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विचार
  • महाराष्ट्र एटीएस को मीडिया से क्यों डर लगता है?
    सुनील कुमार सिंह
    शुक्रवार 10 अगस्त को मुंबई में जो हुआ वो मुंबई में बहुत कम होता है. अपनी व्यवसायिक प्रतिद्वंदिता के चलते पत्रकारों में एक राय कम ही बन पाती है जिसका फायदा नेता और पुलिस अक्सर उठाते हैं. लेकिन महाराष्ट्र एटीएस के बेरुखी भरे रवैये ने शुक्रवार को एटीएस प्रमुख अतुल चंद्र कुलकर्णी की प्रेस ब्रीफिंग का बहिष्कार करने को मजबूर कर दिया.
  • न्याय के लिए भटकते लोगों की दास्तां...
    रवीश कुमार
    सारी बड़ी बातों और बड़ी ख़बरों के बीच कभी ख़ुद को रख कर देखिएगा कि सिस्टम के जब चक्कर लगते हैं तब आपका क्या अनुभव रहता है. सैकड़ों की संख्या में लोग हमारे पास अपनी ऐसी कहानियां भेजते रहते हैं. पढ़ कर या सुनकर बहुत दुख भी होता है. काश सारा मीडिया इन्हीं की बातों को सरकार तक ले जाता तो सबको मना करने का अफसोस मुझ पर भारी न पड़ता.
  • कहीं भारत न पहुंच जाए तुर्क हवा...
    डॉ विजय अग्रवाल
    पिछले महिने एशिया और यूरोप महाद्वीपों के बिल्कुल बीच में बसे हुए आठ करोड़ की आबादी वाले तुर्की नामक इस्लामिक देश में एक छोटी-सी ऐसी राजनीतिक घटना घटी है, जिसकी ओर फिलहाल दुनिया का ध्यान उतना नहीं गया, जितना जाना चाहिए था, जबकि यह घटना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है.
  • फीस बढ़ोतरी में मेडिकल कॉलेजों की मनमानी
    रवीश कुमार
    इंदौर में एक मेडिकल कॉलेज है. इंडेक्स मेडिकल कॉलेज. 10 जून 2018 को स्मृति लहरपुरे ने आत्महत्या कर ली. 8 अगस्त को उसी मेडिकल कॉलेज की एक और छात्रा शिवानी उइके ने आत्महत्या कर ली. दोनों के कारण एक से है. फीस. मनमानी फीस.
  • हरिवंश जी राजनीति में आपका इस तरह बढ़ना हम पत्रकारों को अच्छा नहीं लगता..
    मनीष कुमार
    इस शीर्षक को देखकर आप सब लोग चकित हो रहे होंगे, लेकिन मुझे ये स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि पहले हरिवंश जी का राजनीति में जाना, राज्यसभा सदस्य बनना और राज्यसभा का उप सभापति वह भी पहले टर्म में ही बन जाना, मुझे बहुत ख़ुशी नहीं हो रही.
  • आ गया आ गया, हिन्दी में राफेल लड़ाकू विमान से जुड़े सवाल-जवाब
    रवीश कुमार
    सबसे पहले दो तीन तारीखों को लेकर स्पष्ट हो जाइये. 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद रफाल डील का एलान करते हैं. इसके 16 दिन पहले यानी 25 मार्च 2015 को राफेल विमान बनाने वाली कंपनी डास्सो एविएशन के सीईओ मीडिया से बात करते हुए हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड के चेयरमैन का ज़िक्र करते हैं.
  • क्या नियमों को तोड़कर राफेल डील में बदलाव?
    रवीश कुमार
    क्या राफेल लड़ाकू विमान की खरीद में घोटाला हुआ है, इस बारे में आज यशवंत सिन्हा, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी ने प्रेस कांफ्रेंस की. इनकी मांग है कि सरकार सभी सवालों के जवाब दे, विपक्ष इन सवालों को ठीक से उठाए और मीडिया उन तथ्यों को उजागर करने का प्रयास करे, जिन्हें सरकार छिपाना चाहती है. प्रशांत भूषण ने प्रेस रिलीज में लिखा है कि सरकार दोस्ताना मीडिया के ज़रिए भ्रम फैला रही है. आइये पहले जल्दी से इसकी कहानी कैसे शुरू होती है उस पर नज़र डालते हैं. राफेल लड़ाकू विमान फ्रांस की कंपनी डास्सों एविएशन बनाती है. 2007 से भारत इसे ख़रीदने का सपना देख रहा है. उस साल भारतीय वायुसेना ने सरकार को अपनी ज़रूरत बताई थी और यूपीए सरकार ने रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कंबैट एयरक्राफ्ट खरीदेगा. इसमें साफ साफ कहा गया था कि जो भी टेंडर जारी होगा उसमें यह बात शामिल होगी कि शुरुआती ख़रीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नॉलजी देगी और भारत में उत्पादन के लाइसेंस देगी.
  • हरि बनाम हरि में हारे को हरिनाम
    अखिलेश शर्मा
    कांग्रेस उन पार्टियों का समर्थन हासिल नहीं कर सकी जो उससे और बीजेपी से समान दूरी रखना चाहते हैं. पहले कोशिश थी कि एनसीपी की वंदना चव्हाण को मुकाबले में उतारा जाए. लेकिन जब शरद पवार को बीजू जनता दल के नेता और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के समर्थन का भरोसा नहीं मिला तो उन्होंने चव्हाण के नाम पर ना कर दी.
  • सिस्टम की क्रूरता से इंसान का मतलब नहीं रहा...
    रवीश कुमार
    हमारी राजनीतिक चर्चा थ्योरी और थीम के आसपास घूमती रहती है. शायद इनके विश्लेषण में विद्वान होने का मौक़ा मिलता होगा. राजनीति चलती भी है थीम और थ्योरी से. इस छतरी के नीचे हमारा सिस्टम कैसी-कैसी क्रूरताओं से भरा है.
  • अब किसान के उत्पाद की कीमत घटाने की कवायद...?
    सुधीर जैन
    रिज़र्व बैंक ने कर्ज़ को महंगा करने का फैसला किया. खास बात यह कि यह काम दो महीने में दूसरी बार किया गया. इसका मुख्य कारण यह समझाया गया है कि महंगाई बढ़ रही है. लिहाज़ा महंगाई को काबू में रखने के लिए बाज़ार में पैसे की मात्रा कम करने की ज़रूरत है.
  • खबर का असर: NDTV के स्टिंग को सबूत की तरह पेश करेगी पुलिस
    रवीश कुमार
    NDTV 24x7, NDTV India पर हापुड़ के क़ासिम और अलवर के पहलू ख़ान की हत्या के मुख्य आरोपियों को अगर सौरव शुक्ला और अश्विनी मेहरा अपने कैमरे पर न पकड़ते तो इंसाफ मुमकिन नहीं था. अब भी पता नहीं कि इन आरोपियों पर दोष साबित करने के लिए पुलिस किस तरह से तथ्य जुटाएगी, कैसे चीज़ों को अदालत के सामने रखेगी, मगर इतनी बड़ी घटना जिस पर सबकी नज़र हो, उसमें भी आरोपी इतने आराम से पुलिस और समाज के सामने बेफिक्र हैं, इससे चिन्ता होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने मामले का संज्ञान ले लिया है.
  • राज्यसभा उपसभापति पद के लिए उम्मीदवारी पर विपक्षी एकता की निकली हवा
    अखिलेश शर्मा
    राज्यसभा में विपक्षी एकता तारतार हो गई. उप सभापति पद के लिए संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा करने की रणनीति औंधे मुंह गिर गई. एक दिन पहले ही लोक लेखा समिति में दिखी विपक्षी एकता चौबीस घंटे भी नहीं टिकी और एनडीए के उम्मीदवार हरिबंश को चित करने के मंसूबे धराशाई हो गए.
  • तमिलनाडु की राजनीति के एक युग का अंत
    रवीश कुमार
    तमिलनाडु की राजनीति का आज दूसरा युग समाप्त हो गया. डीएमके नेता एम करुणानिधि का देहांत हो गया. 94 साल के करुणानिधि 28 जुलाई से अस्पताल में भर्ती थे. तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि का लंबा दौर चला है. 5 दिसंबर 2016 को जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति अनिश्चतता से गुज़र रही थी. 5 बार मुख्यमंत्री रहे एम करुणानिधि के निधन ने राज्य की राजनीति का मैदान खुला छोड़ दिया है. जयललिता और करुणानिधि की राजनीति सिर्फ प्रतिस्पर्धा की राजनीति नहीं थी, दोनों ने विचारधारा के स्तर पर कई रेखाएं खीचीं हैं. आज स्क्रीन पर आप भले ही करुणानिधि के उदास और टूटे हुए समर्थकों को देख रहे हैं मगर इस शख्स ने तमिलनाडु का ग़ज़ब का इतिहास लिखा है. आप जानते है कि डीएमके की स्थापना अन्ना दुरई ने की थी. इस पार्टी में नौजवान नेता के रूप में एम करुणानिधि आए थे. इससे पहले वे पत्रकारिता में थे.
  • रवीश कुमार के पास कोई सचिवालय नहीं है, काश होता कोई...
    रवीश कुमार
    दोस्तों, मेरे पास कोई सचिवालय नहीं है. आए दिन लोगों के इतने मैसेज आते हैं कि सबको पढ़ना भी बस की बात नहीं रही. पढ़कर वादा करना भी मुश्किल है. तादाद इतनी है कि 90 फीसदी तो यूं ही पढ़कर डिलीट कर देने पड़ते हैं. कोई 10-20 नहीं, हर दिन 500 से 1,000 तक मुझे मैसेज आते हैं.
  • नीतीश कुमार आखिरकार देर से आए लेकिन दुरुस्त आए..
    मनीष कुमार
    इंसान कभी-कभी खामोश रहके अपने समर्थकों और विरोधियों दोनों को परेशान करता है. लेकिन जब वो इस मौन व्रत को खत्म करता है तब उसके वाक्य और प्रतिक्रिया की सबको बेताबी से इंतज़ार रहता है. मुजफ्फरपुर प्रकरण पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हालत कुछ वैसे ही खामोश इंसान की थी.
  • अब पिछड़ों पर बीजेपी का बड़ा दांव
    अखिलेश शर्मा
    पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के संविधान संशोधन बिल को संसद ने मंजूरी दे दी है. महत्वपूर्ण बात है कि इस बिल के विरोध में एक भी वोट नहीं डाला गया. यानी सारी पार्टियां पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के पक्ष में एक राय रहीं. अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद पांच सदस्यीय आयोग को संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा.
  • Exclusive: अलवर, हापुड़ की भीड़ की हिंसा पर NDTV की पड़ताल
    रवीश कुमार
    17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से एक खाका पेश किया कि भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए पहले और बाद में पुलिस क्या क्या करेगी. वैसे तो पुलिस के पास पहले से भी पर्याप्त कानूनी अधिकार हैं लेकिन क्या ऐसा हो रहा है. हमारे सहयोगी सौरव शुक्ला और अश्विनी मेहरा ने भीड़ की हिंसा के कुछ आरोपियों से बात की है. पुलिस की किताब में उनकी भूमिका कुछ और है मगर वे खुफिया कैमरे पर अपनी भूमिका कुछ और बताते हैं.
  • लाखों नौकरियां चुरा रही हैं सरकारें, नौजवान खा रहे हैं झांसा
    रवीश कुमार
    क्या केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने वह कह दिया, जो सब जानते हैं. उनका बयान आया कि आरक्षण लेकर क्या करोगे, सरकार के पास नौकरी तो है नहीं. बाद में नितिन गडकरी की सफाई आ गई कि सरकार आरक्षण का आधार जाति की जगह आर्थिक नहीं करने जा रही है, मगर इसी बयान का दूसरा हिस्सा भी था कि सरकार के पास नौकरी है नहीं.
  • बच्चों का अपराधी है हमारा समाज...
    राकेश कुमार मालवीय
    बच्चे हैं. यूं भी हाशिये पर हैं. लेकिन जो शेल्टर होम के बच्चे हैं, वे तो भयावह पीड़ा को पहले ही भोग चुके होते हैं. एक जो बच्‍चा शेल्‍टर होम में दाखि‍ल होता है, उसकी सैकड़ों दारुण कहानियां बन चुकी होती हैं.
  • व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का मुल्क, साहस भी कोई चीज़ होती है
    रवीश कुमार
    सिनेमा हमेशा सिनेमा के टूल से नहीं बनता है. उसका टूल यानी फ़ॉर्मेट यानी औज़ार समय से भी तय होता है. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए बनी इस फ़िल्म को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के चश्मे से मत देखिए.
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