प्राइम टाइम इंट्रो : असम में जीतकर मनोवैज्ञानिक दबाव से उबरी बीजेपी

प्राइम टाइम इंट्रो : असम में जीतकर मनोवैज्ञानिक दबाव से उबरी बीजेपी

बीजेपी मुख्यालय में नरेंद्र मोदी, अमित शाह और पार्टी के अन्य नेता।

असम में भारतीय जनता पार्टी की जीत पांच राज्यों के चुनावों की सबसे बड़ी खबर है। असम चुनावों के दौरान छपे तमाम विश्लेषणों को आप पढ़ेंगे तो उनमें इसी बात का जिक्र मिलेगा कि असम की राजनीति की अपनी जटिलता है। वहां की सामाजिक विविधता के कारण भारतीय जनता पार्टी के लिए लड़ाई आसान नहीं है। अगर उन विश्लेषणों को सही माने तो इस लिहाज से भी बीजेपी की जीत बड़ी हो जाती है। असम में भारतीय जनता पार्टी की जीत ने उसे उस मनोवैज्ञानिक दबाव से उबार लिया है जिसे वह दिल्ली और बिहार की हार के बाद महसूस कर रही थी।

126 सीटों की विधानसभा में अकेले भारतीय जनता पार्टी को 61 सीटें मिली हैं। करीब-करीब पार्टी ने अकेले ही सरकार बनाने के 63 के आंकड़ों को छू लिया है। उसके दोनों सहयोगी दलों का भी प्रदर्शन अच्छा रहा है। एजीपी को 14 और बोडो लैंड को 12 सीटें मिली हैं। 2011 के नतीजों से तुलना करें तो बीजेपी 5 से 61 पर पहुंची है। एजीपी को पिछली विधानसभा की तुलना में सिर्फ 4 सीटें अधिक मिली हैं। बोडो लैंड पीपुल्स फ्रंट के पास 12 सीटें थीं। 12 सीटें मिली हैं। यानी सीटों के मामले में भारतीय जनता पार्टी काफी फायदे में रही है। कांग्रेस 78 सीटों के साथ मैदान में उतरी थी लेकिन हार कर 25 पर आ गई। बदरुद्दीन अजमल की पार्टी 18 सीटों के साथ मैदान में उतरी थी मगर 13 पर रह गई। अजमल की पार्टी को नुकसान कम हुआ मगर कांग्रेस को करंट मार गया। 2014 के लोकसभा के हिसाब से असम की 14 में से बीजेपी ने 7 सीटें जीती थीं और 36.8 फीसदी वोट हासिल किए थे। बीजेपी ने इस बार गठबंधन की वजह से सीटें भले ही अच्छी जीती हों लेकिन वोट प्रतिशत उसका गिरा है। उसे 29.5 फीसदी वोट मिले हैं।

कांग्रेस ने बिहार से नहीं सीखा और गठबंधन नहीं किया। बीजेपी ने कहा है कि उसने बिहार से सीखा और गठबंधन किया। असम की जीत के पीछे एजीपी से 2011 में बीजेपी में आए सर्बानंद सोनोवाल और 2015 में कांग्रेस से भारतीय जनता पार्टी में आए हिमांता विश्वा शर्मा के जनाधार की बड़ी भूमिका है। राजनीति का करिश्मा देखिए कि जो असम गण परिषद इस चुनाव में बीजेपी की पार्टनर है, उसी का पूर्व नेता मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। हो सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंता सोनोवाल मंत्रिमंडल में सहयोगी की तरह काम करें। हिमांता फिर से उप मुख्यमंत्री बन सकते हैं।

2011 में सोनोवाल प्रफुल्ल महंता से अजमल से नजदीकी के सवाल पर एजीपी छोड़ बीजेपी में आ गए। एक साल के भीतर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बन गए। यानी 2012 तक बीजेपी के पास अपने नेताओं का इतना अभाव था कि दूसरे दल से आया व्यक्ति साल भर के भीतर प्रदेश अध्यक्ष बन जाता है। 2014 में बीजेपी सांसद बनते हैं और केंद्र में मंत्री। इतना भरोसा कांग्रेस अपने ही पुराने नेता हिमांता विश्सा सर्मा पर नहीं कर पाई। उधर बीजेपी जिस हिमांता विश्वा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रही, उसे अपने पाले में ले लेती है। इसी अप्रैल में इकॉनामिक टाइम्स और डीएनए की खबर के अनुसार एक प्रेस कांफ्रेंस में अमित शाह ने कहा है कि हिमांता के खिलाफ भ्रष्टाचार के जो भी आरोप लगे हैं उसकी जांच होगी। अखबार ने पीटीआई के हवाले से खबर छापी है। सितंबर 2015 तक हिमांता कांग्रेस में ही थे। बीजेपी का कमाल यह रहा कि उसने सर्बानंद को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया और हिमांता को विद्रोह भी नहीं करने दिया।

उधार के नेतृत्व पर आधार तैयार किया है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने। बीजेपी ने दूसरे दलों से आए सिर्फ 14 उम्मीदवारों को ही टिकट दिया, बाकी उसके अपने ही उम्मीदवार रहे। राज्य की राजनीति का अध्ययन करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी इस जीत की बुनियाद डालने का श्रेय दे रहे हैं। आखिर क्या किया आरएसएस ने। असम में काम कर चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ सदस्य से हमने बात की। सिर्फ इतना बताना काफी नहीं है कि संघ ने बहुत मेहनत की, मेहनत में क्या किया यह जानने के लिए जब बातचीत की तो कई बातें निकलकर आईं।

असम में 590 के करीब सरस्वती शिशु मंदिर हैं। एक शिक्षक वाले साढ़े चार हजार स्कूल हैं। यह स्कूल दूरदराज़ के इलाकों में चलते हैं। इनके लिए शिक्षक की ट्रेनिंग संघ देता है। यह शिक्षक संघ की विचारधारा से लैस होते हैं। इन शिक्षकों को पांच हजार का मानदेय संघ अपने स्तर से देता है, लोगों और संस्थाओं से चंदा लेकर। पूर्वोत्तर के छात्रों के लिए असम के भीतर 100 से अधिक छात्रावास चलते हैं।

भारत में कोई भी ऐसी संस्था नहीं है जिसके पास एक राज्य में इतने स्कूल हों। कोई प्राइवेट संस्था भी संघ से इस मामले में मैच नहीं कर सकती है। अकेले असम में संघ की इस वक्त करीब साढ़े बारह सौ शाखाएं चलती हैं। संघ की एक और संस्था यहां काफी काम करती है जिसका नाम है सेवा भारती। बातचीत में पता चला कि सेवा भारती के सात हजार हेल्थ वर्कर काम करते हैं। इन्हें स्वास्थ्य रक्षक कहा जाता है। संघ इन्हें होम्योपैथी और प्राकृतिक चिकित्सा का प्रशिक्षण देता है जो उनके रोजगार का भी ज़रिया बन जाता है। संघ 14 साल से हर साल आठ दिनों की घनवन्तरी सेवा यात्रा निकालता है। इसमें देश भर से करीब 200 एमबीबीएस डाक्टर लाए जाते हैं। इनकी टीम आठ-आठ दिनों तक अलग-अलग इलाके में कैंप लगाती है। और एक ट्रक दवा लोगों से मांगकर गरीबों में बांटी जाती है।

संघ कार्यकर्ता ने बताया कि हम लोगों को अपनी विचारधारा और सेवा से प्रभावित करते हैं। किसे वोट देना है कभी नहीं कहते, लेकिन राजनीति में कोई उल्टा पुल्टा करेगा तो उस पर नजर रखना भी हमारा काम है। तमाम संस्थाओं से जुड़े पंद्रह बीस हजार कार्यकर्ता चुनावों के समय अपनी जिम्मेदारी खुद समझ जाते हैं। खासकर जब उनके संगठन को गाली दी जाती है तब वे उस तरफ तो कभी मतदान नहीं करेंगे जिनसे गाली पड़ती है। इसी बातचीत में एक दिलचस्प बात यह पता चली कि इस बार असम के सत्राधिकार काफी नाराज थे। जैसे मठ होता है उसी तरह असम में सत्र होता है। मठाधीश को वहां सत्राधिकार कहते हैं। असम के सत्रों की जमीन पर बांग्लादेशी मुसलमानों के कब्ज़े के कारण नाराजगी बढ़ी है। सत्राधिकारों ने भी संघ को टारगेट किए जाने से नाराजगी जताई है। ढाई सौ सत्राधिकारों ने परिवर्तन की बात कही थी। इन सत्रों में भक्ति, नृत्य, संगीत का शिक्षण, प्रशिक्षण चलता है।

संघ को चुनौती देने वाले या संघ मुक्त भारत की बात करने वालों को क्या संघ के इस ढांचे और कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता का इल्म है। ऐसा नहीं है कि संघ का यह आधार हमेशा बीजेपी को जीत ही दिला देता है लेकिन अगर संघ से लड़ना है तो लड़ने वालों की तैयारी क्या है। इस बार 250 सत्राधिकारों यानी धार्मिक मठाधीश परिवर्तन की बात चलाने लगे। इन मठों से जुड़े भक्तों की श्रृंखला ने कांग्रेस के आधार को भीतर ही भीतर कमजोर कर दिया। अब यह देखना होगा कि क्या कांग्रेस कभी इन सत्राधिकारों के जरिये नरम हिन्दुत्व की राजनीति करती थी। हमने जब यह सवाल पूछा कि यह इतने ही ताकतवर हैं तो पहले क्यों नहीं बीजेपी के पक्ष में बदलाव करा सके। इसके जवाब में यह बताया गया कि बांग्लादेशी मुसलमानों के प्रति कांग्रेस सरकार की सहनशीलता से लोग आजिज़ आ गए थे और संघ को टारगेट किए जाने से यह नाराज हो गए।

बांग्लादेशी मुसलमानों का मुद्दा बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर उठाती रही लेकिन इससे असम में वह जगह नहीं बना सकी। इस बीच बदरुद्दीन अजमल की पार्टी बन गई और लगातार सीटें जीतने लगी। इस बार अजमल खुद चुनाव हार गए हैं, उन्हें कांग्रेस के उम्मीदवार वाजिद अली चौधरी ने 16,723 मतों से हरा दिया है। अगर कांग्रेस इसी तरह अजमल को सामने से चुनौती देती तो उस पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के पोषण का आरोप नहीं लगता। जानकार कहते हैं कि अजमल ने मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया जिसकी प्रतिक्रिया में कांग्रेस नरम हिंदुत्व की तरफ जाने को मजबूर हुई। लेकिन यही अजमल 2009 में यूपीए को बाहर से समर्थन भी दे रहे थे। कांग्रेस अगर हिंदुत्व आधारित सांप्रदायिकता के प्रति गंभीर होती तो मुस्लिम सांप्रदायिता से भी संघर्ष करती। हालांकि अजमल कहते हैं कि उनकी पार्टी सिर्फ मुसलमानों की पार्टी नहीं हैं। दूसरे धर्मों के लोगों को भी टिकट देती है। अब संघ का कहना है कि बीजेपी सरकार को बांग्लादेशी मुसलमानों की पहचान कर उन्हें बाहर भेजना होगा। क्या वाकई बीजेपी इतने बड़े स्तर पर मुसलमानों की पहचान करेगी और निकालने का काम करेगी। संघ की मानें तो इस आधार पर उसकी सरकार की परीक्षा होनी है। बीजेपी ने 9 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, दो ही जीत सके। जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक मुसलमान हैं, वहां बीजेपी की सरकार है। उसके बाद असम में हैं, वहां बीजेपी की सरकार है।

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असम में भारतीय जनता पार्टी ने मुस्लिम वोट के मिथक को भी ध्वस्त कर दिया है। लोकसभा चुनावों के दौरान कहा जाता था कि यूपी में इतनी सीटें मुस्लिम बहुल हैं। इसके बाद भी बीजेपी ने 70 से अधिक लोकसभा सीटें यूपी में जीत लीं। यूपी में विरोधी दलों के अलग लड़ने से लाभ मिला जैसे असम में मिला। असम में भी कांग्रेस और एयूडीएफ मिलकर लड़ते तो दोनों का मत प्रतिशत बीजेपी से अधिक होता। कांग्रेस ने न तो अजमल को खुलकर चुनौती दी न ही हाथ मिलाया। असम में मुस्लिम मतों की ताकत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि एक बार जमीयत उलेमा हिन्द के मौलाना असद मदनी ने अपनी 18 मांगें पूरी न होने पर कांग्रेस की सरकार ही गिरा देने की बात कह दी थी। आज असम में जो सरकार बन रही है उसमें न तो अजमल का असर है न मदनी का। मुस्लिम वोट की चुनावी ताकत को बीजेपी ने अपनी रणनीति से कमजोर कर दिया।

असम की जीत बीजेपी के लिए बड़ी है। बीजेपी मुख्यालय में असम की परंपरा में प्रधानमंत्री का स्वागत हो रहा है। जब प्रधानमंत्री बनकर नरेंद्र मोदी बीजेपी दफ्तर में आए थे तब उन्होंने देवदास आप्टे का नाम लिया था। यह वही आप्टे हैं जो नागपुर से 1963 में जनसंघ के प्रचारक बनकर असम गए थे। जब प्रधानमंत्री अपने राजनीतिक प्रशिक्षण के दौर में दिल्ली आए थे तब आप्टे जी ही बीजेपी मुख्यालय के इंचार्ज थे। नाना जी देशमुख आप्टे जी को अवध तिरहुत मेल से असम ले गए। आप्टे जी अभी 80 साल के हैं लेकिन 24 साल की उम्र में असम गए थे। आप्टे जी से बात की तो उन्होंने बताया कि लंबा वक्त लग गया असम को बांग्लादेशी मुसलमानों का मसला समझाने में। आप्टे जी ने 1964 में एंटी इंफिल्ट्रेशन कमेटी बनाई। तब असम की राजधानी शिलांग हुआ करती थी। वहां की लाइब्रेरी से सेंसस की रिपोर्ट लेकर आए। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विधायक मधुसूदन दास को इस मसले से जोड़ दिया। आप्टे जी इस जीत पर खुश हैं। संघ जीत के इस दृश्य में शामिल नहीं है पर क्या यह जीत उसकी नहीं है। उसके अपनों की ही खुशी है।