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प्राइम टाइम इंट्रो : किन बातों से तय हुई बिहार चुनाव में हार या जीत?

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प्राइम टाइम इंट्रो : किन बातों से तय हुई बिहार चुनाव में हार या जीत?

लालू प्रसाद और बिहार कांग्रेस अध्‍यक्ष अशोक चौधरी के साथ नीतीश कुमार

नई दिल्‍ली: भारत में एक अखिल भारतीय कारण आयोग होना चाहिए जो चुनावों के बाद हार और जीत के कारणों की समीक्षा करें और कम से कम दस कारणों को आधिकारिक रूप से जारी करे। ऐसे किसी कारण आयोग के अभाव में किसी भी चुनाव के बाद हार और जीत के कारणों की समीक्षा को लीपापोती कहने वालों से मुझे बहुत तकलीफ होती है। जो राजनीतिक दल अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं वो हार के कारणों को लेकर ईमानदार नहीं होंगे, यह बात मैं दावे से तभी कह सकूंगा जब मुझे अखिल भारतीय कारण आयोग का चेयरमैन बनाया जाएगा।

लोकसभा में हार के कारणों की समीझा अगर लालू यादव और नीतीश कुमार ने न की होती तो लालू और नीतीश दोबारा से नहीं गले नहीं मिलते। तब इनकी हार का कारण अलग-अलग लड़ना था। 2014 में मोदी लहर के अलावा बीजेपी का रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के साथ मिलना जीत का कारण बताया गया। अब वही पासवान और कुशवाहा बीजेपी की हार के कारण बताए जा रहे हैं। उस वक्त अगर बीजेपी जीत के कारणों की समीक्षा करती तो पता चलता कि मोदी लहर का लाभ कहीं इन दलों को तो नहीं मिला। बीजेपी कह रही है कि महागठबंधन के सहयोगी ने अपना वोट ठीक से एक-दूसरे को ट्रांसफर किया। पासवान कुशवाहा और मांझी ने अपना वोट ट्रांसफर नहीं किया या इनका वोट ही नहीं था। कहीं ऐसा तो नहीं कि बीजेपी का वोट इन दलों को ट्रांसफर नहीं हुआ। लोकसभा में कुछ तो एक-दूसरे का ट्रांसफर हुआ होगा तभी तो अकेले दम पर बहुमत होने के बाद भी प्रधानमंत्री ने पासवान और कुशवाहा को मंत्री बनाया।

हार और जीत के कारणों में रैलियों और सभाओं के योगदान का भी मूल्यांकन होना चाहिए। मोदी युग की रैलियां विपक्ष में दहशत पैदा करने की रणनीति का हिस्सा लगती है। दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने एक भी बड़ी रैली नहीं की। वो 67 सीट जीत गए। लेकिन बीजेपी रैलियों की भव्यता की रणनीति पर कायम रही। बल्कि इसमें दुनिया भर के स्टेडियम और ऑटिरोयिम को भी शामिल किया।

लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी की रैली कामयाबी का प्रतीक बन गई। जिमी जिब कैमरा, मोदी-मोदी के नारे और जनसैलाब का फैलाव। बिहार में हर रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकसभा से भी ज्यादा भीड़ इस बार देख रहा हूं। जहां तक नज़र दौड़ाता हूं लोग ही लोग नज़र आ रहे हैं। दूसरी तरफ नीतीश कुमार और लालू यादव चुनाव भर सफाई देते रहे कि वो रैली नहीं कर रहे हैं, सभा कर रहे हैं। नीतीश कुमार और लालू यादव की सभाएं देसी अंदाज़ में होती थीं। मंच साधारण होता था और जनता के करीब। विधानसभा के किसी खास क्षेत्र में होने के कारण आसपास के लोगों से भी मैदान भर जाता था। बहुत कम जगहों पर बड़ी संख्या में बसें दिखीं।

मगर प्रधानमंत्री मोदी की हर सभा में बस, बोलेरो और स्कार्पियो की तादाद देखने लायक होती थी। ज़ाहिर है लाए गए लोग भी होंगे ताकि भीड़ से ये संदेश जाए कि जनता बीजेपी के साथ है। समस्तीपुर की रैली में इतनी भीड़ थी कि मुझे लगा कि बीजेपी या एनडीए को 200 सीटें आएंगी। मगर समस्तीपुर ज़िले की दस में से एक भी सीट बीजेपी नहीं जीत सकी। प्रधानमंत्री की किसी भी सभा की तस्वीर निकाल कर देखिये वो कैमरे के क्लोज़ में नज़दीक तो दिखते हैं, मगर उनका मंच इतना बड़ा बनाया जाता था और जनता से इतनी दूर होता था कि उन्हें देखने के लिए आई भीड़ जी भर के देख भी नहीं पाती थी। वक्ता और श्रोता में दूरी बहुत ज़्यादा होने लगी। दावे के साथ नहीं कह सकता कि यही दूरी लोकसभा के समय होती थी या नहीं। लेकिन तब माहौल कुछ अलग होता था। नरेंद्र मोदी को सुनने के साथ साथ देखने का जुनून भी था लोगों में।

हमारे साथ एक खास मेहमान हैं सार्थक बागची। सार्थक नीदरलैंड के लाइडन युनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे हैं। महाराष्ट्र और बिहार विधानसभा चुनावों में वोट के लिए लोगों को कैसे प्रभावित किया जाता है, इस पर तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं। सार्थक ने समस्तीपुर में पंद्रह दिन बिताये और नीतीश कुमार, अमित शाह और प्रधानमंत्री की रैली को देखा और उसके बाद वहीं के किसी गांव में जाकर उसके असर का आंकलन किया था। क्या वाकई चुनाव प्रबंधन से ही जीता जा सकता है।

पटना में भी लालू प्रसाद के पोस्टर एक दो ही नज़र आए। पूरे पटना में बीजेपी और नीतीश कुमार के पोस्टर छाये रहे। कोतवाली थाना और आयकर चौराहे के पास लालू के दो ही पोस्टर नज़र आए। कांग्रेस का तो कहीं नज़र भी नहीं आया। ऐसा नहीं कि लगा नहीं होगा, मगर जब भी पोस्टर दिखा या तो बीजेपी का दिखा या नीतीश कुमार का। लालू यादव ने ज़रूर ट्वीट करने वालों की टीम बना ली थी मगर उनके वोटर स्मार्ट फोन वाले नहीं थे। दिल्ली में बैठे बैठे हम लोग मान चुके हैं कि मतदाता वही है, जिसके पास स्मार्ट फोन है। अगर चुनाव प्रबंधन से ही जीता जा सकता है तो लालू यादव को कैसे सबसे अधिक सीटें आ गईं। बीजेपी और उसके सहयोगियों के दो दर्जन हेलिकॉप्टर उड़े। बीजेपी 53 सीटें ही जीत सकी। लालू यादव एक ही हेलिकॉप्टर से 101 पर लड़कर 80 सीटें ले आए। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को 71 सीटें मिली हैं। ये सही है कि प्रशांत किशोर की टीम ने लालू यादव और नीतीश कुमार के लिए साझा प्रबंध का इंतजाम किया, लेकिन प्रबंधन के मामले में फिर भी बीजेपी की टीम भारी थी।

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सोशल मीडिया सोशल मीडिया किया जा रहा है। महागठबंधन का एक भी नेता ऐसा नहीं है जिसे ट्वीटर पर दो लाख लोग फॉलो करते हों। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्वीटर पर 1 करोड़ 59 लाख लोग फॉलो करते हैं। लालू यादव के फॉलोअर की संख्या 1 लाख 61 हज़ार है। नीतीश कुमार के फॉलोअर की संख्या मात्र 1 लाख 45 हज़ार है। संख्या के मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके सहयोगी लालू यादव मिलकर भी प्रधानमंत्री से मुकाबला नहीं कर सकते। मगर इन दोनों नेताओं ने अपनी बातों से खूब जवाब दिया, बल्कि पहले ट्वीट कर बीजेपी के नेताओं को जवाब देने के लिए मजबूर भी किया। गुजरात विधानसभा चुनावों के समय मैंने देखा था। कांग्रेस के नेता जिस वक्त किसी रैली में आरोप लगाते थे, नरेंद्र मोदी उसी दिन अगली रैली में जवाब दे देते थे। लेकिन इस बार यही रणनीति नीतीश कुमार ने अपनाई। प्रधानमंत्री की तरफ से आरोप आया नहीं कि नीतीश कुमार के प्रेस कांफ्रेस का एसएमएस आ जाता था। लालू यादव का ट्वीट आ जाता था। रीयल टाइम में दोनों नेता प्रधानमंत्री से लड़ रहे थे। चैनलों पर नीतीश कुमार और लालू यादव का ट्वीट भी फ्लैश होने लगा।

बिहार चुनाव ने क्या चुनाव प्रबंधन, शाही खर्च का मिथक तोड़ दिया या फिर से कोई नया मिथक बना दिया। हम आज उन पत्रकारों के साथ हैं जो बिहार चुनावों को कवर कर रहे थे। उन्होंने इन सब तरकीबों के बीच मतदाताओं को किस तरह बदलते देखा। क्या उन्हें कोई नया बिहार नज़र आ रहा था, जिसकी जयकार चुनावों के बाद हो रही है।


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