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'किसानों की ज़िंदगी कितनी सस्ती' रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

यवतमाल में इस साल कपास की खूब बुआई हुई है, मगर कपास को कीटनाशकों से बचाने गए कई किसान अपने गांव ही नहीं लौट सके.

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'किसानों की ज़िंदगी कितनी सस्ती' रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
भारत के बेरोज़गारों के लिए एक बहुत ही साधारण बात कहना चाहता हूं. पहले युवाओं को अच्छे और स्थाई शिक्षकों से वंचित कर उन्हें बेरोज़गार होने के लायक तैयार किया जाता है, फिर जब वे कॉलेज से निकल कर किसी तरह लायक बन भी जाते हैं तो भरसक कोशिश की जाती है कि वे आजीवन बेरोज़गार बने रहें. नौजवानों के साथ-साथ देश के किसान का भी बुरा हाल है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के यवतमाल में किसानों के साथ जो हुआ है, उसकी बात करना चाहता हूं. दो महीने से वहां कीटनाशक स्प्रे करने के कारण 19 खेतिहर मज़दूर मर चुके हैं. 25 किसानों की आंखों पर बहुत बुरा असर पड़ा है. करीब 700 किसान यवतमाल के अस्पतालों में भर्ती हैं और ज़िंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं.

यवतमाल में इस साल कपास की खूब बुआई हुई है, मगर कपास को कीटनाशकों से बचाने गए कई किसान अपने गांव ही नहीं लौट सके. सितंबर के पहले हफ्ते से ही किसानों की मौत की ख़बर आने लगी थीं. बीटी कॉटन पर जब कीटों का हमला हुआ तो बचाने के लिए कीटनाशक की ज़रूरत पड़ी. मास्क और दस्ताने न पहने होने के कारण स्प्रे के दौरान ज़हर उनके शरीर में प्रवेश कर गया. 20 किसान वसंतराव नाइक सरकारी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हुए. अकेले सितंबर महीने में 160 किसानों और खेतिहर मज़दूरों का इलाज शरीर में जहर जाने के कारण हुआ है. पिछले तीन महीने में 300 किसानों का इलाज हुआ है. अब यह संख्या 700 बताई जा रही है. अपनी फसल को बचाने के क्रम में किसान जान से हाथ धो रहे हैं.

अब महाराष्ट्र सरकार ने उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर जांच शुरू कर दी है. फैसला हुआ है कि छिड़काव के दौरान इस्तेमाल के लिए मुफ्त में दस्ताने और मॉस्क दिए जाएंगे और मृतक परिवारों को दो लाख रुपये दिए जाएंगे.

2010 में भिवानी में एक आंधे घंटे की रिपोर्ट बनाई थी कि किस तरह किसानों को जानकारी नहीं होती है और वे बग़ैर पूरी सुरक्षा के स्प्रे करने लगते हैं और उनके शरीर में ज़हर प्रवेश कर जाता है. चूंकि ये खेतिहर मज़दूर होते हैं और दूसरे राज्य से आए होते हैं तो इनकी मौत की ठीक से रिपोर्टिंग भी नहीं होती और न ही आंकड़े रखे जाते हैं. वर्ना पता चलता कि कीटनाशकों के छिड़काव के कारण कितने किसानों की मौत होती है. भिवानी के अस्पतालों के बाहर लिखा होता था कि हमारे यहां स्प्रे के मरीज़ों का इलाज होता है. काश कि कुछ बदलता, कितने किसानों की जान बच जाती.

बुधवार को जब राज्य के कृषि मंत्री यवतमाल गए तो किसानों ने इसी स्प्रे मशीन से उन पर सांकेतिक छिड़काव किया और अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अस्पताल में भर्ती किसानों की संख्या अलग है. कोई 300 लिख रहा है कोई 400 और कोई 700 लिख रहा है.

अस्पतालों में किसानों की भीड़ है. जिन्हें खेतों में होना चाहिए था वो अब ज़िंदगी से लड़ रहे हैं. घटना घटती रही मगर किसी ने अलार्म बटन नहीं दबाया. कहा जा रहा है कि कृषि विभाग और कीटनाशक कंपनियों ने किसानो को ठीक से आगाह नहीं किया. इनका वैसे भी कुछ नहीं होना, कभी बड़ी कंपनियों को सज़ा होती है क्या. किसान संगठन तो किसानों के लिए दस लाख मुआवज़ा मांग रहे हैं. मिला 2 लाख रुपये है.

किसानों के संकट पर नज़र रखने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने वसंतराव नाइक शेतकारी स्वावलंबन मिशन बनाया है. इस टास्क फोर्स के सदस्य किशोर तिवारी ने महीना भर पहले चेतावनी दे दी थी कि बीटी कॉटन अब कीटनाशकों के हमले से मुक्त नहीं रहा. लिहाज़ा बड़े पैमाने पर कीटनाशकों के इस्तमाल होने का ख़तरा है.

राजस्थान के सीकर में किसानों ने कई दिनों तक अहिंसक प्रदर्शन किया जिसमें ज़िले के व्यापारी से लेकर दूसरे लोगों ने भी किसानों का साथ दिया. सीकर का आंदोलन कर्ज़ माफी के वादे के साथ ख़त्म हो गया. अब किसानों का एक और आंदोलन लोगों का ध्यान खींच रहा है. अच्छी बात है कि जयपुर में भी किसान अहिंसक और रचनात्मक तरीके से अपना विरोध ज़ाहिर कर रहे हैं. किसानों की दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है जिसे हम दिल्ली में बैठकर नहीं समझ पा रहे हैं. उनके भीतर की घुटन तरह-तरह के रास्तों से बाहर आ रही है. सरकार को भी किसानों की बेचैनी को समझना चाहिए और संवाद कायम करना चाहिए. किसान अपनी आवाज़ सुनाने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे हैं. बेहतर है सुनना शुरू कर देना चाहिए कि वे क्या कह रहे हैं.

जयपुर में किसान ज़मीन में गड्ढा खोद कर खड़े हो गए हैं. किसने सोचा था कि गांधी की अहिंसा देश की जनता को आईटी सेल पर निर्भर राजनीतिक दलों से भी ज्यादा रचनात्मक बना देगी. इस आंदोलन का नाम है समाधि सत्याग्रह. जल समाधि के बाद ज़मीन समाधि. दो अक्तूबर से यह सत्याग्रह चल रहा है. महिलाएं भी साथ आई हैं. इन किसानों की 1150 बीघा ज़मीन जयपुर विकास प्राधिकरण ने 2010 में ले ली थी. उसी साल से ये किसान ज़मीन का दाम लेने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. आज तक दाम नहीं मिला है. 2000 किसानों की ज़मीन चली गई.

4 अक्तूबर के दैनिक भास्कर की यह पहली ख़बर चीख कर बता रही थी कि मंदसौर की घटना के बाद भी पुलिस ने कुछ नहीं सीखा है. अखबार कह रहा है कि टीकमगढ़ में किसानों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा. थाने में बंद कर कपड़े उतरवाए और 30 किसान घायल हुए हैं. किसानों की गलती ये थी कि वे ज्ञापन देने के लिए जिलाधिकारी से मिलना चाहते थे.

कहीं किसान ज़हर से मर रहा है तो कहीं दौड़ा-दौड़ा कर मारा जा रहा है. किसानों का आरोप है कि उन्हें लॉकअप में कपड़े उतरवा कर घंटों बिठाया गया. राज्य के गृहमंत्री ने जांच के आदेश दे दिए हैं. टीकमगढ़ के कलेक्टर का कहना है कि एक भी किसान घायल नहीं हुआ है. अगर उनके कपड़े उतरवाए गए हैं तो जांच होगी. प्रशासन का कहना है कि किसान और कांग्रेस कार्यकर्ताओं की तरफ से पत्थरबाज़ी हुई जिसकी वजह से लाठी चार्ज हुआ. ये पत्थरबाज़ी वाला उदाहरण बीएचयू के समय भी वहां के वाइस चांसलर ने दिया था जिन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है.

इस आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस नेता अजय सिंह कर रहे थे. कांग्रेस के आह्वान पर ही किसानों ने आंदोलन किया था. कांग्रेस टीकमगढ़ को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग कर रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कहा है कि वे हिंसक प्रदर्शन बर्दाश्त नहीं करेंगे. कांग्रेस पर अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाया है. किसानों की मांग है टीकमगढ़ को सूखाग्रस्त ज़िला घोषित किया जाए. कलेक्टर ने कांग्रेस नेताओं से ज्ञापन ले लिया था. राज्य के मंत्री का कहना है कि किसानों को नहीं पीटा गया, कांग्रेसियों को पीटा गया. ये कांग्रेस की चाल है. अनुराग द्वारी ने राज्य के गृहमंत्री और कांग्रेस नेता से भी बात की है.


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