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विधायक की बुद्धिजीवियों को धमकी...

बासवन गौड़ा पाटिल बीजेपी के विधायक हैं. कर्नाटक के विजयपुरा में कारगिल विजय दिवस पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे गृहमंत्री होते तो सेना के खिलाफ बोलने वाले को गोली से मरवा देते.

विधायक की बुद्धिजीवियों को धमकी...

बीजेपी विधायक बासवन गौड़ा पाटिल.

अगर आप पढ़ते लिखते हैं, सोचते विचारते हैं या आपके परिवार में कोई नौजवान पढ़ता लिखता है, दुनिया को देखने समझने के लिए अलग-अलग किताबें पढ़ता है, जिसे आस पास के लोग इंटेलेक्चुअल कहते हैं, तो थोड़ी सावधानी बरतने में कोई हर्ज नहीं है. कभी भी खुद को इंटेलेक्चुअल न कहें वर्ना अब ऐसा नेता हो गए हैं जिन्हें इंटेलेक्चुअल को गोली से मरवा देने का शौक चढ़ गया है. चुने हुए प्रतिनिधि बेलगाम होते जा रहे हैं. किसी को भी गोली मार देने की बात ऐसे कह रहे हैं जैसे कोई बादशाही हुक्म जारी किया जा रहा हो. कभी सेना को तो कभी आस्था को ढाल बनाकर ऐसी बातें कही जा रही हैं. हम ये कैसा भारत बना रहे हैं जहां विधायक बल्कि बीजेपी के विधायक कहते है कि मैं अगर गृहमंत्री होता तो सेना के ख़िलाफ बोलने वाले इंटेलेक्चुअल को गोली से उड़वा देता. क्या उन्हें नहीं पता कि सेना से रिटायर होने के बाद जनरल से लेकर ब्रिगेडियर और कर्नल तक सेना पर सवाल उठाते रहे हैं. ये कब से हो गया कि ऐसा करने पर गोली से उड़वा दिया जाएगा. 

बासवन गौड़ा पाटिल बीजेपी के विधायक हैं. कर्नाटक के विजयपुरा में कारगिल विजय दिवस पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे गृहमंत्री होते तो सेना के खिलाफ बोलने वाले को गोली से मरवा देते. सोचिए, अगर वाकई ये गृहमंत्री राजनाथ सिंह की जगह होते तो क्या कर रहे होते. जनाब वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री रह चुके हैं. आप देखेंगे कि तरह तरह के तर्कों का सहारा लेकर हत्या को उचित ठहारने की कोशिश हो रही है, उकसाने की कोशिश हो रही है. क्या आज के हिन्दुस्तान में इंटेलेक्चुअल से इतनी नफरत हो गई है कि गोली से उड़ा देने की बात होगी. फिर तो स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी सब बंद कर देनी चाहिए. बासवन गौड़ा एस पाटिल को पता नहीं होगा कि आज ही 27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ है.

2016 से मणिपुर में सुरक्षा बलों द्वारा कथित रूप से फेक एनकाउंटर के 1528 मामले की सुनवाई हो रही है. सभी एनकाउंटर 2000 से 2012 के बीच के हैं, जिसमें सेना, असम राइफल्स, मणिपुर पुलिस पर आरोप है. सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच में ढिलाई के लिए सीबीआई के चीफ को फटकारा है. उनसे कहा है कि 30 जुलाई को बताएं कि तेज़ी लाने के लिए क्या किया जा सकता है. जब सुप्रीम कोर्ट सैनिक और अर्ध सैनिक बलों के विरोध के बाद भी जांच के आदेश दे सकता है तो फिर बासवन गौड़ा कानून की किस समझ के हिसाब से सरेआम गोली मारने की बात कर रहे हैं. क्या अब इस भाषा में बात होगी. मणिपुर में कथित रूप से फेक एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के सेना या अर्धसैनिक बलों को आर्मड फोर्सेस स्पेशनल पावर एक्ट के नाम पर किसी की हत्या करने की अनुमति नहीं है. किसी को शक के आधार पर मार देने या राज्य का दुश्मन घोषित कर देने से लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा.

बासवन गौड़ा पहले भी बयान दे चुके हैं कि वे मुसलमानों से वोट नहीं मांगते हैं, हिन्दुओं पर पूरा विश्वास है कि वोट मिलेगा. क्या ये देश को बांटने वाला बयान नहीं है. ऐसी बातें लगातार पब्लिक स्पेस में सहज होती जा रही हैं. सड़क पर भीड़ को इशारा मिल रहा है कि उनकी हिंसा की करतूत को राजनीतिक समर्थन हासिल है. बस किसी को मार कर सेना और आस्था का बहाना बना देना है. जैसे इन दो मसलों के लिए कानून है ही नहीं. क्या आप अपने बच्चों को ऐसी भीड़ में भेजना चाहेंगे जो किसी भी बहाने किसी की हत्या के लिए तैयार हो.

27 जुलाई को ही वन रैंक वन पेंशन को लेकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कह दिया कि वह अपने फॉर्मूले की दोबारा समीक्षा नहीं करेगी. जो तय हो चुका है उसमें कुछ नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे वित्तीय दबाव बढ़ जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि चार हफ्ते के भीतर याचिकाकर्ता को लिखित रूप में जवाब दे. सेना से ही रिटायर हुए लोगों के संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है. इनका कहना है कि सरकार ने जो वन रैंक वन पेंशन योजना लागू है वो कोशियारी कमेटी के सुझावों के अनुसार नहीं है. कोशियारी भी बीजेपी के ही सासंद है. 

सेवानिवृत सैनिक और अर्धसैनिक अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहते हैं. हाल ही में अर्धसैनिक बलों के पूर्व जवानो ने दिल्ली में पेंशन और वेतन में बराबरी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था. वन रैंक वन पेंशन की मांग की. बासवन गौड़ा पाटिल क्यों नहीं इनकी लड़ाई लड़ते हैं. इनके नाम पर किसी को गोली मार देने की बात कर सकते हैं तो इनकी मांगों के समर्थन करने से क्या पर्दा है.

यूपी के अंबेडकरनगर से सांसद हैं हरि ओम पांडेय. इनका बयान आप सुनिये. पांच साल सांसद के रूप में पूरे करने जा रहे हैं, देश की समस्या के बारे में जो इनका अनुभव हुआ है वो भी जान लीजिए. सासंद जी बलात्कार के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं. सबसे ज्यादा बलात्कार के मामले, यौन शोषण के मामले घरों में होते हैं और घर के लोग करते हैं. यह बात सरकारी रिपोर्ट से लेकर तमाम तरह के शोध में दर्ज है. मगर सांसद जी बता रहे हैं कि तमाम देशों के लोग पलायन करके हमारे देश में आ जाते हैं, जिसके कारण अराजकता, अत्याचार, बलात्कार बढ़ रहा है. एक विशेष जाति की तरफ इशारा कर रहे हैं. आबादी को लेकर. हमारे सांसद विधायक बेहतर है जनता की समस्या के करीब जाएं.

इस वक्त रेलवे की परीक्षा देने वाले 47 लाख से अधिक छात्रों में हाहाकार मचा हुआ है. इस 9 अगस्त से पदों के लिए अस्सिटेंट लोको पायलट और टेक्निशियन के 26,502 पदों की परीक्षा होने जा रही है. चार दिन पहले एडमिट कार्ड जब डाउनलोड हुआ तब छात्रों के होश उड़ गए कि परीक्षा का केंद 1000 से 1500 किमी दूर दिया गया है. बिहार के कटिहार के छात्रों को मोहाली जाना होगा, आरा के छात्रों को भुवनेश्वर और हैदराबाद जाना होगा और बक्सर के छात्रों को चेन्नई जाना होगा. आपको लगेगा कि यह सामान्य बात है, थोड़ा इंतज़ार कीजिए. 

रेल मंत्री को छात्र लगातार ट्वीट कर रहे हैं. जिसमें बता रहे हैं कि मैं राजस्थान का छात्र हूं. अमृतसर सेंटर पड़ गया है. क्या इतनी दूर सेंटर देना ज़रूरी था. बिहार के कटिहार से एक परीक्षार्थी ने बताया कि उसका सेंटर मोहाली पड़ा है. वहां से चंडीगढ़ के लिए हफ्ते में एक दिन ट्रेन जाती है. अगर परीक्षा से चार दिन पहले चलेगी तो चार दिन पहले निकलना होगा या फिर ट्रेन बदल बदल कर मोहाली पहुंचना होगा, जिसका खर्चा बढ़ जाएगा. कटिहार से मोहाली का एक तरफ का किराया 620 रुपये है. वापसी का टिकट नहीं मिल रहा है. वहां रहने का खर्चा अलग होगा. रेलवे की टाइमिंग का भरोसा नहीं इसलिए दो तीन दिन पहले निकलना होगा. ये सब खर्चे और समय का हिसाब रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड ने क्यों नहीं किया. क्या इसलिए किया गया है ताकि बड़ी संख्या में छात्र पहुंच ही न सकें और परीक्षा छूट जाए. 
आरा से एक छात्र ने बताया कि उसका सेंटर भुवनेश्वर है. उसे पहले हावड़ा जाना होगा, वहां से भुवनेश्वर. वापसी का टिकट भी लेना है. ठहरने का खर्चा अलग, कुल मिलाकर 2000 से 3000 का खर्चा आ जाएगा. अंशु ने रेल मंत्री को टैग कर लिखा है कि सर मैं बिहार का छात्र हूं. मेरा एएलपी का सेंटर हैदराबाद पड़ा है. आने जाने का खर्च ही 1500 है. ये सभी छात्र जनरल में सफर करने वाले हैं. साधारण घरों के लड़के लड़कियां हैं. 1500-2000 किमी दूरी पर इम्तेहान के केंद्र देने का क्या मतलब है. रेलवे परीक्षार्थियों में हाहाकार मचा हुआ है. रेल मंत्री ध्यान नहीं दे सकते तो प्रधानमंत्री को तुरंत इस बात का नोटिस लेना चाहिए.

अभय चौधरी ने लिखा है कि पटना के छात्र का सेंटर जबलपुर पड़ा है. आने जाने में ही 2000 रुपये खर्च हो जाएंगे. बात खर्च की नहीं है, किसी को टिकट नहीं मिल रहा है. जनरल बोगी में लदा फदा कर जाने से इनकी स्थिति भी बिगड़ेगी. ये कैसे इम्तेहान देंगे. संजीत कुमार ने लिखा है कि सर मेरा सेंटर मध्य प्रदेश के सागौर पड़ा है. बिहार से सिर्फ एक ट्रेन जाती है 13423 वो भी हफ्ते में एक बार. कम से कम मेरी परीक्षा की तारीख तो उसके हिसाब से हो. मणिरत्नम तिवारी ने ट्वीट किया है कि विद्यार्थियों के साथ धोखा मत कीजिए. पैसे के अभाव में मैं एक्ज़ाम सेंटर तक नहीं पहुंच पाऊंगा. क्योंकि बिहार के भागलपुर में रहने वाले विद्यार्थियों का सेंटर मोहाली दे दिया है. 400 रुपया ही रख लीजिए सीधा, ग़रीब का खून चूस कर. सनी सिंह ने ट्वीट किया है कि सर आप बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं. पर ये क्या सर, परीक्षा दे नहीं सकते दूसरे राज्य में, तीन हज़ार खर्च नहीं सकते, सर मेरी मेहनत और सारे सपनों पर पानी फिर जाएगा. दूसरे राज्य सर, नहीं संभव हो पाएगा. संतोष सिंह का ट्वीट है कि माननीय रेल मंत्री जी, बेरोज़गारों के साथ यह कैसा अन्याय, पहले फॉर्म के 500 और अब परीक्षा देने के 4000 का खर्च, मंत्री जी पैसा न लौटाना पड़े इसलिए परीक्षा कें 1500 किमी. वाह मंत्री जी वाह. 

रेल मंत्री और रेल मंत्रालय को इन छात्रों की बात पर ध्यान देना चाहिए. ये वाकई साधारण परिवारों के बच्चे हैं. किसी के मां बाप ठेला चलाते हैं तो किसी के मां बाप कलकत्ता में गोलगप्पा बेचते हैं. ऐसे परिवारों के बच्चों को दो से तीन हज़ार खर्च कर अपने ज़िले से चेन्नई जाना पड़े, मोहाली जाना पड़े, हैदराबाद जाना पड़े, थोड़ी ज्यादाती है. यूपी का सोनभद्द बेहद गरीब इलाका है. यहां के छात्र का सेंटर मोहाली पड़ेगा तो वे 1500 से 2000 का ख़र्च नहीं उठा सकेंगे. जब परीक्षा ऑनलाइन हो रही है तब फिर इधर से उधर सेंटर देने का क्या मतलब है. फिर ऑनलाइन का क्या मतलब रह जाता है. कुछ लड़कों ने तो लिखा है कि उनके पास पैसे नहीं है. या तो बिहार के मुख्यमंत्री को इन सभी छात्रों को 2-2 हज़ार देना चाहिए या फिर उन्हें भी रेल मंत्री से बात करनी चाहिए कि ग़रीब छात्रों के साथ ऐसे क्यों हो रहा है और ऐसा कैसे हो सकता है.

एक छात्र आरा से हैदराबाद जा रहा है उसे 3000 का खर्च आ रहा है. छात्र बहुत मैसेज कर रहे हैं. 9 अगस्त से परीक्षा शुरू होनी है. अगर राज्यों के मुख्यमंत्री रेल मंत्री से बात कर इन छात्रों का किराया माफ करवा दें तो मैं बिल्कुल इसका श्रेय नहीं लूंगा. बल्कि मैं इसका श्रेय उन्हीं को दूंगा. आप यकीन कीजिए इन्हें दिक्कत न होती तो ये नहीं लिखते. बहुत से छात्रों का इम्तहान छूट जाएगा. चार-चार साल लगाकर तैयारी की है इन लोगों ने. 

उधर, 20 जुलाई से ट्रकों की हड़ताल चल रही है. इसके कारण न माल उठ रहा है न कहीं पहुंच रहा है. सोसायटी ऑफ इंडियन आटोमोबिल ने कहा है कि हड़ताल के कारण गाड़ियों की सप्लाई बंद हो गई है. The All India Motor Transport Congress (AIMTC) ने हड़ताल बुलाई है. इनकी मांग है कि डिज़ल पर टैक्स की कमी की जाए, पेट्रेल और डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए. सीपीएम और AIADMK ने भी सरकार से कहा है कि ट्रक वालों से बात कर समाधान निकाला जाना चाहिए. क्योंकि हड़ताल के कारण चीज़ों के दाम बढ़ सकते हैं और कई छोटे मोटे व्यापारी जो रोज़ के आमद पर निर्भर होते हैं, उन्हें काफी नुकसान हो सकता है. बल्कि हो ही रहा है. All India Motor Transport Congress (AIMTC), का दावा है कि 93 लाख ट्रक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं. ट्रक ऑपरेटर टोल टैक्स के नाम पर अवैध वसूली का भी विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है टोल टैक्स कम भी किया जाना चाहिए. इस हड़ताल का एलान 17 मई को ही कर दिया गया था. इनकी प्रेस रिलीज के अनुसार हड़ताल 70-80 फीसदी सफल है और इससे उद्योगों को 30,000 करोड़ का घाटा हो चुका है. सरकार से कई बार बातचीत की मगर कोई नतीजा नहीं निकला है.

ट्रक हड़ताल से जुड़े लोग एक मैसेज वायरल कर रहे हैं कि एक सप्ताह से हड़ताल चल रही है मगर कोई टीवी मीडिया नहीं दिखा रहा है. किसने दिखाया किसने नहीं दिखाया इस पर दावे के साथ नहीं कह सकता मगर ऐसे मैसेज वायरल करने वालों को एक सवाल खुद से पूछना चाहिए. वे न्यूज़ चैनलों पर क्या देखते हैं. हिन्दू मुस्लिम डिबेट में मज़ा आता है या 2018 के जुलाई में 2019 की मई में कौन जीतेगा. इस चर्चा को देखने में उलझे रहते हैं. अगर वे ऐसे कार्यक्रमों को देखेंगे, बढ़ावा देंगे तो फिर कैसे उम्मीद करते है कि जब वे हड़ताल पर जाएंगे तो चैनल पर पत्रकारिता होने लगेगी. चैनल क्या दिखाते हैं इस पर उनका बस नहीं है मगर इस पर तो उनका बस है कि वे घर पहुंच कर रात में या दोपहर में चैनलों पर क्या देखते हैं. जो देखते हैं क्या वो पत्रकारिता है. 

अगर चैनल वाले पत्रकारिता कर रहे होते तो जनता मुर्गा बनकर अपनी मांग उठाने के लिए मजबूर नहीं होती. इन लोगों का कहना है कि फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया उनकी परीक्षा लेकर अंतिम परिणाम नहीं निकाल रहा है, जिसके कारण उनकी ज्वाइनिंग हो सके. दिसंबर में परीक्षा हुई थी, मार्च में रिज़ल्ट आ गया. ये लोग राजस्थान के हैं और गुजरात रीजन के लिए चुने गए हैं. इसी 11 फरवरी को इम्तेहान हुआ था. 15 और 16 अप्रैल को शारीरिक परीक्षा भी हो गई, लेकिन अप्रैल से जुलाई बीत गया मगर फाइनल रिज़ल्ट नहीं निकल रहा है. इन नौजवानों से भी पूछिए कि वे चैनलों पर पत्रकारिता देखते हैं या हिन्दू मुस्लिम डिबेट देखते हैं. मेरे पास इतनी समस्याएं आ गईं हैं कि दिन भर मना करने में निकल जाता है क्योंकि मैं सभी स्टोरी कर ही नहीं सकता. मीडिया का काम है जनता की बात सरकार तक पहुंचाना लेकिन आप कोई भी चैनल खोल कर देखिए. वहां क्या चल रहा है. कब तक जनता टीवी में आने के लिए और अखबार में छपने के लिए बाल मुड़ाएगी और मुर्गा बनेगी.