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प्राइम टाइम इंट्रो : बातचीत की असफल मेज से मंदिर-मस्जिद विवाद सुलझने की उम्मीद क्यों?

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प्राइम टाइम इंट्रो : बातचीत की असफल मेज से मंदिर-मस्जिद विवाद सुलझने की उम्मीद क्यों?
राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का मुद्दा एक बार फिर से पब्लिक में आ गया है. उन्हीं लोगों के बीच आ गया है जो 67 साल में बातचीत कर, आपस में लड़भिड़कर भी नतीजा नहीं निकाल सके. धीरे-धीरे यह मुद्दा राजनीति से निकलकर अदालत की देहरी में समा गया और आम तौर पर व्यापक शांति कायम हो गई. मीडिया ने यूपी के हर चुनाव में बीजेपी से पूछकर इसे पब्लिक में लाने के तमाम प्रयास किए कि मंदिर कब बनेगा मगर बीजेपी भी अदालत के फैसले की बात कर अपनी दूसरी रणनीतियों को अंजाम देने में जुट गई. बार-बार तमाम पक्षों ने दोहराया कि अदालत का फैसला अंतिम रूप से माना जाएगा. अयोध्या विवाद के संदर्भ में इस एक बिंदु पर व्यापक सहमति कायम हो गई लेकिन मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने इसके सभी पक्षकारों को फिर से टीवी पर ला दिया है. वही सवाल, वही जवाब लेकर टीवी की शाम सज गई है. अब रोज कोई न कोई कुछ न कुछ बोलेगा और जरूरी काम छोड़कर इसी पर टीवी की सारी ऊर्जा खर्च होगी.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि बेहतर होगा कि दोनों पक्ष इस मुद्दे को मिल बैठकर सुलझाएं. ये मामला धर्म और आस्था से जुड़ा है. इसलिए दोनों पक्ष आपस में बैठकर बातचीत के ज़रिए हल निकालने की कोशिश करें. ज़रूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट के जज भी मध्यस्थता करने को तैयार हैं. मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अगर दोनों पक्ष कोई हल नहीं निकाल पाते हैं तो फिर कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर फैसला देने के लिए तैयार रहेगा. लेकिन दोनों पक्षों के सभी लोग टेबल पर बैठकर बातचीत करेंगे, उसमें निष्पक्ष लोगों को भी शामिल करेंगे तो ज़्यादा अच्छा रहेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 31 मार्च को बताने के लिए कहा है कि क्या फैसला किया गया है.  26 फरवरी 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी को अयोध्या विवाद से जुड़े सभी मामलों में पक्षकार माना था. स्वामी का कहना है कि छह साल से सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है. सुप्रीम कोर्ट को रोजाना सुनवाई कर जल्द फैसला सुनाना चाहिए. चीफ जस्टिस की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी ने कहा कि दोनों समुदाय इस मुद्दे पर साथ नहीं बैठेंगे, बेहतर है अदालत ही फैसला दे.

सवा सौ साल पुराना है अयोध्या विवाद. इस मसले की आग में दोनों समुदाय के न जाने कितनों की जान चली गईं, कितनों का रोज़गार छीना और कितनों को नेता बना दिया. न मंदिर बना न मस्जिद तोड़ने वाले पकड़े गए. सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने वाले भी बच गए. सुप्रीम कोर्ट में 6 साल से सुनवाई क्यों हो रही है. इसलिए हो रही है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 30 सितंबर 2010 को अयोध्या विवाद मामले में एक बड़ा फैसला दिया. तीन में दो जज एकमत थे और एक ने अलग मत दिया था. वे थे जस्टिस एस यू खान, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस धर्मवीर शर्मा.

30 सितंबर 2010 को जब फैसला आने वाला था तब पूरे देश और खासकर यूपी में सन्नाटा छा गया था. फैसला भी आया मगर कुछ नहीं हुआ. शायद तब तक यूपी और देश की जनता इस मुद्दे का खेल समझ गई थी. पिछले साठ साल में तमाम अदालतें, तमाम जज इस मामले की सुनवाई करते रहे मगर फैसला लिखने की मंजिल पर नहीं पहुंच सके. इलाहाबाद हाईकोर्ट में 20-21 साल सुनवाई के बाद पहली बार इस विवाद से जुड़े एक पहलू पर फैसला आ गया. तीनों पक्षों का हिस्सा मान लिया गया. अब सिर्फ यह तय करना था कि कौन सा हिस्सा किसे मिलेगा, मगर सभी पहले फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए.

जस्टिस एस यू खान की बेंच ने तय करते हुए कहा कि मुस्लिम, हिंदू और निर्मोही अखाड़ा को इस विवादित जमीन का संयुक्त हिस्सेदार बनाया जाता है. बीच वाले गुंबद का क्षेत्र जहां फिलहाल मूर्ति रखी हुई है, वो हिंदुओं को दिया जाएगा. निर्मोही अखाड़ा को वो हिस्सा दिया जाएगा जो मैप में राम चबूतरा और सीता रसोई के नाम से है. जस्टिस एस यू खान की अध्यक्षता में दो अनुपात एक से तीन जजों की बेंच ने इस विवाद को ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया जहां से अंतिम फैसला करीब दिखने लगा. तीन जजों ने इस फैसले के लिए 9000 से अधिक पन्ने लिखे हैं.

जस्टिस एस यू खान ने अपने फैसले की शुरुआत जिन पंक्तियों से की है उसका जिक्र करना चाहता हूं ताकि आप इस मुश्किल फैसले को लिखते समय एक जज की चुनौतियों को समझ सकें. other orginial suit number 4, 1989. sunni central board of waqf up and others versus gopal singh visharad and others के फैसले में एस यू खान जिस बात से शुरू करते हैं वो कानून के छात्रों के लिए नज़ीर तो है ही, आप भी समझ सकते हैं कि इस मामले में फैसला लिखना आसान नहीं होगा, मगर कोई चाहे तो लिख सकता है. जस्टिस खान इन पंक्तियों से शुरूआत करते हैं - यहां 1500 वर्ग गज जमीन का एक टुकड़ा है जहां देवता भी गुजरने से डरते हैं. यह अनगिनत बारूदी सुरंगों, लैंड माइंस से भरा हुआ है. हमें इसे साफ करने की जरूरत है. कुछ भले लोगों ने हमें सलाह दी है कि कोशिश भी मत करो. हम भी नहीं चाहते हैं कि किसी मूर्ख की तरह जल्दबाजी करें और खुद को उड़ा लें. बावजूद इसके हमें जोखिम तो लेना ही है. किसी ने कहा है कि  जीवन में सबसे बड़ा जोखिम होता है कि मौका आने पर जोखिम ही न लिया जाए. एक बार देवताओं को भी इंसानों के आगे झुकने के लिए मजबूर किया गया था. ये एक ऐसा ही मौका है. हम सफल हुए हैं या नाकाम रह गए हैं? अपने केस में कोई जज नहीं हो सकता है. इस तरह ये रहा वो फैसला जिसका पूरा देश सांस रोके इंतजार कर रहा है.

...और जस्टिस खान फैसला लिख देते हैं. तय कर लिया था कि फैसला देना है. फैसले के बाद किसी को इंटरव्यू भी नहीं दिया न मीडिया के सामने आए. जज का जो काम होता है वो करके जा चुके थे. इसी फैसले में उन्होंने एक और बात लिखी है. जिसका सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से गहरा ताल्लुक है. 10 बार बातचीत की कोशिश हुई है. पूर्व प्रधानमंत्री चंशेखर के साथ बातचीत की कोशिश को सफलता के सबसे करीब माना जाता है मगर अंतिम तौर पर सब नाकाम रही. बातचीत के नाम जितनी कोशिश नहीं होती उससे कहीं अधिक माहौल को गरमाया जाता है.  जस्टिस एस यू खान की बेंच ने भी बातचीत का एक मौका दिया था. 27 जुलाई 2010 को एक आदेश भी पास हुआ था जिसमें कहा गया था कि आज हमने बातचीत के ज़रिए विवाद को सुलझाने की संभावनाओं पर भी विचार किया. अभी तक कुछ भी ठोस नहीं निकला है. फिर भी हमने सभी विद्वान वकीलों से कहा है कि जब तक फैसला सुनाया जा रहा है तब तक उन्हें छूट है कि वे बातचीत के ज़रिए समझौते का प्रयास करें और ज़रूरत पड़ने पर ओएसडी से बेंच गठित करने के लिए संपर्क कर सकते हैं.

जुलाई से सितंबर आ गया मगर बातचीत का कोई प्रयास नहीं हुआ. 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला ही सुना दिया. उस फैसले की भी खूब समीक्षा हुई. जिसमें कहा गया था कि हिन्दुओं की आस्था में हस्तक्षेप नहीं होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी में धर्म और आस्था का नाम लेकर बातचीत का एक और मौका देने की बात कर रहा है. लिहाज़ा बातचीत राजनीतिक हो चली है. उच्चतम अदालत क्यों नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरह रोजाना सुनवाई कर उच्च अदालत के फैसले को आगे बढ़ाती है. क्या सभी को सर्वोच्च न्यायालय का इंतजार नहीं करना चाहिए.

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क्या हमारी अदालतें आस्था के नाम पर या लोगों के बीच व्यापक प्रतिक्रिया को लेकर आशंकित रहती हैं. उनकी चिंता में यह होता है कि फैसले के बाद क्या होगा. क्या ऐसा होना चिंता की बात नहीं है. नवंबर 2015 में जब हाज़ी अली में औरतों के प्रवेश को लेकर बांबे हाईकोर्ट के सामने याचिका आई तो जस्टिस वीएम कनाड़े ने कहा कि ये जो समय है वो असहिष्णुता का समय है. धार्मिक मामलों में लोग अक्सर संवेदनशील हो जाते हैं, इसलिए हम आम तौर पर कोशिश करते हैं कि दखल ही न दें.

इस मामले में भी अदालत ने सभी पक्षों से गुज़ारिश की थी कि आपसी बातचीत से सुलझा लें. ऐसा नहीं है कि अदालतों ने जनभावना के खिलाफ जाकर फैसले नहीं दिए हैं मगर जो मसला 67 साल में अदालत की अंतिम देहरी पर पहुंचा है, वहां से बातचीत की असफल मेज़ पर क्यों भेजा रहा है. खासकर तब जब सब अदालत के आदेश को स्वीकार करने के लिए बैठे हैं, राज़ी हैं.


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