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मांसाहार पाबंदी पर राजनीति : क्‍या उद्धव के बयान की निंदा करेंगे पीएम?

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मांसाहार पाबंदी पर राजनीति : क्‍या उद्धव के बयान की निंदा करेंगे पीएम?
नई दिल्‍ली:

एक अच्छी ख़बर है। अच्छी ख़बर ये है कि हमारे देश की सारी समस्याएं समाप्त हो चुकी हैं। सिर्फ एक समस्या बची है। ग़रीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण, सड़क, अस्पताल की समस्याओं के समाप्त होने के बाद अब एक ही काम बचा है। वो ये कि हम या आप क्या खायें। इससे घर-घर में समय बचेगा और जीडीपी बढ़ेगी। जल्दी ही कोई राजनीतिक दल रोज़ आपके लिए पर्सनल मेन्यू बनाकर व्हाट्सऐप करने लगेगा।

मुझे लगता है कि आपको भी खाना बनाने से पहले किसी पॉलिटिकल पार्टी के दफ्तर फोन कर पूछना चाहिए कि आज क्या बनाना है। पार्टी आफिस से बताया जाएगा कि मांसाहार में बीफ बैन है। मटन बैन नहीं है। किसी दल से यह भी पूछ सकते हैं कि भिंडी पका लें या मटन फ्राई परसों वाला खा लें। दाल में हींग से छौंक लगाएं या जीरे की छौंक। अच्छा सुनिये फोन मत रखिये... ये भी बता दीजिए न कल बच्चे के टिफिन में क्या दूं। अंडा या टमाटर की सब्जी।

चूंकि मैं एंकर हूं इसलिए पार्टियां मुझे पका पकाया पैक कर भिजवा दें तो ठीक रहेगा। महाराष्ट्र में मीट बैन को लेकर जो राजनीति हो रही है और जिस तरह की भाषा का इस्तमाल हो रहा है उससे लग रहा है कि एक दिन खाना बैन करने के बाद समुदायों को भी बैन किया जाएगा। फिलहाल मुंबई में कुछ समय के लिए शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के कार्यकर्ता चिकन बेचते नज़र आए। ये हिम्मत अगर किसी तथाकथित सेकुलर दल ने की होती तो चैनलों के ज़रिये प्रवक्ताओं ने धावा बोल दिया होता। अक्सर शाकाहार बनाम मांसाहार का विवाद मुस्लिम विरोध में बदल जाता है। हिंदुत्ववादी पार्टियां सभी हिन्दुओं को शाकाहारी पेंट करने लगती हैं। लेकिन शिवसेना और मनसे ने यह साफ कर दिया कि मराठी मानुष हिन्दू तो है मगर मांसाहारी है। शिवसेना के नेता टीवी पर बोल रहे हैं कि करोड़ों लोग मांसाहार करते हैं। उनके खाने के अधिकार के समर्थन में शिवसेना ने चिकन का ठेला तक लगा दिया। ऐसा करने में सेकुलर दलों के तो हाथ कांपने लगते। लेकिन शिवसेना मनसे के इस साहस में एक समस्या है। अगर ये दोनों खाने की आज़ादी की वकालत कर रही हैं तो फिर मुसलमानों और इसाइयों के खाने की आज़ादी का सवाल अलग कैसे हो जाता है। मुसलमान और ईसाई के बीफ खाने से हिन्दू आस्था को ठेस पहुंचती है तो इस लिहाज़ से मराठी मानुष, जो कि हिन्दू भी हैं, के मीट खाने से जैन समुदाय की आस्था आहत नहीं हो सकती है।


खाने पर प्रतिबंध की राजनीति का संबंध सीधा सीधा कट्टरता से है। अगर आप कट्टरता के एक रूप को मंज़ूरी देंगे तो इसके दूसरे स्वरूप को भी मानना पड़ेगा। कट्टरता का समर्थक भी कट्टरता का शिकार हो सकता है इस मामले से साफ हो जाता है।

जैसे जब बीफ बैन को लेकर मुसलमानों और इसाइयों को टारगेट किया गया तो जैन समुदाय हमेशा हिन्दुत्व ब्रिगेड की तरफ गिन लिया जाता होगा। अब उन्हीं हिन्दुत्व पार्टियों के निशाने पर जैन आ गए हैं। इन दोनों मामले में एक चीज़ कॉमन है। वो ये कि मुसलमान, ईसाई और जैन तीनों अल्पसंख्यक हैं। जैन भी मुसलमानों की तरह कम से कम राजनीतिक बोलचाल में टारगेट हो रहे हैं। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पार्टी मुखपत्र सामना में लिखा है, 'जैन धर्मांध न बनें। उनकी धर्मांध मानसिकता उन्हें हिंदुओं का दुश्मन बना देगी। बिलकुल वैसे ही जैसे धर्मांध मुसलमान हिंदुओं के दुश्मन बन गए। इसलिए पर्यूषण का आडंबर न किया जाए। पर्यूषण में हिंसा ना करने का आग्रह करते जैन क्या इन दिनों ब्लैक मनी लेना बंद कर देंगे। मुंबई में ज़्यादातर बिल्डर जैन हैं। क्या वे अपने सौदे में पर्यूषण काल में काला धन नहीं लेंगे। हिंसा विचारों में भी होती है। याद रखें कि 92-93 के दंगों में इस जैन समाज के कारोबार की रक्षा शिवसेना ने की थी। और ये भी ना भूलें कि जैन लोगों के कारोबार को उखाड़ फेंकने में हमें ज़्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए कह देता हूं कि जिसे जो खाना है, खाने दो।'

ऐसी धमकी किसी समाज को और किसी को एतराज़ तक नहीं। क्या जैन समाज के तुष्टि‍करण के विरोध के नाम पर मराठी मानुष का तुष्टि‍करण नहीं हो रहा है। जैसे मुस्लिम तुष्टि‍करण के नाम पर हिन्दू तुष्टि‍करण होता है। जैन समाज के साम्राज्य को नष्ट करने की धमकी देने वाली शिवसेना महाराष्ट्र और केंद्र में बीजेपी की सहयोगी पार्टी है। मोदी सरकार में शिवसेना का मंत्री है। महाराष्ट्र में शिवसेना बीजेपी से मिलकर सरकार चला रही है। हिन्दू मुस्लिम वाला मामला होता तो सेकुलर को सिकुलर बताकर ट्वीट करने वाले भाड़े के देशभक्त आ जाते लेकिन जैन समाज को ऐसी धमकी के बाद भी चुप्पी नज़र आती है।

यह सवाल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी पूछा जाना चाहिए कि आपकी सहयोगी पार्टी जैन समाज को बर्बाद करने की धमकी दे रही है। क्या आप कोई ट्वीट करेंगे। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में पर्युषण के दौरान मीट बैन करने वाली बीजेपी मुंबई में जैन समाज के खिलाफ हो रही इन बातों को कैसे देखती है। क्या वो भी चुप है जैसे जैन चुप नज़र आते हैं। क्या इसलिए चुप है कि उसके सामाजिक नेता मुस्लिम-ईसाई विरोध की राजनीति के खिलाफ खड़े न हो सके या इसलिए चुप हैं कि उनकी कोई नहीं सुनेगा। क्या इस मुल्क में हमेशा बहुसंख्यक तय करेगा। क्या तय करने की राजनीति का लाभ कभी भी अल्पसंख्यक को नहीं मिलेगा।

पर्युषण पर्व आठ से दस दिनों तक चलने वाला पर्व है। कहीं दो दिन का मीट बैन है तो कहीं चार दिन तो कहीं आठ दिन। चिकन, मटन पर बैन है, मछली पर बैन नहीं। मछली क्या अफसरों की फाइल से उछल कर मरीन ड्राइव से समंदर में कूद गई।

दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत में नवरात्र और सावन के महीने में बड़ी संख्या में लोग मांसाहार बंद कर देते हैं। बिहार में छठ के दौरान मांसाहार बंद हो जाता है लेकिन कोई बैन नहीं करता। इस तरह की मांग की भी अपनी एक समस्या है। अब यह बात निकल कर आ रही है कि मुंबई छह में जहां गुजराती, मारवाड़ी और जैन समाज के प्रभावशाली लोगों का बहुमत है वहां एक भी दुकान मांसाहार का नहीं है। यह अपने आप हो गया या किसी मांसाहारी रेस्त्रां को खुलने नहीं दिया गया। दरअसल सब अपनी अपनी कट्टरता के मारे हैं। लेकिन मांसाहार पर बैन कोई नई बात नहीं है। गणेश चतुर्थी के दिन भी मांसाहार पर रोक होती है। इस तरह सूची लंबी हो सकती है। मनसे ने तो प्रस्ताव पास किया था कि जो बिल्डर किसी मांसाहारी को फ्लैट नहीं बेचेगा उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इंटरनेट से पता चला कि 2012 में कर्नाटक राज्य के उप मुख्यमंत्री के.एस. ईश्वरप्पा गांधी जयंती के दिन मांसाहार करते देखे गए तो कांग्रेस ने उनके खिलाफ राज्यपाल को याचिका दी कि उन्हें तुरंत बर्खास्त कर दिया जाए क्योंकि उन्होंने गांधीवादियों की भावना को ठेस पहुंचाई है। के.एस. ईश्वरप्पा कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष थे।

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इस बीच यह मामला मुंबई हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। शुक्रवार को भी इस पर सुनवाई होगी। अदालत ने अपनी शुरूआती टिप्पणी में कहा है कि जैन पर्व के लिए जानवरों को मारने और मीट बेचने पर चार दिन की पाबंदी मुबई जैसे मेट्रोपॉलिटन शहर के लिए व्यावहारिक नहीं है। मीट पर ऐसी सीधी पाबंदी कोई फॉर्मूला नहीं हो सकती। मारने और मीट बेचने पर पाबंदी है। अन्य स्रोतों का क्या? बाज़ार में पहले से मौजूद पैकेज्ड मीट का क्या होगा?

उद्धव ठाकरे जी ने जैन समाज का जो चित्रण किया है उससे उन्हें भी समस्या होनी चाहिए। सभी को तो होनी ही चाहिए। लेकिन मुंबई में ज्यादातर बिल्डर जैन हैं और वे काला धन लेते हैं यह सब पंद्रह लाख की वेटिंग लिस्ट वाले फिर से न चहकने लगें कि विदेश से जब तक नहीं आता तब तक जैन वाला ही दे दीजिए। मज़ाक अलग है। ये अच्छा नहीं हो रहा है।



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