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राजनीतिज्ञों की कुभाषा के खिलाफ बढ़ता असंतोष

खराब भाषा रोचक लगने लगी थी. लेकिन इसका चलन इतना बढ़ने लगा कि आमतौर पर इसे खराब माना जाने लगा और अब राजनीतिक भाषणों में खराब भाषा अचानक एक मुद्दा बन गई यही संतोष की बात है.

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राजनीतिज्ञों की कुभाषा के खिलाफ बढ़ता असंतोष

फाइल फोटो

राजनीति में भाषा की मर्यादा पर अब चिंता जताने वालों की तादाद बढ़ने लगी है. लोकतंत्र के भविष्य के लिए यह प्रवृत्ति कितनी घातक थी इसका तत्काल आंकलन कठिन है. दरअसल खराब भाषा रोचक लगने लगी थी. लेकिन इसका चलन इतना बढ़ने लगा कि आमतौर पर इसे खराब माना जाने लगा और अब राजनीतिक भाषणों में खराब भाषा अचानक एक मुद्दा बन गई यही संतोष की बात है. बात इतनी बढ़ गई है कि जो लोग सुरुचिपूर्ण हैं और अब तक मुखर नहीं थे वे भी कहने लगे हैं कि राजनीति में अपने प्रतिद्वंद्वियों की छवि को मटियामेट करने के लिए सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. खराब भाषा की निंदा बढ़ती जाए इसे कौन नहीं स्वीकारेगा. जाहिर है कि हर उबड़खाबड़, घिनौनी, खिल्ली उड़ानेवाली, अपने प्रतिद्वंद्वियों को लेकर क्रूर हास-परिहास करने का चलन अगर बंद या कम हो जाता है तो बहुत संभव है कि मानव जीवन के अनिवार्य पक्ष यानी राजनीति में वे लोग भी आने लगें जो राजनीति के इस उबड़खाबड़पन या गंदगी के कारण नहीं आते. 

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अमर्यादित भाषा की पहचान का सनातन विवाद
राजनीति के क्षेत्र में अबतक अमर्यादित भाषा के लिए जो शब्द सुनने में आता रहा वह है असंसदीय भाषा. भाषा के आगे असंसदीय का यह विशेषण ही बताता है कि वह भाषा सिर्फ संसद की चारदीवारी तक के लिए खराब मानी जाती है. उस पर भी यह विवाद खड़ा कर लिया जाता है कि फलां शब्द असंसदीय है या नहीं. हर सदन के अध्यक्ष के विवेकाधिकार से जो असंसदीय माना जाए उसी को स्वीकार कर लेने का चलन है. लेकिन वे ही सांसद और विधायक या दूसरे जनप्रतिनिधि सार्वजनिक स्थानों पर अपने प्रतिद्वंद्वी के लिए जब गंदी भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो कानूनन मानहानि जैसे आरोप लगाए जाते हैं.  इसके अलावा कोई और उपाय सोच पाने का काम अभी तक नहीं हो पाया है. यानी जिसका ज्यादा दांव पर न लगा हो वह कैसे भी आरोप लगा ले और कैसी भी गाली दे दे और बोलने में किसी के लिए कैसा भी कुव्यवहार कर ले, उसके प्रतिकार के लिए निंदा करने के अलावा कोई उपकरण हम बना नहीं पाए हैं. कम से कम सभ्य समाज तो कोई तरीका नहीं ढूंढ पाया. आलम यहां तक है कि खराब भाषा या गंदी भाषा या आपत्तिजनक शैली को समाज में स्वीकृति मिलती भी देखी गई है. ऐसी भाषा को रस लेकर सुनने की बढ़ती प्रवृत्ति बता रही है कि राजनीतिक क्षेत्र में अपने कथन को चर्चा का विषय बनाने का लालच अच्छे भले लोग तक नहीं छोड़ पा रहे हैं. यह भी होने लगा कि राजनीतिक कथोपकथन में सबसे जरूरी चीज़ यानी तथ्यों की बजाए सिर्फ शब्द ही शब्द सुनाई देने लगे और नकार भाव के शब्दों, निंदा उपरस से ओतप्रोत शब्दों और प्रतिद्वंद्वी को कलंकित करके उसकी छवि को मटियामेट करने वाले शब्दों के बरक्स आजकल दूसरे शब्दों की क्या औकात.

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कब से लगा यह रोग
कहते हैं कि मूल्य या आदर्शों का पतन रातों-रात नहीं होता. आदर्श या मूल्य की बातों को आजकल जो लोग बेमतलब की बातें मानने लगे हैं उनका तर्क होता है कि हमारा जो भी लक्ष्य है वह आदर्श है सो हम उसके लिए क्या साधन अपनाते हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. यह देखना उतना कठिन भी नहीं है कि दुनिया में यह कब से हो रहा है. जो लोग देश या जनता की सेवा के लिए सत्ता हासिल करने का एलान करते हैं वे किसी भी तरीके से सत्ता हासिल करने को आदर्श कार्य सिद्ध कर ले जाते हैं. भारतीय राजनीति में धनबल, बाहुबल, प्रतिद्वंद्वी के छविनाश के लिए कुप्रचारबल कब से कारगर होना शुरू हुआ? इसे निकट इतिहास में झांककर देखना मुश्किल नहीं है. अपने स्वतंत्र भारत के छोटे से इतिहास को देखना अभी तो आसान ही है. राजनेताओं के भाषण के छपे हुए शब्द भी उपलब्ध हैं और इलेक्ट्रानिक युग की देन ऑडियो टेप और डिजिटल रिकॉर्ड अभी मिटे नहींहैं. राजनेताओं के इन कथनों का विषय वस्तु विश्लेषण करेंगे तो पता चल सकता है कि अपने प्रतिद्वंद्वी राजनेता की छवि पर कालिख पोतने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को किस तरह के प्रचार वाक्य थमाए जाते हैं.

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घृणा और जुगुप्सा पैदा करने का दौर
जो इतने सक्षम हैं कि समाज की गहराई में जाकर प्रवृत्तियों को शुरू में ही पकड़ सकते हैं वे समय-समय पर सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों के पतन पर चिंता जताते रहते हैं और आगाह करते रहते हैं. लेकिन राजनीतिक हित साधने के लिए समाज के विध्वंसकों के कौशल का कमाल देखिए कि इन्हीं अग्रपुरुषों को संदिग्ध, पक्षपातपूर्ण और समाज के लिए घातक बताने के प्रचार को कामयाबी मिल जाती है. घृणा तिरस्कार और वैचारिक हिंसा के उपकरणों से समाज और उसके जरिए सत्ता की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम करने में कौन से तत्त्व लगे हैं? अब अगर सवाल उठे कि इन खराब तत्त्वों से कैसे निपटा जाए?  सो  इसका जवाब तो कई साल से निर्माणाधीन या विचाराधीन ही है. हां प्रतिकार के लिए जैसे को तैसा-जैसा उपाय जरूर कुछ लोगों को सूझता होगा. इस अनुमान को आधार मानें तो गाली-गलौच या अपशब्द का इस्तेमाल करने वाले नए लोगों को सुझाव दिया जा सकता है कि आप नए हैं, इस अपराध की मॉडस आपरेंडी यानी कार्यविधि में आप पटु नहीं हैं. सो चक्रव्यूह में घुसते ही हरा दिए जाएंगे.

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राजनीतिक कथोपकथन की भाषा सुधारने का उपाय
पहला उपाय तो यह कि इस भाषा को जनता की स्वीकृति मिलना बंद हो जाए. अगर वाकई ये भाषा अस्वीकार्य है तो जनता उसे पसंद कर ही नहीं सकती. यह निष्कर्ष सामूहिक निर्णय हमेशा सही होने के सिद्धांत पर आधारित है. लेकिन सामने दिख तो यह रहा है कि हर खराब भाषा वाले संवाद पर चुनावी रैलियों में जमा कराई गई भीड़ की तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है. भले ही वह प्रायोजित भीड़ होती हो लेकिन इससे बाकी जनता में संदेश यही पहुंचता है कि जनता की स्वीकृति मिल गई. तटस्थ और निष्पक्ष और साथ में सभ्य नागरिक का भ्रमित हो जाना अपरिहार्य है. बहुत संभव है कि इन्हीं तालियों को आमजन सर्वसम्मति माने और उसी खराब भाषा के साथ हो लें. हालांकि संतोष की बात यह है कि यह रोग अभी नया है. अभी क्रोनिक या असाध्य नहीं बना है.  इसके कई उपाय सोचे जा सकते हैं. मसलन चुनावी रैलियों की खबरों को देते समय राजनीतिक  कथोपकथन की खराब  भाषा पर अगर पत्रकार अपने विशेषाधिकार के तहत टिप्पणियां करना भी शुरू कर दें तो माहौल बदलते देर नहीं लगेगी. हालांकि गलत को गलत और खराब को खराब कहने का भी आजकल हौसला चाहिए. हौसला तो हो भी सकता है, इसलिए सबसे पहले बड़े बड़े लालचों से छुटकारा चाहिए. 

सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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