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प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों पर जनसुनवाई - हर साल क्यों बढ़ती है इतनी फीस?

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प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों पर जनसुनवाई - हर साल क्यों बढ़ती है इतनी फीस?
वो दिन आएगा नहीं बल्कि वो दिन आया हुआ है जिसमें भारत के अन्य मुद्दों को सामने आने के लिए भावुक और धार्मिक मसलों से संघर्ष करना पड़ रहा है. आख़िर क्या किया जाए कि एक तरफ आप बेरोज़गारी, अस्थायी नौकरियां, कम मज़दूरी, मनरेगा, महंगी शिक्षा, महंगे अस्पताल को रख दें, दूसरी तरफ आप तीन तलाक, लाउडस्पीकर, बिरयानी, बीफ, गौ रक्षा, गौ हत्या, अज़ान, पाकिस्तान, वंदेमातरम रख दें तो आप पायेंगे कि हिन्दू-मुसलमान से संबधित सारे मसले बाकी ज़रूरी मसलों को हरा देंगे. आम आदमी भी सारे सवाल भूल कर हिन्दू बनाम मुस्लिम वाले मसले में रम जाता है. समाज, सरकार और मीडिया की नज़र भर पड़ जाए, इसके लिए तमिलनाडु के किसान दिल्ली आकर कभी निर्वस्त्र हो रहे हैं, ज़मीन पर दाल-भात बिछाकर खा रहे हैं, चूहा दबा लेते हैं, घास दबा लेते हैं. अगर आपको ज़रूरी सवालों को सेंटर में लाना होगा तो पहले हिन्दू बनाम मुसलमान वाले टॉपिक से लोहा लेना होगा. जीत तो हिन्दू मुसलमान वाले टॉपिक की ही होगी कि लोगों को भी ऐसे भावुक मुद्दे अच्छे लगते हैं.

न्यूज़ चैनलों की एक ख़ूबी है. 21वीं सदी में 19वीं सदी और 20वीं सदी के अधूरे मुद्दों पर ही बहस हो रही है. स्कूलों पर जनसुनवाई जारी है. पंजाब से एक बुजुर्ग ने पत्र लिखा है. उनका अलग-अलग स्कूलों में अच्छा ख़ासा अनुभव रहा है. उन्होंने लिखा है कि उनके स्कूल में टीचर के खाते में 17000 डाला जाता है, उसमें से 11000 निकाल कर स्कूल को वापस देना होता है. टीचर की सैलरी सिर्फ 6000 ही मिलती है. जिन्होंने आवाज़ उठाई, उनके ख़िलाफ़ स्कूल ने कार्रवाई शुरू कर दी. 6 प्रकार के विभागों से शिकायत की मगर कोई सुनवाई नहीं हुई.

schoolfee@ndtv.com पर हज़ारों ईमेल आए हैं. मैंने सारे तो नहीं मगर कई सौ मेल तो पढ़े ही हैं. यह तय है कि देश भर के प्राइवेट स्कूलों में इस साल 15 से 80 फ़ीसदी तक वृद्धि हुई है. हैदराबाद के एक स्कूल ने 50 फीसदी फ़ीस बढ़ा दी है. ये सब मैं ईमेल के आधार पर बता रहा हूं. क्या किसी माता-पिता की एक साल में सैलरी इतनी बढ़ती है. गाज़ियाबाद से एक महिला ने बताया कि एक बच्चे की फीस बढ़कर 60,000 हो गई है. वो दो बच्चों की फ़ीस नहीं दे सकती हैं तो सोच रही हैं कि इस साल एक का नाम कटा दें. उनके पास साठ हज़ार तो हैं मगर एक लाख बीस हज़ार नहीं हैं. स्कूलों के कारण मिडल क्लास के ये लोग पैसा होते हुए भी ग़रीब हो गए हैं.

हमारी जनसुनवाई को देखते हुए कई लोगों के ईमान जाग रहे हैं. एक जूता कंपनी के वितरक ने बताया कि सिलिगुड़ी से लेकर रायपुर तक के स्कूलों में क्यों महंगे ब्रांड के जूते ख़रीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है. जैसे एक्शन के वेलक्रो और स्पोर्टस शूज़ की कीमत है 700 से 800 रुपये. कंपनी ने 40 फीसदी मार्जिन पर स्कूल को दिया तो 320 रुपये ही कमाएगा. महंगे ब्रांड के जूते 2000 के आते हैं, इन पर भी 40 फीसदी का मार्जिन मिलता है. इस हिसाब से स्कूल की एक जूते पर 800 रुपये की कमाई हो गई. काला जूता तो ठीक है मगर महंगे ब्रांड के लिए मजबूर करने के पीछे ये लूटतंत्र हैं जिसे आप अर्थतंत्र कहते हैं. यही नहीं कई अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में हिन्दी बोलने पर भी फाइन लगती है. एक ईमेल में मऊ नाथ भंजन के एक स्कूल में हिन्दी बोलने पर 300 रुपये जुर्माना लेने का दावा किया गया है. एक और ईमेल में हिन्दी बोलने पर 600 रुपये फाइन वसूलने का दावा किया गया है. हम लूट के ऐसे ही अनुभवों का दस्तावेज़ बना रहे हैं.

कई बार बड़ी-बड़ी बातों में ऐसे किस्से दब जाते हैं. एक स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग में मां बाप के न आने पर 1000 रुपये का जुर्माना लिये जाने का दावा किया गया है. जुर्माने की कोई रसीद भी नहीं दी गई है. जिन लोगों के तबादले होते हैं उन्हें भी लूटने के उपाय निकाल लिये गए हैं. रक्षा विभाग के अधिकारी ने मेल किया है कि तबादले के कारण उनके बच्चे का एडमिशन दूसरे शहर के स्कूल में करा दिया है. लेकिन पुराने स्कूल ने भी अप्रैल और मई की फीस जमा करा लिया, तब जाकर कॉशन मनी देने की बात हुई. दो महीने से कॉशन मनी भी नहीं मिली है और नए स्कूल में भी उन्हें अप्रैल-मई की फीस देनी पड़ी है. गुड़गांव के एक स्कूल ने सिक्योरिटी डिपॉज़िट देने से मना कर दिया कि दो महीने पहले नहीं बताया. यहीं के एक स्कूल ने ट्रांसफर सर्टिफिकेट देने के लिए तीन महीने की फ़ीस जमा कराने के लिए कहा है. देहरादून के एक स्कूल से 15000 की सिक्योरिटी मनी निकालने के लिए अभिभावक को 4000 खर्च कर देने पड़े. फिर भी दस महीने के इंतज़ार के बाद 8,000 रुपये ही मिले, 7000 स्कूल ने रख लिये.

केमिस्ट्री के किस फार्मूले से यह लूट नहीं है और यह ग़ुलामी नहीं है. मुरादाबाद के एक स्कूल ने उन बच्चों से मोज़े उतरवा लिये जिन्होंने स्कूल की छाप वाले मोज़े नहीं पहने थे, जबकि सर्दी का मौसम था. दिल्ली का एक स्कूल है जो भोजन के लिए प्रति दिन का सौ रुपये लेता है. मां बाप का कहना है कि 10 रुपये की मैगी खिलाते हैं. एक अभिभावक ने लिखा है कि जब सुप्रीम कोर्ट स्कूलों के बाहर पान मसाले की दुकान बंद नहीं करा सका तो सरकारें स्कूलों की लूट कैसे बंद करा सकती हैं. भेजने वाले दर्शक काफी कड़क मिज़ाज के मालूम पड़ते हैं. कुछ नहीं होगा तो बात तो कर सकते हैं.

अदालत और सरकार से कुछ नहीं होगा तो गणपति से तो होगा. एक पोस्टर में गणपित बप्पा से अपील की गई है कि वे स्कूल फीस की लूट बंद करा दें. छत्तीसगढ़ के दुर्ग में पालक संघ ने एडीएम पर अपना गुस्सा निकाला. कहा कि वे बढ़ी हुई फीस नहीं देंगे. कुछ हिंसक बातें भी कीं जो मुझे पसंद नहीं है. पालकों ने कहा कि स्कूल नियम तोड़ेंगे तो हम भी नियम तोड़ेंगे. ये ठीक है. छत्तीसगढ़ के ही राजनांदगांव के एक स्कूल की मान्यता रद्द कराने के लिए छत्तीसगढ़ छात्र पालक संघ ने ज़िला शिक्षा अधिकारी से मुलाकात की है.

नोएडा में बुधवार को अभिभावकों ने फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया है. इनका कहना है कि प्रबंधन शिकायत नहीं सुन रहा है. ज़िलाधिकारी ने अभिभावकों की शिकायत पर सिटी मजिस्ट्रेट को जांच करने के आदेश दिये हैं. अभिभावकों का कहना है कि चार साल में 43 प्रतिशत फीस वृद्धि हो गई है. डीपीएस पानीपत के 30 बच्चों के माता पिता ने 27,900 रुपये वार्षिक शुल्क देने से इंकार कर दिया मगर उन लोगों ने बाकी फीस यानी 90,000 के करीब जमा करा दी थी. स्कूल ने ये पैसे रख लिये मगर विरोध करने वाले 12 बच्चों को निकाल दिया. मां बाप ने इसके खिलाफ़ थाने में शिकायत कर दी. अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है. मां बाप को स्कूल ने बताया है कि जब तक पूरी फीस नहीं भरेंगे तब तक इन बच्चों को बैठने नहीं दिया जाएगा. मां बाप का कहना है कि हरियाणा के अंदर एनुअल चार्ज अवैध है, इसलिए एनुअल चार्ज नहीं देंगे. सरकार चाहे तो इन बच्चों को दोबारा स्कूल भेजने के आदेश दे सकता है मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

देश भर में न जाने कितने स्कूलों के ख़िलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं. अभिभावकों ने कम से कम प्रयास तो किया है. अब आते हैं फीस को रेगुलेट करने के कानूनों पर. हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान ने ऐसे कानून बनाए हैं. हरियाणा में 1995 में कानून बना था जिसे 2005 में संशोधन किया गया. 16 फरवरी 2015 की रोहतक मंडल के आयुक्त की कार्यवाही रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के स्कूलों को फीस बढ़ाने के लिए ऑडिट रिपोर्ट के साथ फार्म 6 भरना होता है. अगर स्कूल को मुनाफ़ा हुआ है तो फ़ीस वृद्धि की अनुमति नहीं होती है. एनुअल चार्ज, एक्टिविटी फीस स्मार्ट क्लास फीस, कंप्यूटर फीस सब कैपिटेशन फीस के ही रूप हैं. इन मदों में फीस नहीं ली जा सकती है.

गुजरात ने फीस की अधिकतम सीमा तय कर दी है. महाराष्ट्र में 2014 में कानून बना था. इसमें कहा गया है कि स्कूल अपनी मर्ज़ी से फीस नहीं बढ़ा सकते हैं. अकादमिक वर्ष शुरू होने के 30 दिन के अंदर अभिभावक शिक्षक संघ बनेगा. सभी मां बाप इसके सदस्य होंगे, इन सबको लेकर एक कमेटी बनेगी. इस कमेटी में पास हुए बिना फीस नहीं बढ़ सकती है. कई राज्यों में ड्राफ्ट बना है, कहीं कानून बना है मगर मां बाप हर राज्य के परेशान हैं. जब भी ये कानून बनते हैं हम लोग बहुत वाहवाही करते हैं, लेकिन कभी यह नहीं देखते कि इनके बग़ैर भी फीस बढ़ती जा रही है.


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