NDTV Khabar
होम | ब्लॉग

ब्लॉग

विचार
  • नौकरी के लिए इतना संघर्ष क्यों?
    रवीश कुमार
    कई बार जवानों और किसानों की हालत देखकर लगता है कि हम सब ज़िद पर अड़े हैं कि इनकी तरफ देखना ही नहीं है. समस्या इतनी बड़ी है कि समाधान के नाम पर पुड़िया पेश कर दी जाती है जो मीडिया में हेडलाइन बनकर गायब हो जाती है. अनाज और आदमी दोनों छितराए हुए हैं. न तो दाम मिल रहा है न काम मिल रहा है. सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए ये मुद्दे एक दूसरे की निंदा करने भर के लिए हैं मगर कोई भी ठोस प्रस्ताव जनता के बीच नहीं रखता है कि वाकई क्या करने वाला है, जो कर रहा है वो क्यों चूक जा रहा है. कई बार लगता है कि हमारे राजनेता, हमारे अर्थशास्त्री, सिस्टम में बैठे लोगों ने ज़िद कर ली है कि इन बुनियादी सवालों पर बात नहीं करना है, मीडिया को हर रात कोई न कोई थीम मिल जाता है, सब कुछ इसी थीम की तलाश के लिए हो रहा है. इसके बाद भी भारत के भीतर से तस्वीरें उथला कर सतह पर आ जा रही हैं.
  • कश्मीर दर्द से ऐंठती देह का नाम है
    प्रियदर्शन
    जम्मू-कश्मीर में अब फिर से राज्यपाल का शासन है. महबूबा सरकार से अलग हुई बीजेपी समझाने में जुटी है कि वहां राज्यपाल का शासन क्यों ज़रूरी है. वह अपने जाने-पहचाने शब्दाडंबर पर लौट आई है.
  • 'कश्मीर कांड' के कारण की तलाश...
    सुधीर जैन
    जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि BJP वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है, और दो घंटे के भीतर ही नाकामियों का ठीकरा महबूबा पर फोड़ते हुए BJP ने सरकार गिराने का ऐलान कर दिया. मसला एक विशेष राज्य में सरकार गिराए जाने का है.
  • नोटबंदी के बाद जो आतंकवाद ख़त्म हो गया था, उसी कारण गठबंधन ख़त्म हो गया
    रवीश कुमार
    ईंट का जवाब पत्थर से देने की रणनीति को ही अंतिम रणनीति मान ली गई और हालात अब इस मोड़ पर पहुंच गए हैं कि बीजेपी को फिर से मुड़ना पड़ रहा है. मुमकिन है कि अब वह फिर से धारा 370 का जाप करेगी.
  • जम्मू कश्मीर में किसकी नीति फ़ेल हुई ? 
    रवीश कुमार
    कश्मीर में देशहित में बनाया गया गठबंधन देशहित में तोड़ दिया गया. देशहित वो मैदा है जिससे राजनीति कभी पूड़ी बना लेती है, कभी समोसा बना लेती है. आज इसी देशहित के तहत बीजेपी ने गठबंधन से अलग होने का एलान कर दिया. तीन साल तक बीजेपी और पीडीपी मिलकर सरकार चलाती रही. आज अचानक मीडिया में महबूबा सरकार बोला जाने लगा है मगर क्या हम भूल गए हैं कि उस सरकार में बीजेपी के दस मंत्री थे जिनमें एक उप मुख्यमंत्री भी थे.
  • अरविंद केजरीवाल को इस धरने से क्या मिला?
    राहत इंदौरी का शेर है - 'चराग़ों को उछाला जा रहा है, हवा पर रौब डाला जा रहा है... न हार अपनी न अपनी जीत होगी, मगर सिक्का उछाला जा रहा है ...'
  • यह केजरीवाल का नहीं, लोकतंत्र का सवाल है
    प्रियदर्शन
    जो लोग दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों पर अहंकारी और अराजक होने की तोहमत लगाते हैं, उन्हें दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल का रवैया देखना चाहिए. उनके गेस्ट रूम में आठ दिन से राज्य के मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री धरने पर बैठे हैं, उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्यमंत्री अनशन की वजह से अस्पताल तक पहुंच चुके, लेकिन उपराज्यपाल ने जैसे तय कर रखा है कि जब तक केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं मिलेगी, वह इन आंदोलनकारियों से बात तक नहीं करेंगे. उनके लिए मुख्यमंत्री के ट्वीट और उनकी ओर से आ रहे अनुरोध भी बेमानी हैं.
  • नौकरशाही में बदलाव के नाम पर मोदी सरकार का नया स्टंट
    रवीश कुमार
    केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का एक नया स्टंट लॉन्च हुआ है, जिसे लेकर आशावादी बहस में जुट गए हैं. बाकी स्टंट की तरह इस स्टंट का मक़सद भी यही है कि लोग बहस करें कि कुछ हो रहा है, ख़ासकर ऐसे समय में, जब 'कुछ नहीं हो रहा है' के सवाल सरकार को कसकर घेरने लगे हैं. यह नया स्टंट है संयुक्त सचिव स्तर के 10 पेशेवर लोगों को सरकार में शामिल करना. सरकार के आख़िरी साल में यह ख़्याल क्यों आया, जबकि इस तरह के सुझाव पहले की कई कमेटियों की रिपोर्टों में दर्ज हैं और पहले भी बाहर से लोग सरकार में आए हैं.
  • छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों ?
    रवीश कुमार
    ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना आपने देखा है? भारत में महानगरों से लेकर ज़िलों में ज़िंदगी बर्बाद करने का कारखाना खुला हुआ है, जिसे हम अंग्रेज़ी में यूनिवर्सिटी और हिन्दी में विश्वविद्यालय कहते हैं. इस कारखाने की ख़ूबसूरती यही है कि जिसकी ज़िंदगी बर्बाद होती है उसे फर्क नहीं पड़ता. जो बर्बाद कर रहा है उसे भी कोई फर्क नहीं पड़ता. उत्तर प्रदेश के डॉक्टर राम मनोहर लोहिया यूनिवर्सिटी में इस साल बीए और एमए के 80 फीसदी छात्र फेल हो गए हैं. जिस यूनिवर्सिटी में चार लाख से अधिक छात्र फेल हो जाएं वो दुनिया की सबसे बड़ी ख़बर होनी चाहिए. क्या आपने सुना है कि ऑक्सफोर्ड, हावर्ड, मिशिगन यूनिवर्सिटी के 80 प्रतिशत छात्र फेल हो गए? और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है.
  • फादर्स डे - पि‍ता को बधाई ही नहीं, ‘छुट्टी’ भी दो
    पितृत्व को एक व्यवस्थित स्वरूप देकर उसे कानून प्रावधानों और नीतियों में लाया जाए। देखना है कि यह कब तक हो पाता है।
  • FIFA WORLD CUP: जब पिछली बार मिस्र की टीम यहां थी तब सालाह पैदा भी नहीं हुए थे
    संजय किशोर
    जब बॉल सालाह के बूट से टकराकर गोलपोस्ट के भीतर जाती है, तो लिवरपूल फुटबॉल क्लब स्टेडियम का नज़ारा कुछ ऐसा हो उठता है - पहले जश्न और शोर, फिर कुछ क्षण की खामोशी, फिर हाथ आसमान की तरफ उठता है खुदा को शुक्रिया कहने के लिए, और फिर जब वह धरती को चूमता है, तो उन लम्हों की पवित्रता के लिए ज़रूरी शांति का उसके प्रशंसक सम्मान करते हैं.
  • किस-किस खतरे का सामना करते हैं शुजात बुखारी और कश्मीर घाटी के उनके जैसे पत्रकार
    निधि राज़दान
    वह मुझे कभी यह बताना नहीं भूलते थे कि किस तरह कुछ अन्य TV चैनलों ने अपने नफरत से भरे एजेंडा के तहत कश्मीर में लगातार ज़हर घोला है. मीडिया के ऐसे हिस्से ने बहुत नुकसान पहुंचाया है, और सभी कश्मीरियों की छवि पत्थरबाज़ों और आतंकवादी की बना देने में इन्हीं चैनलों की खास भूमिका रही है.
  • जिनका कोई देश नहीं, उनका ब्राज़ील है
    प्रियदर्शन
    पेले भारत के लिए फुटबॉल खिलाड़ी कम और एक किंवदंती ज़्यादा रहा. अब वक्त बदल रहा है. कोलकाता के एक चाय बेचने वाले ने मॉस्को जाकर वर्ल्डकप देखने के लिए पैसा जुटाया, लेकिन रकम कम पड़ गई. तब उसने अपने मकान को ही अर्जेंटीना के रंगों में रंग लिया
  • विश्व बालश्रम निषेध दिवस : नोबेल पुरस्कार मिलने से बच्चों का क्या बदला...?
    अंतरराष्ट्रीय बाल श्रमिक दिवस भी ऐसा ही मौका है. भले ही हमें नोबेल पुरस्कार मिल गया हो, लेकिन शर्मनाक है कि देश में बाल मजदूरों की हालत अब भी चिंतनीय बनी हुई है. सरकारी आंखों को बाल मजदूर दिखाई ही नहीं देते हैं, इसलिए वह इस पर लगातार गलत जवाब देते हैं. इसलिए कोई कार्रवाई भी नहीं होती, सब हरा-हरा दिखाई देता है.
  • किम जोंग उन की ताकत और डोनाल्ड ट्रंप की सियासत
    प्रियदर्शन
    किम भी अमेरिका से डरकर अगर ऐटमी कार्यक्रम से पीछे हट जाते तो क्या होता...? अमेरिका एक 'रोग नेशन' को ख़त्म करने के जज़्बे के साथ उत्तर कोरिया पर टूट पड़ता और लोकतंत्र के नाम पर अमेरिकी सैन्य आधिपत्य का एक नंगा नाच चल रहा होता.
  • रजनीकांत की छतरी और फिल्‍म 'काला'...
    प्रियदर्शन
    जिस दौर में किसी रोहित वेमुला को हैदराबाद विश्वविद्यालय में आत्महत्या करनी पड़े, जिस दौर में उत्साही गोरक्षकों का हुजूम कहीं अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता हो और कभी दलितों की पीठ उधेड़ता हो, जिस दौर में दलित प्रतिरोध तरह-तरह की शक्लें अख़्तियार कर रहा हो, उस दौर में कोई कारोबारी फिल्म ऐसी भी बन सकती है जैसी 'काला' है.
  • एक‌ ई-मेल और कई‌ सवाल
    प्रियदर्शन
    रअसल, पुलिस ने इस दौरान एक चिट्ठी निकाल ली जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का इरादा जताया गया था.
  • प्रणब के दांव से चित्त हुई कांग्रेस
    अखिलेश शर्मा
    पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय पर कल के भाषण के बाद अब नई बहस शुरू हो गई है. क्या कांग्रेस ने तीखा विरोध कर जल्दबाजी तो नहीं की. कम से कम प्रणब दा के भाषण के बाद आई कांग्रेस और अन्य वरिष्ठ नेताओं की प्रतिक्रिया तो यही बता रही है. हालांकि एक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है कि प्रणब मुखर्जी आखिर संघ मुख्यालय क्यों गए.
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कैसे होगा SC/ST प्रमोशन
    विराग गुप्ता
    गर्मियों की छुट्टी के दौरान काम कर रही अवकाशकालीन पीठ के जजों ने सरकार के विशेष निवेदन पर सिर्फ यह स्पष्टीकरण दिया कि कानून के अनुसार SC/ST वर्ग में प्रमोशन देने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन उसे प्रमोशन के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश बताकर प्रचारित कर दिया गया, जिससे आने वाले समय में समस्या और जटिल हो सकती है. केंद्र और राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के 2006 के आदेश के बावजूद कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में विफल रही हैं, तो फिर इस स्पष्टीकरण से हज़ारों कर्मचारियों का प्रमोशन कैसे हो जाएगा...?
  • आदरणीय योगी जी, UPPSC के इन छात्रों को बुलाकर बात कर लीजिए!
    रवीश कुमार
    यूपी के नौजवान ट्विटर पर मुख्यमंत्री से लेकर सांसदों तक के ट्विट कर रहे हैं. अपील कर रहे हैं. मैं लंबी छुट्टी पर हूं. इतनी रात को जग कर लिख रहा हूं ताकि इन बच्चों को मायूस नहीं होना पड़े.
«123456789»

Advertisement