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देवेंद्र फडणवीस : आधी अधूरी लड़ाई

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देवेंद्र फडणवीस : आधी अधूरी लड़ाई

महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फड़नवीस.

महाराष्ट्र राज्य के 57वें स्थापना दिवस के मौके पर राज्य को बदलने के लिए युवाओं से सीधा संवाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के दिनचर्या का अहम हिस्सा रहा. इसके बाद जननेता के रूप में इस मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठापना का पार्टी द्वारा आयोजित समारोह उनकी बांट जोह रहा था. सीएम बनने के बाद सारे चुनाव जितवाकर बीजेपी को राज्य का सबसे बड़ा दल बनाने के बदले में फड़णवीस का यह सम्मान समारोह था. तयशुदा कार्यक्रम पूरा कर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जब अपने सरकारी आवास पर पहुंचेंगे तो सरकारी अमला शायद याद करेगा कि, साहब के करियर का यह बहुत अहम दिन था. आज बतौर महाराष्ट्र के 27वें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आधा समय पूरा कर लिया है और अब आधा कार्यकाल ही बचा है. ढाई साल की आधी लड़ाई अभी बाकी है.

फड़णवीस के मुख्यमंत्री बनते ही राज्य की शासक जमात रही मराठा वर्ग के स्वघोषित नुमाइंदों की भौवें टेढ़ी हो गई थी. उन्हें राज्य की माइक्रो माइनॉरिटी बनी ब्राह्मण वर्ग का यह नेता राज्य के सर्वोच्च पद पर बैठा भा नहीं रहा था. फड़णवीस के लिए अड़चनों का यह पार्ट टू था. राज्य बीजेपी के कद्दावर नेता नितिन गड़करी से लोहा लेकर और बीजेपी के दूसरे कद्दावर नेता दिवंगत गोपीनाथ मुंडे के समर्थन से जब वे राज्य बीजेपी के अध्यक्ष बने तब उनके राजनीतिक मुश्किलों का पार्ट वन लिखा गया.

ऐसे में देवेंद्र फड़णवीस ने सबसे पहले मुंडे कैम्प में जगह बनाई और मुंडे के अचानक निधन के बाद वे उस गुट के नेता बन बैठे. इस वजह से गडकरी कैम्प ने उनके बतौर सीएम बनने के समय नागपुर में अलग से शक्तिप्रदर्शन भी किया था. लेकिन, केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीटो के चलते ही देवेंद्र को वह मुक़ाम हासिल हुआ जो वर्ना नामुमकिन था.

राजनीतिक दांवपेंच में अपने प्रतिद्वंद्वियों को निपटाने में फड़णवीस को आज ढाई साल बाद काफ़ी सफलता मिली है. केंद्रीय स्तर पर रम जाने की वजह से गड़करी ने राज्य की राजनीति से मुंह फेर लिया है. जिससे अनाथ हुआ गड़करी कैम्प फिलहाल देवेंद्र फडणवीस की छत्रछाया में एडजस्ट हो चुका है. 

वैसे यह न होता अगर फड़णवीस चुनावी समर में एक के बाद एक जीत हासिल न करते. राष्ट्र में नरेंद्र - महाराष्ट्र में देवेंद्र इस चुनावी नारे से सबक लेकर वे अपनी लकीर बढ़ाने में जुटे हैं और इस बात की तसदीक की है कि लाइन कहीं भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाइन से जरा भी छू न जाए. 

राजनीतिक करियर में महज 25 साल पूरे करते हुए CM बने, इसलिए राज्य की सिंचाई की समस्या, महानगरों में इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती को अपना एजेंडा बनाते हुए खुद की इमेज बनाने में लगे फड़णवीस ने हर मुहिम को अबतक बेहतर इवेंट बनाकर पेश किया है. तभी तो राज्य को सूखा मुक्त करने के लिए छिड़ी जलयुक्त शिवार सिंचाई मुहिम में सरकारी प्रोजेक्ट का बोलबाला कम होता है और गूंज उस कार्यक्रम की ज्यादा है जिस को एक्टर आमिर खान आगे ले जा रहे हैं. 

फड़णवीस बखूबी जानते हैं कि वे बेशक और बेरोकटोक तब तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे जबतक केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा चाहेंगे. बीजेपी में नरेंद्र मोदी के अलावा कोई भी और खुद का प्रमोशन होने नहीं देगा इस बात से भी वे अनजान नहीं. इसीलिए फड़णवीस और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के बीच भौजाईनुमा प्यार का होना अब एक ओपन सीक्रेट है. लेकिन, अपने विरोधी इसका फायदा न उठाएं इसलिए इंतज़ामात करने से वे नहीं चूके. इस इंतजाम का नाम है शिवसेना पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे. देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तब सत्ता से दूर रही शिवसेना को साथ लाने के बाद से अभीतक उनका और उद्धव ठाकरे का बैकडोर बेहतरीन कॉर्डिनेशन रहा है. ये दोनों के लिए विन विन हालात हैं. इसमें खुलकर एक दूसरे का विरोध करनेवाले यह दोनों राजनेता पर्दे के पीछे एक दूसरे को मजबूत बनाए हुए हैं. इससे छितरे हुए विपक्ष को दोनों मिलकर और कमज़ोर बना दे रहे हैं. 

लेकिन, ऐसा नहीं कि सारे ओपन सीक्रेट हमेशा चल जाते हैं. ढाई साल पूरा करने के बाद बचे हुए ढाई साल में इसका हिसाब इस सरकार को देना होगा. घनघोर विदर्भवादी रहे देवेंद्र फडणवीस अब पृथक विदर्भ के सवाल को टाल जाते हैं. राज्य के इस इलाके से बीजेपी के सर्वाधिक विधायक चुने गए हैं. ऐसे में पार्टी का एजेंडा होते हुए भी मुम्बई में बैठा बीजेपी का यह मुख्यमंत्री अब विदर्भ अलग करने के मुद्दे पर मौन है. विरोधियों पर बरसते हुए उनकी फिसलती जुबान मुख्यमंत्री के पद की गरिमा कम करती है. ऐसे में मीडिया मैनेजमेंट पर जोर देना पड़ता है. इसमें भी वे उस मीडिया हाउस को सबसे पहले इंटरव्यू देते हैं जिन्हें कभी ट्वीट कर डिफेमेशन की धमकी दे चुके थे.

कभी कपड़ों के ब्रांड के लिए मॉडलिंग कर चुके फड़णवीस का इवेंट मैनेजमेंट इतना जोरदार होता है कि, उनके चुनावी वायदों को लोग पूछे भी तो वो आवाज़ किसी को सुनाई न दें. सिंचाई में 70 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाकर सत्ता में आई बीजेपी को शायद अब यह याद नहीं पड़ता की इसमें कार्रवाई आगे भी ले जानी है. एनसीपी नेता अजित पवार और सुनील तटकरे को जेल भेजने की बात हुई. सिंचाई घोटाले में जो भी कार्रवाई हुई है उसमें किसी भी राजनेता का नाम नहीं हैं. फंसे हैं तो केवल अधिकारी.

एनसीपी नेता छगन भुजबल की गिरफ्तारी इस सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ़ की सबसे बड़ी कार्रवाई थी. लेकिन, बात उस से आगे नहीं बढ़ी.

बावजूद राजनीतिक माहौल बीजेपी के पक्ष में दिख रहा है क्योंकि, अधिकतर इवेंट जोरदार हुए हैं, हो रहे हैं. मेक इन इंडिया से लेकर, समुद्र में शिवाजी मेमोरियल का भूमिपूजन और डॉ. आंबेडकर मेमोरियल का शिलान्यास. फेहरिस्त लंबी है. लेकिन, प्रशासनिक अमला आज भी वैसा ही है जैसा कांग्रेस-एनसीपी की सरकार उसे छोड़ गई थी. मुम्बई में बिल्डिंग बनाने की अनुमतियाँ कम करने का दावा हुआ, राज्य में इज ऑफ डूइंग बिजनेस की बाते हुईं. लेकिन, उनके अमल के लिए प्रशासन हिलने को तैयार नहीं. सम्पूर्ण स्वदेशी हवाई जहाज बनानेवाले कप्तान अमोल यादव को मेक इन इंडिया के दौरान 2016 में फड़णवीस के दिए वायदे को पूरा कराने के लिए 1 साल से ज्यादा इंतज़ार करना पड़ा है. मेक इन इंडिया से राज्य में असलियत में कितना निवेश हुआ उसका सरकारी डॉक्यूमेंट देने की बात फड़णवीस ने सदन में कही थी. उस डॉक्यूमेंट की तलाश जारी है. 

फड़णवीस खेती किसानी से खुद का संपर्क बताते हैं और किसानों का कर्ज़ माफ करने की मांग को अस्वीकार कर चुके हैं. ऐसे में, राज्य में न किसान की परेशानी खत्म हुई है न आत्महत्याएं रुकी हैं. दाल को लेकर बीजेपी सरकार की विफलता हर साल बनी हुई है. इस साल अरहर की बम्पर पैदावार के अंदेशे के बावजूद अपनी फसल बेचने के लिए किसान के पसीने केवल इसलिए छूटे क्योंकि फड़णवीस सरकार का प्रबंधन गड़बड़ा गया. इस बीच राहत बस इतनी है कि जलयुक्त शिवार के 2016 के कामों की वजह से इस साल सूखे की तीव्रता कम हुई है. सन 2016 की गर्मी में जितने पानी के टैंकर्स चले, उसमें इस साल सीधे 90 फीसदी गिरावट आयी है.

पिछले करीब 25 साल में हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों में राज्य का गृहविभाग संभालने वाले देवेंद्र फडणवीस एकमात्र मुख्यमंत्री हैं. राकेश मारिया जैसे अधिकारी की उसे भनक लगने से पहले ट्रांसफर कर फड़णवीस ने डिपार्टमेंट को लाइन हाजिर करा दिया था. लेकिन, उसके बाद विभाग का कसाव वैसा नहीं रहा जिसकी उम्मीद थी. विपक्ष में रहते फड़णवीस के निशाने पर जो थे वे आज अहम पोस्ट पर हैं. क्राइम रेट में कमी लाने के लिए फॉरेंसिक टीमें बढ़ाने के फड़णवीस के मनपसंद दावों पर कितना अमल हुआ यह अलग अनुसंधान का विषय है.

इस सब के बीच, महाराष्ट्र के चढ़ते इस सूरज देवेंद्र फडणवीस को उनके समर्थक प्रधानमंत्री के पद पर देखना चाहते हैं. लेकिन, यूपी चुनाव के बाद आज माहौल बदल गया है. रिकार्ड जीत के साथ योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक पटल पर उदय देवेंद्र फडणवीस के लिए राष्ट्रीयस्तर पर मिली कड़ी चुनौती है. वैसे ग्रहदशा के धनी फड़णवीस के पक्ष में फिलहाल उनकी उम्र है और अबतक का सफ़र जो निर्णायक होगा 2019 में जब बीजेपी को तय करना होगा कि क्या वह एक ब्राह्मण मुख्यमंत्री के नेतृत्व में तब भी विधानसभा चुनाव लड़ना पसन्द करेगी? उम्मीद और भरोसे की यही अधूरी लड़ाई फड़णवीस को अब पूरी करनी होगी.

(प्रसाद काथे एनडीटीवी इंडिया के एसोशिएट एडिटर हैं.)

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