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'बिहार, यूपी और राजस्थान के कॉलेज का हाल', रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

देश में शिक्षा का हाल बदहाल है. टीचरों की कमी के कारण छात्रों को सही शिक्षा नहीं मिल पा रही है. शिक्षकों को सही और समय पर वेतन नहीं मिलता है.

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'बिहार, यूपी और राजस्थान के कॉलेज का हाल', रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
जब हफ्तों चैनलों पर हनीप्रीत का मामला चल सकता है, उसके बेबुनियाद किस्से रचे जा सकते हैं तो हफ्तों चैनल पर देश के ज़िलों और कस्बों के कालेजों की हालत पर चर्चा भी हो सकती है. इस मुद्दे पर बात करना इसलिए भी ज़रूरी है कि ज़िलों के बड़े कॉलेज जब से तबाह हुए हैं उसकी कीमत भी आप चुका रहे हैं. अपने बच्चों को बाहर भेजते हैं और बीए, एमए की पढ़ाई पर लाखों ख़र्च करते हैं. यह पैसा जोड़ दिया जाए कि राज्य के शिक्षा बजट का अच्छा खासा प्रतिशत हो सकता है. सिस्टम ने शिक्षा को अनदेखा कर, समाज और परिवार को तबाह किया है. हर राज्य में आज से बीस साल पहले 4-5 अच्छे कालेज तो होते ही थे जिनके प्रोफेसरों का नाम था, उनकी क्लास में जाने के लिए छात्रों के बीच मारा-मारी होती थी, उनकी इमारत भी शानदार हुआ करती थी, ये सब आज भी है मगर बग़ैर शिक्षक के खंडहर में बदल गया है.

बिहार एक कॉलेज है लंगट सिंह कालेज. 3 जुलाई, 1899 के रोज़ इस कॉलेज को बनाने का फैसला हुआ था तब बाबू लंगट सिंह घोड़े पर पैसा लाद कर ले आए थे. इस दिन उन्होंने इलाके के ज़मींदारों को बुलाया था. सबने खुलकर ज़मीन और पैसा दान दिया. सबसे ज़्यादा योगदान लंगट सिंह का था. इस कॉलेज की इमारत भव्य है, इसे ऑक्सफोर्ड के बलियोल कॉलेज के जैसा बनाया गया था. इंडो सार्सेनिक वास्तु शैली में बना है.

117 साल पुराने इस कॉलेज की दीवारों ने एक से एक लम्हे देखे हैं. केमिस्ट्री की लैब के लिए इस कॉलेज का अपना गैस प्लांट हुआ करता था. चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांधी जी के संपर्क में आए आचार्य जीबी कृपलानी इसी लंगट सिंह कालेज में पढ़ाते थे. गांधी जी भी यहां आ चुके हैं. प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर भी यहां पढ़ा चुके हैं. पढ़ाई-लिखाई में इस कॉलेज का नाम ज़माने तक रहा, कभी हर साल यहां से आईएएस, आईपीएस हुआ करते थे, लोग गर्व से बताते थे कि एलएस कॉलेज से हैं. नैक ने इस कॉलेज को ए ग्रेड दिया है और यूजीसी ने इसकी इमारत को धरोहर की श्रेणी में रखा है. क्या आज लंगट सिंह का वैसा इतिहास है, क्या मुज़फ्फरपुर या उत्तर बिहार का नौजवान दिल्ली विश्वविद्यालय छोड़ लंगट सिंह कालेज में दाखिला लेता है, क्या लंगट सिंह कॉलेज आज पहला च्वाइस है. 59 एकड़ में फैले इसे कॉलेज के कैंपस को देखने भी लोग जाया करते हैं.

लंगट सिंह कॉलेज की वेबसाइट पर जाकर चेक किया कि यहां पर कितने पद खाली हैं. कॉलेज में 15 विभाग हैं और पांच हज़ार छात्र हैं. यहां पर 92 प्रोफेसर परमानेंट हैं मगर 57 ही परमानेंट बचे हैं. 35 शिक्षकों का पोस्ट खाली हैं जिनके स्थान पर एडहॉक या अस्थायी प्रोफेसर पढ़ाते हैं. वेबसाइट हमने चेक की और अपने स्तर पर पता लगाया तो काफी अंतर मिला, जो इस तरह है-

- फारसी, मैथिली, जूलॉजी में एक भी प्रोफेसर या लेक्चरर नहीं.
- जूलॉजी में 6 पद मंज़ूर हैं मगर सभी पद ख़ाली.
- केमिस्ट्री में 9 परमानेंट पोस्ट है मगर 5 प्रोफेसर ही पढ़ा रहे हैं.
- इतिहास में 7 शिक्षक मंज़ूर, मगर 3 ही लेक्चरर हैं.

लंगट सिंह कॉलेज में गणित के कभी 11 प्रोफेसर हुआ करते थे, लेकिन इस वक्त दो ही प्रोफेसर रह गए हैं. इसमें से भी एक परीक्षा नियंत्रक बन कर चले गए हैं. यानी कॉलेज के गणित विभाग में एक ही प्रोफेसर हैं. इन ख़ाली पदों में कोई अस्थायी तौर पर भी नहीं पढ़ाता है. 2002 से इस कॉलेज में कई वोकेशनल कोर्स शुरू किए गए, जैसे बीबीए, बीसीए, बैचलर्स इन जर्नलिज़्म आदि. इनमें से किसी भी कोर्स में परमानेंट फैकल्टी के लिए मंज़ूरी नहीं मिली है. 17-17 साल से यहां शिक्षक अस्थायी तौर पर पढ़ा रहे हैं, इस उम्मीद में कि किसी दिन परमानेंट हो जाएंगे. आप कल्पना नहीं कर सकते कि ये प्रोफेसर अपना घर चलाने के लिए कॉलेज के बाद क्या-क्या करते हैं.

वोकेशनल कोर्स के टीचर को एक क्लास के लिए 400 रुपया मिलते हैं. महीने में 20 क्लास से ज्यादा नहीं पढ़ा सकते. कई शिक्षकों ने बताया कि महीने में अधिकत 12-15 क्लास ही हो पाती हैं. कॉलेज में पढ़ाकर वे महीने में 10,000 से ज़्यादा नहीं कमा पाते हैं.

आप सोचिए कि किस सपने के साथ 1899 में लंगट सिंह कॉलेज बना होगा और 2017 तक उसकी क्या हालत हो गई है. क्लास में जब शिक्षक ही नहीं हैं तो वहां के छात्रों के साथ क्या होता होगा. यह मत सोचिएगा कि यह पिछले एक साल में हुआ है. 20 साल से लगातार हो रही अनदेखी ने देश के हर बड़े कॉलेजों की यही हालत कर दी है. फेडरेशन ऑफ यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन ऑफ बिहार, फुटा के संजय शर्मा ने बताया कि साहबगंज ज़िले के चंदरदेव नारायण महाविद्यालय में एक साल तक तो एक ही प्रोफेसर थे. लगा कि वे मज़ाक कर रहे हैं, फिर जब वहां के सूत्रों से बात किया तो पता चला कि वहां के छात्र तो कई साल से यह मज़ाक झेल रहे हैं.

1969 में चंदेव नारायण महाविद्यालय की स्थापना हुई थी. यहां 3500 छात्र पढ़ते हैं मगर 2016 से हाल तक एक ही प्रोफेसर थे. 2014 में यहां 8 प्रोफेसर थे, 2015 में 5 हो गए, 2016 में एक ही बचे. गणित के प्रोफेसर के भरोसे यह कॉलेज चलता रहा. 15 दिन पहले यहां अंग्रेज़ी और मनोविज्ञान के लेक्चरर की नियुक्ति हुई. यानी कुल तीन प्रोफेसरों के जिम्मे 3500 छात्रों का भार.

क्या तीन प्रोफेसर 3500 छात्रों को पढ़ा सकते हैं? पोस्ट है 23 शिक्षकों की. साहेबगंज के छात्रों के साथ जो मज़ाक हो रहा है, उस पर कौन हंसेगा, खुद छात्र या व्यवस्था चलाने वाले लोग. उन्हें पता है चुनाव बिना इसके भी जीता जा सकता है. चंदेव नारायण महाविद्यालय में कुछ कोर्स में अस्थायी शिक्षकों ने पढ़ाया भी मगर कम वेतन के कारण कोई नहीं आता है. तब उन्हें 4950 रुपया मासिक मिलता था. सोचिए, ज़रा सोचिए, कम भी सोचिए या मत ही सोचिए कि 5000 से कम में कोई कॉलेज में पढ़ाएगा. यह भी पता चला कि ग्रामीण इलाकों के कॉलेजों की हालत तो और भी खराब है.

बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी ने 2017-18 के लिए जो बजट रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी है, उसे देखकर स्थिति तो और भी भयावह नज़र आती है. कुछ कॉलेजों का हिसाब दे दे रहे हैं ताकि वहां के नौजवान स्थायी नियुक्ति के लिए अपने प्रतिनिधियों पर दबाव डाल सकें. यूनिवर्सिटी के पीजी डिपार्टमेंट में 230 शिक्षक होने चाहिएं मगर 101 ही पढ़ा रहे हैं. आरसी कॉलेज, सकरा में 24 शिक्षकों की जगह मात्र 4 ही पढ़ा रहे हैं. डॉक्टर एसके सिन्हा महिला कालेज मोतिहारी में 29 शिक्षक होने चाहिए मगर हैं सिर्फ 7. एमजेके कॉलेज, बेतिया में 67 पद हैं मगर 17 शिक्षक ही तैनात हैं

एक यूनिवर्सिटी की सूची देखकर लगता है कि जानबूझ कर पदों को नहीं भरा जा रहा है. या तो भर्ती नहीं होती या होती है तो कई साल तक प्रक्रिया ही चलती रहती है. हैरानी की बात यह है कि इलाके के सभी बड़े लोगों को यह बात मालूम है. नौजवानों को भी यह बात मालूम है. मगर किसी को नहीं देखा कि सबने मिलकर विधायक और सांसदों पर दबाव डाला हो कि कॉलेज में नियुक्तियां हों, पढ़ाई ठीक से चले.

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक कॉलेज का हाल अब लेते हैं. बुलंदशहर में दो सरकारी और 10 एडेड डिग्री कॉलेज हैं, ज़्यादातर कॉलेजों में टीचरों की कमी है. 1956 में डीएवी डिग्री कॉलेज बनाने के लिए बुलंदशहर के व्यापारियों ने खूब दान दिया, ज़मीन दी. उस वक्त शहर का यह अकेले पीजी कॉलेज था. आज यहां 3000 से अधिक छात्र तो पढ़ते हैं मगर पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं हैं. 40 पद मंज़ूर हैं मगर 20 शिक्षकों के भरोसे काम चल रहा है. क्या 20 शिक्षक 3000 छात्रों को पढ़ा सकते हैं. ये सभी 20 प्रोफेसर 20-20 साल से अस्थायी तौर पर ही पढ़ा रहे हैं. यानी इस कालेज में एक भी परमानेंट टीचर नहीं है. अंग्रेज़ी विभाग के अध्यक्ष तो 23 साल से एडहॉक पढ़ा रहे हैं. 23 साल में इनकी सैलरी 2200 से बढ़कर 8000 हो गई है. बीस-बीस साल से शिक्षक यहां अस्थाई तौर पर पढ़ा रहे हैं. उसी तरह केमिस्ट्री विभाग की अध्यक्ष सुविधा चौधरी भी कई साल से यहा एडहॉक पर पढ़ा रही हैं. आप सोच सकते हैं कि इस कॉलेज के छात्रों के साथ क्या हो रहा होगा. हम भविष्य बना रहे हैं या भविष्य बिगाड़ने का राष्ट्रीय प्रोजेक्ट चल रहा है भारत में.

यकीन ही नहीं हुआ जब मेरठ यूनिवर्सिटी एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफेसर विकास शर्मा ने बताया कि पूरे यूपी में डिग्री कॉलेजों में साठ फीसदी पद खाली हैं. अगर इतने पद खाली हैं जो फिर इतने चुनाव हो चुके, कभी ये सब मुद्दा क्यों नहीं बना. क्या किसी को कॉलेज में नौकरी नहीं चाहिए थी, क्या छात्रों को बगैर प्रोफेसर की पढ़ना था. फिर से राजस्थान चलते है. यहां के जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी का हाल लिया जिसे 1962 में कायम किया गया था. इसका उदघाटन 24 अगस्त, 1962 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन ने किया था. पहले इसे जोधपुर यूनिवर्सिटी भी कहते थे.

इसके कामयाब छात्रों की सूची शानदार है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जोधपुर के सांसद और केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंदर सिंह शेखावत, पूर्व राज्य सभा सांसद एलएम सिंघवी भी इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं. एलएम सिंघवी ने ही 1963 में लोकपाल की कल्पना की थी, जो कानून तो बन गया है मगर आज तक लोकायुक्त नियुक्त नहीं हुआ है. इनके पुत्र अभिषेक मनु सिंघवी भी सांसद रहे हैं. इस यूनिवर्सिटी से कई कानून विद और जज निकले हैं. पूर्व जस्टिस आरएम लोढ़ा भी जयनारायण यूनिवर्सटी से ही पढ़े हैं. यहां पर 47 विषयों के विभाग हैं जिसमें 125 कोर्स चलते हैं. 2016-17 में यहां करीब दो लाख छात्रों ने दाखिला लिया था. इस यूनिवर्सिटी का दर्जा ए से घट कर बी पर आ गया है. ज्यादातर क्लास गेस्ट फैकल्टी के भरोसे चल रही है. पचास फीसदी पद ख़ाली हैं. 648 शिक्षकों के पद मंज़ूर किए गए हैं मगर 324 शिक्षक ही नियमित हैं. किसी गेस्ट फैकल्टी को एक क्लास के लिए 500 मिलता है तो किसी को 300 भी मिलता है. अब सरकार ने एक नया तरीका निकाला है. पुराने गेस्ट फैकल्टी को हटा कर उनकी जगह रिटायर प्रोफेसरों को रखा जाने लगा है. कहां तो नौजवानों को नौकरी दी जानी चाहिए थी मगर रिटायर लोगों से काम लेकर नौजवानों के हक को मारा जा रहा है. गैर शिक्षक में भी भयंकर कमी है. वहां 801 पद स्वीकृत हैं मगर 200 से अधिक पद खाली हैं.

2013 में इस यूनिवर्सिटी में बहाली हुई थी मगर घोटाले का आरोप लग गया. एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच अभी तक चल रही है. यूनिवर्सिटी में इनका एक कमरा भी बन गया है. इस मामले में प्रोफेसर से लेकर कई कर्मचारी गिरफ्तार हो चुके हैं. सिडिंकेट मेंबर और वाइस चांसलर भी जेल जा चुके हैं. विश्वविद्यालय के इतिहास में इस बार यहां पहली महिला अध्यक्ष चुनी गई हैं. एनएसयूआई की कांता ज्वाला टीचर भले न हो, वीसी जेल जा चुके हैं मगर यूनिवर्सिटी में इतिहास का बनना जारी है.

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हमारे सहयोगी अरुण हर्ष 13 साल तक गेस्ट लेक्चरर के रूप में पढ़ाने वाले माखनलाल के घर आए हैं. 2001 से 2013 तक माखनलाल ने आर्टस और कॉमर्स के छात्रों को अर्थशास्त्र पढ़ाया है. एक क्लास के 150 रुपये मिलते थे. कभी 7-8 हज़ार से ज़्यादा नहीं कमा सके. जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी से ही एमए और पीएचडी करके वहीं पढ़ा रहे थे मगर 13 साल के बाद यूनिवर्सिटी ने टाटा कर दिया. इस उम्मीद में पढ़ाते रहे कि शारीरिक चुनौतियों के कारण परमानेंट हो जाएगा लेकिन जब 2008 में वैकेंसी आई तो उनके लिए पोस्ट ही नहीं निकली. अब वे ठेके पर भी नहीं पढ़ा सकते हैं. क्योंकि नियम बदल गया है. जो अब रिटायर होगा वही ठेके पर पढ़ा सकेगा. हाउसिंग बोर्ड के मकान में रहते हैं जो अपना है. दो बच्चे हैं. 44 साल उम्र हो चुकी है.

किसी ने बताया कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में भी कई सौ पद शिक्षकों के ख़ाली हैं. जूलॉजी डिपार्टमेंट में तो 18 पोस्ट मंज़ूर हैं मगर यहां भी 7 गेस्ट पढ़ा रहे हैं और पांच परमानेंट. बाकी 6 पद ख़ाली हैं. जो गेस्ट पढ़ा रहा है उसे महीने का 25000 से अधिक नहीं मिला. इस कार्यक्रम के बाद जगह-जगह से शिक्षकों ने मेल किया है, कहा कि मेरी रिपोर्ट और भी भयावह हो सकती थी, इसमें ये कमी है वो कमी है, वित्त पोषित कालेज की बात नहीं है, प्राइवेट कालेजों में किस तरह पांच हज़ार से आठ हज़ार पर लोगों को पढ़ाने के लिए रखा गया है ये अभी तक नहीं आई. क्या वाकई आप राजनीतिक विषयों पर कुछ भी नहीं बोल रहे थे, कुछ तो चर्चा करते ही होंगे, ये नेता वो नेता, तो फिर अपने मुद्दों को कैसे भूल गए. ये तो शिक्षकों की बात हुई, छात्रों के साथ कितना खिलवाड़ हो रहा है. तो अपने-अपने इलाके के कॉलेज का जायज़ा लीजिए, उनकी बात कीजिए, उन्हें लेकर सवाल कीजिए.


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