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सरकारों का ध्यान शिक्षा पर क्यों नहीं जाता? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

चाहे जिसकी सरकार हो, चाहे कोई भी दल हो, शहर दर शहर कॉलेज जर्जर हो चुके हैं. बाहर से रंग पोतकर देखने लायक जहां बना दिया गया है वहां भी हालत ख़राब है. इसलिए नेता आपकी पढ़ाई के मामले में नहीं बोलेंगे.

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सरकारों का ध्यान शिक्षा पर क्यों नहीं जाता? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
यूनिवर्सिटी सीरीज़ का यह 13वां अंक है. नेताओं के प्रेस कांफ्रेंस में जो मुद्दे सजाए जाते हैं वो अगली प्रेस कांफ्रेंस तक भी नहीं टिकते हैं. उनके बयानों के पीछे भागा जा सकता है बस यही कि अभी तक किसी ने इस बात की परवाह नहीं कि कॉलेजों की ख़राब हालत पर बोले. सबको पता है कि इस पर बोलने का मतलब है कि जवाबदेही स्वीकार करना कि कॉलेजों की हालत ऐसी क्यों है. चाहे जिसकी सरकार हो, चाहे कोई भी दल हो, शहर दर शहर कॉलेज जर्जर हो चुके हैं. बाहर से रंग पोतकर देखने लायक जहां बना दिया गया है वहां भी हालत ख़राब है. इसलिए नेता आपकी पढ़ाई के मामले में नहीं बोलेंगे. उन्हें पता है कि कॉलेजों से बर्बाद और औसत पीढ़ी निकलेगी तभी उनके पीछे ज़िंदाबाद के नारे लगाएगी और आईटी सेल में जाकर ट्रोल बनने का काम करेगी.

मुंबई यूनिवर्सिटी की हालत देखिए. जहां जून के महीने में रिज़ल्ट आ जाने चाहिए थे, अक्टूबर बीत रहा है, अभी तक नहीं आए हैं. 50 हज़ार से अधिक छात्रों ने दोबारा कापी जांच के आवेदन दिए हैं. जिस छात्र को चारो विषय में फेल कर दिया गया था वह दोबारा जांच के बाद टॉपर निकला. क्यों हुआ ऐसा छात्रों के साथ, क्योंकि ऑनलाइन चेकिंग की एक सनक भरी व्यवस्था शुरू की गई. 

मुंबई यूनिवर्सटी ने पेपर चेक के लिए 254 सेंटर बनाए थे. इस बार सेंटर पर कंप्यूटर लगा था, कॉपी को स्कैन किया गया. स्कैन के बाद हर कॉपी को एक कोड दिया गया. उस कोड के सहारे शिक्षक ने कंप्यूटर पर कॉपी चेक की. इस काम के लिए दो अलग अलग कंपनियों को ठेका दिया गया था.

जून की जगह अक्टूबर में आया रिजल्ट
हमें बातचीत से पता चला कि स्कैन करने के लिए उत्तर पुस्तिकाएं फाड़ी गईं. आरोप है कि वापस इन कॉपियों को पंच कर नहीं रखा गया. यही नहीं सिस्टम कंपनी ने दिया और स्कैन करने के लिए यूनिवर्सिटी के कर्मचारी लगाए गए. ऑनलाइन चेकिंग की ज़िद के कारण जिस रिज़ल्ट को जून में ही आ जाना चाहिए था, वह अक्टूबर के आखिरी दिनों तक नहीं आया है. जिनके आए हैं उनके रिज़ल्ट में काफी गड़बड़ियां हैं. रिज़ल्ट नहीं आया मगर इस सिस्टम को लाने वाले वाइस चांसलर को बर्खास्त कर दिया गया. वे मुंबई यूनिवर्सिटी के इतिहास में बर्खास्त होने वाले पहले वाइसचांसलर हैं.

आप सोचिए, तीस-तीस पन्ने की उत्तर पुस्तिका को स्कैन करने में कितना वक्त लगा होगा, कितना पैसा लगा होगा, और फिर उसे ऑनलाइन चेकिंग के लिए दिया गया. यह क्यों किया गया, इससे क्या फायदा हुआ. कहीं ठेकेदारी की नई संभावनाओं की तलाश में ऑनलाइन चेकिंग सिस्टम का जन्म हुआ? आखिर वाइस चांसलर किसी की सुन क्यों नहीं रहे थे शिक्षकों ने भी ऑनलाइन चेकिंग का विरोध किया, मगर नहीं सुना गया.

चेकिंग की ट्रेनिंग काफी नहीं थी
शिक्षकों का कहना है कि उन्हें चेकिंग की ट्रेनिंग दी गई मगर काफी नहीं थी. कंप्यूटर का सिस्टम बहुत धीमा हो जाता था जिसकी वजह से बहुत देरी हुई. छात्रों को भी पता नहीं था कि ऑनलाइन मार्किंग का कोई सिस्टम आया है. जब नतीजा आया और पास होने वाले फेल हो गए तब पता चला 3600 उत्तर पुस्तिकाओं का कहीं अता-पता नहीं चल रहा है. अभी तक ये छात्र रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे हैं. 

45 दिन में नियमतः आ जाना चाहिए रिजल्ट
नियम है कि इम्तहान के 45 दिन के भीतर नतीजा आ जाना चाहिए. अब तो कितने ही 45 दिन बीत गए. यूनिवर्सिटी ने फैसला किया है कि जिनके नतीजे नहीं आए हैं, या जिनके पेपर नहीं मिल रहे हैं उन्हें औसत नंबर दिया जाएगा. यही नहीं यूनिवर्सिटी अपनी ग़लती का बोझ छात्रों पर ही डाल रही है. दोबारा परीक्षा की फीस 500 से बढ़ाकर 1000 रुपये कर दी गई है.

जांच के आवेदन देने वालों की फीस घटाई
जिन छात्रों ने दोबारा जांच के आवेदन दिए हैं उनके लिए फीस 500 से घटा कर 250 कर दी गई है. धंधा बना लिया गया है. एक तरफ फीस घटाई जाती है दूसरी तरफ उससे अधिक किसी और मामले में बढ़ा दी जाती है. रिज़ल्ट को लेकर आंदोलन करने वाले छात्रों को यूनिवर्सिटी ने एक और ज़िम्मेदारी दे दी है कि अब आप इस फीस वृद्धि के ख़िलाफ धरना देकर दिखाइये. यूनिवर्सिटी यह भी नहीं बता रही है कि किन किन के पेपर गायब है. उनका नाम नहीं बता रही है. छात्र यह भी मांग कर रहे हैं कि जिस मेरिट-ट्रैक कंपनी को ठेका दिया गया है उसका करार ख़त्म किया जाए. सात दिनों के भीतर समस्या के समाधान के वादे पर छात्रों ने हड़ताल वापस ले ली है.

कम की गई शिक्षकों और कर्मचारियों की संख्या
देश भर के कॉलेजों में शिक्षकों और कर्मचारियों की संख्या कम की गई. इस दौरान छात्रों की संख्या डबल हो गई. तो इम्तहान कराने और कॉपी चेक कराने के लिए नया तरीका निकाला गया. बाज़ार में इसके लिए कई कंपनियां मौजूद हैं. हमने ठेके पर इम्तहान कराने वाली एक कंपनी का डिटेल देखा. यह कंपनी देश के एक बड़े प्राइवेट शिक्षा समूह की कंपनी है. यानी प्राइवेट शिक्षा समूह सरकारी संस्थानों के भीतर भी अपना बिजनेस कर रहे हैं. एक अगस्त को हमने नीट यानी मेडिकल प्रवेश परीक्षा को लेकर प्राइम टाइम किया था. क्या आपको पता है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा का ठेका किसी अमरीकी कंपनी को दिया गया था. मतलब साफ है इम्तहान एक बड़ा बाज़ार बन चुका है. बड़ी बड़ी कंपनियां उतर गईं हैं. तब दिल्ली पुलिस से अपने 20 पन्ने की चार्जशीट में कहा था कि कंपनी ने माना है कि परीक्षा लेने के सॉफ्टवेयर से छेड़छाड़ हो सकती है. इसे हैक किया जा सकता है. यही नहीं एक कंपनी से करार हुआ और उस कंपनी ने आगे और कुछ कंपनियों से करार किया. इस तरह एक धंधा बना और आपको बताया गया कि ऑनलाइन पर आधारित कोई डिजिटल इंडिया बन रहा है. 

4 लोगों को गिरफ्तार किया था दिल्ली पुलिस ने 
दिल्ली पुलिस इस मामले में अगस्त के महीने में 4 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी थी. आज पटना में एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया गया है. आरोप है कि यह डॉक्टर 10 लाख रुपये लेकर दूसरे छात्र के बदले इम्तहान देता था. दो साल से यह डॉक्टर कथित रूप से पैसे लेकर डॉक्टर बना रहा है. इसका लाभ किसे मिलता होगा, ये आप जानते हैं. अमीर और प्रभावशाली लोगों के बच्चे इसी तरह रिश्वत और महंगी फीस के ज़रिए शिखर पर पहुंचा दिए जाते हैं और आपके हिस्से छोड़ दी जाती है कि आप उम्मीद करें. नेता के भाषणों को सुनकर सपना देखें. 

यूट्यूब पर कई वीडियो मौजूद
यूट्यूब पर आप देखिएगा इवेल्युएशन सिस्टम के नाम से कई वीडियो मिलेंगे जो कंपनियों ने डाले हैं, आप खुद समझ जाएंगे कि पैसे बनाने के ये नए तरीके हैं. अब इस देश में प्राइवेट इम्तहान भी होने लगे हैं मगर चेयरमैन बनाने के लिए इम्तहान बोर्ड का दफ्तर रखा गया है. धीरे-धीरे ये इम्तहान बोर्ड इन कंपनियों के लिए ठेका देने की एजेंसी बनकर रह जाएंगे, बल्कि बन चुके हैं. अब आपको उत्तर प्रदेश ले चलते हैं. बहराईच ज़िले में 1898 में किसी ने संस्कृत कॉलेज बनाया था. हमने संस्कृत पर दो एपिसोड किए हैं, बताते हुए हर्ष और गर्व हो रहा है इसके बाद भी किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ा है. 

आदर्श संस्कृतायुर्वेद महाविद्यालय 1898 से लेकर अभी तक टिका हुआ है. यही इस बात का प्रमाण है कि भारत में चीज़ें टिकी रह जाती हैं. इमारत जर्जर है और गंदगी इसकी जीवन संगीनी. अंग्रेज़ों ने क्या सोचकर 1898 में इस महाविद्यालय की स्थापना की थी, तब इसका नाम था प्रिंस संस्कृत महाविद्यालय, बाद में आदर्श होकर भारतीय हो गया. संस्कृत के नाम पर दंगल करने वाले भारतीय राजनेताओं को ये सब जानने में दिलचस्पी नहीं होगी. इसकी इमारत देखकर दिल छोटा न करें,बल्कि इस बात से ख़ुश हो लें कि आज़ादी के समय यहां 6 शिक्षकों के पद मंज़ूर किए गए थे. आज भी इतनी ही क्षमता है. वैसे यहां तीन शिक्षक हैं और छात्रों की संख्या 304 ही है. जब हमारे सहयोगी सलीम यहां पहुंचे तो एक छात्र पढ़ता हुआ मिला. प्रधानाचार्य का कहना है कि छुट्टियों में छात्र नहीं आते हैं. फिर यह एक छात्र क्या कॉलेज में सपने देखने आया था. कई क्लासरूम में ताले लटके मिले. क्लासरूम में बैठने के लिए फर्नीचर तक नहीं है. पानी के लिए छह माह पहले हैंड पंप लगा है, मगर खराब है, पानी नहीं आता है. 2 शौचालय है मगर ताला लटका है. लगता है यहां आने वालों को शौच की ज़रूरत नहीं होती है. 

बहराइच में 7 संस्कृत विद्यालय हैं
बहराइच ज़िले में 7 संस्कृत विद्यालय हैं. 37 पद स्वीकृत हैं मगर 17 शिक्षकों के दम पर सब चल रहा है. सभी विद्यालय अंग्रेज़ों के समय के हैं. अलग से इस कॉलेज को कोई बजट नहीं मिलता है मगर सैलरी सीधे खाते में आ जाती है. यूपी के ही बलरामपुर से हमारे सहयोगी अनुराग कुमार सिंह ने वहां के एक प्रमुख कॉलेज की रिपोर्ट भेजी है. बलरामपुर अवध इलाके का प्रमुख ज़िला है और राप्ती नदी के पास है. ऑक्सफोर्ड बनने का सपना लिए भारत की जाने कितनी यूनिवर्सिटियों ने दम तोड़ दिया. बलरामपुर के इस कॉलेज को तराई का ऑक्सफोर्ड कहलाने की चाहत थी. 

नैक ने एक ग्रेड दिया 
महारानी लाल कुंवरी डिग्री कॉलेज को नैक ने एक ग्रेड दिया है. इसका उदघाटन यूपी के पूर्व राज्यपाल के एम मुंशी ने 1955 में किया था. इमारत इसलिए शानदार है क्योंकि ये कभी राजदरबार का हिस्सा हुआ करता था. यह भवन बलरामपुर के राजा मटेश्वरी प्रसाद सिंह ने 1 रुपये सालाना किराये पर दान में दे दिया था. खांचे के तौर पर ढांचा तो बहुत बढ़िया है, लेकिन यहां शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था होती तो अच्छे छात्रों को पढ़ने के लिए पलायन नहीं करना पड़ता. इसकी इमारतों को देखकर कभी यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री सीपी गुप्ता ने कहा था कि अगर इस कॉलेज को पहले देखा होता तो गोरखपुर यूनिवर्सिटी नहीं बनाता. एक समय यहां 90 अध्यापक होते थे आज मात्र 32 ही हैं. जबकि एडमिशन लेने वाले छात्रों की संख्या काफी बढ़ गई है. 1955 से लेकर आज तक यह कॉलेज कई विश्वविद्लाय से संबंध रहा है. इस कॉलेज में हाथी का यह जीवाश्म भी काफी दिलचस्प है. चांदमूरत नाम था उस हाथी का. 1899 में ट्रेन से टकरा गया और उसकी मौत हो गई. इस समय इसे कॉलेज के प्राणी विज्ञान विभाग में रखा गया है. इस विभाग में एक ही परमानेंट टीचर हैं. गांव से लेकर कस्बों के स्तर पर युवाओं के सपनों को मारा जा रहा है. 

पढ़ाई ठीक से नहीं होती
छात्रों को सुना आपने. सिलेबस पूरा हो जाता है मगर पढ़ाई ठीक से नहीं होती है. 6000 से अधिक छात्र यहां पढ़ते हैं. अंग्रेज़ी समाजशास्त्र जैसे कई विषय में कोई परमानेंट अध्यापक नहीं है. गेस्ट पढ़ाने वाले शिक्षक 5 से 8 हज़ार में पढ़ा रहे हैं. कभी इस कॉलेज के रिसर्च की प्रतिष्ठा थी, आज हम इसकी प्रतिष्ठा पर रिसर्च कर रहे हैं कि इसकी हालत अब ऐसी क्यों हैं. प्रिंसिपल से लेकर शिक्षक तक मानते हैं कि इससे क्वालिटी ठीक नहीं हो सकती. 200 बीघा ज़मीन में यह कॉलेज है. प्रिसिंपल ने बताया कि इस साल फंड आया है. उम्मीद है कुछ काम होगा. आधिकारिक बयान की अपनी सीमा होती है लेकिन छात्रों के हाल से कॉलेज के हाल का अंदाज़ा लगाइये. 50 से 60 फीसदी यहा नॉन टीचिंग स्टाफ की कमी है.

अभी तक प्रक्रिया नहीं हुई है पूरी
नए छात्रों की संख्या के अनुसार शिक्षकों, गैर शिक्षकों और प्रिंसिपलों के पद का मूल्यांकन नहीं हुआ है. यूपी के कालेजों के लिए अलग अलग आयोग से नियुक्ति होती है. उत्तर प्रदेश में सरकारी डिग्री कॉलेजों के अस्सिटेंट प्रोफेसर की भरती यूपी लोकसेवा आयोग के ज़रिए होती है. यूपी लोक सेवा आयोग ने इसके लिए 24 अक्टूबर को 718 अस्सिटेंट प्रोफेसर की बहाली निकाली है. इसके लिए फॉर्म भरने की अंतिम तिथि 24 नवंबर है. मगर सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों में अस्सिटेंट प्रोफेसर की भर्ती यूपी उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के ज़रिए होती है. इस आयोग ने जून 2014 में 1652 पदों के लिए बहाली निकाली थी मगर अभी तक इसकी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है

नई सरकार ने कहा कि फिर से प्रक्रिया शुरू करेंगे, पुराने तरीके में करप्शन हुआ है. छात्र कोर्ट चले गए. आदेश मिला कि जिनका इंटरव्यू हो चुका है, उनका परिणाम निकाला जाए. इस आदेश के बाद कई लोगो ने ज्वाइन भी किया है. बाकी का पता नहीं है. पिछले साल अखिलेश यादव की सरकार में ही 1150 पदों की बहाली निकली थी. 1652 की बहाली ही पूरी नहीं हुई है. 1150 की बहाली लटकी हुई है. ये हाल है नियुक्तियों का कॉलेजों में. आयोगों का हाल है ये. यूपी के कई कॉलेजों में प्रिंसिपल के पद भी ख़ाली हैं. 8 मई 2017 को यूपी उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग ने 284 प्रिंसिपल की वैकेंसी निकली है. फॉर्म भरने की अंतिम तारीख 13 जुलाई 2017 थी. अक्टूबर बीतने जा रहा है. वैकेंसी निकलती है मगर भरने के लिए नहीं, लटकाने के लिए. इंजीनियरिंग कॉलेज के शिक्षक मैसेज कर रहे हैं कि उनके कॉलेजों में कोई प्रोफेसर नहीं है. 6 से 10 हज़ार के महीने पर टीचर पढ़ा रहे हैं.   


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