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विचार
  • हमारे समाज में बच्चियां कितनी सुरक्षित?
    रवीश कुमार
    इन सब व्यवस्थाओं के बाद भी 24,212 मामलों में से मात्र 911 मामलों में ही फैसला आ सका है. यह रिकॉर्ड बेहद साधारण है. ख़राब भी कहा जा सकता है. 11,981 बलात्कार के मामलों में जांच ही चल रही है. 4871 मामलों में पुलिस अदालत को रिपोर्ट सौंप सकी है. 6449 मामलों में ट्रायल शुरू हो सकी है. 911 मामलों में सज़ा हुई है. 
  • ट्रिनिटी:
    अमित
    विनोबा भावे ने कहा है विज्ञान जब राजनीति के साथ मिलती है तो विनाश का जन्म होता है. सभी शीर्ष वैज्ञानिक चाहते थे कि परमाणु बमों की जानकारी सोवियत रूस (जो उस समय मित्र राष्ट्रों के साथ था) भी दी जानी चाहिए. अमेरिका ने ऐसा नहीं किया. इसी दौरान रुजबेल्ट की मौत हो चुकी थी. ट्रूमैन अमेरिका के नए राष्ट्रपति बने. उनका मानना था कि जर्मनी ने सही तो जापान पर बम गिराकर युद्ध समाप्त किया जाए. अब परीक्षण की बारी आई, 16 जुलाई, 1945, समय  सुबह 5:29... प्लूटोनियम वाले 'the Gadget' (जो आगे फैटमैन बना) को एक टावर पर रखा गया.
  • रवीश कुमार का ब्लॉग : लोगों की आंखें अंधी, कान बहरे, मुंह से ज़ुबान ग़ायब है, चीन में सच बताने के लिए कोई बचा नहीं
    रवीश कुमार
    ''उन्मुक्त आवाज़ की जगह सिमट गई है. आप स्वतंत्र पत्रकार हैं, कहना ख़तरनाक हो गया है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शासन में ऐसे पत्रकार ग़ायब हो गए हैं. सरकार ने दर्जनों पत्रकारों को प्रताड़ित किया है और जेल में बंद कर दिया है. समाचार संस्थाओं ने गहराई से की जाने वाली रिपोर्टिंग बंद कर दी है. चीन में शी जिनपिंग के साथ मज़बूत नेता का उफान फिर से आया है. इसका नतीजा यह हुआ है कि चीन के प्रेस में आलोचनात्मक रिपोर्टिंग बंद हो गई है. यह संपूर्ण सेंसरशिप का दौर है. हमारे जैसे पत्रकार करीब करीब विलुप्त हो गए हैं'. 43 साल की पत्रकार ज़ांग वेनमिन का यह बयान न्यूयार्क टाइम्स में छपा है.
  • राजद का भविष्य और बिहार की राजनीति की दिशा क्यों और कैसे तय करेंगे नीतीश कुमार...
    मनीष कुमार
    लोकसभा चुनाव के बाद बिहार की राजनीति को लेकर जो भी क़यास लगाए जा रहे हैं उसके केंद्र में एक ही बात की प्रमुखता होती है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अगला कदम क्या होगा और राजद टूटेगी या अब एक बार फिर नीतीश कुमार की शरण में जाएगी.
  • भीड़तंत्र के बेकाबू होने की ज़िम्मेदारी किसकी?
    ऋचा जैन कालरा
    क्या भारतीय लोकतंत्र में भीड़तंत्र बेकाबू हो गया है? ये सवाल इसलिए क्योंकि भीड़तंत्र के गुस्से की बलि चढ़ने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. सरकारें कड़ा संदेश देने में कतरा रही हैं और इससे कानून तोड़ने वालों के हौसले और बुलंद हो रहे हैं. सरकारी तंत्र कभी लाचार तो कभी लापरवाह नज़र आता है.
  • सरकारी कंप्यूटर सिस्टम और सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर गृह मंत्रालय के नए प्रतिबन्ध
    विराग गुप्ता
    इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार सरकारी अधिकारियों के लिए यह पहली ऐसी गाइडलाइन है, पर यह तथ्यात्मक तौर पर सही नहीं है. आम बजट के पहले के.एन. गोविन्दाचार्य, रामबहादुर राय, पी.वी. राजगोपाल और बासवराज पाटिल ने अमित शाह को प्रतिवेदन देकर दिल्ली हाईकोर्ट के 2014 के आदेश के तहत बनी सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन कराने की मांग की थी.
  • राम का नाम आराधना के लिए या हत्या के लिए?
    इस सवाल पर लौट आइये इससे पहले कि हम जवाब देने के बजाए नज़रें चुराने लगें. राम का नाम साधना और अराधना के लिए है या इसके नाम पर हत्या करने के लिए है. अभी भले लगता हो कि हमारी ड्राइंग रूम से दूर शायद दिल्ली से बहुत दूर कुछ लोगों का यह काम है और भारत जैसे देश में अपवाद हैं तो आप गलती कर रहे हैं. इनके पीछे की सियासी खुराक कहां से आ रही है, आप इतने भी भोले नहीं है कि सब बताना ही पड़े.
  • बेटियों को अपनी मर्जी से शादी का हक देते हैं हम?
    रवीश कुमार
    करियर की च्वाइस तो है, पायलट बनने की भी च्वाइस है, डॉक्टर बनने की भी है, आज कल की लड़कियां जो हैं, ताली बजाते हुआ मां बाप खूब फोटो खिंचाते हैं, कुछ लोग स्लोगन भी लिख जाते हैं कि आज कल की लड़कियां. लेकिन जब वही आज कल की लड़कियां अपनी च्वाइस से शादी करती हैं तब जाकर पता चलता है कि जो माता पिता या भाई ताली बजा रहे थे उनके भीतर एक संभावित हत्यारा भी छिपा है.
  • धोनी का लौटना देखा नहीं गया...
    रवीश कुमार
    महेंद्र सिंह धोनी के रन आउट होने को लेकर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक पोस्ट लिखी. रवीश कुमार ने लिखा- आज मन उदास है. रन आउट होकर धोनी को लौटता देख अच्छा नहीं लगा. धोनी को मैदान में उतरने से पहले बल्ले को सूंघते देखा. लगा जैसे समझा रहे हों कि आज साथ देना. आज खेलना है.
  • वित्त मंत्रालय में पत्रकारों का जाना हुआ आसान, ख़बरों का आना हुआ मुश्किल
    रवीश कुमार
    मैं सपने में था. सपने में वित्त मंत्रालय था. कमरे में अफ़सर फाइलों को पलट रहे थे. उनके पलटते ही नंबर बदल जाते थे. पीले-पीले पन्नों को गुलाबी होते देख रहा था. 0 के आगे 10 लगा देने से 100 हो जा रहा था. 100 से 00 हटा देने पर नंबर 1 हो जा रहा था. कुछ अफ़सरों की निगाहें भी मिल गईं. मिलते ही उन्होंने निगाहें चुरा लीं. उनकी आंखों में काजल था, पानी नहीं था.
  • कांग्रेस के लिए अकेले लड़ाई लड़ रहे डीके शिवकुमार
    स्वाति चतुर्वेदी
    कांग्रेस के नेता डीके शिवकुमार को "संकट मोचन" कहते हैं. और, आज कर्नाटक के यह दिग्गज नेता मुंबई के रेनिसेंस होटल के बाहर पार्टी के एक मात्र व्यक्ति के रूप में दिखाई दिए. वे उन बागी विधायकों से मिलने के लिए बारिश में घंटों इंतजार करते रहे जिनके इस्तीफे से कर्नाटक सरकार गिरने की स्थिति में आ चुकी है.
  • कर्नाटक के बहाने विपक्ष के खात्मे का प्लान
    रवीश कुमार
    कर्नाटक कांग्रेस के नेता डीके शिवकुमार मुंबई के रेनासां होटल में जाना चाहते थे, मुंबई एयरपोर्ट से सीधे पोवई स्थित रेनेसां होटल मुंबई पहुंच गए. पुलिस के हाथ में विधायकों का पत्र था. शिवकुमार के हाथ में होटल में कमरे की बुकिंग का कागज़. पुलिस ने शिवकुमार को रोक दिया. कहा कि विधायको ने पत्र लिखा है कि उन्हें सुरक्षा चाहिए, क्योंकि उन्हें डर है कि शिवकुमार और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कभी भी अंदर आ सकते हैं. हम भारत के भोले भाले लोग विपक्ष की सरकारों को निरंगत ढ़हते ढ़हाते देख रहे हैं.
  • आर्थिक सर्वे और बजट के आंकड़ों में अंतर कैसे?
    रवीश कुमार
    श्रीनिवासन जैन ने एक रिपोर्ट की है. बजट से 1 लाख 70 हज़ार करोड़ का हिसाब ग़ायब है. प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने आर्थिक सर्वे और बजट का अध्ययन किया. उन्होंने देखा कि आर्थिक सर्वे में सरकार की कमाई कुछ है और बजट में सरकार की कमाई कुछ है. दोनों में अंतर है. बजट में राजस्व वसूली सर्वे से एक प्रतिशत ज्यादा है. यह राशि 1 लाख 70 हज़ार करोड़ की है, क्या इतनी बड़ी राशि की बजट में चूक हो सकती है.
  • बजट और दृष्टिपत्र का फर्क...?
    सुधीर जैन
    इस बजट ने वाकई चक्कर में डाल दिया. विश्लेषक तैयार थे कि इस दस्तावेज की बारीकियां समझकर सरल भाषा में सबको बताएंगे, लेकिन बजट का रूप आमदनी खर्चे के लेखे-जोखे की बजाय दृष्टिपत्र जैसा दिखाई दिया. यह दस्तावेज इच्छापूर्ण सोच का लंबा-चौड़ा विवरण बनकर रह गया. बेशक बड़े सपनों  का भी अपना महत्व है. आर्थिक मुश्किल के दौर में 'फील गुड' की भी अहमियत होती है, लेकिन बजट में सपनों या बहुत दूर की दृष्टि का तुक बैठता नहीं है. पारंपरिक अर्थों में यह दस्तावेज देश के लिए एक साल की अवधि में आमदनी और खर्चों का लेखा-जोखा भर होता है. हां, इतनी गुंजाइश हमेशा रही है कि इस दस्तावेज में कोई यह भी बताता चले कि अगले साल फलां काम पर इसलिए ज्यादा खर्च किया जा रहा है, क्योंकि ऐसा करना आने वाले सालों में देश के लिए हितकर होगा.
  • बेहतर लाइब्रेरी और शिक्षकों की मांग को लेकर पिथौरागढ़ के छात्रों का अनोखा आंदोलन...
    रवीश कुमार
    कुछ दिन पहले दिल्ली के नज़फ़गढ़ से एक छात्र ने लिखा था कि उसके गांव में लाइब्रेरी नहीं है. लाइब्रेरी जाने के लिए उसे दिल्ली में ही 40 किलोमीटर का सफ़र करना पड़ता है. शायद वह पहला मौका था या पहला दर्शक था जिसने लाइब्रेरी के लिए हमें पत्र लिखा था. पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से छात्रों के मैसेज आ रहे थे कि वे लाइब्रेरी और किताबों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. ऐसा कब सुना है आपने कि छात्र अपने कॉलेज की कबाड़ हो चुकी लाइब्रेरी को बेहतर करने के लिए आंदोलन कर रहे हों. ज़ाहिर है इस पर ध्यान जाना ही चाहिए.
  • NJAC: रंगनाथ पांडेय रिटायर हुए हैं, उनका उठाया गया मुद्दा नहीं...
    अमित
    इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रंगनाथ पांडेय ने अपने रिटायमेंट से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति बंद कमरों में चाय पर चर्चा करते-करते हो जाती है. यहां कोई पारदर्शिता नहीं है. नियुक्ति में भाई-भतीजावाद और जातिवाद हावी है. जिसका मतलब है कि जजों के बच्चे या रिश्तेदार ही जज बनते हैं.
  • दस साल में बच्चों के बजट पर सबसे कम प्रावधान
    राकेश कुमार मालवीय
    जब हम बच्चों के लिए खास बजट की बात करते हैं तो उसका मतलब क्या है? उसका मतलब दो दर्जन से अधिक विभागों से जुड़ी उन 89 योजनाओं से है जो सीधे तौर पर देश की चालीस प्रतिशत आबादी यानी बच्चों से जाकर जुड़ती है. अच्छी बात है कि इसको अलग करके देखा जाता है यानी कि एक पूरा दस्तावेज ही बच्चों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं पर आधारित होता है. भारी बहुमत लेकर संसद पहुंची बीजेपी सरकार ने 5 जुलाई को जो बजट पेश किया उसमें चालीस प्रतिशत आबादी यानी बच्चों का हिस्सा केवल 3.29 प्रतिशत है. भारत के कुल 27,86,349 करोड़ रुपये के बजट में से 91,644.29 करोड़ रुपये बाल कल्याण के लिए आवंटित किए गए हैं.
  • टि्वटर पर झगड़ने लगे हैं क्रोधित करोड़पतिगण, क्या भक्ति से ध्यानभंग कर दिया बजट ने
    रवीश कुमार
    बहुत से पत्रकार टाइमलाइन पर दैनिक प्रासंगिकता स्नान कर रहे थे. यह नए प्रकार का स्नान है. उन्होंने कई साल से कोई ख़बर नहीं की है जिससे लगे कि उनमें पत्रकारीय क्षमता है. काफी धूल जम गई है. इसलिए वे सरकार के समर्थन में ट्विट कर किसी से सवाल दाग देते हैं. फिर उनका एडिटर या मालिक नहीं पूछता कि तुम्हारी खबर कहां हैं. यह एक प्रकार का गंगा स्नान है जिसे मैं प्रांसिगकता स्नान कहता हूं.
  • फ़ीस वृद्धि का दौर शुरू हो गया, चुनाव ख़त्म हो गया है...
    रवीश कुमार
    नेशनल लॉ स्कूल की फ़ीस बढ़ा दी गई है. हर साल की फ़ीस 50 हज़ार महंगी हो गई है. डिजिटल इंडिया के छात्रों को इंटरनेट फ़ीस साढ़े बारह हज़ार देने होते हैं और लाइब्रेरी फ़ीस के लिए दस हज़ार. 27 फ़ीसदी वृद्धी हुई है. पांच साल की पढ़ाई ढाई लाख और महंगी हो गई है. छात्रों ने मुझे मैसेज किया है.
  • अपने समय से पीछे रह गए लोगों के लिए समय से आगे की ख़बरें
    रवीश कुमार
    उस छोटी सी जगह में रोज़ 9 से 10,000 गाड़ियां आती हैं. 1500 बसें आती हैं. 80,000 लोग आते हैं. 14 से 24 घंटे तक कतार में इंतज़ार करते हैं. तब जाकर दर्शन करते हैं. व्यस्तता से भरी इस दुनिया के इसी समय में दर्शन के लिए 24 घंटे कतार में होने का धीरज कहीं बचा हुआ है. वैसा ही जैसा हज़ारों वर्ष पूर्व रहा होगा.
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