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प्राइम टाइम इंट्रो : चक्रव्यूह में फंसे किसानों का रचनात्मक प्रदर्शन

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प्राइम टाइम इंट्रो : चक्रव्यूह में फंसे किसानों का रचनात्मक प्रदर्शन
लोकतंत्र की हम जब भी बात करते हैं, हमारा ध्यान राजनीतिक दल और उनके नेताओं की तरफ ही जाता है. स्वाभाविक भी है. लेकिन आप यह भी देख सकते हैं कि जब चुनाव समाप्त हो जाता है तो वो कौन लोग हैं जो आवाज़ उठाने का साहस करते हैं, सत्ता से सीधे टकराते हैं. आप पाएंगे कि प्रेस कांफ्रेंस में तो नेता दिखते हैं लेकिन सड़क पर तरह-तरह के आम लोगों का समूह सरकारों और संस्थाओं की ताकत से लोहा ले रहा होता है. राजनीति से निराश होते वक्त भी हम इनकी तरफ नहीं देखते. हो सकता है कि हमें ये लगता हो कि लाठी खाते शिक्षकों से हमारा क्या लेना देना, फीस वृद्धि की मार सहने वाले मां-बाप से हमारा क्या लेना, रोज़गार की मांग करने वालों से हमारा क्या. हालांकि आप इन सबमें होते हैं लेकिन देखने और सोचने की ट्रेनिंग ऐसी हो गई है कि पार्टी के बाहर आप किसी को नेता की तरह देखते ही नहीं हैं. आप भी और हम लोग भी. हम सब यह मान चुके हैं कि लोकतंत्र के लिए संघर्ष राजनीतिक दलों के मुख्यालयों से ही होता है.

आज देश के तमाम ज़िलों में बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के छोटे-छोटे समूह बनाकर मां-बाप तमाम अधिकारियों को ज्ञापन दे रहे हैं. बहुत कुछ हासिल नहीं हो रहा, मगर इनकी लड़ाई इस भरम को तोड़ रही है कि प्राइवेट स्कूल के नाम खुली ये दुकानें सब कुछ अच्छा ही कर रही हैं. मां-बाप की मजबूरी का लाभ उठाकर स्कूल उन पर तरह-तरह की शर्तें थोप रहे हैं. एक किस्म की मानसिक और आर्थिक गुलामी में रहने के लिए मजबूर कर रहे हैं. इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे मां-बाप का साथ किस दल का कौन सा नेता दे रहा है? तो क्या ये लोग बिना किसी नेता की मदद के अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. लुधियाना में ही ये कौन लोग हैं जो प्रदर्शन कर रहे हैं, दिल्ली गाज़ियाबाद, नोएडा के तमाम स्कूलों के बाहर प्रदर्शन करने वाले मां-बाप में हम कभी नेतृत्व की संभावना नहीं खोजते हैं. हम मुंबई के आज़ाद मैदान में स्कूलों की मनमानी के ख़िलाफ़ अनशन पर बैठे मां-बाप में नेतृत्व की संभावना नहीं खोजते. राजनीतिक दलों में नेता नज़र नहीं आता है तो रोने लगते हैं कि देश कौन चलाएगा.

नेता अगर एक मिनट में चाहें तो प्राइवेट स्कूलों की धांधली बंद हो सकती है. वे चाहें तो सरकारी स्कूल भी सुधर सकते हैं मगर सबको पता है अंतिम लक्ष्य नोट बनाना है. काम के नाम पर उतना ही करना जिससे मीडिया में हेडलाइन बन जाए कि स्कूल का दौरा हो गया. टीचर को हड़का लिया गया, फिर स्कूलों में खाली शिक्षकों के हजारों पदों के सवाल, बेंच से लेकर किताबों के सवाल कहीं खो जाते हैं. आप देखेंगे कि हमारी आज की राजनीति वही कर रही है जिससे व्हाट्स ऐप या फेसबुक में अपलोड करने के लिए तस्वीरें छवियां पैदा की जा सकें. ताकि काम जितना हो नहीं, उससे कहीं ज़्यादा लगे कि हां कुछ हो रहा है.

अब तो कई महीने बीत गए हैं, बिल्डरों पर लगाम लगाने का दावा करने वाले कानून को बने हुए. इसके बाद भी हर रविवार को नोएडा ग्रेटर नोएडा में ही फ्लैट ख़रीदने वालों का प्रदर्शन क्यों जारी है. क्या आपने किसी राजनीतिक दल के नेता को रविवार की धूप में इनके साथ प्रदर्शन करते देखा है. वे नहीं दिखेंगे हां अपने घर में बुलाकार मुलाकात करते हुए ज़रूर दिखेंगे जिसकी तस्वीर मीडिया में प्रदर्शन करने वाले लोगों से कहीं ज़्यादा छपती है. आख़िर जनता के खड़े किए हुए संघर्ष में बिना दिखे कोई नेता नायक या जननायक कैसे बन जाता है. उसे तो आप ही बनाते हैं. फिर भी ताकतवर बिल्डरों के खिलाफ प्रदर्शनों का यह सिलसिला उम्मीद नहीं जगाता है कि कोई कितनी भी सत्ता हासिल कर ले, लोकतंत्र को छीन नहीं सकता है. ये कौन लोग हैं जो बिल्डरों से लोहा ले रहे हैं ,सोचिएगा कभी इनके बारे में.

स्कूल और रीयल इस्टेट ऐसा गढ़ है जहां नेताओं की जान बसती है. इसके ज़रिए लोगों का हौसला पस्त किया गया. उनकी कमाई हड़पी जा रही है इसके बाद भी थोड़ी-बहुत संख्या में ही सही मगर कुछ लोग हैं जो आवाज़ उठा रहे हैं. इन लोगों को देखते हुए उम्मीदों से लबालब हो जाना चाहिए. गाय और मंदिर से फुर्सत निकालकर सोचिएगा कि जब जनता का कोई मुद्दा होता है तो नेता कहां होता है. ऐसा नहीं कि नेता के मुद्दे जनता के नहीं होते, बस नेताओं के मुद्दों को जनता तय नहीं करती है. उनका अपना तरीका होता है. किसान पैदल मार्च करेंगे तो दो तस्वीर नहीं छपेगी, टीवी पर दो मिनट फुटेज नहीं दिखेगा, मगर किसानों को लेकर बड़े राजनीतिक दल के नेता पदयात्रा करेंगे तो उसका घंटों सीधा प्रसारण किया जाएगा और वाहवाही होगी कि किसानों की तकलीफ समझने वाला नेता आ गया है. यह सब आपके आशीर्वाद से कायम है. इसे किसी बाहरी ने नहीं बल्कि आपने बनाया है.

एक तस्वीर है, मार्च 2015 की, झारखंड की है. एक कागज़ पर लोग पखाना कर रहे हैं, टट्टी कर रहे हैं. इंग्लिश में आजकल इसे वाशरूम जाना कहते हैं क्योंकि टायलेट या लैट्रिन अब सुनने में टट्टी या पखाना जैसा भद्दा लगता है. यह तस्वीर है नक्सल प्रभावित लातेहार के बरवाडीह ब्लाक आफिस की जहां साठ गांव के लोग जमा हुए थे. तो यह कागज पर टट्टी करते हुए क्या कर रहे हैं. दो साल पहले इस तरकीब से इन किसानों ने भूमि अधिग्रहण कानून का विरोध किया था. इनका लक्ष्य था कि प्रदर्शनों को देखने और देखकर न देखने की हमारी आदत को गहरा झटका लगे. हमारे सहयोगी आलोक पांडे ने तब लिखा था कि यह आइडिया किसी पीआर या ईवेंट मैनेजमेंट कंपनी की तरफ से नहीं आया था बल्कि आदिवासी समाज के नेताओ की मौलिक सोच थी. वे बताना चाहते थे कि भूमि अधिग्रहण कानून में कितना दुर्गंध है.

आम लोगों के प्रदर्शनों और नेताओं के आयोजनों में कितनी रचनात्मकता आ गई है. हालांकि दोनों की रचनात्मकता में काफी अंतर है, दोनों की नैतिकता में भी अंतर है लेकिन बदलाव तो आ ही चुका है. पहले पदयात्रा हुआ करती थी, फिर वो रथयात्रा हुई, फिर वो रोड शो हुआ और अब रोड शो भी बदल गया है. लेज़र लाइट से लेकर हज़ारों बाइकों का इस्तमाल होता है. सब कुछ इस तरह से होने लगा है जैसे राजनीति मुंबई के महबूब स्टुडियो में फिल्माई जा रही है. वहीं पर स्विट्ज़रलैंड है वहीं पर इंग्लैंड है. नेताओं के प्रदर्शन अब टीवी पर प्रसारण के हिसाब से होते हैं. उनका कैमरा एंगल तक बदल गया है ताकि आप के दिमाग पर गहरा असर हो. गरीबी दूर करने वाले और गरीबी झेलकर मंच पर पहुंचे नेताओं के कपड़े तक डिजाइनर हैं, महंगे हैं. ये सब आपको अच्छा भी लगता है. लेकिन ग़ौर से देखिए आपके टीवी स्क्रीन पर आने के लिए नेता या आयोजन में कितनी तेजी से बदलाव आ रहे हैं.

कुछ साल पहले जब रामलीला मैदान में दिन-रात सत्याग्रह चल रहा था तब नर्मदा नदी में कुछ किसान जल सत्याग्रह करने उतर गए. 213 लोगों ने 32 दिनों तक कमर भर पानी में खड़े होकर प्रदर्शन किया था. उनके पांव खराब हो गए थे. मीडिया और सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए आम लोगों को क्या-क्या करना पड़ रहा है. वे अपनी रचनात्मकता के ज़रिए इस लोकतंत्र को समृद्ध करते रहे. कभी जीत जाते हैं, कभी हार भी जाते हैं.

14 मार्च को तमिलनाडु से 134 किसान दिल्ली आए. तमिलनाडु में भयंकर सूखा है, 140 साल में ऐसा सूखा किसी ने नहीं देखा, मगर वहां के नेता सत्ता का खेल खेल रहे हैं. किसान मुआवज़े और कर्ज़ माफी की मांग को लेकर दिल्ली आए. हमने 17 मार्च को प्राइम टाइम किया था कि किस तरह हिन्दी भाषी प्रदेश में आकर इन किसानों ने अपनी देह को ही भाषा में बदल दिया. मुश्किल से इनके बीच हिन्दी बोलने वाला है. वैसे हिन्दी बोल पाते तब भी कोई गारंटी नहीं है कि मीडिया और सरकार सुनती ही. यह पहलू अभी छोड़ दीजिए, देखिए कि इन किसानों ने अपने प्रदर्शन को किस तरह से हर दिन एक नई ऊंचाई दी है. ये प्रदर्शनों की रचनात्मकता का दौर है. किसान नहीं ये असली कवि हैं.

जब ये स्टेशन पर उतरे थे तबकी एक तस्वीर है. स्टेशन से उतरते ही वहां छोटी मोटी सभा जैसी कर ली. सबको निर्देश दिया कि कहां जाना है क्या करना है और फिर जंतर मंतर के लिए चल दिए. एक ऐसे शहर में जहां इन्हें उस मीडिया से भी होड़ लेना था जिसकी प्राथमिकताएं अन्य कारणों से तय होती रहती हैं. जल्दी ही ये लोग हर दिन ख़ुद ही घटना बनने लगे. सबसे पहले खुद को अर्धनग्न किया. हाथ में कटोरा लिया और उस पर बेगर लिख दिया. आधे ढंके तन के साथ ये किसान कर्ज़ माफी की मांग करने लगे. इनके गले में नरमुंड की माला भी थी. इनका कहना था कि यह खोपड़ी उन किसानों की है जिन्होंने कर्ज़ से तंग आकर आत्महत्या कर ली है.

40 दिन से ये जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं. 134 किसान आए थे जिनमें से कई बीमार पड़कर वापस चले गए मगर वहां से सौ किसानों का नया जत्था जल्द ही दिल्ली आने वाला है. हमने सोचा कि क्यों न इनके प्रदर्शनों की एक सूची बनाते हैं. देखते हैं कि दिन गुज़रने के साथ-साथ ये क्या क्या करते हैं. अपनी लड़ाई को प्रासंगिक और रोचक बनाए रखना भी मूल संघर्ष से ज़्यादा बड़ा संघर्ष है. इन किसानों में 25 साल का नौजवान भी है और 75 साल के बुजुर्ग किसान भी. हमने 17 मार्च के प्राइम टाइम में इनके प्रदर्शन को शामिल किया था.

दूसरे दिन दो किसान पेड़ पर चढ़ गए और फांसी लगाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने समय रहते इस घटना को रोक दिया. तीसरे दिन इनका प्रदर्शन कुछ और हो गया. किसानों ने अपने कपड़े उतार दिए और पत्तों से शरीर को ढंक लिया. चौथे दिन पूरे शरीर को पेंट कर लिया. छठे दिन वे रुद्राक्ष की माला पहनकर प्रदर्शन करने लगे. सातवें, आठवें और नौंवे दिन इन्होंने कुछ अलग नहीं किया. जंतर मंतर पर ही प्रदर्शन करते रहे. 10 वें दिन सुप्रीम कोर्ट तक लंगोट में पदयात्रा की, 11 वें दिन जंतर मंतर पर कुत्ता बन गए और भौंककर प्रदर्शन करने लगे.

12 वें दिन एक किसान लाश बन गया, किसान लाश के आसपास बैठकर घंटा बजाने लगे, रोने लगे,लाश बने किसान की शवयात्रा भी निकाली. 13 वें दिन रो-रोकर प्रदर्शन करने लगे.14 वें दिल्ली रेलवे स्टेशन गए और वहां से चूहे पकड़कर ले आए. आप कल्पना कीजिए, पटरियों पर दौड़ते चूहों को पकड़ना और उन्हें लेकर आना और फिर दांत से दबाना. यह सब क्या आसान रहा होगा? क्या ये सिर्फ इनकी नाटकीयता रही होगी? नाटकीय होने के तो और भी तरीके हैं, कोई चूहा क्यों पकड़ेगा? 15 वें दिन इन्होंने एक नाटक किया.

तमाम मंत्रियों के दफ्तर भी गए, तमिलनाडु से मोदी सरकार में मंत्री भी आए, राहुल गांधी भी गए और बहुत से सामान्य लोग भी गए. मगर आने जाने से ज़्यादा इनकी दिलचस्पी अपनी बात मनवाने में है. इनका कहना है कि कुछ हो जाए, दिल्ली से लड़ाई जीतकर जाएंगे. इनका कहना है कि अगर सरकार ट्रेन में बिठा देगी तो चेन खींच देंगे, फिर भी उतरने नहीं देगी तो चलती ट्रेन से कूद जाएंगे. अब तो इन किसानों का कहना है कि वे पेशाब पीने जा रहे हैं.

यही नहीं उन्होंने जंतर मंतर पर एक नाटक भी खेला. इसमें प्रधानमंत्री को चाबुक मारते हुए दिखाया गया और किसान गांधी का मुखौटा पहनकर ज़मीन पर कोड़ा खाते रहे और मदद मांगते रहे. यह उनके प्रदर्शन का 15 वां दिन था.
 
हम कह सकते हैं कि इनका प्रदर्शन विचित्र होता जा रहा है. लेकिन इस तरह से प्रदर्शन की कल्पना हम सबने कब की थी. लेकिन एक बात याद रखिएगा. नेताओं के यहां लाखों का ठेका लेकर बैठे ईवेंट मैनेजर इससे कुछ अपना आइडिया बनाएंगे. अब वे किसी सरकार या राजनीतिक दल के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे तो इसी तरह रोज़-रोज़ आइडिया निकालेंगे. विचित्र-विचित्र हरकतें करेंगे और इवेंट में बदल देंगे. अभी आपको लग रहा है कि इनके प्रदर्शन पर किसी का ध्यान नहीं है, मगर जल्दी ही कोई इनके प्रदर्शन से नया आइडिया निकालने वाला है. 16 वें दिन सांप का मांस खाया. तमिलनाडु से सांप लाया गया था. 17 वें दिन काले कपड़े से सर और आंख को ढंक लिया. 18 वें दिन कटोरा लेकर भिखारी बन गए. 19 वें दिन आधा सर और आधी मूंछ मुंडवा ली. 21 वें दिन पूरी मूंछ साफ कर दी और 22 वें दिन किसानों के सर के बल खड़े हो गए.
 
इस आंदोलन का नेतृत्व 70 साल के एक वकील कर रहे हैं. इनका कहना है कि ये पिछले साल भी दिल्ली आए थे. तमिलनाडु के किसानों की व्यथा बताई थी मगर किसी ने परवाह नहीं की. वे ज़रूर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं मगर तमिलनाडु की राजनीतिक गतिविधियों को देखकर नहीं लगता कि वहां के विधायकों या सरकार को किसानों की चिंता है. अब 23 वां दिन आ चुका था. इनका प्रदर्शन कुछ और रूप ले चुका था.
 
24 वें दिन इन किसानों ने कपड़े से खुद को ढंक लिया. 25 वें दिन एक आदमी प्रधानमंत्री बन गया और किसान अपनी हथेली काटकर खून उनके चरणों में अर्पित करने लगा. 26 वें दिन भूख हड़ताल की. 27 वें दिन गले में फांसी डालकर प्रदर्शन करने लगे. 28 वें और 29 वें दिन इनका प्रदर्शन झझकोर देने वाला रहा. किसी ने कल्पना नहीं की थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय में अपना ज्ञापन देकर लौटते वक्त ये निर्वस्त्र हो जाएंगे और प्रदर्शन करने लगेंगे.

जैसे-जैसे दिन गुजरा इन किसानों की ज़िद बढ़ती गई. चालीस हज़ार करोड़ की मदद राशि की मांग है इनकी. किसी भी सरकार के लिए मुश्किल है. केंद्र सरकार ने भी 2000 करोड़ से अधिक की मदद का एलान तो किया ही है मगर चालीस हज़ार करोड़ वह दे सकेगी, हम अंदाज़ा तो कर ही सकते हैं. 29 वें दिन इन्होंने जो किया वो और भी मुश्किल था. खुली सड़क पर चावल को चादर की तरह बिछा दिया. उस पर दाल डालकर खाने लगे. आप और हम कभी इस तरह से नहीं खा सकते, किसी दूसरे को खाते देख भी नहीं सकते.

30 वें दिन उन्होंने जिस शरीर को भाषा में बदला था, उसी की छाती और पीठ पर मांग लिख दी. ब्लैक बोर्ड बन गए. 31 वें दिन की जानकारी नहीं है हमारे पास. 32 वें दिन इन किसानों ने साड़ी पहनकर प्रदर्शन किया. ध्यान रखिए- लाश बने, निर्वस्त्र हुए, मूंछे मुड़ा ली और अब साड़ी पहनकर प्रदर्शन करने लगे. इन किसानों ने बताया कि एक किसान ने पत्नी का मंगलसूत्र गिरवी रखकर कर्ज़ लिया था. लोन नहीं चुका पाया तो साहूकार मंगलसूत्र ले गया. इस सीन को किसानों ने जंतर मंतर पर दोहराया. धागे के मंगल सूत्र पहनकर प्रदर्शन करने लगे.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सहकारिता बैंकों से लिए गए 5,780 करोड़ के कर्ज़ वहां की सरकार ने माफ कर दिए हैं. हाईकोर्ट ने भी कहा है कि तमिलनाडु के किसानों का कर्ज़ माफ होना चाहिए. इस बार तमिलनाडु में पिछले 140 साल में सबसे कम बारिश हुई है. पिछले साल यहां 170 मिलीमीटर बारिश हुई जबकि औसतन 437 मिलीमीटर बारिश होती है. कई ज़िले ऐसे हैं जहां 60 फीसदी कम बारिश हुई है. राज्य के कई इलाकों में पानी का संकट है. 80 फीसदी किसान, छोटे किसान हैं. तमिलनाडु में आपने सुना होगा कि सस्ता खाना दिया जा रहा है. किसानों को सस्ती दरों पर अनाज भी दिया जाता है. इसके बाद भी किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं. क्योंकि कर्ज़ का बोझ उनकी सीमा को पार कर गया है. 34 वें दिन किसान औरत बन गए, चूड़ी तोड़कर प्रदर्शन करने लगे. 37 वें दिन किसानों ने फटा हुआ कुर्ता पहन लिया. पागल बन गए. वे अब पागल बनकर प्रदर्शन करने लगे.

आप कह सकते हैं कि किसानों के इन प्रदर्शनों में अतिवाद है, विचित्र भी हैं, लेकिन यह भी तो देखिए कि आम किसान अपनी बात को लेकर कैसे लड़ रहा है. लड़ने के लिए किन-किन तरीकों को ईजाद कर रहा है. जंतर मंतर पर ही उनका घर बस गया है. मांग पूरी होने तक जाने वाले नहीं हैं इसलिए वहीं रात बिताते हैं, वहीं खाना बनाते हैं. आसपास से लोग मदद भी करने आ रहे हैं. कोई आर्थिक मदद कर रहा है तो कोई नैतिक मदद दे रहा है. लेकिन इनके प्रदर्शनों में कोई ज़ोर शोर से शामिल नहीं है. नेता मंत्री गए हैं मगर जाने की औपचारिकता दर्ज हो, उतने भर के लिए गए हैं.

किसान चक्रव्यूह में फंसे हैं. ऐसा नहीं है कि सरकारें कुछ नहीं करती हैं लेकिन उनका करना काफी नहीं है. किसानों ने जो रचनात्मकता दिखाई है उससे उनकी बेचैनी समझ में आती है. कुछ लोग निंदा भी कर रहे होंगे कि इतना अतिवाद क्यों. कई बार करुणा दिखानी चाहिए. समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों कोई मुंह में चूहा दबा रहा है, ज़मीन पर दाल-भात बिछाकर खा रहा है. वो क्या कहना चाहता है, क्या पाना चाहता है. ऐसी ही ज़िद और रचनात्मकता चाहिए किसानों को अपनी समस्या से निकलने के लिए. प्रदर्शन के लिए भी और खेती के तौर तरीके बदल देने के लिए भी....ऐसा ही ज़ोर लगाना होगा महंगी खेती के चक्र से निकलने के लिए...


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