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विचार
  • गोडसे को हीरो बताने के पीछे राजनीति क्या है?
    रवीश कुमार
    इस बात को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. सोचा जाना चाहिए और पूछा जाना चाहिए कि वो कौन सी शक्तियां हैं, वो कौन से लोग हैं और वो लोग किस राजनीतिक खेमे के साथ नज़र आते हैं जो बार-बार गांधी के हत्यारे को अवतार बताने चले आते हैं. पहली बार नहीं हुआ है जब गोडसे को देशभक्त बताया गया है. भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने कहा है कि नाथूराम गोडसे देशभक्त है. आतंकवादी नहीं है.
  • लोकसभा चुनाव : तृणमूल और बीजेपी के बीच संघर्ष के पीछे की कहानी
    मनोरंजन भारती
    पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने प्रचार करने पर रात के 10 बजे के बाद से रोक लगा दी है..यह चुनाव आयोग का एक ऐसा फैसला है जिसको लेकर बहस छिड़ गई है..कई लोग कह रहे हैं कि यदि चुनाव आयोग को प्रचार बंद ही करना था तो 15 तारीख के 10 बजे से ही बंद कर देना चाहिए था. उसे 34 घंटे क्यों बढ़ाया गया. क्या इसलिए कि बंगाल में प्रधानमंत्री को दो रैली होनी थीं. चुनाव आयोग अपने इस फैसले को लेकर विवाद के घेरे में आ गया है और उस पर पक्षपात करने का आरोप लग रहा है.
  • गोरखपुर की चुनावी जंग में कड़ा मुकाबला
    मनोरंजन भारती
    गोरखपुर पूर्वांचल की सबसे हॉट सीट मानी जाती है. वजह है कि गोरखपुर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट है. मुख्यमंत्री बनने के पहले योगी इस सीट से पांच बार सांसद बने. पहली बार 1998 में जीते थे 21 हजार वोटों से फिर उनका जीत का अंतर बढ़ता चला गया. उससे पहले महंत अवैद्यनाथ 1991 से 1998 तक बीजेपी के टिकट पर जीते और 1989 से 1990 में हिंदू महासभा से जीते. मगर योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में प्रवीण निषाद साढ़े 21 हजार वोटों से जीते. निषाद सपा-बसपा के संयुक्त उम्मीदवार थे.
  • लोकसभा चुनाव 2019 : बिहार में मोदी के सहारे लड़ते दिख रहे हैं नीतीश कुमार
    आईपी बाजपेयी
    राष्ट्रीय राजमार्ग 31 के ज़रिये पटना में घुसने से ज़रा पहले शोरशराबा शुरू हो जाता है. एक किलोमीटर से भी ज़्यादा दूरी तक सड़क के एक किनारे पर ट्रक खड़े हुए हैं, और राजमार्ग का यह अहम हिस्सा पार्किंग लॉट में तब्दील हो गया है. इसी सड़क पर दूसरी लेन में ट्रक आ-आकर चलते ट्रैफिक में घुसते रहते हैं. ...और यह सब रोज़ाना होने के बावजूद यहां पुलिस का नाम-ओ-निशान भी दिखाई नहीं देता.
  • क्या हैं गठबंधन के पॉवरप्ले में सोनिया गांधी की वापसी के मायने...
    विपक्ष की राजनीति के इस दौर में नए साझीदार तलाशने के लिए उठाया गया यह पहला कदम है, और काफी अहम है, क्योंकि हाल ही में दक्षिण भारत की राजनीति के मज़बूत चेहरे और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) प्रमुख के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) प्रमुख एम.के. स्टालिन से मुलाकात की, ताकि यह चर्चा की जा सके कि एक हफ्ते में ही घोषित होने जा रहे चुनाव परिणाम के बाद कौन किसके साथ गठबंधन करेगा. बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मुखिया मायावती जैसे अन्य विपक्षी नेताओं ने तो देश के प्रशासन के शीर्ष पद पर विराजने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को ज़ाहिर करने में कतई संकोच भी नहीं किया है.
  • लोकसभा चुनाव 2019 : एग्ज़िट पोल पर चुनाव आयोग का विरोधाभासी रवैया
    विराग गुप्ता
    पार्टियों के बड़े खर्चे, नेताओं की बद्जुबानी, पेड न्यूज़ और आचार संहिता के संगठित उल्लंघन को रोकने में विफल चुनाव आयोग द्वारा, राजनीतिक विश्लेषण को रोकने का अतिरेकी प्रयास, आयोग की प्रभुसत्ता को और भी अप्रासंगिक बना देगा.
  • बिहार के नियोजित शिक्षकों के नाम रवीश कुमार का पत्र
    रवीश कुमार
    अब मैं जो उन्हें कहना चाहता हूं, उन्हें ध्यान से सुनना चाहिए. उन्हें देखना चाहिए कि इस मुद्दे को लेकर नैतिक बल और आत्म बल है या नहीं. गांधी को पढ़ना चाहिए. अगर उन्हें लगता है कि उनका मुद्दा सही है. नैतिकता के पैमाने पर सही है तो उन्हें सत्याग्रह का रास्ता चुनना चाहिए. बार-बार बताने की ज़रूरत नहीं है कि वे साढ़े तीन लाख से अधिक हैं. अगर हैं तो इनमें से एक-एक को गांधी मैदान में जमा हो जाना चाहिए और सत्याग्रह करना चाहिए. सत्याग्रह क्या है, इसके बारे में अध्ययन करना चाहिए. पांच हज़ार की रैली को नेता दिन भर ट्विट करते रहते हैं कि जन-सैलाब उमड़ गया है. सोचिए, अगर आपने लाखों की संख्या में जमा होकर सत्याग्रह कर दिया तो क्या होगा. यह फ़ैसला तभी करें जब सभी साढ़े तीन लाख शिक्षक सत्याग्रह के लिए तैयार हों. सत्याग्रह के लिए तभी तैयार हों जब उन्हें लगे कि उनके साथ अन्याय हुआ है. यह ध्यान में रखें कि उनकी बात को सुप्रीम कोर्ट ने सुना है. कमेटी बनवाई है. राज्य सरकार की कमेटी को भी शिक्षकों के साथ बात करनी पड़ी है. तो उनके पक्ष के बारे में भी सोचें और फिर भी लगता है कि यह ग़लत हुआ है तो मुझे मेसेज न करें. किसी मीडिया को मेसेज न करें. बल्कि मैंने तो कहा है कि आप टीवी देखना बंद कीजिए. अख़बार पढ़ना बंद कीजिए. आपने अपने केस में देख लिया कि जब आप परेशान हुए तो इनके छापने और नहीं छापने से आपकी समस्या पर कोई फर्क नहीं पड़ा. इसलिए फर्क नहीं पड़ता है कि क्योंकि आपमें नैतिक बल और आत्मबल नहीं है.
  • बंगाल पर चुनाव आयोग का ऐतिहासिक फैसला
    रवीश कुमार
    भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार चुनाव आयोग ने आर्टिकल 324 के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल करते हुए पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार 20 घंटे पहले ही ख़त्म करने का फ़ैसला किया है... यानी गुरुवार रात दस बजे के बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार नहीं होगा जबकि इसे शुक्रवार शाम पांच बजे बंद होना था. ये ध्यान दिया जाना ज़रूरी है कि कल बंगाल में प्रधानमंत्री मोदी की दो रैलियां हैं. माथुरपुर लोकसभा क्षेत्र में शाम पौने पांच बजे और दमदम में शाम साढ़े छह बजे प्रधानमंत्री रैली करेंगे.
  • क्या आम आदमी पार्टी हाशिए पर आ गई है...
    मनोरंजन भारती
    दिल्ली में 12 मई को वोट डाले जा चुके हैं और उसके बाद मैं निकला दिल्ली की गलियों में, लोगों से पूछने कि अब उनको क्या लगता है कि दिल्ली में क्या होने वाला है? मैं अपने प्रोग्राम 'बाबा के ढाबा' के लिए पहुंचा दिल्ली के मशहूर चांदनी चौक पर. वहां के लोगों से बात करके एक बात साफ थी कि इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपना जलवा खोती जा रही है. इस बार मुद्दा आम आदमी पार्टी था ही नहीं. लोगों से जब मैं यह पूछता था कि विधानसभा चुनाव में आपने तो आम आदमी पार्टी को 67 विधानसभा सीटों पर जितवा दिया, तो लोग चुप हो जाते थे.
  • आरएसएस पर मायावती का पैंतरा
    अखिलेश शर्मा
    क्या इस लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस बीजेपी और नरेंद्र मोदी के साथ वैसे खुलकर साथ नहीं आ रहा है जैसे कि पिछले लोकसभा चुनाव में आया था? क्या आरएसएस के स्वयंसेवक मोदी सरकार के कामकाज से खुश नहीं हैं? क्या आरएसएस के समर्थन के बिना मोदी की नैया डूब रही है? कम से कम बीएसपी प्रमुख मायावती का तो यही दावा है.
  • भयावह जलसंकट की आहट
    सुधीर जैन
    सब कुछ छोड़ देश चुनाव में लगा रहा. भोजन पानी के इंतजाम से भी ध्यान हट गया. इस बीच पता चल रहा है कि देश में पानी को लेकर इमरजेंसी जैसे हालात बनते जा रहे हैं. सरकारी तौर पर अभी सिर्फ महाराष्ट्र और गुजरात के भयावह हालात की जानकारी है.
  • ऐसे हास्यास्पद दावे क्यों करते हैं मोदी?
    रवीश कुमार
    दुनिया में डिजिटल कैमरा कब आया, दुनिया में आने के बाद भारत कब आया, दुनिया में ईमेल कब लॉन्‍च हुआ और भारत में ईमेल कब लॉन्‍च हुआ. प्रधानमंत्री ने जब से एक इंटरव्यू में जवाब दिया है 2019 के चुनाव का आखिरी चरण क्विज़ शो में बदल गया है. जितने भी लोग इस सवाल को लेकर टेंशन में थे कि कौन जीतेगा, बीजेपी को कितनी सीटें आएंगी, यूपी में महागठबंधन का क्या होगा, वे सारे लोग डिजिटल कैमरा कब आया, यह पता लगाने में व्यस्त हैं.
  • नीतीश कुमार ने खुद ही लिख डाला अपनी कहानी का दुखद मोड़
    68 वर्षीय नीतीश कुमार को लगातार साझीदार बदलते रहने की वजह से भारतीय राजनीति में बेहद कमतर माना जाने लगा है. भले ही वो अब भी बिहार के मुख्‍यमंत्री हों लेकिन पिछले महीने के आखिर में पीएम मोदी के साथ एक ही मंच पर उनके बुझे हुए चेहरे ने उनकी दशा जाहिर कर दी.
  • 'न्यूज़ छपती है कि नहीं लोकतंत्र में सिर्फ यही एक चीज़ नहीं है' - मोदी
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री ने यह बात इंडियन एक्सप्रेस के रवीश तिवारी और राजमकल झा से कही है. यह इंटरव्यू 12 मई को छपा है. इस इंटरव्यू में प्रधानमंत्री इंडियन एक्सप्रेस को कई बार पत्रकारिता को लेकर लेक्चर देते हैं. एक्सप्रेस के पत्रकार काउंटर सवाल नहीं करते हैं. ऐसा लगता है कि उन्होंने सुनाने के लिए एक्सप्रेस को बुलाया है. वे यह नहीं बताते हैं कि एक्सप्रेस की कौन सी ख़बर ग़लत थी मगर यह बताना नहीं भूलते हैं कि कौन सी ख़बर उसने नहीं की. किसी प्रधानमंत्री का यह कहना है कि न्यूज़ का छपना ही लोकतंत्र में एक मात्र काम नहीं है, डरावना है. आपको डरना चाहिए कि फिर जनता कितने अंधेरे में होगी.
  • समय के साथ-साथ कितने बदले हैं राहुल गांधी?
    2014 से लेकर 2019 के बीच राहुल गांधी के अंदर बहुत बदलाव आया है. इस चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने कई इंटरव्यू दिए है. शुक्रवार को राहुल गांधी ने एनडीटीवी के रवीश कुमार को इंटरव्यू दिया. मध्य प्रदेश के सुजालपुर में यह इंटरव्यू हुआ. इंटरव्यू के लिए मैं भी रवीश कुमार के साथ ट्रेवल कर रहा था. हम सबके मन में एक सवाल यह भी था क्या राहुल गांधी लाइव इंटरव्यू देंगे? समय के मुताबिक राहुल गांधी सुजालपुर पहुंचते है फिर कार्यक्रम शुरू होता है. स्टेज पर कमल नाथ समेत कई बड़े नेता मौजूद थे. मेरी नजर राहुल गांधी पर थी, यह पहला मौका था जब मैं राहुल गांधी को करीब से देख रहा था. राहुल के हावभाव पर मेरी नजर थी. मैं राहुल गांधी का आत्मविश्वास को मापने में लगा हुआ था.
  • तेज बहादुर : क्या अब सुप्रीम कोर्ट से भी सवाल पूछे जाएंगे?
    अमित
    कई बार विरोधियों की आलोचना में इतने आगे बढ़ जाते हैं कि सत्य बहुत पीछे छूट जाता है और बस झूठ पर आधारित नैरेटिव आगे बढ़ता जाता है. ऐसी आलोचना में तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया जाता. हम तनिक रुककर यह नहीं सोचना चाहते कि विरोधी की आलोचना में उस तीसरे पक्ष का क्या होगा, जो बेवजह इन सबमें अपनी विश्वसनीयता खो रहा है, पिस रहा है.
  • फ़र्ज़ी कंपनियों का बहीखाता लेकर जीडीपी बढ़ाने का खेल पकड़ा गया
    रवीश कुमार
    जीडीपी का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बताने के लिए फ़र्ज़ी कंपनियों का इस्तमाल किया गया है. नेशनल सैंपल सर्वे (NSSO) ने एक साल लगाकर एक सर्वे किया मगर उसकी रिपोर्ट दबा दी गई. पहली बार सर्विस सेक्टर की कंपनियों का सर्वे हो रहा था. इसके लिए NSSO ने कारपोरेट मंत्रालय से सर्विस सेक्टर की कंपनियों का डेटा लिया. जब उन कंपनियों का पता लगाने गए तो मालूम ही नहीं चल पाया.
  • झूठ के दौर में दुनिया को आईना दिखाती है सुनयना की आवाज
    ऐसे दौर में जब टीवी स्क्रीन पर न्यूज चैनल से दिनरात आती ‘तू,तू—मैं,मैं’ की डरावनी आवाजों से लोग आजिज आ चुके हों, सातवी कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची सुनयना के मार्फत कही गई कहानी नजीर बनकर आती है. यदि आप इस कहानी में को यूं न भी मानें कि इसे बतौर एंकर एनडीटीवी के प्रमुख प्रणय रॉय अंजाम दे रहे हैं तो ही इसका महत्व कम नहीं हो जाता! आप केवल यह देखिए कि वह किस धैर्य से बातें करके जीवन के तमाम सवालों को सामने ला रहे हैं, इसलिए आलोचना के खतरे को समझते हुए भी मैं कह रहा हूं कि यह हालिया समय की सबसे बेहतरीन टीवी रिपोर्ट है.
  • त्रिशंकु लोकसभा की आशंका को लेकर जुगाड़ में जुटे विपक्षी दल
    अखिलेश शर्मा
    अभी लोकसभा चुनाव के दो चरण होने बाकी हैं. 23 मई को क्या होगा, यह कोई नहीं जानता, लेकिन कई विपक्षी पार्टियों ने सरकार बनाने के लिए अभी से जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया है, पर इन्हें एक डर है. वह यह कि त्रिशंकु लोकसभा के हालात में बीजेपी अगर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तो कहीं राष्ट्रपति उसे सरकार बनाने के लिए न बुला लें. ऐसा 1996 में हो चुका है जब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी को सरकार बनाने के लिए बुलाया था.
  • जन्मदिन पर विशेष : राष्ट्रगान लिखने वाला कविगुरु राष्ट्रवाद के विरुद्ध था
    प्रियदर्शन
    जब हर तरफ़ राष्ट्रवाद का शोर है, राष्ट्रगान गाने पर ज़ोर है, तब रवींद्रनाथ टैगोर को याद करने का एक ख़ास मतलब है. टैगोर संभवतः दुनिया के अकेले कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो-दो देशों ने अपने राष्ट्रगान की तरह अपनाया. भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी उनकी ही रचना है. यही नहीं, श्रीलंका का राष्ट्रगान भी जिस आनंद समरकून ने लिखा, वे टैगोर के शिष्य थे- उन्होंने विश्व भारती से पढ़ाई की थी. कई लोगों का मानना है कि जिस गीत को श्रीलंका का राष्ट्रगान बनाया गया है, उसका संगीत टैगोर ने ही तैयार किया था.
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