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चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा गर्माने की तैयारी?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता इस कारण संविधान संशोधन बिल लाया जा रहा है.

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चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा गर्माने की तैयारी?

मोदी सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला कर लिया है (फाइल फोटो)

नौकरियां कहां हैं, धीरे धीरे जब नौकरी का सवाल बड़ा हो रहा था, ऐसे आंकड़े आ रहे थे कि पिछले साल शहरों और गांवों में एक करोड़ लोगों की नौकरियां चली गई हैं, मोदी सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला कर लिया है, बल्कि संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन यानी 8 जनवरी को संविधान संशोधन विधेयक भी पेश किया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता इस कारण संविधान संशोधन बिल लाया जा रहा है. मीडिया में खबरें चल रही हैं कि दस फीसदी ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला हुआ है मगर सामाजिक न्याय राज्य मंत्री विजय सांपला ने कहा है कि इस दस फीसदी में गरीब सवर्णों यानी ब्राह्मण बनिया मुस्लिम और ईसाई भी हैं.

क्या वाकई मोदी सरकार ईसाई और मुसलमानों के गरीब लोगों को इस दस फीसदी में जगह देने जा रही है. तो फिर मीडिया में यही क्यों चल रहा है कि ग़रीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है. ईसाई और मुसलमानों के आरक्षण पर क्या बीजेपी ने अपना राजनीतिक स्टैंड बदल दिया है? यह कब हुआ क्या इसी के साथ आरएसएस ने भी मुस्लिम आरक्षण को लेकर अपना स्टैंड बदल दिया है, क्योंकि बीजेपी और संघ मुसलमानों को आरक्षण का लाभ दिए जाने का विरोध करते रहे हैं. आपको उनके अनगिनत लेख मिल जाएंगे, भाषण मिल जाएंगे.


रविवार को बीजेपी जब अनुसूचित जाति के लिए भीम महाभोज का आयोजन कर रही थी, पांच हज़ार किलो खिचड़ी पका रही थी, शायद आयोजकों को भी अंदाज़ा नहीं होगा कि खिचड़ी कुछ और पक रही है. एससी/एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर नाराज़ सवर्णों के कारण मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी हार गई. इस हार में अनुसूचित जाति और जनजाति की नाराज़गी भी शामिल थी मगर मीडिया के विश्लेषणों में इसी बात को प्रमुखता से उभारा गया. अगर उनका साथ नहीं मिलता तो 2013 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को प्रचंड सफलता नहीं मिलती. लेकिन बीजेपी समझ गई कि अनुसूचित जाति का मतदाता उससे खिसक रहा है. भीमा कोरेगांव, ऊना और रोहित वेमुला प्रसंगों को राष्ट्रवाद से ढंकने का प्रयास सफल होता नहीं दिखा. इसलिए नागपुर से कड़ाही मंगा कर खिचड़ी बनाई गई. पहली बार बीजेपी ने अनुसूचित जाति के लोगों को बुलाकर खिलाया, वर्ना इसके पहले अमित शाह सहित उसके नेता कई महीनों तक अनुसूचित जाति के कार्यकर्ता और मतदाता के घर जाकर भोजन करते रहे. भोजन के तुरंत बाद फोटो ट्वीट किया करते थे. यही नहीं 2016 के उज्जैन कुंभ का विवाद याद कीजिए. अमित शाह और शिवराज सिंह चौहान बाल्मीकि घाट पर अनुसूचित जाति के साधुओं के साथ स्नान करने पहुंच गए. इसका नाम समरसता स्नान दिया गया था, दिल्ली की खिचड़ी का नाम भी समरसता खिचड़ी रखा गया था. रविवार को खिचड़ी खिलाकर सोमवार को मोदी सरकार फैसला करती है कि ग़रीब सवर्णों, ईसाई और मुसलमानों को दस फीसदी का आरक्षण दिया जाएगा.

1990 के साल में जब वी पी सिंह लेफ्ट और राइट की खींचातानी में फंसे थे, भीतर से देवीलाल की चुनौती का सामाना कर रहे थे तब उन्होंने अगस्त 1990 में मंडल आयोग के सुझावों को स्वीकार कर लिया और लाल किले से इसका एलान कर दिया. इसकी काट खोजने के लिए आडवाणी राम मंदिर बनाने के लिए रथ यात्रा पर निकल गए. नंवबर 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया कि ओबीसी आरक्षण सही है और 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं होना चाहिए. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी जाती है. उसके बाद हुए दंगों में कई लोग मारे जाते हैं.

उस वक्त भी मंडल की बहस ने कमंडल की बहस को पीछे धकेल दिया और बीजेपी को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की राजनीति का कोई लाभ नहीं मिला. उसके बाद हुए चुनावों में यूपी सहित कई राज्यों में बीजेपी हार गई. तब से बीजेपी बीच चुनाव में राम मंदिर के नाम से किनारा करने लगी और कहने लगी कि जो कोर्ट से फैसला होगा, वही माना जाएगा. इस वक्त संघ के घटकों से राम मंदिर को लेकर दबाव बढ़ता जा रहा है. क्या मोदी राम मंदिर के दबाव की काट में वी पी सिंह की तरह कदम उठा रहे हैं, या फिर वो आरक्षण और राम मंदिर दोनों के सवाल को एक साथ साधने का प्रयास कर रहे हैं? क्या उनके इस फैसले से आरक्षण विरोधी अब आरक्षण का समर्थन करने लगेंगे? आप प्रधानमंत्री के तमाम भाषणों को याद कीजिए, कभी याद आता है कि उन्होंने ग़रीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने की बात की हो. या इसे प्रमुख एजेंडा बनाया हो. पांच साल तक विकास विकास करते रहने वाले मोदी आखिर में आरक्षण पर क्यों दांव लगाना चाहते हैं.

व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के ज़रिए इस बात को खूब फैलाया गया कि आरक्षण ग़लत है. ऐसा झांसा दिया जा रहा था कि आरक्षण समाप्त हो सकता है. धीरे धीरे यह छवि बनती चली गई कि भाजपा और संघ आरक्षण को खत्म कर देंगे. यह बात उनके राजनीतिक विरोध में भी आई. अब वे इस छवि से होते नुकसान को रोकने के लिए आरक्षण का समर्थन करने लगे. आरक्षण समाप्त करने की बहस अब आरक्षण लागू करने की बहस में बदल जाएगी. भाजपा समर्थक आरक्षण विरोधियों को व्हाट्स एप का मेसेज डिलिट करना पड़ेगा. बिहार चुनाव के समय संघ प्रमुख मोहन भागवत को कहना पड़ा कि आरक्षण समाप्त नहीं होगा. शिवराज सिंह चौहान को भी कहना पड़ा कि आरक्षण को कोई खत्म नहीं कर सकता है. मार्च 2016 में प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में अंबेडकर मेमोरियल लेक्चर में आरक्षण और उनकी सरकार को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब दिया था. उन्‍होंने कहा था, 'अब ये भाजपा वाले आए हैं अब आपका आरक्षण जाएगा, जो लोग पुराने हैं उन्हें याद होगा. ऐसा तूफान चलाया कि आरक्षण चला गया. दो टर्म सरकार रही लेकिन आरक्षण पर खरोंच नहीं आई. मध्य प्रदेश में गुजरात में पंजाब में हरियाणा में यूपी में, अनेक राज्यों में हम जिस विचार को लेकर निकले हैं, उस विचार वालों को सरकार चलाने का अवसर दो तिहाई से मिला लेकिन कभी भी दलित पीड़ित शोषित ट्राइबल को खरोंच तक नहीं आने दी है. फिर भी झूठ चलाया जा रहा है. खुद बाबा साहब अंबेडकर आकर आपका यह हक नहीं छीन सकते हैं.'

हमने इस भाषण को पूरा सुना, इसमें कहीं भी गरीब सवर्णों के आरक्षण की बात नहीं थी. उन्होंने कभी भी ईसाई और मुसलमानों के गरीबों को आरक्षण देने की बात नहीं की. तेलंगाना में के सी आर की पार्टी ने मुसलमानों को 12 फीसदी आरक्षण देने का विधेयक लाया था. अमित शाह ने उसका पुरज़ोर विरोध किया था. अमित शाह ने कहा था, 'राव जी ने ओवैसी के दबाव में आकर धर्म के आधार पर आरक्षण देने का बिल लाया. मित्रों मुस्लिम आरक्षण का बिल लाया है वो हमारे दलित ओबीसी के खिलाफ है. क्योंकि पचास फीसदी सीमा तय करी है. इससे ज्यादा रिज़र्वेशन बंद नहीं कर सकता. 12 परसेंट देना है अल्पसंख्यक को देना है तो किसका काटोगे वो केसीआर ने जनता को बताना चाहिए.'

सितंबर 2018 में अमित शाह साफ-साफ कहते हैं कि 50 परसेंट से अधिक आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता है. 2017 के गुजरात चुनावों में भी यही बात कहते हैं. जनवरी 2019 में अब अमित शाह को कहना पड़ेगा कि 50 परसेंट से अधिक रिज़र्वेशन दिया जा सकता है और उनकी सरकार संविधान संशोधन बिल लाने जा रही है. इसके पहले 1999 में नरसिम्हा राव सरकार ने भी गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात कही थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया. गुजरात में आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके को 10 परसेंट आरक्षण दिया गया. जनवरी 2018 में हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक मानते हुए रिजेक्ट कर दिया. हरियाणा में जाट भी मांग रहे थे तो उन्हें क्यों नहीं दिया गया. बीजेपी ने यूपी चुनाव में वादा किया था कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण में एमबीसी के लिए अलग आरक्षण करेंगे. इसके लिए एक कमेटी बनी जिसने दिसंबर 2018 में रिपोर्ट दी कि ओबीसी कोटा के भीतर 7 प्रतिशत आरक्षण यादव और कुर्मी के लिए है, बाकी आरक्षण मोस्ट बैकवर्ड कास्ट को दिया जाए. उस रिपोर्ट का क्या हुआ. क्या वो भी लागू होगा.

क्या आरएसएस इस बात से सहमत होगा, मोहन भागवत ने आरक्षण के लाभों की सामाजिक समीक्षा की बात कही थी, मगर उन्होंने भी जनरल कास्ट, ईसाई और मुसलमानों के आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके को 10 फीसदी आरक्षण का आइडिया नहीं सोचा था. सबको पता है सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं. 2006 के साल से यूपीए के दौर में मीरा कुमार निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात कर रही थीं. बैठकें वगैरह होती थीं मगर कुछ खास नहीं हुआ. नवंबर 2017 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्राइवेट सेक्टर में 50 परसेंट आरक्षण की बात कही थी. उनकी सरकार ने एक फैसला भी किया है कि बिहार में जो भी प्राइवेट कंपनी आउटसोर्सिंग का काम करती है, उसे आरक्षण के प्रावधानों को लागू करना होगा. प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण के सवाल को क्यों छोड़ दिया गया? नौकरियां सरकारी सेक्टर में कम हैं, ये आरक्षित वर्ग को भी नहीं मिलती हैं और अनारक्षित वर्ग के लिए भी नहीं हैं.

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आपको याद होगा जाति की जनगणना का. 2012 में तय हुआ. काफी पैसा खर्च हुआ मगर 2015 में जब रिपोर्ट आई तो जारी ही नहीं किया गया. जाति की जनगणना के आंकड़ों से कौन डरा था. क्यों नहीं सार्वजनिक हुआ. अगर आरक्षण पर ईमानदार बहस करनी ही थी तो उस रिपोर्ट को भी सामने लाना चाहिए. तब नीतीश कुमार ने मोदी सरकार की आलोचना की थी. शरद यादव ने तो निरंतर अभियान चलाया कि जाति की जनगणना की रिपोर्ट जारी की जाए.

इस फैसले से आरक्षण की बहस किस दिशा में जाती है. क्या यह मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक है. बीजेपी सांसद उदित राज ने इस फैसले का स्वागत किया है. कांग्रेस ने भी कहा है कि सपोर्ट करने का ही संकेत दिया है. बसपा भी आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके को रिज़र्वेशन देने की बात करती रही है. इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक आधार को आरक्षण का कारण नहीं माना था. कहा था कि गरीब हो जाने से यह साबित नहीं होता कि सामाजिक बहिष्कार का अपमान झेलना पड़ा हो.


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