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विचार
  • सीएजी रिपोर्ट : रेलवे में ठेके पर काम कर रहे मज़दूरों को लूट रहे हैं ठेकेदार
    रवीश कुमार
    मीडिया में गढ़ी गई छवि के बरक्स अगर आप ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों पर आई सीएजी की रिपोर्ट को देखेंगे कि तो पता चलेगा कि रेलवे बग़ैर किसी मंत्री के चल रहा है. राम भरोसे कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि राम भरोसे तो सारा देश चलता है.
  • शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?
    रवीश कुमार
    सरकारी स्कूलों और कालेजों में शिक्षा की हालत ऐसी है कि जरा सा सुधार होने पर भी हम उसे बदलाव के रूप में देखने लगते हैं. सरकारी स्कूलों में लाखों की संख्या में शिक्षक नहीं हैं. जो हैं उनमें से भी बहुत पढ़ाने के योग्य नहीं हैं या प्रशिक्षित नहीं हैं.
  • क्या लोकसभा चुनाव में डिजिटल प्रचार से मिलेगी जीत?
    अखिलेश शर्मा
    वैसे तो कहा जा रहा है कि 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी होने जा रहा है. इन दोनों शख्सियतों की एक लड़ाई डिजिटल दुनिया में चल रही है जिसने बीजेपी और कांग्रेस दोनों के नेताओं और सांसदों की नींद उड़ा दी है. दरअसल, पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर जनता से नमो ऐप के जरिए बीजेपी सांसदों के कामकाज के बारे में राय मांगी है. खबर है कि बीजेपी बड़ी संख्या में मौजूदा सांसदों के टिकट काटेगी. ऐसे में माना जा रहा है कि मौजूदा सांसदों को दोबारा टिकट मिलेगा या नहीं, इसमें इस फीडबैक की एक बड़ी भूमिका होगी.
  • क्या IIT-JEE सचमुच दुनिया की सबसे कठिन परीक्षा है?
    अनुराग मेहरा
    वास्तव में बड़ा सवाल यह है कि क्यों IIT प्रवेश परीक्षा या JEE के लिए अब तक बहुविकल्पी प्रश्नों वाले फॉरमैट का इस्तेमाल करते हैं. यह फॉरमैट मशीन द्वारा ग्रेडिंग को संभव बनाने के लिए अपनाया गया था, और फिर लगातार बढ़ती आवेदकों की संख्या की वजह से ज़रूरत बन गया. उन पेपरों का मूल्यांकन, जिनमें हर 'लम्बे' जवाब को पढ़ा जाना होता था, असंभव होता जा रहा था, क्योंकि IIT के पास मानवीय रूप से पेपर जांचे जाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे. इस समस्या का एक संभव हल यह था कि इस काम को आउटसोर्स कर दिया जाए, लेकिन IIT अपनी परीक्षा की निष्पक्षता की जी-जान से हिफाज़त करती रही हैं, और कभी किसी बाहरी एजेंसी को शामिल नहीं किया. यह भी हो सकता है कि लगभग 12 साल पहले जिस वक्त MCQ फॉरमैट को अपनाया गया था, उस वक्त किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह इतनी गंभीर समस्याएं पैदा कर देगा.
  • बहुत आसानी से मोदी सरकार को वॉकओवर दे रहा है विपक्ष
    यशवंत सिन्हा
    अतीत में भी राष्ट्रपति इन्हीं हालात में एक ही साल मे दो-दो संयुक्त सत्रों को संबोधित कर चुके हैं. लेकिन विश्लेषक इस बात से हैरान है कि लेखानुदान पारित करने के लिए सामान्य से काम के लिए दो सप्ताह का सत्र क्यों आहूत किया गया है, जबकि उसे दोनों ही सदनों में दो-दो दिन में निपटाया जा सकता था.
  • जेएनयू मामले में आम चुनाव से तीन महीने पहले ही चार्जशीट क्‍यों?
    रवीश कुमार
    जवाहर लाल यूनिवर्सिटी का मसला फिर से लौट आया है. 9 फरवरी 2016 को कथित रूप से देशदोह की घटना पर जांच एजेंसियों की इससे अधिक गंभीरता क्या हो सकती है कि तीन साल में उन्होंने चार्जशीट फाइल कर दी. वरना लगा था कि हफ्तों तक इस मुद्दे के ज़रिए चैनलों को राशन पानी उपलब्ध कराने के बाद इससे गोदी मीडिया की दिलचस्पी चली गई है. उस दौरान टीवी ने क्या क्या गुल खिलाए थे, अब आपको याद भी नहीं होंगे.
  • लोकसभा चुनाव 2019 : नरेंद्र मोदी बनाम महागठबंधन
    मनोरंजन भारती
    उत्तरप्रदेश की राजनीति में सपा और बसपा ने साथ आकर कुछ ऐसा किया है जो करीब 25 साल पहले भी हुआ था, मगर इस बार इनका साथ आना काफी मायने रखता है. यह गठबंधन भारतीय राजनीति की तस्वीर बदलने वाला है. मायावती और अखिलेश दोनों ने अपने अहं को दरकिनार करते हुए साथ आने का फैसला लिया.
  • अब केवल रोम नहीं, पूरा यूरोप जल रहा है...
    डॉ विजय अग्रवाल
    आज इसी महाद्वीप का सीना सुलग रहा है. इसके एक तिहाई से ज़्यादा देश अनेक तरह के आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों, परस्पर संघर्षों तथा अन्य संकटों से जूझ रहे हैं. यदि इन सभी देशों के आंदोलनों का एक कोलाज बना दिया जाए, तो उसमें उन देशों की संघर्ष गाथा सुनाई दे जाएगी, जिन पर इन्होंने निर्मम शासन किया था, और जिनके स्वायत्तता संबंधी विरोधों को ये राष्ट्रद्रोह कहकर सूलियों पर चढ़ा दिया करते थे.
  • सूरत की गठरियों में लागा चोर, मुसाफिर जाग ज़रा, 200 करोड़ की चोरी के विरोध में कपड़ा मार्केट बंद
    रवीश कुमार
    सूरत के राधा कृष्ण कपड़ा बाज़ार में चोरी को लेकर हंगामा मचा हुआ है. राधा कृष्ण कपड़ा मार्केट भारत का सबसे बड़ा कपड़ा बाज़ार माना जाता है. यहां पर कपड़े की पांच-छह हज़ार दुकानें हैं. जब से यहां पिछले कई रविवार को डुप्लीकेट चाबी की मदद से माल चोरी की घटना सामने आई है, व्यापारियों के होश उड़े हुए हैं. सब अपने माल का स्टॉक चेक कर रहे हैं और सीसीटीवी की रिकार्डिंग देख रहे हैं. सारी दुकानों में सीसीटीवी कैमरे नहीं हैं और जिनके यहां हैं, बहुतों के पास नाइट विज़न नहीं हैं.
  • आलोक वर्मा के घर किसकी सिफ़ारिश करने गए थे केंद्रीय सतर्कता आयुक्त चौधरी?
    रवीश कुमार
    हिन्दी अख़बारों के संपादकों ने अपने पाठकों की हत्या का प्लान बना लिया है. अख़बार कूड़े के ढेर में बदलते जा रहे हैं. हिन्दी के अख़बार अब ज़्यादातर प्रोपेगैंडा का ही सामान ढोते नज़र आते हैं. पिछले साढ़े चार साल में हिन्दी अख़बारों या चैनलों से कोई बड़ी ख़बर सामने नहीं आई. साहित्य की किताबों से चुराई गई बिडंबनाओं की भाषा और रूपकों के सहारे हिन्दी के पत्रकार पाठकों की निगाह से बच कर निकल जाते हैं. ख़बर नहीं है. केवल भाषा का खेल है.
  • क्या आपका बैंक भी आपको 'चूना' लगा रहा है?
    प्रभात उपाध्याय
    कुछ दिनों पहले ही खबर आई कि सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंकों और निजी क्षेत्र के तीन प्रमुख बैकों ने वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान खाते में सिर्फ न्यूनतम राशि न रख पाने की वजह से ग्राहकों से 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा वसूल लिये. आप जानकर चौंक जाएंगे कि इसमें से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने अकेले 2,433.87 करोड़ रुपये वसूले.
  • आलोक वर्मा निपट गए फिर शाह को ग़ुलामी का डर क्यों सता रहा है?
    रवीश कुमार
    रिटायर जस्टिस ए के पटनायक का बयान आया है कि उन्हें वर्मा के ख़िलाफ़ केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के कोई प्रमाण नहीं मिले थे. सुप्रीम कोर्ट ने ही जस्टिस पटनायक से कहा था कि वे सीवीसी की रिपोर्ट की जांच करें. पटनायक ने चौदह दिनों के भीतर जांच कर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम  कोर्ट को सौंप दी थी.
  • असम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय में क्यों हो रहा है नागरिकता संशोधन बिल का विरोध
    रवीश कुमार
    मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन बिल को लोक सभा में पास करा लिया है. इसके प्रावधान के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में सताए गए वैसे हिन्दू, सिख, बौद्ध, पारसी और ईसाई को भारत में छह साल रहने के बाद नागरिकता दी जा सकती है जो 31 दिसंबर 2014 के पहले भारत आ गए थे.
  • आईपीएस आलोक वर्मा : विवादों से घिरा नाम
    मुकेश सिंह सेंगर
    आलोक वर्मा को डीजी तिहाड़ बनने के पहले बहुत कम ही लोग जानते थे. उनका किसी विवाद में कोई नाम नहीं आया था. लेकिन 5 अगस्त 2014 को जब वे डीजी तिहाड़ बने तो विवादों ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया. यहां पुलिस मुख्यालय में बैठे कुछ आईपीएस उनके लिए एक स्क्रिप्ट लिख रहे थे.
  • दिल्ली की जंग, शीला की जुबानी
    मनोरंजन भारती
    कांग्रेस ने शीला दीक्षित को एक बार फिर दिल्ली की कमान सौंप दी है. वैसे इस खबर की चर्चा कई दिनों से थी मगर जैसे ही यह खबर आई तो लोगों ने कई तरह के सवाल पूछने शुरू कर दिए कि इतनी उम्र में यह जिम्मेदारी क्यों? वैसे यह लाजिमी भी था क्योंकि शीला दीक्षित 80 को पार कर गई हैं और एक तरह से सक्रिय राजनीति से दूर हो गई थीं. मगर कांग्रेस के पास लगता है कोई चारा नहीं था.
  • CBI प्रमुख को हटाया जाना SC की भावना के ख़िलाफ़ नहीं?
    रवीश कुमार
    आलोक वर्मा ने ही पिछले साल अपने नंबर टू स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के खिलाफ एफआईआर के आदेश दिए थे. उन पर 3 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप था. अस्थाना ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका लगाई है कि एफआईआर रद्द की जाए. इस याचिका पर अभी निर्णय नहीं आया है.
  • रेलवे की ऑनलाइन परीक्षा के लिए 36-36 घंटे की ऑफलाइन रेलयात्रा, वाह, गोयल जी, वाह!
    रवीश कुमार
    भारत दुनिया का अनोखा देश हैं, जहां रेलवे की ऑनलाइन परीक्षा देने के लिए किसी को 26 घंटे की रेलयात्रा करनी पड़ती है. इस महीने 21, 22 और 23 जनवरी को सहायक लोको पायलट और टेक्नीशियन के 64,317 पदों के लिए दूसरे चरण की परीक्षा होनी है. 10 दिन पहले छात्रों के सेंटरों की लिस्ट जारी की गई है. छात्रों के सेंटर 1,500 से 2,000 किलोमीटर दूर दिए गए हैं.
  • चुनाव में जाने से पहले नरेंद्र मोदी सरकार उठा सकती है ये '5 कदम'
    सुरेश कुमार
    लोकसभा और राज्‍यसभा में राफेल पर घमासान मचा हुआ था. राहुल गांधी समेत पूरा विपक्ष सरकार को रोज़-रोज़ राफेल पर बयान देने को मजबूर किए जा रहा था. ऐसे में सदन के पटल पर सरकार के संकटमोचक अरुण जेटली इस सरकार में लगभग वही रोल अदा कर रहे हैं, जो कभी UPA में प्रणब मुखर्जी किया करते थे. जेटली ने शानदार तरीके से राफेल पर सरकार का पक्ष रखा और राहुल गांधी को इस मसले पर ABCD से शुरू कर सीखने की सलाह दी.
  • पारदर्शी और ईमानदार परीक्षा व्यवस्था कब आएगी?
    रवीश कुमार
    सभी प्रकार की सरकारों से आज तक ये न हुआ कि एक पारदर्शी और ईमानदार परीक्षा व्यवस्था दे सकें जिस पर सबका भरोसा हो. बुनियादी समस्या का समाधान छोड़ कर हर समय एक बड़े और आसान मुद्दे की तलाश ने लाखों की संख्या में नौजवानों को तोड़ दिया है.
  • संसद के गलियारे से : सवर्ण आरक्षण और आगे...
    मनोरंजन भारती
    संसदों में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि आखिर वे अगड़ों को 10 फीसदी का आरक्षण देने की बात पर सत्र के आखिरी दिन चर्चा क्यों कर रहे हैं. जाहिर है कोई भी इस बिल का विरोध नहीं कर सकता इसलिए सबको मिलकर इस बिल को पारित कराना ही होगा. मगर सबके मन में एक ही सवाल है कि अब क्या...लोकसभा का चुनाव सिर पर है और क्या ऐसे और भी मामले आने वाले हैं जिनके लिए उनको तैयार रहना चाहिए?
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