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क्या बैंकों में दिखता है स्वच्छ भारत अभियान?

26 फरवरी को हमने प्राइम टाइम की सीरीज़ में कुछ बैंकों के शौचालय का हाल दिखाया था. असर ये हुआ है कि इलाहाबाद बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, सिंडिकेट बैंक और इंडियन बैंक हरकत में आया है. इन सबने सर्कुलर भेजकर महिलाओं के लिए हर ब्रांच में सौ फीसदी शौचालय की व्यवस्था करने का एलान किया है.

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क्या बैंकों में दिखता है स्वच्छ भारत अभियान?
भले ही आप मुझे न देखें लेकिन टीवी कम देखिए. बहुत से लोग अब सोशल मीडिया पर उन चैनलों की करतूत को लेकर लतीफा बना रहे हैं. एक तो पहले श्रीदेवी की दुखद मौत हुई उसके बाद हर चैनल ने श्रीदेवी को अपने अपने हिसाब से मारा और उसे देखने वाले हर दर्शक ने लतीफा बनाकर अपने अपने हिसाब से मारा. आप समझ तो रहे ही होंगे कि टीवी के पास आपकी संवेदनशीलता ख़त्म करने की कितनी ताकत है. कोई पहला मौका तो नहीं है, इस तरह से न्यूज़ चैनल हज़ार बार कर चुके हैं और आगे भी करते रहेंगे. पर एक सवाल आप खुद से पूछिए क्या वाकई आपने तय कर लिया है कि ख़ुद और समाज को बर्बाद कर देना है. 

अगर आपने तय कर लिया है तो फिर आपको यह जानकर खुशी होनी चाहिए कि कई राज्यों में आपके बच्चों के पढ़ने के लिए ढंग का एक कॉलेज तक नहीं है. उन कॉलेजों में शिक्षक नहीं है और जो ठेके पर पढ़ा रहे हैं उन्हें दस बारह हज़ार रुपए दिए जा रहे हैं. अगर आप माता पिता हैं तो अपने बच्चों को कहिए कि हमने तुम्हारी बर्बादी का इंतज़ाम कर दिया है चलो मिलकर टीवी देखते हैं. अगर आपको लगता है कि मैं सही नहीं कह रहा तो ndtv.in पर जाकर यूनिवर्सिटी सीरीज़ के सभी 27 अंक देख जाइये और फिर अपने बच्चे को दिखाइये कि हम तुम्हें इस कॉलेज में बर्बाद होते देखना चाहते हैं, लेकिन अभी चलो टीवी देखते हैं. मौत का बाथटब देखते हैं. आलोचना के बाद भी चैनलों की निर्लज्जता पर कोई असर नहीं पड़ा. आगे भी नहीं पड़ेगा. क्या इसमें आपकी सहमति नहीं है, ये जानने के लिए आप फेसबुक और व्हाट्स अप के मैसेज चेक कीजिए कि आप क्या पढ़ रहे हैं, क्या लिख रहे हैं और क्या शेयर और लाइक कर रहे हैं.

इन्हीं चैनलों को कुछ दिन बार सर्वश्रेष्ठ चैनल का पुरस्कार मिल जाएगा, कोई एंकर विजेता हो जाएगा और फिर सब बधाई संदेशों के साथ ठीक भी हो जाएगा. टीवी कम देखिए. इस पर या तो झूठ का प्रोपेगैंडा चलता है, नेता की नेतागिरी चल रही है, आपको या आपके बच्चे को मानव बम में बदलने के लिए हिन्दू मुस्लिम डिबेट चलाया जाता है. 

26 फरवरी को हमने प्राइम टाइम की सीरीज़ में कुछ बैंकों के शौचालय का हाल दिखाया था. असर ये हुआ है कि इलाहाबाद बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, सिंडिकेट बैंक और इंडियन बैंक हरकत में आया है. इन सबने सर्कुलर भेजकर महिलाओं के लिए हर ब्रांच में सौ फीसदी शौचालय की व्यवस्था करने का एलान किया है. आपके स्क्रीन पर जो पंक्तियां चल रही हैं उन्हीं सर्कुलर की हैं. पटना के पंत भवन में इंडियन बैंक की शाखा में शौचालय की व्यवस्था को लेकर खूब मीटिंग हुई. इलाहाबाद बैंक ने तो 9 जनवरी के अपने सर्कुलर का भी ज़िक्र कर दिया मगर यह नहीं बताया कि एक महीने के बीच इन सर्कुलरों के दौरान हुआ क्या. इलाहाबाद बैंक का सर्कुलर कहता है कि पुरुष और महिला दोनों के लिए शौचालय और पीने के पानी की उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मेसेज में कहा गया है कि 
एनडीटीवी महिला कर्मचारियों के शौचालय की सुविधा पर सर्वे कर रहा है, मगर हल्के से चेतावनी दे दी गई है कि छवि को नुकसान न पहुंचे यानी बैंकर मुझे कुछ न बताएं. अब बहुत देर हो चुकी है. मुझ तक बहुत सारी जानकारियां पहुंच चुकी हैं. हमने कई मैसेज ऐसे भी देखे हैं जिनमें रीजनल हेड से ऊपर के अधिकारी शाखाओं के मैनेजर से अभद्र भाषा में बात करते हैं. वो ऐसा करना जल्दी बंद कर दें वरना उन गालियों को टीवी पर दिखा दूंगा. 

बैंक अपने विज्ञापन पर कितना ख़र्च करते हैं. तीन तीन साल तक स्वच्छता का बैनर टांगे रहे, तब उन्होंने हर शाखा में महिलाओं या पुरुषों के लिए अलग अलग बढ़िया शौचालय क्यों नहीं बनाया. वैसे अब जब बन जाएगा तो बैंकों को प्राइम टाइम के दर्शक से उदघाटन कराना चाहिए, क्योंकि यही वो दर्शक हैं जो श्रीदेवी की दुखद मौत पर चैनलों की नौटंकी छोड़कर एक ज़ीरो टीआरपी एंकर की बैंकों पर सीरीज़ देख रहे थे. आप सभी दर्शकों को आधी बधाई. पूरी बधाई तब जब शौचालय बन जाएंगे. नीरव मोदी से गिनें तो बैंक सीरीज़ का यह 9वां अंक है वैसे बैंके के भीतर जो दुर्दशा है उसके हिसाब से यह छठा अंक होना चाहिए. 

इस शौचालय को देखकर आप दिल न छोटा करें बस पेट पर नियंत्रण करने की इच्छाशक्ति बड़ी कर लें. यह पंजाब के किसी बैंक के किसी शौचायल का है. भेजने वाले से वादा है कि नाम न बताऊं तो निभा रहा हूं. दरवाज़े में कुंडी नहीं है इसलिए बाहर कोई खड़ा रहता है. महिला कर्मचारी फिलहाल नहीं हैं मगर जब जांच के लिए या कैश के साथ आती हैं तो इसी शौचालय का इस्तमाल करना पड़ता है. बाहर कोई खड़ा रहता है. कमोड के बगल में कुर्सी क्यों रखी है इस पर आप भी कुछ दिमाग लगाइये. ज़रूर कुछ गिर रहा होगा, जिसे रोकने के लिए कुर्सी टिका दी गई होगी. सोचिए कि जब यह कुर्सी यहां आ गई है तो जहां ये थी वहां क्या रखा होगा.

शायद यहीं की कुर्सी टॉयलेट में रखी है तभी यहां खटिया रख दी गई है. खटिया पर बैठकर काम होता है. इस तरह से खाना गरम करने की मशीन रखी हुई है. आपका बैंकर इन हालात में काम कर रहा है. इस दूसरी तस्वीर को देखिए. कभी यहां टॉयलेट हुआ करता था, जगह नहीं है तो फाइलें रख दी गई हैं. बड़ी संख्या में बैंक की शाखाओं से ग्राहकों, रिपोर्टरों और पीड़ित पक्ष ने फीडबैक भेज दिए हैं. किसी भी सरकार के लिए यह फीडबैक सोने का अंडा है. चाहे तो ठीक कर दो दिन में वाहवाही लूट सकती है. ऐसा हो जाए तो मुझे भी जुलाई तक यह सीरीज़ नहीं करनी पड़ेगी. इस तरह से लगातार तो नहीं मगर बीच बीच में करता रहूंगा. 

बैंकों के जो बड़े अफसर हैं चालाक होते हैं. जब शौचालय की हालत दिखाई तब उन्हें होश आया. जब मैंने कहा कि दिवाली तक यह सीरीज़ करूंगा तो कई बैंकों ने अपने ब्रांच की ख़बर लेनी शुरू कर दी है. यह हिमाचल प्रदेश के एक ग्रामीण बैंक के शौचालय का हाल है. इसकी तस्वीर देखकर आपको पता चल जाएगा कि बैंक अपने कर्मचारियों का किस तरह ख्याल रखते हैं. यह वीडिओ कानपुर के पंजाब नेशनल बैंक की श्याम नगर शाखा का है. यहां एक ही शौचालय है जो बैंक के बाहर है. वो भी इस हालत में है. यहां एक महिला कर्मचारी भी काम करती हैं. पुरुष और स्त्री दोनों के लिए एक ही शौचालय है. कारण और बहाने में मेरी दिलचस्पी नहीं है, मेरी दिलचस्पी जो है उसे दिखाने में है.

केंद सरकार की महिलाओं को 180 दिन का मातृत्व अवकाश मिलता है. साथ में मांएं दो साल तक चाइल्ड केयर लीव ले सकती हैं. या तो एक साथ ले सकती हैं या फिर 18 साल होने तक टुकड़ों-टुकड़ों में. उस दो साल की छुट्टी ले सकती हैं. मगर उसी केंद सरकार से नियंत्रित सरकारी बैंकों में महिलाओं को मातृत्व अवकाश मात्र 6 महीने का मिलता है. इतना अंतर क्यों है. क्या चेयरमैन साहब लोग एक दिन में महिला बैंकरों का मातृत्व अवकाश कें सरकार में काम करने वाली महिलाओं के बराबर नहीं कर सकते हैं. यह अंतर अभी तक कैसे है. हमारे एनडीटीवी में तो हम पुरुषों को 15 दिन का पितृत्व अवकाश मिलता है. पुरुष अधिकारियों का भी हाल बुरा है. जो शीर्ष के दो प्रतिशत अधिकारी हैं रीज़नल हेड टाइप उनकी काफी मौज है, मगर नीचे के मैनेजरों को रात के नौ नौ बजे तक बैंक में रूकना पड़ता है. आखिर बैंकिंग जैसा काम कोई सुबह के दस बजे से लेकर रात के दस बजे तक कैसे करता है. उसकी ज़िंदगी क्या हुई फिर. हम बैंक कर्मचारियों की बीमारियों पर भी अलग से इस सीरीज़ में चर्चा करने वाले हैं. मैं यह सब एक दो शिकायतों के आधार पर नहीं कह रहा. यकीन कीजिए. हज़ारों मैसेज पढ़े हैं. उसके बाद ये फीडबैक तैयार किया है जो मैं आपको और सरकार को दे रहा हूं.

हमारी सीरीज़ के तीन चार फ्रंट हैं. सैलरी तो है ही, उससे ज्यादा ज़बरन लोन दिलवाना, ग्राहक के भरोसे का इस्तेमाल कर खराब बीमा पालिसी बिकवाना. तीसरा है ट्रांसफर. आपमें से बहुत से लोग होंगे जिन्हें पता चल गया होगा कि बिना आपकी जानकारी के ही बीमा पॉलिसी बेच दी गई है. 

आप बहुत अच्छे दोस्त हैं और सही मायने में गांधी जी की आज़ादी का मान रखते हैं. आपकी बात सही लगी कि आप नाम बताने से नहीं डरते. हमें सोचना होगा कि नौकरी हमें ज़िंदा रखने के लिए है या मारने के लिए. हमारे पेशे में भी काफी तनाव है. कम तनाव नहीं है, लेकिन बैंकिंग जैसा मुश्किल काम कोई 10 बजे सुबह से रात के नौ बजे तक क्यों करेगा. ऐसा कौन सा काम है जो आठ घंटे में खत्म नहीं हो सकता है. जब से बैंक अफसरों और कर्मचारियों से बीमा बिकवाया जा रहा है, म्युचुअल फंड बिकवाया जा रहा है, टारगेट ने उनकी ज़िंदगी ख़त्म कर दी है. किसी को इसी बात की ऑडिट करनी चाहिए कि बैंक में लोग कितने घंटे काम करते हैं. हम क्रॉस सेलिंग के लिए जो टारगेट का आतंक है उस पर अलग से एपिसोड करेंगे, लेकिन बैंकों के भीतर ग़ुलाम ज़िंदगी पर बात बहुत ज़रूरी है. 

इससे दो बातें पता चलती है. एक कि हम छोटे बच्चों से भी अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं. दूसरा कि सैंकड़ों की संख्या में पुरुष और महिला बैंकरों ने काम के इस तनाव की शिकायत की है. दबाव डालकर लोन पास करवाया जा रहा है. यह सीरीज़ सैलरी बढ़ाने की बात से शुरू हुई थी मगर इसके तमाम पहलुओं को देखते हुए यही लगता है कि यह अर्थव्यवस्था कहने को ही उदार है, इसके भीतर इंसान को ग़ुलाम बनाकर रखने का पूरा इंतज़ाम है. एक बैंकर क्लर्क ने बताया कि नोटबंदी के दौरान इतना दबाव था कि नोट गिनने में ग़लती हो गई. ढाई लाख कम हुए तो उसे अकेले लोन लेकर भरपाई करनी पड़ी. अगर सारे बैंकर यही सच बोल दे कि नोटबंदी के दौरान हुई ग़लतियों, सड़े गले नोटों और जाली नोटों के बदले किस-किस ने कितना जुर्माना भरा तो उसकी संख्या कई करोड़ में पहुंच सकती है. 

एक क्लर्क ढाई लाख रुपये अपनी जेब से दे तो उसकी क्या हालत होगी. जबकि उसकी सैलरी 20,000 भी नहीं होती है. ये सारी बातें बैंकरों ने खुद बताई है. वे बोल नहीं सकते तो उनकी बातों को फीडबैक के तौर पर पेश कर रहा हूं. आप इसका प्रिंट आउट लेकर ऊपर के दो प्रतिशत वाले अफसरों से नहीं बाकी 98 प्रतिशत बैंकरों से पूछिए एक एक बात पर हां कहेंगे. कहेंगे कि यही सही है. 

मेहुल चौकसी का अभी तक पता नहीं चला कि वे किस देश का सम्मान बढ़ा रहे हैं. उनके वकील संजय एबोट ने बताया है कि मेहुल को प्रत्यर्पण निदेशालय का समन तो मिला है मगर पासपोर्ट रद्द होने के कारण यात्रा नहीं कर सकते हैं. तो क्या सरकार ने इनका पासपोर्ट इसलिए रद्द किया है कि ये भारत न आ सकें. यह ख़बर खुश्बू नारायण और सदाफ़ मोदक की है. इंडियन एक्सप्रेस में छपी है. नीरव मोदी जी भी भारत भूमि पर अभी तक अवतरित नहीं हुए हैं. पंजाब नेशनल बैंक ने सोमवार को स्टॉक एक्सचेंज से कहा है कि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी ने 1322 करोड़ का एक और फ्रॉड किया है. अब इन दोनों के फ्रॉड के कारण पंजाब नेशनल बैंक को जो चूना लगा है उसकी राशि 12,600 करोड़ हो गई. 11,400 करोड़ से बढ़कर 12, 600 करोड़ हो गई है मगर नीरव मोदी जी नहीं आए हैं. चौकसी जी की चौकी कहां लगी है किसी को पता नहीं है. लाइवमिंट पर एक खबर है कि नीरव मोदी की कंपनी फायरस्टार डायमंड ने बैंकरप्ट घोषित होने के लिए आवेदन किया है. इसका कारण बताया है कि सप्लाई चेन में दिक्कत हो रही है. बहुत दिनों से मैच एकतरफा चल रहा था तो इज़ इक्वल टू करने के लिए सिंभोली चीन मील के चेयरमैन गुरमित सिंह मान, उप प्रबंध निदेशक गुरपाल सिंह और अन्य के खिलाफ 97.85 करोड़ के फ्रॉड का केस दर्ज हुआ है.

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गुरपाल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के दामाद हैं. कांग्रेस पार्टी ने सीबीआई के इस कदम का स्वागत करते हुए ट्वीट किया फिर बाद में डिलिट कर दिया. कैप्टन अमरिंदर का कहना है कि गुरपाल सिंह केवल 12.5 प्रतिशत शेयर के हिस्सेदार हैं. उनके दामाद को राजनीति के तहत खींचा जा रहा है. फिर भी 12,600 करोड़ के फ्राडिए पकड़ में न आए और उसके बदले 97 करोड़ का फ्रॉड करने वाले पकड़ा जाए तो वह भी ठीक है. कम से कम यह तो रहेगा कि किसी को बख्शा नहीं जा रहा है. बड़े वाले को पकड़ा नहीं जा रहा तो क्या हुआ, छोटे वाले को बख्शा नहीं जा रहा है. 

वित्त मंत्रालय ने सभी बैंकों से कहा है कि वे 50 करोड़ से ऊपर के सभी एनपीए खातों की जांच करे, देखें कि उनमें क्या फ्रॉड हुआ है और सीबीआई को रिपोर्ट करें. सीबीआई का काम भी बढ़ गया लेकिन अगर यह हुआ तो भले ही नीरव मोदी और मेहुल चौकसी अभी पकड़ में नहीं आ रहा है मगर एक बार भांडा फूटे तो हर दल के सर्वदलीय प्रभावशाली लोग धरा जाएंगे लेकिन क्या ऐसा होगा. जब तक यह होता है आप उना के इस बैंक की तस्वीर देखिए. अंधेरा जैसा दिख रहा है. यह खुली जगह है. इस बैंक में शौचालय नहीं है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का है. एक ग्राहक ने भेजा है. इसका कहना है कि बैंक के कर्मचारियों के लिए शौचालय नहीं है. बैंक इसे निगेटिव फीडबैक के रूप में न लें. बड़े बड़े घोटाले के बाद भी बैंकों की छवि खराब नहीं होती तो चिन्ता न करें, शौचालय न होने और ऐसी जगह में शौच करने की तस्वीर से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है. अगर यहां शौचालय बन जाएगा तो उल्टा लोग बैंक की तारीफ करेंगे. 


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