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प्राइम टाइम इंट्रो : राजनीति में नैतिकता को तौलने वाला कोई तराजू नहीं

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प्राइम टाइम इंट्रो : राजनीति में नैतिकता को तौलने वाला कोई तराजू नहीं
भारतीय राजनीति में सब कुछ है बस एक तराजू नहीं है, जिस पर आप नैतिकता तौल सकें. चुनाव बाद की कोई नैतिकता नहीं होती है. राज्यपाल के बारे में संविधान की जितनी धाराएं और उनकी व्याख्याएं रट लें, व्यवहार में राज्यपाल सबसे पहले अपनी पार्टी के हित की रक्षा करते हैं. यही हम कई सालों से देख रहे हैं, यही हम कई सालों तक देखेंगे. राज्यपालों ने संविधान की भावना और आत्मा से खिलवाड़ न किया होता तो कर्नाटक, बिहार, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के मामले में अदालत को राज्यपाल के फैसले पलटने नहीं पड़ते. उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को जब चुनौती दी गई तब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा था लोग गलत फैसले ले सकते हैं चाहे वे राष्ट्रपति हों या जज. ये कोई राजा का फैसला नहीं है जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती है. तब के चीफ जस्टिस ने कहा था कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के मामले में केंद्र सरकार को निष्पक्ष होना चाहिए लेकिन वो प्राइवेट पार्टी जैसा व्यवहार कर रही है.

गोवा और मणिपुर के संदर्भ में टीवी पर अजीब सा तर्क सुना. एक जानकार कह रहे थे कि गोवा के राज्यपाल ने बीजेपी को इसलिए भी बुलाया होगा क्योंकि बीजेपी के वोट शेयर अधिक थे. यह वह व्याख्या है जिसका जिक्र संविधान में कहीं नहीं होगा. सीटों के आधार पर तो सरकार बनाने का आमंत्रण दिया जाता था मगर वोट शेयर का तर्क संविधान से बाहर का है. तो आप सरकार बनाने के पक्ष में ताकत के दम पर नए-नए तर्क सुनने के लिए तैयार रहिए. वोट शेयर को लेकर तर्क देने वालों से सावधान रहें. कई बार कम वोट शेयर वाले को ज्यादा सीट मिल जाती हैं तो क्या उसे सरकार बनाने का न्यौता नहीं मिलेगा. जैसे गोवा में कांग्रेस -28.4 प्रतिशत, 17 सीट और बीजेपी- 32.5 प्रतिशत 13 सीट. मणिपुर में कांग्रेस का वोट शेयर है 35.1 प्रतिशत, सीटों की संख्या 28 है. बीजेपी का वोट शेयर है 36.3 प्रतिशत, सीटों की संख्या कांग्रेस से सात कम 21 है. गोवा में आम आदमी पार्टी का 6. 3 प्रतिशत वोट शेयर है मगर एक भी सीट नहीं है. लेकिन गोवा फार्वर्ड पार्टी को 3.5 प्रतिशत वोट है और तीन विधायक. इस तर्क से कोई राज्यपाल बिना विधायक वाली आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने का न्यौता न दे दे.

पिछले दो साल में अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सरकार गिराकर राष्ट्रपति शासन लागू करने के सरकार के तमाम तर्क अदालत में ध्वस्त हो चुके हैं. दोनों जगहों पर सरकारें बहाल हुई हैं. तब भी अरुण जेटली ने ब्लॉग लिखकर राष्ट्रपति के फैसले और राज्यपाल की रिपोर्ट का बचाव किया था, जो अदालत में गलत साबित हुआ. गोवा मामले में उन्होंने फिर इस बार ब्लॉग लिखा है कि कांग्रेस ने बीजेपी पर गोवा के जनादेश चोरी करने का आरोप लगाया है जो सही नहीं है.

गोवा विधानसभा चुनावों में बेनतीजा जनादेश आया... एक त्रिशंकु विधानसभा बनी... ऐसी स्थिति में पोस्ट पोल एलायंस होंगे ही... बीजेपी एक गठबंधन बनाने में कामयाब रही और राज्यपाल के सामने 40 में से 21 विधायकों का समर्थन पेश किया. वे खुद राज्यपाल के सामने पेश हुए और समर्थन पत्र सौंपा. कांग्रेस ने राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा भी नहीं किया. मनोहर पर्रिकर की अगुवाई में 21 विधायकों के दावे के सामने राज्यपाल 17 विधायकों के अल्पमत को न्योता नहीं दे सकते थे. ऐसी कई पुरानी नज़ीर हैं जो राज्यपाल के फैसले का समर्थन करती हैं.  2005 में बीजेपी झारखंड की 81 में से 30 सीटों पर जीती. तब 17 विधायकों वाली जेएमएम के नेता शिबू सोरेन को अपने समर्थकों के साथ सरकार बनाने के लिए न्योता दिया गया. वर्ष 2002 में जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के 28 विधायक जीते लेकिन सरकार ने पीडीपी के 15 और कांग्रेस के 21 विधायकों के गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुलाया. सन 2013 में बीजेपी ने दिल्ली में 31 सीटें जीतीं लेकिन आप के 28 विधायकों को कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का न्योता दिया गया.

जेटली के ये तर्क सही हैं. कांग्रेस के दौर के ऐसे तमाम उदाहरण हैं. इसलिए नैतिकता का कोई पैमाना लागू नहीं होता है. बशर्ते नैतिकता के लिए आप जिद कर रहे हों. गोवा में बीजेपी के मुख्यमंत्री दो-दो क्षेत्रों से हार गए. उनके छह मंत्री हार गए. 13 विधायक बने जबकि कांग्रेस के 17 बने हैं. दोनों के पास सरकार बनाने के लिए 21 की संख्या नहीं है. दोनों के पास यह संख्या गठबंधन से ही आ सकती थी. बीजेपी से उम्मीद की जा रही थी कि वह नैतिकता का प्रदर्शन करेगी और अपनी हार स्वीकार करेगी. लेकिन कांग्रेस ने प्रयास क्यों नहीं किया. अब वो बीजेपी पर आरोप लगाकर क्या साबित करना चाहती है. राज्यपाल को चिट्ठी भेजने की पहल क्यों नहीं की.

बीजेपी ने इसे मौके के रूप में लिया और नितिन गडकरी को दिल्ली से भेज दिया. गोवा में मौजूद दिग्विजय सिंह गोवा फार्वर्ड पार्टी और निर्दलीय विधायक को साथ नहीं ले पाए. सरकार बनाने की चुनौती कांग्रेस के पास बीजेपी से कम थी. बताया जा रहा है कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री के दावेदार बहुत थे. उसके टिकट पर चार-चार पूर्व मुख्यमंत्री जीते हैं. तो क्या कांग्रेस के आंतरिक झगड़े का लाभ बीजेपी ने उठाया. क्या कांग्रेस का नेतृत्व अपने नेताओं को संभाल नहीं  पाया. यह संकट कांग्रेस का ज्यादा लगता है, बीजेपी का कम लगता है. कांग्रेस कहती है कि राज्यपाल ने नहीं बुलाया. सुप्रीम कोर्ट चली गई मगर उसे कोई राहत नहीं मिली. कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में हार गई. कोर्ट ने कहा कि मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं लेकिन उन्हें गुरुवार तक विधानसभा के पटल पर बहुमत साबित करना पड़ेगा. कांग्रेस ने कोर्ट से कहा कि राज्यपाल ने बीजेपी को न्यौता देकर असंवैधानिक काम किया है क्योंकि सबसे अधिक सीटें उसे मिली हैं. कोर्ट ने पूछा कि अगर संख्या थी तो आपको राजभवन के बाहर धरना करना चाहिए था. अब इस पर बहस हो सकती है कि क्या राजभवन के बाहर धरना देना अनिवार्य शर्त है. अगर किसी ने किसी दल को धरना देने से रोक दिया तो क्या सरकार बनाने की उसकी दावेदारी खत्म हो जाएगी.

इस बीच मनोहर पर्रिकर गोवा के चौथी बार मुख्यमंत्री बन गए हैं. पर्रिकर ने दो बार शपथ ली. पहली बार उन्होंने मुख्यमंत्री की जगह मंत्री बोलकर शपथ ली लेकिन नितिन गडकरी के कहने पर दोबारा लौटे और शपथ ली. बिहार में लालू यादव के बेटे को दो बार शपथ लेनी पड़ी थी. तब बीजेपी ने खूब मजाक उड़ाया था. आईआईटी से पास आउट पर्रिकर से भी चूक हो गई. वैसे पर्रिकर ने करीब पौने चार लाख करोड़ के बजट वाले रक्षा मंत्रालय को छोड़ साढ़े चौदह हजार करोड़ के बजट वाले गोवा की कुर्सी संभाली है. कम बड़ा त्याग नहीं है. उनके मंत्रिमंडल में बीजेपी के कम सदस्य हैं, गठबंधन के ज्यादा मंत्री बने हैं. पर्रिकर के अलावा आठ मंत्रियों ने शपथ ली है. इसमें दो बीजेपी के मंत्री हैं, तीन गोवा फार्वर्ड पार्टी के मंत्री हैं, एक निर्दलीय मंत्री है और दो एमजीपी के हैं. यानी समर्थन देने वाली पार्टियों के सभी सदस्यों को मंत्री बना दिया है.

तीन सीटें जीतने वाली गोवा फार्वर्ड पार्टी के सौ फीसदी विधायक मंत्री बन गए हैं. इसके नेता विजय सरदेसाई जिनका एकमात्र लक्ष्य बीजेपी की सरकार को हटाना था, बीजेपी की सरकार में ही पूरी पार्टी के साथ मंत्री बन गए हैं. उनके इस फैसले के खिलाफ उनकी पार्टी के अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया है. विजय सरदेसाई यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं. निर्दलीय विधायक बन चुके हैं लेकिन इस बार अपनी पार्टी बनाकर चुनाव में उतरे थे. प्रसाद काथे ने लिखा है कि उनके साथ कांग्रेस ने रणनीतिक समझ के कारण शिवाली में गोवा फार्वर्ड पार्टी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं दिया.  जिसके कारण उस सीट पर बीजेपी के मंत्री दयानंद मान्देकर हार गए. विजय सरदेसाई ने चुनाव प्रचार के दौरान मनोहर पार्रिकर पर जमकर हमले किए. परिर्कर के मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय सरदेसाई ने ही शपथ ली. बीजेपी के मंत्री को हराने वाला बीजेपी की सरकार में मंत्री बन गया. गोवा फार्वर्ड पार्टी ने अक्टूबर 2016 में छह प्वाइंट का एजेंडा जारी किया था जिसका मकसद था मौजूदा बीजेपी सरकार को सत्ता से हटाना है. गोवा की नदियों का राष्ट्रीयकरण करना है. स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में 80 फीसदी आरक्षण. नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए 80 फीसदी आरक्षण की मांग डोनाल्ड ट्रंप को प्रेरित न कर दे. बीजेपी की पुरानी सहयोगी महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी के तीन में से दो विधायक मंत्री बन गए हैं. लिहाजा पर्रिकर सरकार को बहुमत साबित करने में कोई दिक्कत नहीं आएगी. अगर किसी नैतिकता के कारण गोवा में हारने के बाद बीजेपी को सरकार बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए था तो उसी नैतिकता के कारण बहुमत से दूर रह गई कांग्रेस को भी सरकार बनाने के लिए हल्ला नहीं करना चाहिए.

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मणिपुर में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला. बीजेपी कांग्रेस के बाद दूसरी पार्टी बनकर उभरी है. मगर उसे भी बहुमत नहीं मिला. मणिपुर की राज्यपाल इस बात से संतुष्ट हैं कि बीजेपी के पास संख्या है और बीरेन सिंह को सरकार बनाने का न्यौता दिया है. एन बीरेन सिंह तीन-चार महीना पहले कांग्रेस से बीजेपी में आए हैं. इतने कम समय में कांग्रेस से बीजेपी में आकर मुख्यमंत्री बनने वाले वे पहले नेता होंगे. एन बीरेन सिंह 2002 में डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी से पहली बार विधायक बने, जिसका कांग्रेस में विलय हो गया. सन 2007 और 2012 में वे कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने और मंत्री भी. वर्ष 2017 में वे बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. अरुणाचल प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी कांग्रेस से बीजेपी में आए हैं. असम में कांग्रेस से आए हेमंता विश्वास शर्मा सरकार में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं और पूर्वोत्तर में बीजेपी के प्रसार के अगुआ नेता हैं.

मणिपुर और अरुणाचल के उदाहरण से साफ है कि कांग्रेस के नेताओं का बीजेपी में अच्छा भविष्य है. जिस तालाब में कमल खिल रहा है उसी में हाथ भी धुल रहा है. उत्तराखंड में सोनिया कांग्रेस और सोनिया बीजेपी का नारा उछला था मगर कांग्रेस से बीजेपी में जाने वाले 14 नेताओं में से 12 विधायक बन गए हैं. कांग्रेस के लिए बीजेपी में काफी अच्छा स्कोप है. गोवा और मणिपुर को लेकर क्या राज्यपाल ने कांग्रेस के साथ नाइंसाफी की है या वही किया है जो उन्हें संविधान और सुप्रीम कोर्ट के तमाम आदेश करने को कहते हैं.


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