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विचार
  • प्रदर्शन के मौलिक अधिकार पर बंदिश, रोजगार के अधिकार पर चुप्पी
    रवीश कुमार
    यूनिवर्सिटी कैंपस में विरोध प्रदर्शन को दबाने के नाम पर तरह-तरह के नियम बनाए जा रहे हैं. ये सारे नियम सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले के खिलाफ खड़े नज़र आते हैं, जिसने 2018 में कहा था कि प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है. ज़रा-ज़रा सी बात पर छात्र को हॉस्टल से बाहर किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि हॉस्टल में भाषण देने से पहले डीन से अनुमति लेनी होगी.
  • कमाल की बात: क्या बुर्कापोश महिलाओं के आंदोलन से हो रहा ध्रुवीकरण?
    कमाल खान
    संशोधित नागरिकता कानून  और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर पर मुस्लिम महिलाओं के आंदोलन के जवाब में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अब तक की सबसे बड़ी मुहिम शुरू कर दी है. उनके कार्यकर्ता गांव-गांव जा कर बता रहे हैं कि पाकिस्तान में जिन हिंदुओं को सताया गया उनमें 75 फीसदी दलित और पिछड़े हैं.
  • नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को इस अंदाज में पार्टी से बाहर का रास्ता क्यों दिखाया?
    मनीष कुमार
    जनता दल यूनाइटेड (JDU) के प्रमुख नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने मंगलवार को विधिवत रूप से प्रशांत किशोर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. हालांकि संयमित भाषा के लिए पहचान रखने वाले नीतीश कुमार, पवन वर्मा और प्रशांत किशोर पर कुछ इस तरह गुस्सा निकाला कि अपनी पार्टी के प्रवक्ता जिस भाषा में बोलते हैं नीतीश भी उसी अंदाज़ में आ गए. लेकिन प्रशांत किशोर की विदाई का एक ही राजनीतिक अर्थ है कि भाजपा के साथ सीटों का समझौता नीतीश कुमार के मनमुताबिक हो गया हैं.
  • सांप्रदायिक तूफ़ान के भंवर में दिल्ली का चुनाव
    रवीश कुमार
    सुप्रीम कोर्ट का डेटा है कि 2019 में जनवरी से जून के बीच बच्चों खासकर लड़कियों के खिलाफ 24000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे. 2018 में भारत में 33,977 बलात्कार के केस दर्ज हुए हैं. क्या किसी केस में प्रधानमंत्री और अमित शाह बचाते हुए देखे गए हैं? राष्ट्रीय अपराध शाखा ब्यूरो के रिकार्ड के अनुसार 2018 में दिल्ली में बलात्कार के 1217 मामले दर्ज हुए थे.
  • शाहीन बाग़ और भारतीय लोकतंत्र की चुनौती
    प्रियदर्शन
    शाहीन बाग़ से बहुत सारी आवाजें आ रही हैं, बहुत सारे दृश्य आ रहे हैं. वहां तिरंगा लहराया जा रहा है, वहां जन-गण-मन और वंदे मातरम तक गाया जा रहा है, वहां भारत का सुंदर नक्शा बनाया जा रहा है. वहां भारत की साझा संस्कृति के गीत गाए जा रहे हैं, वहां गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल वाली आज़ादी के नारे लगाए जा रहे हैं, लेकिन बीजेपी को यह सब सुनाई और दिखाई नहीं पड़ रहा. उसे बस दो हाशिए की आवाज़ें सुनाई पड़ीं जिन्हें शाहीन बाग के मंच का समर्थन नहीं मिला.
  • क्या भीड़ से तय होगा कि कौन गद्दार है?
    रवीश कुमार
    26 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी मन की बात में अंहिसा की बात करते हैं, 27 जनवरी को उनके ही मंत्री गोली मारने के नारे लगवाते हैं. ऐसा लगता है कि अहिंसा सिर्फ मन की बात बन कर रह गई है, ज़ुबान की बात कुछ और है. 25 जनवरी को राष्ट्रपति देश के युवाओं को गांधी की अहिंसा की याद दिलाते हैं.
  • पश्चिमी मीडिया के कवर पर क्यों बदली मोदी और भारत की छवि?
    रवीश कुमार
    इंटरनेट के ज़माने की राजनीति से अच्छी तो बैलगाड़ी के ज़माने की राजनीति थी. झूठ की रफ्तार भी कम थी और नेताओं की अर्थहीन बातें सेकेंड-सेकेंड आपके इनबाक्स में नहीं पहुंचती थीं. भारत का नौजवान सुबह आंख खोलता है कि आज उसकी नौकरी और कस्बे के घटिया कालेजों पर बात होगी लेकिन बातचीत का सारा समय हलवा बनाम पोहा में चला जाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने कपड़े से पहचानने की भाषा स्थापित की तो उनकी पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय खाने से पहचानने का आइडिया ले आए हैं. विजयवर्गीय ने कहा है कि उनके घर में एक नया कमरा बन रहा है. जिसमें काम कर रहे छह-सात मज़दूरों के खाने का तरीका बहुत अजीब है. वे पोहा खा रहे हैं. पोहा खाते देख शक होता है और पता करने लगते हैं कि कहीं बांग्लादेशी तो नहीं है.
  • शाहीन बाग को बचाना भारत को बचाना है
    प्रियदर्शन
    शाहीन बाग में करीब 40 दिन से आंदोलन चल रहा है- बल्कि वह लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन को एक नई गरिमा, नई कलात्मकता, नई ऊंचाई और नई जनतांत्रिकता दे रहा है. कविता, संगीत, चित्रकला, नाटक, संस्थापन कला- सब इस आंदोलन की जान हैं. दूर-दूर से लोग यहां बस यह देखने आ रहे हैं कि विरोध प्रदर्शन कितना खूबसूरत हो सकता है. दूर-दराज के इलाक़ों में शाहीन बाग बनाने की कोशिश हो रही है.
  • रवीश कुमार का ब्लॉग: मोदी जी को 400 नहीं 545 सीट दीजिए लेकिन उनकी भाषा मत लीजिए
    रवीश कुमार
    छह साल बाद अर्थव्यवस्था फेल है. इस दौरान जिनकी ज़िंदगी बर्बाद हुई उसे सुधरने में बहुत वक्त लग जाएगा. आप प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री की भाषा देखिए.
  • शिकारा का प्रीमियर: सब कुछ पहली बार जैसा था, जैसे पहली बार उसी दिन गोली चली हो
    रवीश कुमार
    जम्मू से आए कश्मीरी पंडित परिवारों को देख रहा था तभी राहुल पंडिता की एक बात कान से टकराई. सबके भीतर इतना भरा हुआ है कि लोग फट पड़ते हैं. हर बार शुरू से कहानी बताने लगते हैं. उसके बाद धीरे-धीरे कश्मीरी पंडित परिवारों से टकराता गया. कनॉट प्लेस के पीवीआर प्लाज़ा सिनेमा हॉल के भीतर जा ही रहा था कि किसी ने पीछे से आवाज़ दी और मुझे खींच लिया, विधु विनोद चोपड़ा. मुड़ते ही उन्होंने कहा कि मैं टीवी नहीं देखता. मैं तो खुद कहता हूं लोग टीवी न देखें. पर वो कुछ और कहना चाहते थे. उन्होंने कहा कि राहुल ने आपके वीडियो का लिंक भेजा था. शाहीन बाग वाले एपिसोड का. मैं देखने लगा तो हैरान हुआ कि टीवी पर इतनी शांति से कैसे बातचीत हो सकती है. फिर मैंने ही कहा था कि इनको बुलाओ. लेकिन मुझे अफ़सोस है कि उसके पहले आपके बारे में कुछ पता नहीं था.
  • लोकतंत्र के पैमाने पर भारत का रैंक क्यों गिरा
    रवीश कुमार
    असम में एनआरसी लागू होने के कारण लोगों को काफी तकलीफों से गुज़रना पड़ा है. इन प्रदर्शनों के बैनरों पोस्टरों पर फासीवाद लिखा है. न्यूजीलैंड के लोग फासीवाद के खिलाफ है. भारत सबका है. जामिया, जेएनयू और एएमयू के छात्रों के साथ सहानुभूति दिखाई गई है. यूनिवर्सिटी पर हमले को रोकने की बात है. दो घंटे तक चले इस मार्च में जो बैनर पोस्टर हैं वो भारत की अच्छी तस्वीर तो पेश नहीं कर रहे हैं. लेकिन एक बार सोचना तो चाहिए कि इस कानून ने लोगों को कितना भयभीत किया है जगह जगह लोग सड़कों पर उतर रहे हैं.
  • निर्भया के इंसाफ़ की गरिमा बनाए रखें- उसे जल्दबाज़ी भरे प्रतिशोध में न बदलें
    प्रियदर्शन
    निर्भया की मां आशा देवी का दुख निस्संदेह बहुत बड़ा है. इस दुख को समझना मुश्किल नहीं है. उनकी बेटी के साथ बहुत बर्बर और घृणित व्यवहार हुआ और उसके मुजरिमों को अब तक सज़ा नहीं मिली है. लेकिन सांत्वना की बात इतनी भर है कि ये मुजरिम सजा के बिल्कुल आख़िरी सिरे पर हैं, ख़ुद को मिले अंतिम क़ानूनी विकल्पों का इस्तेमाल कर रहे हैं और इनकी सज़ा के लिए गिनती के दिन रह गए हैं. यही नहीं, न्याय से जुड़ी संस्थाएं जितनी तेज़ी से न्याय की इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही हैं, वह रफ़्तार किसी और केस में दिखाई नहीं पड़ती.
  • प्रधानमंत्री जी सरकारी नौकरी परीक्षा पर चर्चा कब होगी ?
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री मोदी ने स्कूली बच्चों के साथ परीक्षा पर चर्चा क्या की, सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में फंसे छात्र चाहते हैं कि उनकी परीक्षा पर भी प्रधानमंत्री चर्चा करें. ताकि 12वीं के जो छात्र अगले एक दो साल में जब पहली बार मतदाता बनेंगे तो उन्हें भी पता चले कि आगे सरकारी परीक्षाओं का एक भयानक स्वरूप उनका इंतज़ार कर रहा है.
  • योगी जी ध्यान दें, कहीं यूपी में बेरोज़गार बाग न बन जाए
    रवीश कुमार
    मुझे अंदाज़ा होने लगा है कि एक दिन देश का बेरोज़गार शाहीन बाग़ की तर्ज पर बेरोज़गार बाग़ बना लेगा. वो कब तक रवीश कुमार को पत्र लिखेगा. मैं कब तक फेसबुक पर पोस्ट करूंगा. इन युवाओं के माता-पिता भी इनकी समस्या छोड़ कर हिन्दू मुस्लिम में मस्त हैं.
  • कश्मीरी पंडितों का दर्द हमने कितना समझा?
    रवीश कुमार
    अगर किसी की तमाम तक़लीफों में सबसे बड़ी यही तकलीफ हो कि किसी ने उनकी बात नहीं की तो उस चुप्पी पर बात होनी चाहिए. इंसाफ़ का इंतज़ार लंबा हो ही गया है और शायद आगे भी हो लेकिन चुप्पी उनके भीतर चुप रही है. वो हर दिन पहले से ज्यादा चुभने लगती है.
  • मुझे यूपी के 69000 पदों के चार लाख उम्मीदवारों के पत्र का इंतज़ार है
    रवीश कुमार
    मुझे सांप्रदायिक नौजवानों की जमात का हीरो नहीं बनना है. मैं ज़ीरो ठीक हूं. मैं जानता हूं कि 69000 शिक्षक भर्ती पद के सवा चार लाख उम्मीदवारों में से ज़्यादातर घोर कम्युनल होंगे. फिर भी ये उम्र में मुझसे छोटे हैं और मैं इनको ना नहीं कह पाता.
  • लखनऊ में घर तलाश रही हैं प्रियंका गांधी वाड्रा, बढ़ती जा रही हैं कांग्रेस की उम्मीदें...
    स्वाति चतुर्वेदी
    कांग्रेस का तर्क है कि प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा उत्तर प्रदेश में किए काम का असर दिखने लगा है - सबूत के तौर पर वह बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मुखिया तथा पूर्व मुख्यमंत्री मायावती द्वारा हाल ही में प्रियंका पर किए हमले को पेश करते हैं. इसके अलावा प्रियंका की योगी आदित्यनाथ से भी झड़प हो चुकी हैं. क्षेत्रीय महत्व रखने वाले एक ही राजनेता ने अब तक प्रियंका का विरोध नहीं किया है, और वह हैं समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख तथा पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव.
  • रवीश कुमार का ब्लॉग : CAA पर असम के मंत्री हिमंता बिश्व शर्मा का बयान पढ़ें और जोर से हंसे
    रवीश कुमार
    नागरिकता संशोधन क़ानून इसलिए लाया गया है ताकि इसके आधार पर जनता को उल्लू बनाया जा सके. अब देखिए. हिन्दी प्रदेशों में अख़बारों और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में जो ठेला गया है उसका आधार सिर्फ़ यह है कि किसी के कपड़े देखकर बहुसंख्यक सोचना बंद कर देंगे और बीजेपी की तरफ़ एकजुट हो जाएंगे. हंसी आती है. हर दूसरी चर्चा में सुनता रहता हू. क्या यह मान लिया गया है कि लोगों ने सोचना बंद कर दिया है?
  • शाहीन बाग़ जैसे प्रदर्शनों से कौन बोर हो गया है?
    रवीश कुमार
    ऐसा क्या फैसला है ये कि इसे समझाने के लिए बीजेपी को देश भर में 250 प्रेस कांफ्रेंस और 1000 सभाएं करनी पड़ रही हैं. इसमें स्थानीय और राष्ट्रीय नेता भी हैं और दरवाज़े दरवाज़े जाकर कानून को समझाने का कार्यक्रम भी है. जब इस कानून को 130 करोड़ भारतीयों का समर्थन हासिल है तो फिर बीजेपी को इतनी रैलियां क्यों करनी पड़ रही हैं. अब यह देखा जाना चाहिए कि 1000 सभाओं में से कितनी सभाएं असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में होती हैं. जहां इस कानून के विरोध का स्वरूप ही कुछ अलग है.
  • अमित शाह ने नागरिकता कानून के बचाव में गांधी का गलत इस्तेमाल क्यों किया?
    रवीश कुमार
    जब से नागरिकता संशोधन कानून का विरोध तेज़ हुआ है, इसके समर्थन में गांधी जी का उदाहरण दिया जाने लगा है. गांधी जी उदाहरण इस तरह से दिया जा रहा है जैसे सारा काम गांधी जी के बताए रास्ते पर ही चलकर करते हों. अब गांधी जी ने तो नहीं कहा था कि गोडसे को देशभक्त बताने वाले को टिकट देनी है और सांसद बनाना है. तो फिर नागरिकता कानून का बचाव गांधी जी के नाम पर क्यों किया जा रहा है?
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