NDTV Khabar

प्राइम टाइम इंट्रो : आखिर क्‍या हो रहा है इस मीडिया में...

रोज़ आम आदमी से जुड़े सवाल राष्ट्रीय मीडिया से बाहर कर दिये जाते हैं. एक व्यक्ति को लेकर घंटों चर्चा होती है, लाखों किसानों को लेकर एक घंटा भी बहस नहीं होती है. इसलिए आपके लिए जानना ज़रूरी है कि मीडिया में क्या हो रहा है.

12170 Shares
ईमेल करें
टिप्पणियां
प्राइम टाइम इंट्रो : आखिर क्‍या हो रहा है इस मीडिया में...

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

इतना भी घबराने की ज़रूरत नहीं है. बस जानने की ज़रूरत है कि इस मीडिया में क्या हो रहा है. फिर आपको समझ आ जाएगा कि आपके साथ क्या होने जा रहा है. डराने वाले ताकतवर होते हैं, यह बात सही है. पर उसका क्या करेंगे जिसके पास ताकत नहीं होती मगर जो डरता नहीं है. मैं आपको एक बात बताता हूं फिर आप इसे अपने मन में रख लेना. दिल्ली जब आइयेगा तो पत्रकारों से मिलियेगा. मिलकर जो अनुभव होगा, उसे डायरी में लिखियेगा. मुझे पत्र लिखियेगा. आपको दिल्ली में दो तरह के पत्रकार मिलेंगे. एक जो डरे हुए हैं और एक जिन्हें डराया जा रहा है. जो डरे हुए हैं उनमें दो तरह के डरपोक मिलेंगे. एक जिन्हें डरने की काफी कीमत मिल रही है, दूसरे जिन्हें डर के बदले सिर्फ डर ही मिल रहा है. दिल्ली के पत्रकारों की हालत ये है कि कह दीजिए कि आपका फोन रिकॉर्ड हो रहा है तो बातचीत ही बंद कर देगा. रिकॉर्डिंग की बात सच है या नहीं मगर कोई रिकॉर्ड कर रहा है, इसका डर तो सच है. राजकमल झा की इस बात को कितनी बार दोहराऊं. फिर भी एक बार पढ़ लीजिए. क्या पता अब इस तरह की बात करने वाले लोग ही न रहें.

राजकमल झा ने कहा था, ''Its important especially in an age, and I turn 50 this year so I can say that, when we have a generation of journalists who are growing up in an age of retweets and likes. And they do not know that criticism from a government is a badge of honour."

पूरी दुनिया में मीडिया सत्ता की गोद में खेल रहा है. ये मीडिया गोदी मीडिया है. अंग्रेज़ी में इसे एम्बेडेड जर्नलिज़्म कहते हैं. टीवी के ज़रिये आपकी धारणा को नियंत्रित किया जा रहा है. आखिर क्या बात है कि दो चार मुद्दों के आस पास ही तमाम चैनल साल भर बहस करते हैं. दुनिया भर में टीवी को मैनेज करना अब सरकार और चुनावी रणनीति का हिस्सा है. मैं बहुत दिनों से एक एनिमेशन पर काम कर रहा था. हमारे ग्राफिक्स कलाकार ईशान ने मन लायक बना ही दिया है तो सोचा आज बता ही देता हूं ताकि आपको पता चले कि आपके साथ क्या हो रहा है.

टीवी के सामने बैठे दर्शक के बारे में कहा गया कि यह शक्तिशाली है. अपने रिमोट से तय करता है कि कौन सा चैनल देखेगा और क्या देखेगा. इसलिए चैनलों की दुनिया में होड़ होती थी अलग-अलग खबरों को लाने की. धीरे-धीरे होड़ बंद हो गई. कभी तालिबान तो कभी 2012 में दुनिया खत्म होने के कार्यक्रम आने लगे. एक रिपोर्टर तो स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंच गया था. सारे चैनल धीरे-धीरे एक से होने लगे. आप एक दर्शक के रूप में लाचार. चैनल बदलना न बदलना एक ही बात हो गया. चारों तरफ वही मुद्दे, वही दलीलें. एक बार एजेंडा तय हो गया फिर सारे चैनल चल पड़े. क्या यह सिर्फ संयोग होगा कि कई चैनल दो चार मुद्दों के आस-पास ही दिन रात बहस करते रहते हों. टीवी एक ईंट बनता गया. टीवी के ऊपर टीवी. चैनल के ऊपर चैनल. दर्शक के आस-पास एक कुआं बन गया. कुएं की दीवार ऊंची होती चली गई. वो धारणा के इस अंधेरे कुएं में बंद होने लगा. कुआं अब सुरंग होने लगा है. आपकी सोच उस स्क्रीन का विस्तार बन जाती है जो आप देख रहे होते हैं. जहां बैठे बैठे दर्शक को अब दो चार बातें ही मालूम हैं, या वही मालूम है जिसे बताये जाने का फैसला हुआ है. इस कुएं में बंद दर्शक के दर्शक होने का अस्तित्व मिट जाता है. आप दर्शक नहीं रह जाते हैं. मौत का कुआं आपने देखा होगा मेले में, ये जो आप देख रहे हैं लोकतंत्र में जनमत की मौत का कुआं है.

मीडिया कंट्रोल के दौर में रिमोट कंट्रोल का कोई मतलब नहीं रह जाता है. पोलैंड मैं कभी नहीं गया, लगता भी नहीं कि कभी जा पाऊंगा. 1982 की एक घटना है. हानिया एम फेदरोविच का लिखा एक पेपर है जिसका टाइटल है THE WAR FOR INFORMATION: THE POLISH RESPONSE TO MARTIAL LAW. 12 दिसंबर 1981 की आधी रात पोलैंड में मार्शल लॉ लगा था. मतलब आपातकाल. कम्युनिस्टों का यह आपातकाल था. इस रिसर्च के ज़रिये यह देखने का प्रयास किया गया कि जब सूचनाओं पर सरकार का नियंत्रण हो जाता है तब समाज के भीतर कैसी प्रतिक्रिया होती है. क्या दर्शकों का एक बात सुनते सुनते दिमाग पक जाता है और अगर पक जाता है तो वे क्या करते हैं.

पोलैंड में जब टीवी पर एक बात आने लगी, सरकार की बात, सरकार की जी हुज़ूरी, तो लोगों ने नायाब तरीका निकाला. Swidnik और Lublin नाम के शहर में शाम के वक्त लोग अपने टीवी सेट को खिड़की की तरफ मोड़ देते थे, और बाहर घूमने निकल जाते थे. हज़ारों लोगों ने ऐसा ही करना शुरू कर दिया. टीवी तो चल रहा होता था मगर लोग बाहर टहल रहे होते थे. 36-37 साल पहले की जनता इतनी रचनात्मक थी. दर्शकों को यही बताना था कि कोई नहीं देख रहा है. गुस्से में प्रशासन ने बदला लेना शुरू कर दिया. शाम के वक्त बिजली और पानी के कनेक्शन काट दिये. जब इससे बात नहीं बनी तो सरकार ने यहां तक नियम बना दिये कि शाम के वक्त कितने लोग गलियों में घूमने के लिए निकलेंगे. ताकि कुछ लोग घर बैठ कर टीवी पर प्रोपैगैंडा देख सकें. नतीजा यह हुआ कि और भी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर टहलने के लिए निकलने लगे.

हिन्दी का पत्रकार इतना ग्लोबल हो जाए, चलता है. पटना के एपिसोड में पोलैंड का उदाहरण. पर देखिये एक समाज कैसे सरकार की खुशामद करने वाली मीडिया से लड़ता है. लोग तब भी मीडिया और सरकार का गेम समझ रहे थे, अब भी समझ ही रहे होंगे. पोलैंड में लोग अपील करने लगे कि अखबार न पढ़ें. उस समय एक नारा चला कि "Let the piles of unsold newspapers at the newsstands demonstrate our opposition to military rule". मतलब न्यूज़ स्टैंड पर अखबारों को बिना बिके पड़े रहने दीजिए ताकि उन्हें समझ आ जाए कि हम मिलिट्री रूल का विरोध करते हैं. इसका असर हुआ. सेना के नियंत्रण में छपने वाले अखबार को लोगों ने खरीदना ही बंद कर दिया. पोलैंड की जनता को आज तक अपना वो अतीत याद है.

2016 में पोलैंड की सरकार ने प्रेस की आज़ादी को सीमित करने के लिए कुछ नियम बनाए. सरकार चाहती थी कि चार पांच टीवी चैनलों के रिपोर्टर ही संसद कवर करें. विपक्ष ने कहा कि ये सब सूचना रोकने के तरीके हैं ताकि नागरिकों को पता ही नहीं चले कि संसद में क्या हुआ. विपक्ष की यह बात जनता समझ गई और 13 दिसंबर 2016 संसद को घेर लिया. उस दिन पोलैंड में मार्शल लॉ लगने की 56वीं बरसी थी.

सोमवार सुबह खबर आई कि एनडीटीवी के प्रमोटर डॉ. प्रणॉय रॉय और राधिका रॉय के घर पर सीबीआई के छापे पड़े हैं. सीबीआई ने भी प्रेस रिलीज जारी कर बताया कि एफआईआर की गई है. गोदी मीडिया के कुछ हिस्से बिना तथ्यों की जांच किए उतावले हो गए. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के ज़रिये तरह तरह की अफवाह फैलाई जाने लगी. आप जानते हैं कि सोशल मीडिया पर एनडीटीवी के बारे में निरंतर अफवाह फैलाई जाती रहती है. सुबह ही एनडीटीवी ने बयान जारी कर दिया था कि हम डरने वाले नहीं हैं. फर्जी मामलों से नहीं डरेंगे. शाम को एक विस्तृत बयान आया जिसे आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं.

'नेता चाहे हम पर जितना भी हमला करें, हम भारत में मीडिया की आज़ादी की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे.' ये अंतिम वाक्य है इस बयान का. इसमें एक वाक्य अपनी तरफ से जोड़ रहा हूं. पोलैंड की जनता की तरह लड़ाई का कुछ फर्ज़ आप भी अदा कीजिए. आपमें से बहुत लोगों ने इसे मीडिया की आज़ादी पर हमला माना है. आवाज़ उठाई है. बहुत से पत्रकारों ने इसका विरोध किया है.

बहुत से लोगों ने व्हाट्सऐप कर बताया है कि वे समझ रहे हैं कि इस खेल के ज़रिये किसे डराया जा रहा है. योगेंद्र यादव, सिद्धार्थ भाटिया, हरतोष सिंह बाल, एम के वेणु, राजदीप सरदेसाई, शोएब दानियाल, प्रणीव स्वामी, ओम थाणवी, रामचंद्र गुहा, अजय शुक्ला, ये वो लोग हैं जो तमाम मसलों पर पब्लिक स्पेस में लिखते रहे हैं, बोलते रहे हैं. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस छापेमारी को डराने की कार्रवाई बताया है. देश भर से आम दर्शकों ने भी ट्वीट किया है. वेंकैया नायडू ने कहा है कि अगर कोई मीडिया में है, गलत काम करता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सरकार चुप बैठेगी, अधिकारी अपना काम कर रहे थे और उसमें कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं है.

एनडीटीवी ने अपना जवाब दे दिया है. जिस व्यक्ति की शिकायत पर देश की अदालतों ने संज्ञान नहीं लिया, उस व्यक्ति की शिकायत पर सीबीआई छापे मारने चली आई जबकि एनडीटीवी के प्रमोटर ने साफ कहा है कि जिस लोन की बात थी, वो लोन चुका दिया गया है. वैसे कानून को याद दिलाना चाहिए कि छह लाख करोड़ का जो नॉन परफार्मिंग एसेट है बैंकों का, उसके लिए भी कुछ काम करने की ज़रूरत है. बहरहाल ये जो हमला है वो दरअसल आप पर है. आज यह हमला नहीं होता तो मैं वो करता जिसके बारे में शनिवार से सोच रहा था.

आप जानते हैं कि भारत के दो बड़े राज्य मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान आंदोलन कर रहे हैं. पूरे महाराष्ट्र में सोमवार के दिन किसान स्ट्राइक थी. इन किसानों की मांग वही है जिससे सरकार बच रही है. किसान चाहते हैं कि जितनी लागत है उसमें पचास टका मुनाफा जोड़ कर दाम देने की गारंटी दे सरकार. बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में यही वादा किया था. यहीं नहीं किसानों के सारे कर्ज़े माफ हों. एक महीना पहले अहमदनगर के गांव कुंतांबा की ग्रामसभा में ये प्रस्ताव पास किया था. धीरे धीरे महाराष्ट्र के कई गांवों की ग्राम सभाओं में प्रस्ताव पास होने लगे और एक जून से महाराष्ट्र में भयंकर किसान स्ट्राइक हुई. इसके तहत किसानों ने शहरों को फल, दूध और सब्ज़ी की सप्लाई रोक दी. बीच में खबर आई कि हड़ताल टूट गई है मगर इस स्ट्राइक के कोऑर्डिनेशन कमेटी के डॉक्टर अजित नवले ने कहा कि स्ट्राइक चालू है. मध्य प्रदेश में भी किसानों ने इसी तरह की स्ट्राइक की है. वहां हड़ताल के समाप्त होने की खबर है. वहां भी किसान पूछ रहे हैं कि मंडी में हमें एक रुपये किलो प्याज का दाम मिलता है उसी को हम बाजार से बीस रुपये किलो खरीदते हैं. ऐसा क्यों हो रहा है. दावे के साथ तो नहीं कह सकता मगर शायद ही कोई चैनल किसानों के पक्ष में खड़ा हुआ होगा, सरकार से पूछा होगा कि तीन साल हो गए, आपने वादा किया था कि उत्पादन लागत में पचास फीसदी मुनाफा जोड़ कर दाम देंगे, वो दाम कब देंगे. जब भी ऐसी आवाज़ आती है, नेशनल मीडिया के सामने दूसरे मसले खड़े कर दिये जाते हैं. सेना के मसले पर चर्चा होने से आप शक भी नहीं करेंगे कि किसानों के मसले पर चर्चा रोकी गई है. आप क्या हम भी चाहेंगे कि सेना के मसले पर ही चर्चा हो मगर इसी तरह रोज़ आम आदमी से जुड़े सवाल राष्ट्रीय मीडिया से बाहर कर दिये जाते हैं. एक व्यक्ति को लेकर घंटों चर्चा होती है लाखों किसानों को लेकर एक घंटा भी बहस नहीं होती है. इसलिए आपके लिए जानना ज़रूरी है कि मीडिया में क्या हो रहा है.


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement