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विचार
  • पं. नेहरू जिस बात पर अमल कर चुके हैं पीएम मोदी ने कही वही बात
    अमित
    इतिहास की उल्टी व्यख्या नहीं हो सकती. (जैसे 'समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाए) व्यक्ति एक-दूसरे के कार्यों से प्रेरणा ले सकते हैं, लेते हैं. कई बार देश की परंपराएं इतनी गहरी धंसी होती हैं कि, कभी ये किसी के कार्यों के द्वारा, तो कभी किसी के शब्दों के द्वारा प्रकट हो जाती हैं. अपनी वैचारिक मान्यताओं और सुविधा के कारण हम उन्हें किसी व्यक्ति या समूह से जोड़ देते हैं.
  • क्या आपात स्थिति के लिए फ़ायर विभाग तैयार है?
    रवीश कुमार
    24 मई को सूरत के तक्षशिला आर्केड में आग लगने से 22 लोगों की मौत हो गई है. 17 छात्र छात्राओं की मौत की घटना के बाद सारी बहस इस तंज तक सिमट कर रह गई है कि हम 3000 करोड़ की पटेल की मूर्ति बना लेते हैं मगर स्मार्ट सिटी सूरत में आग बुझाने के लिए सीढ़ी तक नहीं थी.
  • राहुल पद छोड़ना चाहते हैं, उन्हें क्या सलाह दे रहीं सोनिया और प्रियंका
    अगले माह अपना 49वां जन्मदिन मनाने से पहले आम चुनाव में बीजेपी के हाथों धूल चाटने की पीड़ा झेल रहे राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने के अपने उस फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार नहीं हैं जिसके बारे में उन्होंने शनिवार को पार्टी को अवगत कराया था.
  • तो क्या विधानसभा चुनाव से पहले ही अपनी सीट हार चुके हैं अरविंद केजरीवाल?  
    मनोरंजन भारती
    यही नहीं नजफगढ़ से केजरीवाल सरकार में मंत्री कैलाश गहलोत भी तीसरे नंबर पर हैं, यहां कांग्रेस को लोकसभा के वोटों के अनुसार 23 हजार 354 वोट मिलेगें तो आप को 22 हजार 302 वोट. यदि इन आकंड़ों के आधार पर विधानसभा के क्षेत्रवार सीटों से मिलान किया जाए तो दिल्ली की 70 सीटों में से बीजेपी 65 सीट जीत सकती और कांग्रेस 5 सीटें जबकि आम आदमी पार्टी का खाता भी नहीं खुलता दिख रहा है.
  • यह PM नरेंद्र मोदी का सर्वश्रेष्ठ भाषण था, लेकिन अब उन्हें 'विश्वास' सचमुच जीतना होगा
    अगर मोदी अपनी नई पारी की शुरुआत सचमुच सबको साथ जोड़कर करने के प्रति गंभीर हैं, तो उन्होंने बहुत-से मुद्दों पर आत्ममंथन करना होगा. उन्हें BJP और संघ परिवार को भी उन्हीं की लाइन पर चलने के लिए बाध्य करना होगा. उन्हें खुद आगे बढ़कर मुस्लिम समुदाय के प्रभावी और सम्मानित प्रतिनिधियों को नियमित वार्ताओं के लिए आमंत्रित करना होगा, जिनमें उनके कड़े आलोचक भी शामिल हों, और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में ताकत के विभिन्न स्तरों पर उन्हें भी हिस्सेदारी देनी होगी.
  • ब्लॉग: कांग्रेस के नेता चुनाव क्षेत्र को अपनी संपत्ति न मानें, यह लोगों की संपत्ति है
    ऑस्ट्रेलिया टीम इसीलिए अच्छा प्रदर्शन करती है. भारत की राजनीति में भी यह फार्मूला लागू होना चाहिए. फॉर्म में जो नेता नहीं हैं उनके जगह नए नेताओं को टिकट देना चाहिए. यह जो पुराने नेता है उन्हें टेनिस की तरह नॉन प्लेइंग कप्तान बना देना चाहिए जो बाहर बैठकर सलाह देते रहे.
  • लालू प्रसाद की अनुपस्‍थ‍िति या तेज प्रताप का विद्रोह, आखिर कैसे डूबी बिहार में महागठबंधन की नैया?
    सुरेश कुमार
    लालू प्रसाद यादव जेल में सजा काट रहे हैं. यह पहला मौका है जब किसी चुनाव में लालू प्रसाद यादव रैली, सभा से दूर रहे. इसका नुकसान उनकी पार्टी राष्‍ट्रीय जनता दल समेत उनके सहयोगी दलों को भी उठाना पड़ा. चुनावी समर में नेतृत्‍व उनके बेटे तेजस्‍वी यादव के कंधों पर था. अभी तक चली आ रही जातिगत समीकरण पर आधारित राजनीति ने सभी दलों को उसके हिसाब से चुनावी मैदान में उम्‍मीदवार उतारने को विवश कर दिया. चाहे एनडीए हो या यूपीए, किसी ने उस फार्मूले से किनारा नहीं किया.
  • नून रोटी खाएंगे, मोदिए को ले आएंगे...
    संजय किशोर
    भाजपा और सहयोगी दलों के सांसदों को भी इस बार ये बात समझ लेनी चाहिए कि उन्होंने नरेंद्र दामोदर दास मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया, मोदी ने उन्हें संसद तक पहुंचाया है. अमेठी के आसमान में सुराख स्मृति ईरानी ने नहीं किया है.
  • क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं
    रवीश कुमार
    2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा बोला है क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं. उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला. सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं. मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं. बल्कि उनकी समस्या वास्तविक थी इसलिए दिखाई. आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है. मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है. कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले. उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी की वे मुझे गालियां देते थे. मेरे पास सैंकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है. इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना. यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना.
  • प्रचंड जीत के लिए दिसंबर के झटकों से किस तरह उबरे मोदी
    आशुतोष
    आज बड़ा सवाल यह है कि क्‍या हिन्‍दुत्‍व ने बीजेपी को उस जगह पर बैठा दिया है जहां पहले कांग्रेस इंदिरा और नेहरू के समय थी? कुछ तथ्‍यों को मानना ही होगा. मोदी नीत हिन्‍दुत्‍व नई सत्तरारूढ़ विचारधारा है और किसी भी दूसरी राजनीतिक विचाराधारा के लिए इसे बाहर निकालना आसान नहीं होगा.
  • कांग्रेस को भारी पड़ गया 'हुआ तो हुआ', जनता ने फिर किया मोदी पर 'विश्‍वास'
    सुरेश कुमार
    कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता मणिशंकर अय्यर के एक बयान ने गुजरात चुनाव की दिशा मोड़ दी थी. ठीक वैसा ही बयान चुनावी अभियान के दौरान कांग्रेस के खेमे से निकला और बीजेपी ने उसका इस्‍तेमाल मिसाइल की तरह करके कांग्रेसनीत गठबंधन के किले को ध्‍वस्‍त कर दिया. वह बयान था सैम पित्रोदा का जो कि सिख दंगों को लेकर दिया गया था- 'हुआ तो हुआ'.
  • ईवीएम की सुरक्षा को लेकर इतना हंगामा क्यों?
    रवीश कुमार
    अगर उनके जमा होने का कारण यह है कि ई वी एम मशीन बदली जा सकती है या गड़बड़ी हो सकती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है. यह चुनाव आयोग की विश्वसनीयता के लिए अच्छा नहीं है. जिस तरह इस चुनाव में उसके फैसलों पर नज़र रखी गई है, हर फैसले को लेकर संदेह किया गया है यह पहले के चुनावों से कहीं ज़्यादा है. 
  • एग्जिट पोल की अटकलभर से पूंजी बाजार बमबम...
    सुधीर जैन
    एग्जिट पोल में मोदी सरकार की जीत की अटकल लगते ही शेयर बाजार की बांछें खिल गईं. सोमवार को बाजार खुलते ही एक मिनट के भीतर बाजार के सांड ने दौड़ लगा दी.
  • गंभीर मुद्दे इन चुनावों से गायब क्यों रहे? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
    नमस्कार मैं रवीश कुमार, इंटरव्यू होता नहीं था कि लोग हंसना शुरू कर देते थे. ह्मूमर नहीं होता तो 2019 का चुनाव सीरियस नहीं होता. पत्रकारों की जगह अभिनेताओं ने ले ली और सवाल लतीफे बन गए. कई बार तो लगा कि नेता खुद ही कार्टून बन रहे हैं और कार्टूनिस्ट सिर्फ स्केच कर रहे हैं.
  • चुनाव आयोग पर क्यों उठ रहे हैं सवाल
    मामला बिगड़ता गया क्योंकि आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में पीएम मोदी पर जो सवाल उठे उसमें चुनाव आयोग क्लीन चिट देता गया. इस पर चुनाव आयोग के अंदर का मतभेद खुल कर सामने आ गया, जब चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को लिखी चिट्ठी में उनकी अलग राय को रिकॉर्ड नहीं करने की बात सामने आई. उसके बाद लाख सफाई भी काम ना आई.
  • एग्जिट पोल पर बना प्राइम टाइम क्यों ट्रेंड कर रहा है?
    रवीश कुमार
    मेरा शुरू से मानना रहा है कि संडे से बड़ी ख़बर कुछ नहीं होती. संडे घर पर रहने के लिए होता है. संडे को कुछ भी हो एंकरिंग करने नहीं जाना चाहिए. मैं ख़ुद को इतना महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहता कि बिग ब्रेकिंग न्यूज़ में कुर्सी छेंक कर बैठ जाएं. दस साल की एंकरिंग में मैंने ख़ुद से किया यह वादा निभा दिया.
  • मुझे एग्जिट पोल अविश्‍वसनीय लगते हैं, 23 मई का इंतजार करूंगा
    आशुतोष
    जब तक 23 मई को नतीजे नहीं आ जाते, मैं उन आंकड़ों पर भरोसा नहीं करने वाला, जो एग्ज़िट पोल ने हमें दिए हैं. ऐसा नहीं है कि मैं षड्यंत्र वाली थ्योरी में यकीन करता हूं कि चुनाव में धांधली हुई है, या EVM के साथ छेड़छाड़ की गई है. मैं इन पर यकीन नहीं करता, क्योंकि वास्तविकता, जो मुझे दिख रही है, इससे बिल्कुल अलग है. मैं गलत हो सकता हूं, या मैं यह देखने से चूक गया हो सकता हूं कि कब भारत इतना बदल गया, लेकिन मुझे यकीन करने के लिए वास्तविक आंकड़े चाहिए.
  • एग्ज़िट पोल्स को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं...
    रवीश कुमार
    एग्ज़िट पोल पर अब ऐसी कोई बात नहीं है जो कही जा सकती है. टीवी में मुश्किल यही है कि जब सारी बात कह जा चुकी हो तो फिर से उसे कैसे कहें. दरअसल यही टीवी है. एग्जिट पोल के बाद सारे चैनलों को 22 तारीख की आधी रात तक वैसे ही ग़ायब हो जाना चाहिए जैसे एग्ज़िट पोल शुरू होते ही नमो टीवी अपने आप ग़ायब हो गया है.
  • आख़िर कांग्रेस ख़त्म क्यों नहीं होती?
    प्रियदर्शन
    योगेंद्र यादव के ट्वीट को लेकर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस को ख़त्म हो जाना चाहिए. अगर वो भारत के विचार की रक्षा के लिए बीजेपी को इन चुनावों में रोक पाने में नाकाम रही तो इस पार्टी के लिए भारतीय इतिहास में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है. आज किसी विकल्प के निर्माण में ये सबसे बड़ी बाधा की प्रतिनिधि है.'
  • एग्जिट पोल के आंकड़ों पर रवीश कुमार का विश्‍लेषण
    रवीश कुमार
    शुक्रिया एग्ज़िट पोल का. एग्ज़िट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि मोदी लहर धुंआधार है. हर सर्वे में बीजेपी प्लस की सरकार आराम से बन रही है. यह पूरी तरह आप पर है कि आप एग्ज़िट पोल पर भरोसा करते हैं या नहीं करते हैं. दोनों ही स्थितियों में एग्ज़िट पोल वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. यह ज़रूर है कि 23 तारीख तक आप टीवी पर कुछ नहीं देख पाएंगे
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