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फ्रांस के लोग प्रदूषण के कारण कंपनी को भगा रहे हैं, भारत में कंपनी को घर में घुसा रहे हैं

फ्रांस के लियां शहर के पास आमेजन पैकिंग और डिलिवरी के लिए एक बड़ा सा गोदाम बना रहा है. इसके कारण इस छोटे से जगह में भागमभाग बढ़ जाएगी.

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फ्रांस के लोग प्रदूषण के कारण कंपनी को भगा रहे हैं, भारत में कंपनी को घर में घुसा रहे हैं

रवीश कुमार.

“यह लोगों की स्वतंत्रता का प्रश्न है. फ्रांस के संविधान ने हड़ताल में शामिल होने का अधिकार दिया है. नेशनल यलो वेट मूवमेंट भी हुआ मेरा मुवक्किल उसमें हिस्सा लेना चाहता था. क्या राष्ट्रीय आंदोलन के वक्त चुप रहना चाहिए सिर्फ इसलिए कि वह आमेजन का कर्मचारी है?”

यह उस कर्मचारी के वकील का बयान है जिसने अपने फेसबुक पोस्ट पर आंदोलन का समर्थन कर दिया था. जिसके कारण फ्रांस स्थित आमेजन ने निकाल दिया. फ्रांस में आमेजन के खिलाफ आंदोलन चल रहा है. पिछले चार महीनों में आमेजन के कई डिपो का रास्ता रोका गया.

फ्रांस के लियां शहर के पास आमेजन पैकिंग और डिलिवरी के लिए एक बड़ा सा गोदाम बना रहा है. इसके कारण इस छोटे से जगह में भागमभाग बढ़ जाएगी. लोगों का कहना है कि 1000 लारियां चलेंगी और 4500 छोटी गाड़ियां चलने लगेंगी जिसके कारण इलाके में ट्रैफिक जाम बढ़ेगा और वायु प्रदूषण भी. यही नहीं 33 फीसदी जीव जन्तु समाप्त हो जाएंगे.


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स्थानीय लोगों ने इस अमरीकी कंपनी के खिलाफ मुकदमा कर दिया है. उनका कहना है कि इस तरह के प्रोजेक्ट आउटडेटेड हो गए हैं. हमें सोचना होगा कि कम प्रदूषण के साथ समाज को कैसे जीने के लिए बेहतर बनाया जा सके. अमेजन कंपनी के खिलाफ खूब प्रदर्शन हो रहे हैं. एक मांग यह भी है कि इन कंपनियों को टैक्स में बहुत छूट मिलती है जबकि इन्हीं के भीतर काम करने वाले कर्मचारियों को सारे टैक्स देने पड़ते हैं. दिन भर मज़दूरी करने वाला, कम कमाने वाला ज़्यादा टैक्स देता है, कंपनी को कम से कम देना पड़ता है. ऐसा कैसे हो सकता है.

अमेजन का कहना है कि वह फ्रांस के नियमों के अनुसार टैक्स देता है मगर आरोप है कि वह लग्ज़म्बर्ग के ज़रिए फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में अपने माल की सप्लाई करता है जिससे उसका टैक्स बिल कम हो जाता है. लोगों का गुस्सा देखते हुए फ्रांस की सरकार ने आश्वासन दिया है कि गूगल और अमेजन जैसी कंपनियों पर टैक्स बढ़ाएंगे.

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भारत में प्राइवेट नौकरी से बहुत लोग परेशान हैं. कम पैसे पर वे दिन रात काम कर रहे हैं. फिर भी वे अपनी बात मेरे इनबॉक्स में करेंगे लेकिन पेज पर पोस्ट करेंगे तथाकथित राष्ट्रवादी चीज़ों को. अगर आपकी समस्या इनबॉक्स के लायक है तो वह नितान्त निजी है. अगर आप उसे व्यापक बनाना चाहते हैं कि सामने से लिखें. पढ़िए कि दुनिया भर में क्या हो रहा है. लोग क्या कर रहे हैं. भारत में लोग अगर फर्क नहीं कर पाते हैं तो क्या किया जा सकता है. इस समय दुनिया के 20 प्रदूषित शहरों में 15 भारत में हैं. पटना एक है. फिर भी विवाद नहीं. बहस नहीं है. केवल मोदी मोदी है.

लियां बहुत प्यारा औऱ सुंदर शहर है. मैं वहां गया हूं. इस शहर ने अपने संसाधनों का कितनी खूबसूरती से इस्तमाल किया है, वैसा आप भारत में सात जन्म में नहीं सोच सकते. रोज़गार की ज़रूरत उन्हें भी है लेकिन वे प्रदूषण के साथ रोज़गार नहीं चाहते हैं. वे अमेजन के लॉजिस्टिक गोदाम का इसलिए विरोध कर रहे हैं.

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भिलाई में स्टील अथारिटी आफ इंडिया का एक प्लांट है. वहां कोई 20-21 हज़ार लोग काम करते हैं. कंपनी ने फरमान किया कि सारे कर्मचारियों को एक घंटे के भीतर ही निकलना होगा. इस कारण हज़ारों कर्मचारी हड़बड़ाहट में निकलने लगे. कंपनी के गेट पर भगदड़ मच गई. नतीजा यह हुआ कि लोग धरने पर बैठ गए. नारे लगाए. अंत में प्रबंधन ने गेट से समय सीमा हटा ली.

कंपनी के एक कर्मचारी ने बताया कि असल में गुस्सा इस बात को लेकर था कि 2017 से सैलरी नहीं बढ़ी है. मगर धरना दिया गेट को लेकर. सैलरी का गुस्सा गुप्त रहा. यह वही बात है. जो बड़ा सवाल है उसे आप इनबाक्स में साझा करते है. जिसके बारे में आपको समझ तक नहीं, आपका ब्रेनवॉश किया जा रहा है, उस तथाकथित राष्ट्रवाद को लेकर आप मुख्य पोस्ट लिख रहे हैं. धरना खत्म हो गया है. अच्छी बात है कि इसी बहाने लड़े तो सही क्योंकि यूनियन ने शुरू में साथ ही नहीं दिया. इन कर्मचारियों का वेज रिवीजन अगले 5 साल में भी हो जाए तो गनीमत है मगर ये आंदोलन करेंगे गेट को लेकर.

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भारत के कई गांवों में आंदोलन चल रहा है. हमारे गांव की ज़मीन पर शहर का कचरा न फेंका जाए. हमारे गांव के पानी में शहर के नाले का पानी मिल गया है. जीवन बर्बाद है. खूब प्रदर्शन होते हैं मगर फिर भी चुनावी मुद्दा नहीं है. दो चार एक्टिविस्ट ही मीडिया को बुलाकर दिखाते रहते हैं लेकिन आम लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता. जबकि प्रदूषण के कारण ग़रीब और ग़रीब होता चला जाता है.

भारत सरकार ने 100 स्मार्ट सिटी बनाने का वादा किया. शहरों के बीच प्रतियोगिता की नौटंकी की गई. इस चुनाव में एक भी स्मार्ट सिटी का पोस्टर नज़र नहीं आ रहा है. गुजरात में 2007 से गिफ्ट नाम की एक स्मार्ट सिटी बन रही है जो आज तक पूरी नहीं हो सकी. कोच्ची में भी मनमोहन सिंह के समय स्मार्ट सिटी की बुनियाद पड़ी थी, अब उसकी क्या हालत है, किसी को पता नहीं. आप यू ट्यूब में देखिएगा, कोच्ची को स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर कैसे सपने दिखाए गए है. बहरहाल, स्मार्ट सिटी बना होता है तो मोदी ज़रूर गुणगान करते.

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बिजनेस स्टैंडर्ड में एक ख़बर आई है. इस ख़बर के अनुसार स्मार्ट सिटी का सपना दिखा गया मेरठ और इंदौर वालों को मगर असली स्मार्ट सिटी का सपना कोई और पूरा कर रहा है. मोदी राज की आर्थिक नीतियों और नारों को समझने के लिए सामान्य तर्क बुद्धि काफी नहीं है. न ही जनता इसके लिए तैयार है. नाला सीवर बनाने की बात हुई लेकिन डिवाइर रंग दिया और दो चार डस्टबिन डालकर स्मार्ट सिटी बना दिया. बोगस संकल्पनाओं का साम्राज्य है मोदी सरकार का पांच साल.

बिजनेस स्टैंडर्ड के देव चटर्जी ने सूत्रों के हवाले से खबर लिखी है. इस खबर में रिलायंस इंफ्रा लिमिटेड का पक्ष नहीं है. खबर यह है कि रिलायंस इंफ्रा लिमिटेड को नवीं मुंबई के पास नया मेगासिटी बनाने जा रहे हैं. इसमें अगले दस साल में 75 अरब का निवेश होगा. दस साल में बनेगा. रिलायंस न सिर्फ इस प्रोजेक्ट को डेवलप करेगा बल्कि शहर के प्रशासन को भी चलाएगा ताकि खर्च और लाल फीताशाही में कटौती हो.

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सिंगापुर के तर्ज पर बनने वाले इस मेगासिटी का प्रशासन एक प्राइवेट कंपनी के पास होगा. बहरहाल 7 मार्च को रिलायंस ने अपनी एक सब्सिडरी कंपनी के ज़रिए नवी मुंबई स्पेशल इकोनमी जोन के साथ समझौता किया है. 2180 करोड़ रुपये के शुरूआती भुगतान के साथ लीज़ पर 4300 एकड़ ज़मीन का करार हुआ है.

भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बस की बात नहीं है कि इन योजनाओं और इनकी राजनीति को समझना.

प्राइवेट नौकरी के दौर पर नीचले तबके के ज्यादा लोग दुखी है. उनका काम चल रहा है. इतना काम करना पड़ता है कि परिवार के साथ चाय पीने का वक्त नहीं होता. सरकारी नौकरी का यही हाल है. सब कुछ ठेके पर चल रहा है. इसके बाद भी जीवन स्तर की बेहतरी को लेकर कोई बात नहीं है. कोई आंदोलन नहीं है.

क्या एक साल में 20 लाख पद भरे जा सकेंगे?

अमीरों पर टैक्स लगाने की बात को हल्के में लिया जाता है. 5 लाख तक आय पर टैक्स माफ करने वाले नरेंद्र मोदी कहते हैं कि कांग्रेस आएगी तो मिडिल क्लास पर टैक्स लगाएगी. जब टैक्स माफ किया था तो मिडिल क्लास को यही लगा था कि उस पर टैक्स बढ़ेगा. मिडिल क्लास पर टैक्स बढ़ाने की ज़रूरत ही क्या है. सरकार स्कूल कालेज खत्म कर दो. ताकि उसके बच्चे लोन लेकर इंजीनियरिंग और डाक्टरी की पढ़ाई करें. कर्ज़ में दब जाएं. मोदी बताएं कि मिडिल क्लास को क्या दिया गया. न अच्छी नौकरी न अच्छा टैक्स. नोटबंदी और जीएसटी के नाम पर जो अफरा तफरी मची वो तो गनीमत है कि मिडिल क्लास का ब्रेनवॉश हो गया वर्ना वह अपनी जेब देखता तो मोदी के सारे दावे हवा हो जाते. मोदी भी जानते हैं कि फर्ज़ी राष्ट्रवाद से ब्रेनवॉश हो रहा है. इसलिए इस चुनाव में मुद्दे गायब हैं. माहौल छाया हुआ है.

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प्रधानमंत्री बता दें कि क्या वे मिडिल क्लास को राहत देने जा रहे हैं? क्या राहत दे सकते हैं? उनके वित्त मंत्री अरुण जेटली तो 2014 के पहले टैक्स में कमी की बातें करते थे, सरकार में आए तो कारपोरेट टैक्स कम करने की बात करने लगे. क्या उन्होंने कोई बड़ी राहत दी?

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