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शिक्षा व्यवस्था को लेकर कितने गंभीर हैं हम?  

जब भी उच्च शिक्षा की समस्याओं पर बात होती है, ऑटोनमी यानी स्वायत्तता को एंटी बायेटिक टैबलेट के रूप में पेश किया जाता है.

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शिक्षा व्यवस्था को लेकर कितने गंभीर हैं हम?  

कई बार हमें लगता है कि किसी विश्वविद्यालय की समस्या इसलिए है क्योंकि वहां स्वायत्तता नहीं है इसलिए उसे स्वायत्तता दे दी जाए. जब भी उच्च शिक्षा की समस्याओं पर बात होती है, ऑटोनमी यानी स्वायत्तता को एंटी बायेटिक टैबलेट के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन आप किसी भी विश्वविद्यालय को देखिए, चाहे वो प्राइवेट हो या पब्लिक यानी सरकारी क्या वहां सरकार या राजनीतिक प्रभाव से स्वायत्त होने की स्वतंत्रता है. सरकार ही क्यों हस्तक्षेप करती है, वो हस्तक्षेप करना बंद कर दे. कभी आपने सुना है कि वाइस चांसलर की नियुक्ति की प्रक्रिया बेहतर की जाएगी, उनका चयन राजनीतिक तौर पर नहीं होगा.  

यह भी राजनीतिक स्वायत्तता का ही एक रूप है जो भयावह हो चला है. क्रांतिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा कच्छ यूनिवर्सिटी के कैमिस्ट्री के प्रोफेसर गिरिन बक्शी का चेहरा काला कर दिया गया है. विश्व गुरु बनाने वाले भारत के गुरुओं का ये हाल हो रहा है, आप चेहरा काला करने वाले छात्रों को देखिए, उसी से भारत के भविष्य का अंदाज़ा हो जाएगा. आस पास कैमरे भी हैं, फिर भी डर है न लज्जा. शिक्षक दिवस 5 सितंबर को होता है मगर शिक्षक तो कोई साल भर होता होगा. छात्रों का आरोप था कि यूनिवर्सिटी चुनाव के मतदाता पत्र में गड़बड़ी है. क्या यह इतनी बड़ी शिकायत है कि एक प्रोफेसर को इस तरह घेर कर उसका मुंह काला कर दिया जाए.

कच्छ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने बताया कि गिरिन बक्शी क्लास में पढ़ा रहे थे, वहां से इन्हें खींच कर बाहर निकाला गया और चेहरा काला कर दिया गया. यह स्वायत्तता न तो यूजीसी ने दी है और न ही कानून ने मगर इन्होंने ले ली है तो ले ली है. अखबारों में कहीं इन्हें एबीवीबी का कार्यकर्ता लिखा जा रहा है तो कहीं समर्थक लिखा जा रहा है. ये जो भी हैं भुज पुलिस ने 15-20 छात्रों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. 5 लोग गिरफ्तार किए गए हैं.


यह राजनीतिक स्वायत्तता का नमूना है जो किसी भी स्वायत्ता से ऊपर हमेशा ही रहेगी. अब हम आपको अलीगढ़ से एक वीडियो दिखाते हैं. शिवदान सिंह इंटर कॉलेज के एक दलित अध्यापक ने अखबार की कटिंग फेसबुक पर पोस्ट कर दी. मामला थाना पहुंच गया. वहां पर बीजेपी के पदाधिकारी की मौजूदगी में उनसे माफी मंगवाई गई, यही नहीं उनसे पांव छूने के लिए मजबूर किया गया. पहले आप वीडियो देखिए फिर आगे डिटेल बताते हैं. 

क्या पुलिस थाने में भी इंसाफ अब इस तरह से होगा कि पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में एक अध्यापक को पांव छूकर माफी मांगनी होगी. जब थाने तक शिकायत पहुंच गई तब कानून के हिसाब से होना था मगर पांव छूने के लिए मजबूर किया गया और जिनका पांव छूने के लिए कहा गया है वो भाजपा के मंडल अध्यक्ष कालीचरण गौड़ हैं. उनका इस कॉलेज से कोई लेना देना नहीं हैं. यह स्वायत्तता राजनीतिक सत्ता से आती है या यूजीसी से मिली हुई है?

अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले सत्यभान सिंह ने एक अखबार की कटिंग पोस्ट की जिसका शीर्षक है कि यदि भारत के भविष्य का निर्माण करना है तो ब्राह्मणवाद को पैरों तले कुचल डालो. अखबार में यह कथन स्वामी विवेकानंद का बताया गया है. इसे शेयर करने का अपराध इतना बड़ा है कि सत्यभान को डिलिट करने के लिए मजबूर किया गया, फेसबुक पर माफी मांगने की बात कही गई, उससे भी संतुष्टि नहीं हुई तो सत्यभान से कहा गया कि वे पैर छू कर माफी मांगे. वैसे स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के अपने भाषण में ऐसा नहीं कहा था कि ब्राह्मणवाद को पैरों तले कुचल डालो. हमने भाषण चेक किया है. 

क्या अध्यापक सत्यभान सिंह के साथ जो हुआ उसमें जाति का अहंकार नहीं था कि आलोचना की एक कटिंग क्या पोस्ट कर दी उनसे माफी मंगवाई गई और थाने में पांव छूने के लिए कहा गया. किसी को दस लोगों के बीच पांव छूने के लिए मजबूर करना सामंतवादी और जातिवादी व्यवस्था नहीं है तो और क्या है. जब थाने तक मामला पहुंच ही गया था तो फिर कानून पर छोड़ दिया जाता, वहां जातिगत और सामंती तरीके से पांव छूने के लिए क्यों मजबूर किया गया.

सत्यभान सिंह से बात करने की कोशिश की मगर वे इतना घबरा गए हैं कि बात ही नहीं की. मानव संसाधन मंत्रालय की वेबसाइट पर आज एक नया एक्ट अपलोड किया है, जिससे पता चलता है कि सरकार यूजीसी खत्म कर उसकी जगह उच्च शिक्षा आयोग बनाने जा रही है. चार साल बाद अचानक एक नए नियामक संस्था की ज़रूरत की याद आई है, या इसकी ज़रूरत हो भी सकती है मगर भारत की यूनिवर्सिटी आयोग का नहीं अब तक ठोस फैसलों का इंतज़ार कर रही थी. मानव संसाधन की वेबसाइट पर जो अपलोड हुआ है उसका नाम है 'The Higher Education Commission Of India (Repeal Of UGC Act) Act 2018. इस एक्ट पर जनता से 7 जुलाई 2018 तक सुझाव मांगा गया है. इतने बड़े बदलाव के लिए जनता को राय देने के लिए सिर्फ 10 दिन दिए गए हैं, जिसे आपको ईमेल करना है.

सरकार ने अपनी मंशा के बारे में लिखा है वह यह एक्ट इसलिए पेश कर रही है क्योंकि वह शिक्षा के नियामक संस्थाओं में सुधार के लिए प्रतिबद्ध है ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों को ज्यादा स्वायत्तता मिल सके. स्वायत्तता का आलम ये है कि क्या प्राइवेट और क्या सरकारी, न तो किसी प्रोफेसर को सवाल करने की हिम्मत होती है न किसी वाइस चांसलर को. राजनीतिक हस्तक्षेप इस कदर बढ़ता जा रहा है कि अब मंत्री तय करते हैं कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाएगा और कॉलेज में क्या पढ़ाया जाएगा. बहरहाल यह एक्ट आपके सामने है.

क्या इन्हीं सब उद्देश्यों के लिए यूजीसी का गठन नहीं हुआ था, नए उच्च शिक्षा आयोग के मकसद में ऐसा क्या खास है जो यूजीसी में नहीं था या यूजीसी से पूरा नहीं हो सकता था. इससे पहले कि आप यकीन कर लें कि भारत की उच्च शिक्षा की समस्याएं इसलिए विकराल हो चुकी हैं, क्योंकि यूजीसी को समाप्त कर नया उच्च शिक्षा आयोग बनाने की ज़रूरत है, यह समझना चाहिए कि उच्च शिक्षा आयोग के सामने भी वही समस्याएं होंगी जो यूजीसी के सामने हैं. 2014 के पहले के कई साल और उसके बाद के चार साल से इन समस्याओं के संग्रह का नतीजा यह है कि आज सारे भारत के नौजवान 12वीं पास करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी की तरफ भागते हैं. भारत में एक लाख शिक्षकों की कमी है. सरकारें उच्च शिक्षा के साथ किस तरह खिलवाड़ करती हैं उसका एक रूप आपको दिखाता हूं. 

ये जो नोटिफिकेशन आप देख रहे हैं वो झारखंड सेंट्रल यूनिवर्सिटी का है. 25 जून को इसकी वेबसाइट पर अपलोड होता है कि झारखंड सेंट्रल यूनिवर्सिटी अस्थायी रूप से 64 सहायक प्रोफेसरों को बहाल करना चाहती है. इन सभी को एकमुश्त 55000 महीने की सैलरी दी जाएगी. नौकरी अस्थायी होगी. मगर इस नोटिफिकेशन के 12 घंटे के भीतर एक सुधार करती है कि अब उन्हें 55000 नहीं, 35000 की सैलरी मिलेगी. यह भी सेंट्रल यूनिवर्सिटी है. हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी में अस्थायी पढ़ाने वाले शिक्षकों की सैलरी से तुलना की तो वहां एडहॉक पढ़ाने वालों को 65000 के करीब सैलरी मिलती है. एक ही भारत सरकार की एक यूनिवर्सिटी किसी को 35000 देती है और किसी को 65000.

मध्य प्रदेश में तो यूनिवर्सिटी और कॉलेजो में शिक्षक 20,000 के आस पास की सैलरी पर पढ़ा रहे हैं. अगर ये मज़ाक नहीं तो फिर मज़ाक क्या है. 12 घंटे के भीतर विज्ञापन में सैलरी 55 हज़ार से घटकर 35000 हो जाती है. आपको लगता है कि वाकई अच्छी क्वालिटी के छात्र अपना जीवन ऐसी व्यवस्था को देंगे. मजबूरी में दे देंगे लेकिन क्या उनका पहला चुनाव होगा? 20 अगस्त 2017 को 'टाइम्स ऑफ इंडिया में मानस की एक रिपोर्ट है. जिसमें मानव संसाधन मंत्री का बयान छपा है कि आईआईटी, एनआईटी और यूनिवर्सटी में एक तिहाई पद खाली हैं. 

नई सेंट्रल यूनिवर्सिटी में तो 53.28 प्रतिशत पद ख़ाली हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में 47 प्रतिशत पद ख़ाली हैं. नए और पुरानी आईआईटी में 35 प्रतिशत पद ख़ाली हैं. आईआईएम में भी 26 प्रतिशत पद खाली हैं. आईआईएम इंदौर में तो 51 प्रतिशत पद खाली हैं.

'टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट में लिखा है कि सरकार ने संसद को यह सब जानकारी दी है. आपको पता ही होगा कि सातों एम्स में टीचिंग के 70 फीसदी से अधिक पद खाली हैं. बाकी मेडिकल कॉलेजों के टीचिंग स्टाफ की लिस्ट बना रहा हूं, वहां भी हालत बुरी है. बिना टीचर के आप पढ़कर डॉक्टर हो जाए यह कमाल कहां हो सकता है, यह बार-बार बताने की ज़रूरत नहीं है. अगस्त 2017 की यह रिपोर्ट है. इस वक्त कितने पद भरे जा चुके हैं मानव संसाधन मंत्री ही बेहतर बता सकते है. सुबह-सुबह ट्वीट कर सकते हैं कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी में जो पिछले साल तक 6000 से अधिक पद खाली थे, उनमें से कितने पर स्थायी नियुक्ति हो चुकी है. परमानेंट की बात कर रहा हूं. 20 मार्च 2017 को मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जवड़ेकर ने कहा था कि एक साल के भीतर दिल्ली यूनिवर्सिटी के 9000 एडहॉक शिक्षकों को परमानेंट कर दिया गया. एक साल से ज़्यादा होने जा रहा है. मंत्रीजी को याद दिला रहा हूं कि इस बारे में भी कल ट्वीट कर सकते हैं कि 9000 में से कितने एडहॉक को परमानेंट कर चुके हैं. हमें तो पता है बेहतर है वहीं बता दें. वैसे 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के मुताबिक एक अप्रैल 2017 तक सेंट्रल यूनिवर्सिटी हरियाणा में 75 फीसदी ख़ाली हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में 54.75 प्रतिशत पद ख़ाली हैं. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में 64 फीसदी पद ख़ाली हैं. 

भारत में ही 75 प्रतिशत शिक्षकों के बिना सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा चल सकती है यही जानने के लिए मेधावी छात्रों को ऑक्सफोर्ट छोड़कर यहां पढ़ने आना चाहिए. आप भी अपने बच्चों का नामांकन वहीं कराएं जहां शिक्षक नहीं हैं. वैसे जहां भी कराएंगे वहां शिक्षक नहीं ही होंगे जो हाल है. वैसे आपको बता दें कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी भी स्वायत्त संस्थाएं मानी जाती हैं, मगर आए दिन आप वहां सरकारी और राजनीतिक हस्तक्षेप देखते रहते हैं. हमने आपको पिछले दिनों बताया था कि राममनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी में बीएससी थर्ड ईयर के 80 प्रतिशथ छात्र फेल हो गए हैं. बीएससी प्रथम वर्ष के 56 प्रतिशत छात्र फेल हो गए हैं. 

स्थानीय मीडिया में छपा था कि अवध यूनिवर्सिटी में 80 प्रतिशत छात्र फेल हो गए. इस हिसाब से जब छह लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी तो चार लाख 80 हज़ार हुए. विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर ने इसे ही मुद्दा बना लिया कि जब तीन लाख से कुछ ज्यादा छात्रों के रिज़ल्ट ही निकले हैं तो 4 लाख 80 हज़ार फेल हो गए. ये चूक थी मगर हमने ये भी कहा था कि बीएससी थर्ड ईयर में 80 प्रतिशत फेल हुए हैं. फर्स्ट ईयर में 56 प्रतिशत फेल हुए हैं. आज वाइस चांसलर मनोज दीक्षित से जब हमारे सहयोगी प्रमोद श्रीवास्तव ने बात की तो वे नहीं बता सके कि कितने छात्र परीक्षा में बैठे थे, फेल होने वाले छात्रों की कुल संख्या कितनी है. वाइस चांसलर ने फेल के आंकड़े कम दिखाने के लिए सरकारी मदद प्राप्त और स्ववित्त पोषित कॉलेज के नतीजों में बंटवारा कर दिया. वे यह भूल गए कि वाइस चांसलर सरकारी मदद प्राप्त कॉलेजों के भी हैं और स्ववित्त पोषित कॉलेजों के भी. 

एक यूनिवर्सिटी में कथित रूप से नकल रोकने के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में छात्र फेल हो जाए क्या यह विश्व विद्यालय की गुणवत्ता पर टिप्पणी नहीं है. वहां क्या पढ़ाई होती है कि नकल रोकने पर फेल हो जाते हैं. आज जब प्रमोद ने वीसी मनोज दीक्षित से बात की तब उन्होंने नहीं बताया कि कितने छात्रों ने परीक्षा दी थी जबकि 22 फरवरी के आस पास प्रेस कांफ्रेंस में खुद कहा था कि 6 लाख से अधिक छात्रों ने परीक्षा दी थी. छह लाख छात्र परीक्षा में बैठेंगे तो रिजल्ट छह लाख का निकलेगा या तीन लाख का निकलेगा? वीसी दीक्षित ने प्रमोद से पहले कहा कि नहीं मालूम कितने छात्र परीक्षा में बैठे थे, आपको ओमप्रकाश बता देंगे. बाद में प्रमोद श्रीवास्तव ने जानने की कोशिश कि तो यह पता चला कि ये ओम प्रकाश यूनिवर्सिटी के कोई अधिकारी नही हैं, किसी पद पर नहीं हैं. कार्य परिषद के सदस्य हैं. कायदे से वीसी को 19 जून के प्रेस रिलीज में ही बताना चाहिए था जब उन्होंने हमारी सीरीज के बाद जारी किया था और जिसमें सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में फेल होने वाले छात्रों का प्रतिशत दिखाया था, उसमें क्यों नहीं कहा कि 3 लाख से अधिक छात्र परीक्षा ही नहीं देने आए क्योंकि नकल विरोधी अभियान चल रहा था. 

22 फरवरी को वीसी ने कहा था कि स्नातक की परीक्षा में 6,11680 छात्र शामिल होंगे. 3,41000 छात्रों का रिजल्ट निकला और इसमें से 15-16 प्रतिशत फेल हो गए. इस हिसाब से फेल होने वाले छात्रों की संख्या होती है 54,560. जब वीसी से पूछा गया कि इम्तेहान तो 6 लाख से अधिक छात्रों ने दिया तो उन्होंने कहा कि बाकी छात्र नहीं आए.  इस हिसाब से 2,70680 छात्र परीक्षा देने नहीं आए, ये तो फेल से भी शर्मनाक है. अब आप फेल होने वाले और परीक्षा नहीं देने वालों की संख्या जोड़िए. यह संख्या होती 3, 25,240 छात्र पास होने लायक नहीं हैं.

क्या यह किसी यूनिवर्सिटी के लिए शर्मनाक नहीं है कि फॉर्म भरने वाले छात्रों में से आधे या तो इम्तहान देने का साहस न जुटा सकें और फेल हो जाएं. वैसे राज्यपाल रामनाईक को चेक करना चाहिए कि वाकई 2 लाख 70000 से अधिक छात्रों ने परीक्षा छोड़ दी, और छोड़ दी तो यह बात रिजल्ट के समय क्यों नहीं वेबसाइट पर बताई गई. आज तक इसका ज़िक्र नहीं है. 19 जून की प्रेस रिलीज में वीसी दीक्षित बता सकते थे कि करीब पौने तीन लाख छात्रों ने परीक्षा ही नहीं दी. 

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अवध यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों में छात्रों की संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं हैं. मंज़ूर पदों की संख्या के हिसाब से भी शिक्षक नहीं हैं. अगर यही क्वालिटी शिक्षा की रहेगी तो इन यूनिवर्सिटी को बंद कर देना चाहिए क्योंकि व्हाटअस एप यूनिवर्सिटी तो चल ही रही है. कानपुर यूनिवर्सिटी और बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के नतीजों का भी बुरा हाल है. यहा सिर्फ बीए बीएससी और बीकॉम में 2 लाख 18 हज़ार 28 छात्रों ने परीक्षा दी थी, इसमें से 1 लाख 22 हज़ार 583 छात्र फेल हो गए हैं. करीब करीब 50 फीसदी छात्र बुंदेलखंड में फेल हैं. 

सारा श्रेय नकल रोकने को लेकर है मगर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की गुणवत्ता कब सुधरेगी. क्या यह अच्छी बात है कि एक यूनिवर्सिटी में सिर्फ 40 प्रतिशत छात्र पास हों. बीएससी पार्ट वन में तो 12.5 प्रतिशत छात्र ही पास हुए हैं बाकी सब फेल हैं. कोई 26000 छात्र फेल हैं. बीएससी पार्ट टू में भी 24000 के करीब छात्र फेल हैं. यह पता नहीं कि बीएससी में ही 50,000 से अधिक छात्र फेल हैं. बंदेलखंड यूनिवर्सिटी में सभी कोर्स में कुल मिलाकर 2 लाख 43 हज़ार छात्रों ने परीक्षा दी थी, जिसमें से 95,445 छात्र ही पास हुए है. बाकी सब फेल. ये है हमारी उच्च शिक्षा का हाल. न टीचर हैं न प्रिंसिपल हैं न छात्र पास होने लायक हैं. नतीजा क्या होगा आप समझ सकते हैं.



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