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शिक्षा संस्थानों में कागज़ी खानापूर्ति, रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम 

भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जहां के छात्रों को, प्रोफेसरों को, माता पिता को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि यूनिवर्सिटी, कॉलेज में पढ़ाई हो रही है या नहीं.

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शिक्षा संस्थानों में कागज़ी खानापूर्ति, रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम 
नई दिल्ली: राजनीति ने देश के मीडिया का सिलेबल तय कर दिया है. तय ही नहीं फिक्स कर दिया. वही बिरयानी का मज़हब, मंदिर मस्जिद, तलाक, नमाज़, ताज महल, कश्मीर, सरदार पटेल, नेहरू, इंदिरा गांधी, राष्ट्रवाद, सेना का सम्मान, कब और कहां राष्ट्रगान, कितनी बार राष्ट्रगान. मुझे उम्मीद है चैनलों के साथ साथ आपने भी ये सिलेबस पूरा कर लिया होगा और अब नेहरू और पटेल के बारे में किसी को कुछ पढ़ने की ज़रूरत नहीं होगी.

मीडिया के इस सिलेबस से बाहर जाकर यूनिवर्सिटी सीरीज़ वाकई आउट ऑफ सिलेबस लग रहा है. भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जहां के छात्रों को, प्रोफेसरों को, माता पिता को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि यूनिवर्सिटी, कॉलेज में पढ़ाई हो रही है या नहीं. उन्हें आप बस किसी कॉलेज का पता बता दीजिए वो तीन से पांच साल के लिए फीस देने चले जाते हैं. हमने दुनिया को बताया ही नहीं कि भारत में ऑटोमेटिक कॉलेज हैं. जहां आप ऑटोमेटिक मशीन की तरह पैसे डालते हैं और टिकट की तरह ग्रेजुएट होकर बाहर आ जाते हैं. 

गमछा लगाए, धारी वाली कमीज़ पहने आप हरियाणा के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक हैं मगर यहां पूजा कराने की ड्यूटी लगा दी गई है. शिक्षक जी भक्तों का प्रसाद देवता तक चढ़ाकर वापस कर दे रहे हैं. आप पहली से पांचवी तक पढ़ाने वाले जूनियर बेसिक टीचर हैं. मुझे यह काम मिले तो खुशी-खुशी कर दूं, क्योंकि मेरे प्राइम टाइम नहीं करने से आपके बच्चे की पढ़ाई पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन शिक्षक जी को प्रशासन ने चढ़ावे की ज़िम्मेदारी सौप दी है, लगता है बहुत प्रसन्न नहीं हैं,चेहरे पर भक्ति भाव में कुछ कमी है, शायद इस चिंता में हैं कि यहां ड्यूटी करेंगे तो बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा. जीन्स और चेक शर्ट पहने हुए आप भी शिक्षक हैं, लगता है कि कैमरे के ओके का इंतज़ार कर रहे हैं. आपकी ड्यूटी मत्था टेकवाने की लगी है. जिस मेले की तस्वीर है वहां हिन्दू और सिख दोनों श्रद्धालु आते हैं. इस काउंटर पर सफेद गमझे में मास्टर जी हैं जो मकुनदाना, इलायचीदाना प्रसाद के रूप में वितरित कर रहे हैं. चढ़ावा भी चढ़ा रहे हैं. कुछ तनाव में दिख रहे हैं कि कहीं कोई देख न ले. कोई देख भी लेगा तो क्या होगा. मैं तो यह काम खुशी-खुशी करता.

छठ पूजा में घाट पर किया भी हूं. नीले शर्ट में आप भी मास्टर जी हैं. थाली में इलायचीदाना प्रसाद के रूप में बांट रहे हैं. शिक्षकों को पुण्य का काम मिला है मगर शिक्षक नाराज़ हैं. क्यों नाराज़ हैं, कहां ये काम मिला है ये भी बताते हैं पहले क्लास रूम छोड़ पूजा रूम में एक्टिव इन शिक्षकों को सुन लेते हैं. ये जो आपने शिक्षकों को चढ़ावा चढ़वाते हुए, पूजा करवाते हुए, प्रसाद बांटते हुए देखा ये सभी हरियाणा के यमुनानगर के हैं. जहां कपाल मोचन मेला लगा हुआ है. एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक यह मेला चलता है. पांच दिनों के दौरान लाखों की संख्या श्रद्धालु आते हैं और स्नान करते हैं. यमुनानगर से हमारे सहयोगी तिलक भारद्वाज ने रिपोर्ट भेजी है.

मेले में लगती है शिक्षकों की ड्यूटी
हर साल यहां मेले के प्रबंधन के काम में शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जाती है, मगर पहली बार इन्हें मंदिर के भीतर पूजा से लेकर प्रसाद बांटने की ड्यूटी लगाई गई है. मेला बहुत अच्छा है जैसा कि हर मेला होता है. हो सके तो आप भी ऐसे मेले में जाइये, धर्म और संस्कृति के सुंदर रंग मिलेंगे. अब तो मेले में इसलिए भी जाइये क्योंकि जो मास्टर क्लास रूम में नहीं मिलेंगे, उनके यहां मिलने की पूरी उम्मीद है. 106 शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई है. शिक्षक सरकार का आदेश मानकर ड्यूटी कर लेते हैं. जनगणना, मतगणना, पशुगणना किसी भी काम को वे ड्यूटी समझ कर पूरा कर देते हैं.

गांव-गांव जाकर करते हैं जागरूक
स्वच्छता अभियान के तहत सुबह बाहर जाने वालों के लिए सीटी बजाने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं. हमें यह बात एक शिक्षक ने नाम न बताने की शर्त पर बताई है. रन फॉर यूनिटी भी इन्होंने सफलतापूर्वक संपन्न कराया है. पराली जलाने से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, इसके प्रति गांव गांव जाकर लोगों को जागरूक करने का काम भी इन शिक्षकों के जिम्मे आ गया है. मुझे लगता है कि ब्रेक के लिए सरकार ने इन्हें पूजा के काम में लगा कर ठीक ही किया कम से कम थोड़ी देर के लिए मानसिक शांति तो मिलेगी.

हमने ड्यूटी चार्ट देखी. इसमें कुछ कैटगरी देखकर हमारा भी नॉलेज बढ़ा है. इस काम के लिए सूरजकुंड में एक दिन की ट्रेनिंग भी हुई है. जो शिक्षक नहीं आए उन्हें नोटिस दिया गया. हमने जब कुछ शिक्षकों को फोन किया तो उन्हें लगा कि कोई अफसर फोन कर रहा है तो छूटते ही कहने लगे कि कमर में दर्द है, दस मिनट में जगह पर पहुंच रहे हैं सर. अंग्रेज़ी में लिखा है सुपरवाइज़र ऑफिसर एट गुल्लक लोकेशन ये इनकी ज़िम्मेदारी का नाम है. 

संस्कृत और हिन्दी के टीचर पुजारी के काम में लगे हैं 
पता चला है कि संस्कृत और हिन्दी के शिक्षकों को पुजारी के काम में मुख्य रूप से लगाया गया है. ये ठीक नहीं है क्या मैथ्स के टीचर पूजा नहीं करा सकते, इंग्लिश के नहीं करा सकते. राजकीय अध्यापक संघ ने इसकी निंदा की है कि शिक्षक हैं, पुजारी नहीं हैं. शिक्षक संघ ने अपनी नाराज़गी में टीए डीए न मिलने, ड्यूटी पर खाना न मिलने की बात को भी महत्व दिया है. कहीं टीए डीए के कारण ही तो आपत्ति नहीं हो रही है. हरियाणा सरकार के पूर्व ओएसडी और बीजेपी नेता जवाहर यादव ने कहा है कि शिक्षकों को ऑर्डर समझने में दिकक्त हुई होगी. लेकिन ऑर्डर में तो हमने साफ साफ लिखा दिखा कि पुजारी और गुल्लक के सुपरवाइज़र ऑफिसर की ड्यूटी है.

हरियाणा के स्कूलों में 30 हजार शिक्षकों की कमी
एसोचैम की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के प्राइमरी स्कूलों में 30,000 शिक्षकों की कमी है. यह ख़बर 26 अक्टूबर को टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी है. हमारे सहयोगी कर्मवीर को हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ ने बताया है कि राज्य के सभी प्रकार के स्कूलों में 52 हज़ार से अधिक शिक्षकों की ज़रूरत है. कोई बेरोज़गार प्राइम टाइम देख रहा है तो अपने प्रतिनिधियों से पूछ सकता है कि वेकैंसी कब आएगी.

अब हम यूनिवर्सिटी सीरीज़ के 17 वे अंक में हरियाणा के ही सेंट्रल यूनिवर्सटी के बारे में बात करेंगे जिसे 2009 में संसद के एक्ट से बनाया गया था. आपको अगर यकीन नहीं हो रहा है कि आपके बच्चों को बर्बाद करने के लिए राष्ट्रीय प्रोजेक्ट चल रहा है तो मैं क्या कर सकता हूं. लेकिन आप मेरी बात बिल्कुल मत मानिये, मीडिया का जो सिलेबस चल रहा है पटेल, नेहरू, कश्मीर उसी में लगे रहिए. कम से कम बर्बाद हो चुके नौजवानों को कुछ तो पता रहेगा. 

हरियाणा का एकमात्र सेंट्रल यूनिवर्सिटी
यह हरियाणा की एकमात्र सेंट्रल यूनिवर्सिटी है. इसे ए ग्रेड हासिल है तो आप भी समझेंगे कि कोई कमी नहीं होनी चाहिए. मगर यहां बीटेक में एडमिशन लेने वाले छात्र भीतर से जो कमियां देख रहे हैं वो बाहर कैसे दुनिया को बताएं इसके लिए तरस रहे हैं. जब तक उन्हें यह कमी नहीं समझ आई होगी, ये भी टीवी पर हिन्दू मुस्लिम डिबेट में मस्त होंगे, मगर अब मीडिया खोज रहे हैं जिसने रोज़ रात के लिए अपना सिलेबस बना लिया है. देश नेहरू और पटेल को लेकर डिबेट कर रहा है और ये नौजवान बीटेक के लेक्चरर और लैब जैसी मालूमी चीज़ों में उलझे हैं.

आंदोलन पर उतरे छात्र
2016-17 में कोर्स शुरू हो गया मगर न तो उस वक्त कोई टीचर था न बिल्डिंग पूरी बनी थी, न लैब बना था, न हॉस्टल. 65 हज़ार की फीस भी दे चुके थे. ओरिएंटेशन प्रोग्राम में कुलपति ने इन्हें भरोसा दिलाया कि एक साल बाद सारी सुविधा मिल जाएंगी. डेढ़ साल बीत गए तो ये छात्र आंदोलन पर उतर आए हैं. अगस्त के महीने में आंदोलन किया, आश्वासन मिला, मगर कुछ नहीं हुआ तो कोर्ट भी गए. छात्रों ने बताया कि  बी टेक की क्लास शुरू हो जाने के बाद सिलेबस फाइनल हुआ. एक एक टीचर को चार चार सब्जेक्ट पढ़ाने दिया गया. अंग्रेज़ी बोलने में शिक्षकों की हालत ख़राब हो जाती है. ठेके पर एक रिटायर टीचर को लाया गया कि वो बीटेक के कोर्स का संचालन करें. यही नहीं लैब के लिए दूसरे प्राइवेट कॉलेज के लैब में भेज दिया गया. छह महीने का प्रैक्टिल दो घंटे में करा दिया गया. यह सब छात्रों ने हमें बताया है. भला हो यूनिवर्सिटी सीरीज़ का वरना स्थानीय अखबारों में इनका आंदोलन छप तो रहा था मगर बर्बादी की ख़बर दिल्ली तक नहीं पहुंच रही थी. भारत के नौजवानों को बर्बाद करना सबसे आसान काम है.

पहले सेमेस्टर में 70 फीसदी छात्र हुए फेल
आपने छात्रों को सुना. जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि तह तक जाने के लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. शिक्षा का जो बुरा हाल है पूरे देश में, उसे कवर करने के लिए हमें दो लाख योग्य संवाददाता की ज़रूरत है और 20 हज़ार चाटुकार संपादक की. एक संपादक होता है जो चाटुकार होता है और एक होता है जो चाटुकार नहीं होता है उसे अचाटुकार संपादक कहते हैं. पत्रकारिता के कोर्स में इसे जुड़वा दीजिएगा. छात्रों पर क्या गुज़री होगी. किस लाचारी में खुद को महसूस करते होंगे जब पहले सेमेस्टर में 70 प्रतिशत छात्र फेल हो गए. दूसरे सेमेस्टर में 50 प्रतिशत छात्र फेल हो गए. तीसरे सेमेस्टर में 142 में से 49 छात्रों को प्रवेश नहीं मिला.

छात्रों की सुनने वाला कोई नहीं
मैं छात्रों की बेबसी समझ सकता हूं. वे ख़ुद को कितना अकेला और असहाय महसूस करते होंगे कि उनकी सुनने वाला कोई नहीं. उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है. आपको टीवी पर नेहरू और पटेल पर बहस दिखा कर भरमाया जा रहा है. मैं आप दर्शकों का भी अकेलापन समझता हूं. छात्रों ने 7 दिनों तक हड़ताल की, छात्रों का आरोप है कि वीसी मिलने तक नहीं आए. कैंपस आकर भी नहीं मिले, क्योंकि उस वक्त वे दिल्ली में रहते थे. यहां तक कि छात्रों के माता पिता को फोन करके धमकी दी गई, पुलिस बुला ली दई. स्ट्राइक ख़त्म हो गई. हालात भी आज भी वैसे ही हैं. लीपापोती हो रही है. एक साल की पढ़ाई बीस दिन में कराकर सप्लिमेंट इम्तहान कराए जा रहे हैं. मुझे तो इन छात्रो पर रोना आ रहा है, मगर आपसे अनुरोध है कि आप ज़ोर-ज़ोर से हंसिए वर्ना कुछ भी पोज़िटिव नहीं रहेगा. रजिस्ट्रार साहब का शुक्रिया कि उन्होंने नारनौल के हमारे सहयोगी भालेंदर यादव से बात की. भालेंद यादव ने ही हरियाणा के सेंट्रल यूनिवर्सिटी की स्टोरी भेजी है. इन्हें सुनकर आपको लगेगा कि कोई समस्या नहीं है, छात्र समस्याओं का सपना देख रहे थे.

रजिस्ट्रार की बात से छात्र नहीं है सहमत
छात्र रजिस्ट्रार साहब की बात से सहमत नहीं हैं. कहते हैं कि प्रिटिंग एंड पैकेजिंग टेक्नॉलजी की कोई भी लैब नहीं है. सिविल डिपार्टमेंट में एक बी लैब नहीं है. तीन सेमेस्टर हो गए मगर एक भी लैब नहीं हुआ है. 2009 से 2017 आ गया मगर परमानेटं फैकल्टी की ड्यू प्रोसेस पूरी नहीं हुई. सेंट्रल यूनिवर्सिटी हरियाणा की और भी जानकारी है, जो हमें छात्रों ने बताई है. हम चाहते हैं कि इसे भी सामने ले आएं. टीचिंग के 75 फीसदी पोस्ट अभी तक ख़ाली हैं. 31 प्रोफेसर की जगह यहां मात्र 1 प्रोफेसर है. 62 एसोसिएट प्रोफेसर होने चाहिए, सिर्फ 9 हैं. 132 अस्सिटेंट प्रोफेसर होने चाहिए मगर 24 ही हैं. यह जानकारी संसद में 24 जुलाई 2017 को एक सवाल के जवाब में दी गई है. हरियाणा की इस यूनिवर्सिटी के बारे में केरल के सांसद ने सवाल पूछा था. आठ साल में अगर शिक्षक नहीं रखे गए तो यहां पढ़ाई कैसे हो रही होगी, क्या कोई भी देश एक दिन भी इंतज़ार कर सकता है, क्या उसे छात्रों के भविष्य की चिन्ता नहीं करनी चाहिए.

यूनिर्वसिटी के कुछ विभाग और स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में कई ऐसे विभाग हैं जहां एक ही रेगुलर टीचर है. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर चलते हैं. हमारे सहयोगी अनुराग द्वारी यहां के दुर्गा महाविद्यालय गए. ये कॉलेज पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से संबंध है. पंडित रविशंकर शुल्क स्वतंत्रता सेनानी थे, कांग्रेस नेता थे, मध्य प्रदेश जब राज्य बना तो पहले मुख्यमंत्री बने. छत्तीसगढ़ बनने से पहले यह इलाका भी मध्य प्रदेश का ही हिस्सा था. 1951 में जब शुरू हुआ तो यहां 56 छात्र थे आज यहां 300 से ज़्यादा छात्र कॉमर्स और आर्ट्स की पढ़ाई पढ़ रहे हैं. 5 एकड़ के इस कैंपस में यूजीसी के नियमों के उलट तीन कॉलेज चल रहे हैं. इस कॉलेज को सरकार से 100 फीसदी ग्रांट मिलता है. बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है. वैसे तो यहां शिक्षक की कमी है, लाइब्रेरी की कमी है, शौचालय की कमी है, मगर दो छात्र आमरण अनशन पर बैठे तो कैंटीन की मांग को लेकर. जो सबसे ज़रूरी है उसके लिए आमरण अनशन तो बहुत ज़रूरी है. वैसे कैंटीन अभी तक नहीं बनी है. यहां 63 शिक्षकों के पद मंज़ूर हैं मगर 21 ही परमानेंट हैं, बाकी सब ठेके पर पढ़ाते हैं. उन्हें 11 से 30 हज़ार तक मिलता है.

शिक्षक और छात्र सबके पास मजबूरी की लिस्ट है. अनुराग ने यहां पढ़ चुके नेताओं मंत्रियों की लिस्ट निकाली तो वो भी लंबी हो गई. ताकतवर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा, मो अकबर, सुनील सोनी, विकास उपाध्याय, जैसे 18 धुरंधर नेता यहीं के हैं. अनुराग द्वारी ने इस कॉलेज की लाइब्रेरी का दौरा किया. हम चाहते हैं कि आप भी अनुराग के साथ इस लाइब्रेरी का दौरा करें ताकि नेशनल लेवल पर हिन्दू मुस्लिम टॉपिक समझने में मदद मिले और बिना गुरु के भारत को विश्व गुरु बनाने का चूरन स्वादिष्ट लगे.

कर्मचारियों की कमी का रोना
प्रिसिपल ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि इतने कर्मचारी नहीं हैं कि हर काम का ढंग से प्रबंधन हो सके. मेरा एक आइडिया है. सारे कॉलेजों को दिन में बंद कर दिया जाए, रात को चालू किया जाए, क्लास में प्रोफेसर न हो और वहां न्यूज चैनल खोल दिए जाएं जहां छात्रों के लिए नेहरू बनाम पटेल, ताजमहल मंदिर है या मकबरा, जैसे आज के ज्वलंत मुद्दों पर डिबेट सुनना अनिवार्य कर दिया जाए. यही उनकी पढ़ाई समझी जाए और इसी से परीक्षा में भी सवाल पूछे जाएं. वैसे प्रिंसिपल ने जो कहा क्या वाकई सच होगा, उन्होंने कहा कि जब से राज्य बना है तब से भर्ती पर रोक है.

ये जो हालत है वो आज की नहीं है, हमने कॉलेजों को बर्बाद करने में बीस साल की मेहनत की है. तब जाकर ऐसा शानदार रिजल्ट आया है. कांग्रेस शासित राज्य हो, बीजेपी शासित राज्य हो, जनता दल युनाइटेड शासित राज्य हो, तृणमूल शासित राज्य हो, हर जगह यही हाल है, अगर इस हालत में व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी लोकप्रिय नहीं होगी तो कब होगी.


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