत के हिसाब से उसे सिकोड़ने या फैलाने में लग जाती है.
  • एक देश एक कानून की सनक का मिसाल है नागरिकता बिल
    रवीश कुमार
    देश ऐसे ही होता है. अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अलग कानून की ज़रूरत पड़ती है. भारत ही नहीं दुनिया भर में कानूनों का यही इतिहास और वर्तमान है. एक देश के भीतर कहीं कानून भौगोलिक कारणों से अलग होता है तो कहीं सामुदायिक कारणों से.
  • क्या हमने CAB पर पूर्वोत्तर की शिकायतों को ठीक से सुना?
    रवीश कुमार
    यह पूर्वोत्तर की ज़रूरत है. भारत के अन्य सरहदी इलाकों में भी इनर लाइन परमिट सिस्टम है. कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सरहद से लगे इलाकों में है. यह कानून 1873 के अंग्रेज़ी कानून की विरासत है. 2019 में पहली बार मणिपुर में लागू किया जाएगा. नए नागरिकता कानून के तहत जिन लोगों को भारत की नागरिकता मिलेगी वो मणिपुर, मिज़ोरम, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में जाकर नहीं बस सकते हैं.
  • नागरिकता संशोधन बिल की आड़ में क्‍या है सरकार की पॉलिटिक्‍स?
    अश्विन कुमार सिंह
    भारतीय जनता पार्टी (BJP), जिसका पूरा जनाधार ही हिन्दुत्व के मुद्दे पर आधारित है, अब लगता है कि इसी मुद्दे को सत्ता में बने रहने के लिए हथियार के तौर पर उपयोग करने जा रही है. ऐसा इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि 2019 में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद से पार्टी में आत्मविश्वास है कि जनता उसके हिन्दुत्व और राष्ट्रप्रेम वाली छवि को ध्यान में रखकर देश में होने वाले सभी चुनावों में वोट करेगी.
  • दुनिया की सबसे कमउम्र प्रधानमंत्री, जो हफ्ते में सिर्फ 24 घंटे काम करने पर विश्वास रखती हैं
    सुशील कुमार महापात्र
    समानता में विश्वास रखने वाली साना मरीन का मानना है कि किसी भी इंसान को एक हफ्ते में सिर्फ 24 घंटे काम करना चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा समय अपने परिवार को देना चाहिए. अगस्त के महीने में जब वह यह प्रस्ताव लेकर सामने आई थीं, तो इसे किसी ने नहीं माना था, लेकिन अब वह प्रधानमंत्री बन गई हैं, सो, देखना होगा कि सप्ताह में सिर्फ 24 घंटे काम करने वाला प्रस्ताव पारित हो पाएगा या नहीं. साना मरीन अपने परिवार को लेकर भी काफी सक्रिय रहती हैं, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर अपने परिवार के साथ तस्वीरें पोस्ट करती रहती हैं.
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