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क्या सरकार को किसानों की वाकई फिक्र है?

सरकारों को किसान तभी दिखाई देते हैं, तभी उनकी आवाज़ सुनाई देती है जब वे मुंबई की तरह सड़कों पर बड़ी संख्या में उतरते हैं.

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क्या सरकार को किसानों की वाकई फिक्र है?
न्यूज चैनलों पर नेताओं के भाषणों का अतिक्रमण हो गया है. उनके भाषण झूठ से भरे होते हैं, उन्माद फैलाने वाले होते हैं, मुद्दों से भटकाने वाले होते हैं. इतिहास तो गलत होता ही है. दूसरी तरफ आम जनता अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर लाचार खड़ी है कि कोई उसे आवाज़ दे दे. मध्य प्रदेश में सिपाही की परीक्षा देने वाले छात्र अब गिड़गिड़ाने की स्थिति में आ गए हैं. रो रहे हैं कि कोई उनकी बात सामने रख दे.

चुनावों के समय टीवी का इस्तेमाल इस तरह से होने लगा है कि आज से कुछ साल बाद आप किताबों में पढ़ेंगे कि कैसे इस माध्यम के इस्तेमाल से किस तरह से लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया और जनता के अस्तित्व को खत्म कर दिया गया. आखिर एक चुनाव को लेकर आप कितनी बार और कितना सर्वे देखना चाहते हैं. जब सर्वे नहीं होता है तब नेताओं के बयान पर बहस चल रही होती है. जिसमें वही दो चार लोग होते हैं. 

दिल्ली में काम करने वाला एक नौजवान कई हफ्तों से हमारे संपर्क में है. इस नौजवान की जिद है कि बिहार के दाल किसानों की स्थिति पर चर्चा होनी चाहिए. आज भी उस नौजवान से यही बात हो रही थी. मतलब यही था कि टीवी ने आप दर्शकों को इतना बदल दिया है कि कहां आप सर्वे को छोड़ दाल किसानों की हाल पर रिपोर्ट देखेंगे. हमारी आपकी रुचियां भी तो बदल गई हैं. आज का यह कार्यक्रम सिर्फ उस नौजवान के इस विश्वास के लिए कर रहा हूं कि मीडिया पर आ जाने से सरकारें हरकत में आती हैं और किसानों की सुनती हैं. हालांकि रिकॉर्ड बताते हैं कि ऐसा नहीं है. सरकारों को किसान तभी दिखाई देते हैं, तभी उनकी आवाज़ सुनाई देती है जब वे मुंबई की तरह सड़कों पर बड़ी संख्या में उतरते हैं.

बिहार के टाल क्षेत्र के दाल उत्पादकों की कहानी है. पहले जान लीजिए कि टाल क्षेत्र क्या है. टाल झेत्र उसे कहते हैं जहां नदियां पानी और मिट्टी लाकर छोड़ देती हैं. जब तक टाल में पानी रहता है, तब तक यह इलाका देखने में बहुत खूबसूरत लगता है. पानी के लौटने के बाद किसान इस मिट्टी में खेती करते हैं. बिहार में पटना, फतुहा, बख्तियारपुर, बाढ़, मोकामा, बड़हिया, लक्खीसराय, शेखपुरा, बरबीघा, नवादा, नालंदा का कुछ इलाका इस टाल क्षेत्र में आता है. टाल क्षेत्र में सिर्फ रबी की फसल होती है. रबी मतलब दाल गेहूं.

नौजवान रौशन ने बताया कि तीन साल से इस क्षेत्र के किसान दाल की खेती करने के कारण तबाही के कगार पर पहुंच गए हैं. दाल की कीमत मिल ही नहीं रही है. इस इलाके में स्टोरेज की क्षमता का अभाव है, इसलिए ऐसे समय के लिए रख भी नहीं सकते कि जब दाम अधिक हो तो बेचकर लागत निकाल लें. एक किसान हैं ओमप्रकाश. ओमप्रकाश जी ने भारत के प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखा है जो इन दिनों रोज कर्नाटक में चुनावी सभा करने में व्यस्त हैं.

48 साल के ओम प्रकाश जी ने बिहार के कृषि मुख्य सचिव को भी पत्र लिखा है, कृषि सचिव ने मुख्य टाल क्षेत्र का दौरा भी किया है, लेकिन कोई समाधान नहीं. 26 मार्च 2017 की यह चिट्ठी आज भी जवाब का इंतज़ार कर रही है. इतना ही जवाब आया कि ओमप्रकाश जी के इस पत्र को बिहार के मुख्य सचिव के पास भेजा जा रहा है ताकि कार्रवाई हो. 

'माननीय प्रधानमंत्री जी, निवेदन पूर्वक कहना है कि हमलोग मोकामा प्रखंड के किसान हैं. हमारी कुल भूमि में से 95 फीसदी खेती टाल क्षेत्र की है. जिसमें मुख्य रूप से मसूर की ही खेती होती है. हमने विपरीत परिस्थितियों में साहस का परिचय देते हुए ऊपज को प्राप्त किया. मगर हमारे समक्ष आज यह काफी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है. आज स्थिति यह हो गई है कि हम अपना अन्न बेच नहीं पा रहे हैं. हमारे सामने भूखमरी की स्थिति हो गई है. हमारी सारी पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी बंद हो चुकी है. हमारी फसल बिक नहीं रही है. हमारी स्थिति यह है कि अगर कुछ समय ये स्थिति रही तो हम लोग आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाएंगे. श्रीमान इसे त्राहिमाम संदेश भी समझ सकते हैं.' 

ये किसानों का पत्र है जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कृषि सचिव को लिखा गया है. 2016-17 के लिए मसूल दाल का समर्थन मूल्य 3950 रुपये प्रति क्विंटल था. 2017-18 के लिए समर्थन मूल्य 4250 रुपये प्रति क्विंटल किया गया, मगर इस दाम पर कोई खरीदने वाला नहीं है. जो बात पत्रकारों को पता नहीं वो किसानों को मालूम है कि प्रधानमंत्री कब मोज़ांबिक गए, कब दालों पर आयात शुल्क शून्य हुआ, कब से उनका दाल बाहर जाना बंद हो गया और दाम गिर गया. दाल किसानों का कहना है कि बिहार सरकार ने भी दाल खरीदने पर ध्यान नहीं दिया. उन्हें बाज़ार से दाम मिल जा रहा था, इसलिए अभी तक सरकार की जरूरत नहीं थी मगर अब जब सरकार की तरफ देख रहे हैं, पता नहीं चल रहा है कि क्या हो रहा है. 

हमने ओमप्रकाश जी से फोन पर बात की और समझना चाहा कि उनकी खेती का क्या अर्थशास्त्र है. उन्होंने जो समझाया वो इस तरह है. पिछले साल 80 बीघा जमीन दाल की खेती के लिए किराये पर ली. 10,000 रुपये प्रति बीघा के हिसाब से 80 बीघा का किराया हुआ 8 लाख. इस पैसे का भुगतान महाजनों से ब्याज पर लेकर अक्तूबर में ही करना पड़ा. 80 बीघे में दाल की बुवाई के लिए एक लाख का बीज लगा, बाकी खर्चा अलग. दाम न मिलने के कारण वे दाल बेचकर 7.5 लाख ही निकाल सके हैं. 

यानी लागत भी नहीं निकाल पाए. ब्याज का पैसा अलग देना पड़ा. हथिया नक्षत्र में बारिश के कारण लेट बुवाई से उपज भी कम हुई. इससे घाटे का अंतर और बढ़ गया. ओमप्रकाश जी ने बताया कि 2016-17 में 7200 प्रति क्विंटल के भाव से दाल बेचा था तब खूब पैसा कमाया था मगर उसके बाद से घाटे में ही बेच रहे हैं. सरकार का दाम 4250 रुपये प्रति क्विंटल है. बाजार में 3200 रुपये प्रति क्विंटल भी खरीदने वाला नहीं है. किसानों की दालें खुले खेत में पड़ी हैं. बारिश होने से भी अनाज बर्बाद हो जाता है. स्टोरेज की कोई व्यवस्था नहीं है. एक किसान ने बताया कि पहले किसान दो तीन महीने स्टॉक कर लेते थे मगर जीएसटी के कारण स्टॉक करना बंद कर दिया है. कभी कभार स्थानीय व्यापारी खरीदने आते भी हैं तो दाम बहुत कम देते हैं.

व्यापारी जो भाव देते हैं उसी पर बेचने के लिए मजबूर हैं. आप इन किसानों की हालत देखिए, इनका शरीर ही बता रहा है कि मेहनत का फल कितना मिला होगा. आंकड़े बताते हैं कि भले ही इस साल के लिए समर्थन मूल्य 4250 प्रति क्विंटल है मगर किसान 2013-14 के समर्थन मूल्य 2950 रुपये प्रति क्विंटल के आस पास बेचने को मजबूर है. यानी लागत आज के भाव से और कमाई चार साल पहले के भाव से. ये खेल हो रहा है किसानों के साथ. 

टाल क्षेत्र पटना से 100 किमी की दूरी पर होगा. किसानों के प्रति कोई भी संवेदनशील सरकार या कृषि मंत्री को इनके बीच बीस बार जाना चाहिए, कोई रास्ता खोजना चाहिए था ताकि इनकी परेशानी दूर हो सके. टाल क्षेत्र के किसान टीवी पर क्या देखते हैं हमें नहीं पता, मुमकिन है वे भी आजकल जो नेशनल सिलेबस चल रहा है हिन्दू मुस्लिम वही देखने में व्यस्त होंगे, मगर यह तय है कि किसानों के पास दाम का जब भी संकट आता है हमारे पास कोई मुकम्मल समाधान नहीं है.

महाराष्ट्र से सोहित मिश्र ने रिपोर्ट भेजी है कि वहां के दूध उत्पादक किसान आंदोलन पर हैं. राज्य भर में उनका प्रदर्शन हो रहा है. 14 मई से वे जेल भरो आंदोलन चलाने वाले हैं. सरकार ने 27 रुपये प्रति लीटर दाम तय किया है मगर किसानों को मिल रहा है 17 रुपये प्रति लीटर. इस बार उनका नारा है, लूटते क्यों हो भाई, मुफ्त में ले जाओ. दाल से लेकर दूध के दाम नहीं मिल रहे हैं. गोभी और आलू किसानों का भी वही हाल है. किसान फसलों को सड़कों पर फेंक रहे हैं. गन्ना किसान बकाये से परेशान हैं. शनिवार को बिजनेस स्टैंडर्ड में वीरेंद सिंह रावत और टी ई नरसिम्हन की रिपोर्ट छपी थी टमाटर पर. तीन साल के दौरान टमाटर की पैदावार काफी बढ़ गई है. इतनी कि किसानों को दाम कम मिल रहे हैं. क्योंकि फूड प्रोसेसिंग सेक्टर की क्षमता भी नहीं बढ़ रही है जिससे टमाटर की थोक खरीद नहीं हो पा रही है.

आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के टमाटर उत्पादक दाम न मिलने से परेशान हैं. दाम मिलने का क्या समाधान होना चाहिए, क्या हमारे पास आश्वासन के अलावा वाकई कोई सिस्टम है, समाधान है जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाया जा सकता है. इस पर न किसी की रूचि है न ध्यान. महाराष्ट्र में आपको याद होगा कि किसानों ने 6 से 12 मार्च के बीच नासिक से मुंबई के बीच लांग मार्च निकाला था. सरकार ने वादे भी कर दिये थे. मगर पूरे होने के इंतज़ार में मुंबई से सटे डहाणू इलाके में किसानों ने पिछले हफ्ते फिर प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन में वे किसान भी थे जो बुलेट ट्रेन के लिए अपनी ज़मीन नहीं देना चाहते थे. उनका कहना है कि ले दे कर ज़मीन ही बची है चली जाएगी तो खाएंगे क्या. यही नहीं मीडिया रिपोर्ट है कि गुजरात के भावनगर में 5000 किसानों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग की है. वे राज्य विद्युत कंपनी को अपनी ज़मीन नहीं दना चाहते हैं. 

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उचित मूल्य न मिलने के कारण महाराष्ट्र के बुलडाणा जिले के 91 किसानों ने इच्छामृत्यू का अनुमति मांगी है. इस संबंध में किसानों ने उपराज्यपाल और सबडिवीजनल आफिसर (एसडीओ) को पत्र लिखा है. किसानों का कहना है कि उन्हें उनकी फसलों का उचित मुल्य नहीं दिया जा रहा है. साथ ही सरकार ने हाइवे बनाने के लिए उनकी जिस जमीन का अधिग्रहण किया था, उसका भी पर्याप्त मुआवजा उन्हें अभी तक नहीं दिया गया है.

आखिर सारे नेता मंत्री मिलकर किसानों की समस्या का समाधान कब निकालेंगे. एक एलान कर दिया जाता है मगर होता कुछ नहीं है. किसान एकता मंच की तरफ से उत्तर भारत के किसान 1 से 10 जून के बीच अपने अपने गांव में हड़ताल पर रहेंगे. इस बार वे शहर नहीं आ रहे, बल्कि अपने गांव में ही बंद रखेंगे. इनकी मांग है कि किसानों को न्यूनतम आमदनी दी जाए. 18,000 रुपये प्रति माह. 2011 से 2016 के बीच नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हर साल किसान की औसत आय 0.44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. किसान एकता मंच के संयोजक देवें शर्मा ने यह जानकारी दी है. इसके अलावा सरकार किसानों के कर्ज माफ करे. राजनीति बदल गई है. अब चुनाव इवेंट मैनेजर तय करते हैं. तरह तरह के गाने बनते हैं. हमारे किसान आंदोलन भी बदल रहे हैं. वे भी नए-नए गाने लिख रहे हैं, स्लोगन लिख रहे हैं. कैथल हरियाणा के एक गांव के रहने वाले जगबीर सिंह गिल ने किसान हड़ताल को लेकर एक गाना लिखा हैं.


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