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  • रवीश कुमार का ब्लॉग :  बेरोज़गारी की दर ने 45 साल का रिकार्ड तोड़ा मगर बिखर गया बेरोज़गारी का मुद्दा
    रवीश कुमार
    45 साल में बेरोज़गारी सबसे अधिक है. 31 मई को आई आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हो गई है. 2017 जुलाई से लेकर 2018 जून तक की अवधि में बेरोज़गारी हर स्तर पर बढ़ी हुई देखी गई. चुनाव के कारण सरकार ने इसे जारी नहीं किया था. तरह-तरह के विवादों से इसे संदिग्ध बना दिया. कभी कहा गया कि यह झूठ है और कभी कहा गया कि इसका पैमाना सही नहीं है. ख़ैर यह रिपोर्ट आ जाती तब भी कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता लेकिन जनता तक यह आंकड़ा न पहुंचे इसके लिए रिपोर्ट को जारी न होने दिया गया. इसके विरोध में राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग के दो सदस्यों ने इस्तीफा भी दे दिया. तब भी सरकार टस से मस नहीं हुई. सरकार बनने के बाद इस रिपोर्ट को जारी कर दिया गया. बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबसे अधिक है.
  • बढ़ती बेरोज़गारी से बढ़ेगी मुश्किल?
    रवीश कुमार
    पिछले डेढ़ साल में पहली बार हुआ है जब भारत की जीडीपी चीन की जीडीपी से पीछे हो गई है. चीन की जीडीपी 6.4 प्रतिशत है. जनवरी से मार्च की जीडीपी के बारे में फोरकास्ट था कि 6.3 प्रतिशत तक रहेगी लेकिन जीडीपी उससे भी कम हो गई है. रिज़र्व बैंक ने भी अनुमान ज़ाहिर किया था कि 2019-20 की जीडीपी 7.2 प्रतिशत तक जा सकती है. इस जीडीपी में खेती का योगदान और कम हुआ है.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल शुरू
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री नरेंद मोदी का दूसरा कार्यकाल औपचारिक रूप से शुरू हो गया. कृषि प्रधान भारत देश में आज का दिन ईवेंट प्रधान रहा. ये तो कहिए कि मंत्रियों को फोन आने लगे वरना एंकरों के हलक सूखने लगे थे कि किनका नाम चलाएं और किनका नाम नहीं. मगर सबका ध्यान इस बात पर था कि इस मंत्रिमंडल की सबसे बड़ी ख़बर की घोषणा कब होगी. अटकलें चल रही थीं मगर कोई नहीं चला पा रहा था अमित शाह के शामिल होने की घोषणा कब होगी.
  • मोदी सरकार का शपथ समारोह, जेडीयू ने बनाई दूरी; नीतीश बाबू क्यों बने शादी में 'नाराज फूफा'
    मनोरंजन भारती
    नीतीश कुमार का कहना था कि जब अकाली दल के पास दो सांसद हैं और उन्हें एक मंत्री पद मिल रहा है और रामविलास पासवान की पार्टी के पास छह सांसद हैं और उन्हें एक कैबिनेट का पद मिल रहा है, तो जेडीयू के पास 16 सांसद हैं, उन्हें किस आधार पर एक ही कैबिनेट मंत्री पद दिया जा रहा है.
  • कांग्रेस ने एक महीने के लिए चैनलों में प्रवक्ता भेजना बंद किया, बीजेपी भी करे ऐसा
    रवीश कुमार
    कांग्रेस का यह फ़ैसला अच्छा है मगर कमज़ोर है. उसे प्रवक्ताओं के साथ खलिहर हो चुके सीनियर नेताओं पर भी पाबंदी लगा देनी चाहिए. अगर वे जाना बंद न करें तो अमित शाह से बात कर बीजेपी में ज्वाइन करा देना चाहिए. प्रधानमंत्री ने भरी सभा में अपने सांसदों से कहा कि छपास और दिखास से दूर रहें. किसी ने नहीं कहा कि एक जनप्रतिनिधि को चुप रहने की सलाह देकर प्रधानमंत्री सांसद की स्वायत्ता समाप्त कर रहे हैं. मतलब साफ़ था कि पार्टी एक जगह से और एक तरह से बोलेगी. आपने पांच साल में बीजेपी सांसदों को चुप ही देखा होगा जबकि उनमें से कितने ही क़ाबिल थे. बिना मीडिया से बोले एक सांसद अपना कार्यकाल पूरा करे यह भयावह है.
  • भारतीय समाज में जातिवाद का जहर
    रवीश कुमार
    मुंबई में डॉ. पायल तड़वी की आत्महत्या को लेकर नागरिक समाज के एक हिस्से में बहुत बेचैनी है. पायल तड़वी के लिए इंसाफ की मांग कर रहे इन लोगों को देखकर आपको लग सकता होगा कि यह एक रूटीन विरोध प्रदर्शन है. मेरी यही गुज़ारिश है कि जिस कारण से पायल ने आत्महत्या की है, हम उसे पुलिस की कार्रवाई तक न सीमित रखें. अब तो पायल के अस्पताल ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि उसे उसकी जाति को लेकर प्रताड़ित किया जा रहा था.
  • राहुल गांधी को क्यों इस्तीफ़ा देना चाहिए...?
    प्रियदर्शन
    यह सच है कि 2014 और 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुए हैं. नरेंद्र मोदी और BJP की ऐतिहासिक जीत के आईने में यह हार कुछ और बड़ी और दुखी करने वाली लगती है. लेकिन अतीत में देखें तो ऐसे इकतरफ़ा परिणाम और अनुमान कांग्रेस और BJP दोनों के हक़ में आते रहे हैं और दोनों को हंसाते-रुलाते रहे हैं. 1984 में जब राजीव गांधी को 400 से ज्यादा सीटें मिली थीं और अटल-आडवाणी को महज 2, तब भी कुछ लोगों को लगा था कि अब तो BJP का सफ़ाया हो गया. लेकिन 1989 आते-आते BJP वीपी सिंह की सत्ता का एक पाया बनी हुई थी.
  • ब्लॉग : बड़ा दिल दिखाना होगा कांग्रेस को, राहुल बने रहें चेहरा, योगेंद्र यादव को बना दें पार्टी अध्यक्ष!
    मानस मिश्र
    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपना पद छोड़ना चाहते हैं जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उन्हें समझाने में लगे हैं कि वह इस ज़िम्मेदारी को न छोड़ें. लेकिन यह भी सच है कि अगर राहुल गांधी पद नहीं छोड़ते हैं, तो कांग्रेस का उबर पाना मुश्किल होगा, क्योंकि ऐसा लगता है कि राहुल की अगुवाई में कांग्रेस अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर चुकी है. गुजरात विधानसभा चुनाव के समय जब राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था और तब BJP को पार्टी ने कड़ी टक्कर दी थी.
  • ब्लॉग: PM मोदी हैं 'मैन ऑफ द मैच', पत्रकार इसे अपनी जीत न समझे
    ऐसी सोच पत्रकारिता को खत्म करती है. किसी भी पार्टी की हार या जीत पर पत्रकार को खुश या दुखी नहीं होना चाहिए. पत्रकार को अपना काम करना चाहिए. पत्रकार का काम लोगों की समस्या पर ध्यान देना, लोगों की समस्या दिखाना है, न की किसी पार्टी की गोद में बैठ जाना. इस देश में कुछ ऐसे पत्रकार भी हैं जो सरकार की हमेशा आलोचना करते हैं, कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगता है. इन पत्रकारों को गाली दी जाती है. परेशान किया जाता है. कई लोग यह भी कहते हैं कि यह पत्रकार सरकार की तारीफ क्यों नहीं करते. पत्रकार का काम सरकार की तारीफ करना नहीं है चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो. पत्रकार का काम है सवाल करना लोगों की समस्या को सामने रखना है. पत्रकारों को उस दिन सरकार की तारीफ करनी चाहिए जिस दिन सभी समस्या खत्म हो जाये.
  • पं. नेहरू जिस बात पर अमल कर चुके हैं पीएम मोदी ने कही वही बात
    अमित
    इतिहास की उल्टी व्यख्या नहीं हो सकती. (जैसे 'समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाए) व्यक्ति एक-दूसरे के कार्यों से प्रेरणा ले सकते हैं, लेते हैं. कई बार देश की परंपराएं इतनी गहरी धंसी होती हैं कि, कभी ये किसी के कार्यों के द्वारा, तो कभी किसी के शब्दों के द्वारा प्रकट हो जाती हैं. अपनी वैचारिक मान्यताओं और सुविधा के कारण हम उन्हें किसी व्यक्ति या समूह से जोड़ देते हैं.
  • क्या आपात स्थिति के लिए फ़ायर विभाग तैयार है?
    रवीश कुमार
    24 मई को सूरत के तक्षशिला आर्केड में आग लगने से 22 लोगों की मौत हो गई है. 17 छात्र छात्राओं की मौत की घटना के बाद सारी बहस इस तंज तक सिमट कर रह गई है कि हम 3000 करोड़ की पटेल की मूर्ति बना लेते हैं मगर स्मार्ट सिटी सूरत में आग बुझाने के लिए सीढ़ी तक नहीं थी.
  • राहुल पद छोड़ना चाहते हैं, उन्हें क्या सलाह दे रहीं सोनिया और प्रियंका
    अगले माह अपना 49वां जन्मदिन मनाने से पहले आम चुनाव में बीजेपी के हाथों धूल चाटने की पीड़ा झेल रहे राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने के अपने उस फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार नहीं हैं जिसके बारे में उन्होंने शनिवार को पार्टी को अवगत कराया था.
  • तो क्या विधानसभा चुनाव से पहले ही अपनी सीट हार चुके हैं अरविंद केजरीवाल?  
    मनोरंजन भारती
    यही नहीं नजफगढ़ से केजरीवाल सरकार में मंत्री कैलाश गहलोत भी तीसरे नंबर पर हैं, यहां कांग्रेस को लोकसभा के वोटों के अनुसार 23 हजार 354 वोट मिलेगें तो आप को 22 हजार 302 वोट. यदि इन आकंड़ों के आधार पर विधानसभा के क्षेत्रवार सीटों से मिलान किया जाए तो दिल्ली की 70 सीटों में से बीजेपी 65 सीट जीत सकती और कांग्रेस 5 सीटें जबकि आम आदमी पार्टी का खाता भी नहीं खुलता दिख रहा है.
  • यह PM नरेंद्र मोदी का सर्वश्रेष्ठ भाषण था, लेकिन अब उन्हें 'विश्वास' सचमुच जीतना होगा
    अगर मोदी अपनी नई पारी की शुरुआत सचमुच सबको साथ जोड़कर करने के प्रति गंभीर हैं, तो उन्होंने बहुत-से मुद्दों पर आत्ममंथन करना होगा. उन्हें BJP और संघ परिवार को भी उन्हीं की लाइन पर चलने के लिए बाध्य करना होगा. उन्हें खुद आगे बढ़कर मुस्लिम समुदाय के प्रभावी और सम्मानित प्रतिनिधियों को नियमित वार्ताओं के लिए आमंत्रित करना होगा, जिनमें उनके कड़े आलोचक भी शामिल हों, और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में ताकत के विभिन्न स्तरों पर उन्हें भी हिस्सेदारी देनी होगी.
  • ब्लॉग: कांग्रेस के नेता चुनाव क्षेत्र को अपनी संपत्ति न मानें, यह लोगों की संपत्ति है
    ऑस्ट्रेलिया टीम इसीलिए अच्छा प्रदर्शन करती है. भारत की राजनीति में भी यह फार्मूला लागू होना चाहिए. फॉर्म में जो नेता नहीं हैं उनके जगह नए नेताओं को टिकट देना चाहिए. यह जो पुराने नेता है उन्हें टेनिस की तरह नॉन प्लेइंग कप्तान बना देना चाहिए जो बाहर बैठकर सलाह देते रहे.
  • लालू प्रसाद की अनुपस्‍थ‍िति या तेज प्रताप का विद्रोह, आखिर कैसे डूबी बिहार में महागठबंधन की नैया?
    सुरेश कुमार
    लालू प्रसाद यादव जेल में सजा काट रहे हैं. यह पहला मौका है जब किसी चुनाव में लालू प्रसाद यादव रैली, सभा से दूर रहे. इसका नुकसान उनकी पार्टी राष्‍ट्रीय जनता दल समेत उनके सहयोगी दलों को भी उठाना पड़ा. चुनावी समर में नेतृत्‍व उनके बेटे तेजस्‍वी यादव के कंधों पर था. अभी तक चली आ रही जातिगत समीकरण पर आधारित राजनीति ने सभी दलों को उसके हिसाब से चुनावी मैदान में उम्‍मीदवार उतारने को विवश कर दिया. चाहे एनडीए हो या यूपीए, किसी ने उस फार्मूले से किनारा नहीं किया.
  • नून रोटी खाएंगे, मोदिए को ले आएंगे...
    संजय किशोर
    भाजपा और सहयोगी दलों के सांसदों को भी इस बार ये बात समझ लेनी चाहिए कि उन्होंने नरेंद्र दामोदर दास मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया, मोदी ने उन्हें संसद तक पहुंचाया है. अमेठी के आसमान में सुराख स्मृति ईरानी ने नहीं किया है.
  • क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं
    रवीश कुमार
    2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा बोला है क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं. उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला. सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं. मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं. बल्कि उनकी समस्या वास्तविक थी इसलिए दिखाई. आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है. मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है. कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले. उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी की वे मुझे गालियां देते थे. मेरे पास सैंकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है. इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना. यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना.
  • प्रचंड जीत के लिए दिसंबर के झटकों से किस तरह उबरे मोदी
    आशुतोष
    आज बड़ा सवाल यह है कि क्‍या हिन्‍दुत्‍व ने बीजेपी को उस जगह पर बैठा दिया है जहां पहले कांग्रेस इंदिरा और नेहरू के समय थी? कुछ तथ्‍यों को मानना ही होगा. मोदी नीत हिन्‍दुत्‍व नई सत्तरारूढ़ विचारधारा है और किसी भी दूसरी राजनीतिक विचाराधारा के लिए इसे बाहर निकालना आसान नहीं होगा.
  • कांग्रेस को भारी पड़ गया 'हुआ तो हुआ', जनता ने फिर किया मोदी पर 'विश्‍वास'
    सुरेश कुमार
    कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता मणिशंकर अय्यर के एक बयान ने गुजरात चुनाव की दिशा मोड़ दी थी. ठीक वैसा ही बयान चुनावी अभियान के दौरान कांग्रेस के खेमे से निकला और बीजेपी ने उसका इस्‍तेमाल मिसाइल की तरह करके कांग्रेसनीत गठबंधन के किले को ध्‍वस्‍त कर दिया. वह बयान था सैम पित्रोदा का जो कि सिख दंगों को लेकर दिया गया था- 'हुआ तो हुआ'.
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