प्राइम टाइम इंट्रो : कमज़ोरों के साथ कितना सख़्त है सिस्टम

प्राइम टाइम इंट्रो : कमज़ोरों के साथ कितना सख़्त है सिस्टम

अक्सर सुबह शाम चैनलों को देखकर लगता है कि नेताओं, कलाकारों और कुछ मूर्ख लोगों के विवादित बयानों में ही अपना देश बसता है. यह एक सीमित मात्रा में ज़रूरी हो सकता है लेकिन क्या यही मीडिया सिस्टम का काम है. मीडिया सिस्टम यानी जिसमें आप भी शामिल हैं और हम भी शामिल हैं. अगर बयानों में ही देश दिखेगा तो एक दिन देश हमारे सामने आकर खड़ा हो जाएगा. तब होगा ये कि हमारे पास बोलने के लिए शब्द ही नहीं बचेंगे.

जैसे यह आदमी कंधे पर अपनी बीवी की लाश समेट कर आपके हमारे ड्राइंग रूम में घुस आया है. दाना मांझी अगर अपनी पत्नी की लाश को चादर-चटाई में बांध कर कंधे पर नहीं लादता तो याद कीजिए कि आपने आखिरी बार दिल्ली से चलने वाले राष्ट्रीय चैनलों पर उड़ीसा को लेकर कब कोई ख़बर सुनी है. आज जब तमाम चैनलों पर दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश लेकर चल रहा था तो उसके साथ साथ कई बुनियादी सवाल भी चल रहे थे. हो सकता है यह घटना अपवाद हो लेकिन इस एक घटना ने हमारे समाज और सिस्टम की तमाम खुशफहमियों को ध्वस्त कर दिया है. आप इन तस्वीरों को देखते हुए मेरे शब्दों का इंतज़ार न करें, अपने शब्द ख़ुद गढ़ें, ख़ुद रोएं, ज़रूरी नहीं है कि कुछ कहें ही, थोड़ी देर चुप भी रहें, हो सके तो अपने कंधे पर कुछ भारी चीज़ लाद कर थोड़ी दूर पैदल चलें. बाहर नहीं जा सकते तो अपने ड्राईंग रूम में ही चलें. आप रोते रोते अपने सिस्टम पर हंसने लगेंगे. हंसते हंसते रोने लगेंगे. बेहतर है कि आप महसूस करें कि इस दुनिया में ग़रीबी नाम की यातना से बच गए हैं. मीडिया को रोज़ रात एक खलनायक चाहिए. दाना मांझी के बहाने मीडिया ने अपना खलनायक ढूंढ लिया है, अस्पताल का प्रशासन.

घटना उड़ीसा के कालाहांडी की है जो कई दशकों से देश का ग़रीब ज़िला है. कोई यह बताये कि जब कालाहांडी में गरीबी दूर नहीं हुई तो देश में गरीबी कैसे कम हो गई. बिहार के दशरथ मांझी अपनी पत्नी को अस्पताल नहीं ले जा सके, मर गईं तो गुस्से में पहाड़ काट डाला. उड़ीसा का दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश कंधे पर लाद कर बारह किमी तक पैदल चलता रहा. साथ में उसकी बेटी चलती रही. इसने हमारे तमाम भ्रमों के पहाड़ को काट डाला है. ग़रीबी के पास अपनी ओर सिस्टम और समाज का ध्यान दिलाने के लिए मृत्यु के अलावा कुछ नहीं होता है.

ज़िला कालाहांडी, पंचायत नखरूडी, गांव मेलघर. यही पता है दाना मांझी का. गांव से साठ किलोमीटर दूर भवानीपटना के सरकारी अस्पताल लेकर आए थे. मांझी की पत्नी अमांग देई को टीबी हो गया था. आज ही टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर छपी है कि देश में टीबी के मरीज़ दुगने हो गए हैं. बुधवार रात उनकी पत्नी ने दम तोड़ दिया. उसके पास पत्नी को वापस घर ले जाने के लिए पैसे नहीं थे, अस्पताल से मदद मांगी किसी ने सुनी नहीं, सो उसने पत्नी को कंधे पर लाद लिया और अपनी बेटी के साथ पैदल निकल पड़ा. लोगों ने जब देखा कि कोई कंधे पर लाश लिये यूं चला जा रहा है तो सवदा नामक जगह पर पीतांबर नायक नाम के एक आदमी ने उसे रोका और मदद करने का भरोसा दिया. तभी गांव के कुछ लोगों ने मीडियाकर्मी को फोन कर बताया और कलेक्टर को भी सूचना दी. मीडिया वालों के पहुंचने के घंटे भर के भीतर एंबुलेंस भी पहुंच गया.

6 घंटे तक दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश को लादे चल चुके थे. दाना मांझी ने आपबीती बताई है. जो कहा है वो आप भी पढ़ें..
'डॉक्टर ने बोला की मलेरिया हुआ है, टीवी हुआ है बोला फिर मेडिसिन लाने के लिए बोला, फिर मैं मेडिसिन लेने के लिया गया. वह लोग रिसिप्ट काटकर दिया फिर मैं मेडिसीन लाने के लिए गया मेरा पैसा खत्म हो गया. बुर्ला लेने के लिए बोला. मैं बुर्ला नहीं ले सकता था, मेरा पास पैसा नहीं था. फिर बोला जो करना है करो हम कुछ नहीं कर सकता. दो तीन बार बोलने के बाद कुछ नहीं हुआ फिर मेरा मन घबराने लगा फिर रात को दो बजे मैं वहां से मृत शरीर के साथ निकल गया, क्या कर सकता था मेरा पास कोई नहीं था, डॉक्टर मदद नहीं किया.'

लेकिन सरकार और प्रशासन जब अपनी बात कहेंगे तो उसकी शुरुआत सफाई से होती है, फिर जांच पर पहुंचती है और फिर जांच से पहले कार्रवाई हो जाती है. कालाहांडी की ज़िलाधिकारी ब्रुंडा देवराजन ने कहा कि करीब 2 बजे बिना बताये वह शव को लेकर चले गए. अगर मदद मांगी होती तो हम मदद करते. डीएम ने यह भी कहा कि अस्पताल के स्टाफ ने उन्हें बताया कि दाना मांझी ने शराब पी रखी थी. अब सवाल ज़िलाधिकारी से पूछा जा सकता है कि अस्तपाल के कैंपस से बिना किसी प्रमाण पत्र के कोई लाश लेकर कैसे निकल गया. क्या कर्मचारियों ने भी शराब पी रखी थी.

क्या आपको लगता है कि यह शख्स जो छह घंटे से अपनी पत्नी के शव को लिये जा रहा है वो शराब के नशे में है. क्या उसने शराब के नशे में पत्नी के शव को इस तरह लपेटा होगा. बांधा होगा. कंधे पर लादा होगा. उसके पास दवा के पैसे नहीं थे. उसके पास दूसरे अस्पताल तक ले जाने के पैसे नहीं थे, क्या ये सच्चाई नहीं हो सकती है. जबकि उड़ीसा सरकार ने ऐसे लोगों की मदद के लिए एक योजना बना रखी है. अस्पताल से शव को ले जाने के लिए राज्य के 37 अस्पतालों में 40 वैन रखी गई है. वैन का इंतज़ाम महाप्रयाण योजना के तहत किया गया था जिसका एलान फरवरी में हुआ था. आज यानी गुरुवार को इस योजना के लांच किये जाने की घोषणा कर दी गई. जब तक उसकी पत्नी ज़िंदा थी दवा के लिए किसी ने एक पैसे नहीं दिए, अब जब मीडिया में बात आ गई है तो रेड क्रास ने भी 15 हज़ार की राशि दी है. सरकार ने भी 12000 दिये हैं. उड़ीसा में हरिश्चंद्र योजना है जिसके तहत अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी और घी मुफ्त में दिया जाता है.

आहत होने से, खुद को लानत भेजने से हम दाना मांझी के साथ न्याय नहीं कर पायेंगे. बुधवार रात जब दफ्तर से निकल रहा था तब गुड़गांव से ख़बर आई. वही अलमुनियम सिटी जिसे इंग्लिश में मिलेनियम सिटी कहते हैं. क्यों कहते हैं आज तक समझ नहीं आया लेकिन खबर यह थी कि यहां के सरकारी सिविल अस्पताल में अपनी बारी का इंतज़ार कर रही 11 साल की नेहा तीन घंटे तक लाइन में खड़ी रही. अपनी मां के साथ आठ बजे लाइन में लगी थी और 11 बजे तक लाइन में ही रही. जब प्यास लगी तो मां पानी लाने गई. इस बीच नेहा बेहोश हो गई. लोग किसी तरह उसे इमरजेंसी तक ले गए जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. परिवार वालों का कहना है कि उसका इलाज इसी अस्पताल के ओपीडी में तीन महीने से चल रहा था. कार्रवाई के नाम पर सीनियर मेडिकल अफसर का तबादला हो गया है. चतुर्थ श्रेणी की एक महिला कर्मचारी को बर्खास्त कर दिया गया है और जांच का एलान भी हो गया है. लेकिन क्या इससे आम मरीज़ों को होने वाली तकलीफ का कोई स्थायी समाधान निकला. उस मां ने किन शब्दों में अपना दुख बयां किया होगा, क्या कह कर रोई होगी, क्या आपके पास वो शब्द हैं. क्या आपने नेताओं से पूछा है कि वे अस्तपालों की बात क्यों नहीं करते हैं.

गुड़गांव के सीएमओ ने कहा है कि नेहा बहुत गंभीर हालत में आई थी. उसकी मौत किसी की लापरवाही की वजह से नहीं हुई. हम कोशिश करेंगे कि और भी काउंटर बढ़ा दिये जाएं ताकि मरीज़ों को दिक्कत न हो. क्या सीएमओ साहब हरियाणा के सारे ज़िला अस्पतालों में काउंटर बढ़वा देंगे, पहले क्यों नहीं बढ़वा दिया, क्या सीएमओ साहब नेहा के मरने का इंतज़ार कर रहे थे या फिर एक अस्पताल में काउंटर बढ़ाकर मीडिया को झांसा दे देंगे कि समाधान हो गया है. दरअसल, यह सिस्टम की संवेदनशीलता का पतन है. समाज की संवेदनशीलता का पतन नहीं है. समाज को लेकर छाती पीटने की ज़रूरत नहीं है. सवाल सिस्टम की क्षमता को लेकर होना चाहिए. हर जगह लोग आगे जा जाते है.

कुछ ही दिन पहले उत्तर प्रदेश के बहराइच से ये ख़बर आई थी. सरकार की योजना बेहतर और मुफ्त इलाज की होने के बाद रिश्वत न देने के कारण एक मां के सामने उसका बीमार बेटा कृष्णा मर गया. उसका कहना था कि सुई लगाने के लिए कर्मचारी ने बीस रुपये मांगे जो उसके पास नहीं थे. वो मिन्नतें करती रही लेकिन वार्ड में मौजूद किसी का दिल नहीं पसीजा, उसका बेटा मर गया. यहां भी वही कार्रवाई हुई. लापरवाही से इंकार किया गया और कर्मचारी का तबादला कर दिया गया.

जब तक लाश के कंधे पर ढोने की तस्वीर चलेगी टीवी के लिए आहत होने का सवाल तभी तक बना रहेगा जैसे ही यह सवाल पब्लिक हेल्थ यानी आम लोगों के स्वास्थ्य और इलाज की तरफ मुड़ेगा, टीवी के लिए यह मसला बोरिंग हो जाएगा. अगर आप यह उम्मीद करते हैं कि मीडिया अब सरकारी अस्तपालों का जायज़ा लेगा, प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों की तरफ दौड़ लगाएगा तो मुझे यकीन है कि आप वही दर्शक है जो इन दिनों बयानों की बहस देखते हैं, जंगली जानवरों के कारनामों पर बीस बीस मिनट के कार्यक्रम देखते हैं और देश विदेश की विचित्र कथाएं जिनमें कोई मकान से लटका है तो कोई रेल इंजन के आगे खड़ा है. वर्ना आप ऐसी उम्मीद बिल्कुल नहीं करते. क्या तब भी आप आहत हुए थे जब आगरा से यह खबर आई थी कि ज़िला अस्पताल में जब पूनम का इलाज नहीं हुआ, उसे भगा दिया गया, पूनम अस्तपाल से बाहर आई और पैदल चलने लगी. टीबी की मरीज़ पूनम को अस्पताल वालों ने कहा कि तुम्हें टीबी है, तुम्हारा इलाज नहीं होगा. दो किमी ही चल पाई थी कि उसके शरीर ने जवाब दे दिया. सड़क के किनारे लेट गई. गनीमत है कि राहगीरों की नज़र पड़ गई और डाक्टर को बुला लिया. फुटपाथ पर ही उसका इलाज हुआ. हालत सुधरी तो उसने हालात के बारे में बयां किया. जब अधिकारियों को पता चला कि लोगों को मालूम हो गया है तो रात को ही एंबुलेंस भेज दिया. जिसमें कोई डाक्टर नहीं था. अधिकारी एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे.

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क्या हम नहीं जानते कि सरकारी अस्पतालों में रात के वक्त कितने डाक्टर और कर्मचारी होते हैं, क्या हमारे आपके हंगामा करने के बाद कोई आगे आकर यह बता रहा है कि हमारे पास पर्याप्त कर्मचारी हैं या नहीं हैं. तबादला या निलंबन से कुछ नहीं होगा. एक सवाल है. राष्ट्रीय मीडिया भले ही दिल्ली मुंबई से काम चला लेता है लेकिन स्थानीय अखबारों में ऐसी लापरवाहियों की तमाम खबरें होती हैं. क्या उनका सरकार और समाज पर कोई असर हो रहा है या इन सबके बिना ही राष्ट्रवाद हो रहा है. आप भी कितनी समस्याओं को याद रखेंगे.

ये तस्वीर पिछले साल अगस्त की है, मध्यप्रदेश की है. 31 अगस्त के राजस्थान पत्रिका और 3 सितंबर के हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी है. खबर के मुताबिक उमरिया ज़िले के 40 साल के विशाली बैगा ने पेड़ से लटक कर जान दे दी. पोस्टरमार्ट के लिए कोई गाड़ी नहीं मिली तो खटिया पर शव को रख अपने कंधे पर लाद लिये. दोनों आदिवासी कंधे पर शव को लादे रात भर पैदल चलते रहे और पांच घंटे तक चलने के बाद शहडोल पहुंचे. देवलाल बैगा ने बताया कि परिवार के पास पैसे नहीं थे. किराये पर गाड़ी नहीं ले सकते थे. उस वक्त पाली थाने के सहायक इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया गया था. पत्रिका में ज़िला अस्पताल शहडोल के एस एन पाठक ने बताया था कि हमारे पास फोन आया था मगर हमारे पास शव वाहन नहीं हैं. सरकारी अस्पतालों के सिस्टम को खत्म किया जाता रहा है. हम नहीं बोलते क्योंकि बोलने वाला मिडिल और अपर मिडिल क्लास बीमा को ही अस्पताल समझने लगा है. हम फिलहाल उड़ीसा की घटना पर ही बात करेंगे कि मीडिया को क्या करना चाहिए था.