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प्राइम टाइम इंट्रो : क्या हर समुदाय का अलग पर्सनल लॉ हो?

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प्राइम टाइम इंट्रो : क्या हर समुदाय का अलग पर्सनल लॉ हो?

यूनिफार्म सिविल कोड को लेकर कोई ठोस प्रस्ताव तो सामने है नहीं, ये क्या है, कैसा होगा, किसी को नहीं पता, जो भी है लॉ कमिशन के सोलह सवाल हैं. क्या तीन तलाक या बहुविवाह को समाप्त कर देना ही यूनिफार्म सिविल कोड आ जाएगा. क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड का यह भी मतलब है कि अन्य समाजों के रीति रिवाजों को लेकर भी बहस होगी.

क्या इस वक्त जो हिन्दू कोड बिल है वो जेंडर जस्टिस की कसौटियों पर खरा उतरता है या उसमें भी किसी प्रकार के संशोधन की बात होगी या हो रही है. क्या हिन्दू कोड बिल ही यूनिफॉर्म सिविल कोड होगा या एक यूनिफॉर्म सिविल कोड के तहत अलग अलग धर्मों के रीति रिवाजों का कोड बनेगा. काश कोई ड्राफ्ट होता तो बात होती. बहरहाल वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फेसबुक पर पोस्ट किया है कि तीन तलाक़ की संवैधानिक वैधता का जो मुद्दा है वो यूनिफॉर्म सिविल कोड से अलग है. संविधान निर्माताओं ने उम्मीद जताई थी कि नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत राज्य यूनिफॉर्म सिविल लॉ बनाने की कोशिश करेगा. कई मौकों पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस पर राय मांगी है.

सरकार ने बार-बार अदालतों और संसद से कहा है कि पर्सनल लॉ में अमूमन कोई भी बदलाव सभी पक्षों के साथ विचार विमर्श के बाद ही होते रहे हैं. यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे पर लॉ कमीशन ने अकादमिक प्रक्रिया फिर से शुरू की है. यूनिफॉर्म सिविल कोड आज संभव है या नहीं, इसे रहने दें तो भी ये सवाल उठता ही है कि विभिन्न समुदायों के पर्सनल लॉ में सुधार की ज़रूरत है. एकरूपता न भी हो तो भी पर्सनल लॉ में सुधार एक सतत प्रक्रिया है. समय के साथ कई प्रावधान पुराने और बेकार हो जाते हैं. सरकारों, विधायिकाओं और समुदायों को समय की मांग का जवाब देना पड़ता है.


वित्त मंत्री जेटली के इस जवाब को कई तरीके से पढ़ा जा सकता है. क्या वे यह कह रहे हैं कि कई समुदायों के पर्सनल लॉ में सुधार की प्रक्रिया पर विमर्श चल रहा है. तो क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ के अलावा भी अन्य पर्सनल लॉ को लेकर सुधार पर बहस होने जा रही है. कानून के मामले में उनकी विद्वता जगप्रसिद्ध है, अगर वे भी लॉ कमीशन के कुछ सवालों को देखेंगे तो उनके जैसा व्यक्ति शायद ही पसंद करे. फिर भी वित्त मंत्री कहते हैं कि लॉ कमीशन ने अकादमिक विमर्श की शुरुआत की है. लॉ कमीशन के सवालों को आप खुद देखिये और तय कीजिए कि क्या उनके सवालों से वो झलक मिलती है जिसकी बात वित्त मंत्री कर रहे हैं. क्या सिर्फ मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की ज़रूरत है या अन्य पर्सनल लॉ में भी.

लॉ कमीशन में एक दो ही सवाल हैं जो दूसरे समुदायों की बात करते हैं. जेटली ने फेसबुक पर आगे यह भी लिखा है कि धार्मिक व्यवहार, रीति रिवाज और नागरिक अधिकार में बुनियादी अंतर होते हैं. जन्म, गोद लेने, विरासत, शादी और मृत्यु से संबंधित धार्मिक संस्कारों को रीति रिवाजों के ज़रिये भी पूरा किया जाता है. क्या जन्म, गोद लेने या विरासत या शादी, तलाक आदि को लेकर जो अधिकार की बात होती है उनकी गारंटी धर्म से होनी चाहिए या संविधान से. क्या इन मामलों में ग़ैर बराबरी हो सकती है, मानव सम्मान से कोई समझौता हो सकता है. कुछ लोग कह सकते हैं कि पर्सनल लॉ को संविधान के अनुसार नहीं होना चाहिए. सरकार का मत साफ है. पर्सनल लॉ को संविधान के अनुसार ही होना चाहिए. तीन तलाक को बराबरी और सम्मान के साथ जीने के आधार के तराजू पर तौला जाएगा. यही पैमाना अन्य दूसरे पर्सनल लॉ पर भी लागू होगा.

अगर वित्त मंत्री जेटली अपने फेसबुक पोस्ट में यह भी स्पष्ट कर देते कि अन्य पर्सनल लॉ क्या हैं जहां वे तीन तलाक को परखने के पैमानों को लागू करना चाहते हैं. उन्होंने ज़रूर अन्य पर्सलन लॉ में सुधार की बात की है लेकिन उदाहरण सिर्फ तीन तलाक का ही दिया है. अगर वे दूसरे समुदायों के भी उदाहरण देते तो बेहतर होता. उनके इस पोस्ट को ध्यान से देखा जाना चाहिए कि वे तीन तलाक की समाप्ति की बात कर रहे हैं या यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत कर रहे हैं. जेटली का लिखा है. थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ेगी. आखिर में उनकी इस पंक्ति को भी ग़ौर से समझने की ज़रूरत है.

यूनिफॉर्म सिविल कोड के संबंध में अकादमिक बहस लॉ कमीशन के समक्ष चलती रह सकती है. जवाब इस सवाल का खोजा जाना है कि अगर हर समुदाय का अलग पर्सनल लॉ हो तो क्या ये सभी पर्सनल लॉ संविधान सम्मत नहीं होने चाहिए.

हमने शुक्रवार को नल्सर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा साहब से सवाल जवाब के अंदाज़ में इस पर बात की थी. कुछ सवाल और रह गए थे. इस बीच निवेदिता मेनन ने हिन्दू में एक लेख लिखा है इस पर. निवेदिता मेनन के लेख से भी कुछ सवाल बनते हैं. जैसे उन्होंने कहा है कि क्या हिन्दू कोड बिल में जेंडर जस्टिस है? क्या वही मॉडल है या इसमें भी सुधार होगा? क्या सभी पर्सनल लॉ की जेंडर जस्टिस प्रथाओं का एक जगह संकलन किया जाएगा? क्या यूसीसी के तहत हिन्दू अनडिवाइडेड फैमिली के प्रावधान को समाप्त करना होगा? क्या भारत के सभी नागरिक एक समान उत्तराधिकार कानून से शासित होंगे?

वित्त मंत्री जेटली और निवेदिता ने बार बार जेंडर जस्टिस शब्द का इस्तमाल किया है. मतलब यही हुआ कि कानून ऐसा हो कि औरतों को बराबरी का हक़ मिले. दूसरी बात है हिन्दू संयुक्त परिवार के प्रावधान को समाप्त कर एक समान उत्तराधिकार के कानून लाने की बात को भी अलग से समझने की ज़रूरत है. निवेदिता के लेख से एक और सवाल उभरता है कि जेंडर जस्टिस के अनुसार शादी की बेहतर व्यवस्था क्या हो. निकाह में मुस्लिम औरतों के लिए मेहर की रकम तय होती है. निवेदिता मेनन ने पूछा है कि ऐसा सिस्टम हिन्दुओं में नहीं है तो क्या यूनिफॉर्म सिविल लॉ के तहत ये अन्य समुदायों में भी लागू होगा. वित्त मंत्री कहते हैं लॉ कमीशन के सामने जाकर बहस करें लेकिन लॉ कमीशन ने जो सवाल वेबसाइट पर रखे वे बेहद बुनियादी हैं और इस बहस का व्यापक रूप प्रदान नहीं करते हैं. ये मेरी अपनी राय है. तमाम लेखों में आप गोवा के यूनिफॉर्म सिविल कोड का ज़िक्र सुनेंगे. हम इसके बारे में भी अलग से चर्चा करना चाहते हैं. हिन्दू अख़बार में निवेदिता मेनन ने लिखा है कि गोवा में 1939 में Portuguese Civil Procedure Code (1939) of Goa लागू हुआ था. यह न तो यूनिफॉर्म यानी समान है, ना ही इससे जेंडर जस्टिस होता है. अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए शादी के कानूनी प्रावधान अलग हैं. निवेदिता मेनन के अनुसार गोवा में हिन्दुओं के रीति रिवाज और चलन को मान्यता दी गई है. जिसमें सीमित तरीके से हिन्दुओं को बहुविवाह की अनुमति भी है.

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क्या वाकई ऐसा है. गोवा का सिविल कोड सभी समुदायों की पत्नियों को सभी प्रकार की संपत्तियों में पचास फीसदी की हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है. व्यवहार में होता है या नहीं मालूम नहीं. भारत सरकार ने भी ऐसे कानून बनाए हैं. जो बेटियां, पत्नियां और सहेलियां ट्वीटर-फेसबुक पर हैं, अगर वहीं पोस्ट करें कि उनके पिता की संपत्ति में कुछ मिला है या नहीं तो जागरुकता भी फैलेगी. मुस्लिम महिलाओं को ऐसे अधिकार हिन्दू महिलाओं से पहले से हासिल हैं. ज़रा वे भी पोस्ट करें कि व्यवहार में उन्हें कुछ मिलता भी है या नहीं.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)



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