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विचार
  • ये कौन से गरीब हैं, जिन्हें आरक्षण मिलेगा...?
    प्रियदर्शन
    आरक्षण को लेकर BJP और कांग्रेस जैसी मूलतः अगड़े वर्चस्व वाली पार्टियां हमेशा दुविधा में रहीं. लेफ्ट फ्रंट को भी जातिगत आधार पर आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करने में वक्त लगा. संघ परिवार खुलेआम आरक्षण का विरोध करता रहा. 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का ऐलान किया, तो देशभर में जो मंडल-विरोधी आंदोलन चल पड़ा, उसे इन राजनीतिक दलों की शह भी हासिल थी. मंडल की काट के लिए BJP ने कमंडल का दांव भी खेला.
  • रवीश कुमार का BLOG: पकौड़े के पीछे नौकरी के सवाल से भागती मोदी सरकार
    रवीश कुमार
    अगस्त 2018 से जनवरी 2019 आ गया लेकिन इस रिपोर्ट का कुछ पता नहीं है. 25 दिसंबर को बिजनेस स्टैंडर्ड में वित्त मंत्री अरुण जेटली का इंटरव्यू छपता है. इस इंटरव्यू में सवाल पूछा जाता है कि क्या आप मौजूदा 7.5 प्रति वर्ष की विकास दर से संतुष्ट हैं, इसी से जुड़ा सवाल है नौकरियों को लेकर. जवाब में वित्त मंत्री कहते हैं, 'मैं मानता हूं कि जब अर्थव्यवस्था लगातार विस्तार कर रही हो, यहां तक कि 7.5 प्रतिशत की दर से, नौकरियों में वृद्धि तो होनी ही है.
  • रवीश कुमार की टिप्‍पणी: 10 प्रतिशत आरक्षण में हिन्दू सवर्ण, ईसाई और मुसलमान भी हैं
    रवीश कुमार
    आरक्षण सिर्फ ग़रीब सवर्णों के लिए नहीं है. जैसा कि मीडिया में चलाया जा रहा है. यह आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके को दिया जा रहा है. जिसमें हिन्दू सवर्ण, मुसलमान और ईसाई शामिल हैं. इसके मसौदे से यही बात ज़ाहिर होती है.
  • चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा गर्माने की तैयारी?
    रवीश कुमार
    नौकरियां कहां हैं, धीरे धीरे जब नौकरी का सवाल बड़ा हो रहा था, ऐसे आंकड़े आ रहे थे कि पिछले साल शहरों और गांवों में एक करोड़ लोगों की नौकरियां चली गई हैं, मोदी सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला कर लिया है, बल्कि संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन यानी 8 जनवरी को संविधान संशोधन विधेयक भी पेश किया जाएगा.
  • क्या 2019 में टीवी के दर्शकों को कोई काम नहीं है?
    रवीश कुमार
    कहीं से घूमते-फिरते हुए आकर बैठे और बिठाए गए ये लोग गिनती में दो, चार, छह और कभी-कभी दस भी होते हैं. कई साल से आते-आते इनके चेहरे पर टीवी की ऊब दिखने लगी है. जो नया आता है वो भी इसी टाइप के टीवी को देखते-देखते ऊबा हुआ लगता है.
  • आज भारत की औरतों का जन्मदिन है... क्या आप जानते हैं?
    रवीश कुमार
    सावित्री बाई ने पहला स्कूल नहीं खोला, पहली अध्यापिका नहीं बनीं, बल्कि भारत में औरतें अब वैसी नहीं दिखेंगी जैसी दिखती आई हैं, इसका पहला जीता जागता मौलिक चार्टर बन गईं. उन्होंने भारत की मरी हुई और मार दी गई औरतों को दोबारा से जन्म दिया.
  • ट्रोलरों को रवीश कुमार की नसीहत: अपने साहब से बोलिए एक लाइव इंटरव्यू पर आएं, दुनिया हंस रही है
    रवीश कुमार
    अपने नेता जी की सुविधा से आप सक्रिय होते हैं, मेरा नंबर पब्लिक करते हैं और फिर ख़ुद ही फ़ोन करते रहते हैं. अब मैं फ़ोन तो उठाता नहीं. आप आज दिन भर फ़ोन करते रहे. कई सौ नंबरों से फ़ोन आए. आपको क्यों लगता है कि साहब की राजनीति की सुविधा के हिसाब से मुझ पर दबाव बना लेंगे?
  • पत्रकार बनना चाहने वालों के लिए रवीश कुमार की 'क्लास'
    रवीश कुमार
    चुनाव आते ही कुछ युवा पत्रकार व्हॉट्सऐप करने लगते हैं कि मुझे चुनाव यात्रा पर ले चलिए. आपसे सीखना है. लड़का और लड़की दोनों. दोनों को मेरा जवाब 'न' है. यह संभव नहीं है. कुछ लोगों ने सीमा पार कर दी है. मना करने पर समझ जाना चाहिए, पर कई लोग नहीं मानते हैं. बार-बार मैसेज करते रहते हैं, इसलिए यहां लिख रहा हूं. यह क्यों संभव नहीं है?
  • 'The Accidental Prime Minister' से फिर उठेगी कथा और इतिहास की बात
    सुधीर जैन
    मसला यह था कि क्या किसी ऐतिहासिक चरित्र को नई कथा में ढाला जा सकता है. खैर, जिन्होंने विवाद खड़ा किया, उन्हें क्या और कितना हासिल हुआ, इसका पता नहीं चला. आखिर मामला सुलटा लिया गया. फिल्म रिलीज़ हुई. लेकिन साहित्य जगत में एक सवाल ज़रूर उठा और उठा ही रह गया कि क्या ऐतिहासिक चरित्रों के साथ उपन्यासबाजी या कहानीबाजी की जा सकती है, या की जानी चाहिए, या नहीं की जानी चाहिए...? कला या अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर क्या किसी ऐतिहासिक चरित्र को वैसा चित्रित किया जा सकता है, जैसा वह न रहा हो...? यह सवाल भी कि क्या कोई कलाकार किसी का चरित्र चित्रण ग्राहक की मांग के आधार पर कर सकता है...?
  • अगर भाषा कारण है, तो किशोरचंद्र ही नहीं, मोदी-शाह समेत अनगिनत पर रासुका लग जाएगा
    रवीश कुमार
    मणिपुर के पत्रकार किशोरचंद्र वांग्खेम को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत एक साल की सज़ा हुई है. NSA का एक सलाहकार बोर्ड होता है. 11 दिसंबर को राज्य सरकार ने पत्रकार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को इसके सामने पेश किया. 13 दिसंबर को बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी और NSA के तहत गिरफ्तारी को मंज़ूरी दे दी.
  • बिहार की 'आशा' और 'आंगनवाड़ी' वर्करों की आशा, मीडिया नहीं आता फिर भी
    रवीश कुमार
    बिहार की एक आंगनवाड़ी सेविका की बेटी का पत्र आया है. मैं सोच रहा था कि इस पत्र को आपके सामने कैसे रखूं. इतने मामूली पैसे से कोई महिला अपने वजूद की रक्षा कर पाती है, तो यह पैसा कितना मायने रखता होगा. स्टेट की समीक्षा की ज़रूरत आ पड़ी है. हमारी राज्य व्यवस्थाएं सड़ गईं हैं. उनके भीतर संभावनाओं का विस्तार नहीं हो रहा है.
  • हमारे संस्कृत से जुड़े संस्थान किस हाल में हैं?
    रवीश कुमार
    26 मई 2014 को जब प्रधानमंत्री मोदी ने हिन्दी में शपथ ली थी तब उनके साथ सुषमा स्वराज, उमा भारती और हर्षवर्धन ने संस्कृत में शपथ ली थी. सांसद के रूप में महेश गिरी, परवेज़ साहिब सिंह वर्मा, शांता कुमार, योगी आदित्यनाथ, महेश शर्मा, राजेंद्र अग्रवाल ने संस्कृत में शपथ ली. 2017 में स्मृति ईरानी राज्य सभा का सासंद बनी थीं तो शपथ संस्कृत में ली थीं. मेसेज गया कि संस्कृत के लिए अब कुछ होने वाला है.
  • राजनीति की भट्टी में पिघलाया जा रहा स्टील प्रेम...
    डॉ विजय अग्रवाल
    पहले देश के तीन राज्य के लोगों ने सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों में बदलाव किया. नई पार्टी सत्ता पर आसीन हुई, और गद्दी पर आने के बाद उसने जो दूसरा बड़ा काम किया, वह था - बड़ी संख्या में प्रशासनिक फेरबदल. मीडिया में इसे 'प्रशासनिक सर्जरी' कहा गया. 'सर्जरी' किसी खराबी को दुरुस्त करने के लिए की जाती है. ज़ाहिर है, इससे ऐसा लगता है कि इनके आने से पहले प्रशासन में जो लोग थे, वे सही नहीं थे. अब उन्हें ठिकाने (बेकार के पद) लगाया जा रहा है, जैसा व्यक्तिगत रूप से बातचीत के दौरान एक नेता ने थोड़ा शर्माते हुए कहा था, "पहले उनके लोगों ने मलाई खाई, अब हमारे लोगों की बारी है..."
  • सरकारी बैंकों की हालत क्यों ख़राब है?
    रवीश कुमार
    2018 का साल आया नहीं था, कि न्यूज़ चैनलों पर 2019 को लेकर चर्चा शुरू हो गई. सर्वे दिखाए जाने लगे. काश ऐसा कोई डाटा होता कि एक साल में 2019 को लेकर कितने सर्वे आए और चैनलों पर कितने कार्यक्रम चले तो आप न्यूज़ चैनलों के कंटेंट को बहुत कुछ समझ सकते थे.
  • मोदी सरकार का फिर एससी/एसटी पर दांव
    अखिलेश शर्मा
    मोदी सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के वोट बैंक को लुभाने की एक और कोशिश की है. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति में एससी और एसटी वर्ग को आरक्षण देने की बात कही है.
  • पार्कों में नमाज़ और उद्धत बहुसंख्यकवाद
    प्रियदर्शन
    अगर आप वह वीडियो देखेंगे और सुनेंगे, तो हैरान रह जाएंगे. नोएडा सेक्टर 58 के पार्क में पांच-छह दाढ़ी-टोपी वाले लोग गोल घेरे में बैठकर कुछ पैसा जुटा रहे हैं, कुछ चटाइयां बिछी हुई हैं, एक कर्कश आवाज़ उनसे लगभग बदतमीज़ी से जवाब तलब कर रही है - कहां से आए हो, यहां क्यों आए हो, किससे पूछकर यहां बैठ गए, पुलिस से परमिशन ली है, क्या गड़बड़ करना चाहते हो...?
  • अरुण जेटली को कैसे समझ आ गया एक GST रेट, क्या आप समझ पाए...?
    रवीश कुमार
    4 अगस्त, 2016 को हमने एक लेख लिखा था. उस हफ्ते राज्यसभा में GST को लेकर बहस हुई थी. कांग्रेस और BJP के नेताओं की बहस को सुनते हुए मैंने लिखा था, "राज्यसभा में वित्तमंत्री अरुण जेटली और पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम की भाषा और देहभाषा ऐसी थी, जैसे दोनों एक चैप्टर पढ़कर आए हों और उसे अपना पर्चा बताने का प्रयास कर रहे हों...
  • दिक्कत क्या है विराट कोहली की आक्रामकता में...
    संजय किशोर
    सौरव गांगुली ने आंख में आंख डालकर बात करना सिखाया तो टीम इंडिया ने जीतना भी सीखा. महेंद्र सिंह धोनी की ‘कूलनेस’ में भी आक्रामकता थी.अब विराट कोहली सीने टकरा रहे हैं. कोहली का सीना उस 56 इंच की तरह खोखला नहीं हैं जहां से सिर्फ बातें और वादे निकलते हैं. इस सीने के अंदर आग है जो सिर्फ जीत से बुझना चाहती है. कामयाबी के लिए ये आत्मविश्‍वास भी जरूरी है-'तुम एक स्टैंडिंग कप्तान हो और मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़!' कोहली ने ये कहा हो या न कहा हो, बंदे में क़ुव्वत है तभी दंभ भी दिखा रहा है.
  • रेल भर्ती के हों या यूपी पुलिस भर्ती के, कब तक होगा ऐसा
    रवीश कुमार
    सरकारी नौकरी से संबंधित समस्याओं को देखकर लगता है कि एक समस्या खुद नौजवान भी हैं. अलग-अलग भर्ती परीक्षा के नौजवान अपनी परीक्षा के आंदोलन में तो जाते हैं मगर दूसरी परीक्षा के पीड़ित नौजवानों से कोई सहानुभूति नहीं रखते.
  • सपना देखा हरियाणा के द‍लीप सिंह ने, पूरा किया दीपा कर्माकर ने
    रवीश कुमार
    एक अच्छे पाठक और दर्शक को हर किरदार में प्रवेश कर उसे महसूस करना चाहिए. अपनी ज़िंदगी से निकल दूसरे की ज़िंदगी में प्रवेश करना ही पाठक होना है. वरना कहानी की डोर छूट जाती है. विमल मोहन और दिग्विजय सिंह देव की किताब हाथ में आई तो पुरानी याद भी कहीं से निकल आई.
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