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दिल्ली में अधिकारों को लेकर खींचतान अब ख़त्म होगी?

दिल्ली को राज्य तो नहीं मिला मगर कौन राज करेगा उसका हिसाब आज साफ हो गया.

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दिल्ली में अधिकारों को लेकर खींचतान अब ख़त्म होगी?

दिल्ली को राज्य तो नहीं मिला मगर कौन राज करेगा उसका हिसाब आज साफ हो गया. लेफ्टिनेंट गवर्नर के सहारे दिल्ली सरकार न चलने देने का जो खेल दो साल से चला है, उस खेल को सही ठहराने के तमाम तर्कों के कंकाल आपको टीवी चैनलों के आर्काइव में मिल जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले से भले कुछ न बदले ऐसा कहने वाले वही कह सकते हैं, जिन्हें अब भी भरोसा है कि कभी विधायकों की सदस्यता खत्म करने की चाल से तो कभी गवर्नर के बहाने दिल्ली में खेल अब भी खेला जाएगा. फिर भी लंबे समय के लिए दिल्ली के संवैधानिक आसमान पर छाई धुंध छंट गई है. अब दिल्ली का वक्त इस सवाल को लेकर बर्बाद नहीं होगा कि मुख्यमंत्री सरकार चलाएंगे या लेफ्टिनेंट गवर्नर.

पिछले दो साल से यही लगता रहा कि लेफ्टिनेंट गर्वनर ही सरकार हैं और चुन कर आए मुख्यमंत्री उनकी सरकार के सामने मात्र फरियादी. पहले यही समझाया जाता रहा कि मुख्यमंत्री को एलजी के हिसाब से काम करना होगा, मगर पांच जजों की संविधान पीठ ने साफ-साफ कह दिया है कि चुनी हुई सरकार लोकतंत्र में अहम है इसलिए, मंत्रीपरिषद के पास फैसले लेने का अधिकार है. भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण की खंडपीठ ने बहुमत से फैसला देते हुए कहा कि है कि दिल्ली के उपराज्यपाल प्रशासक हैं, राज्यपाल नहीं हैं.


कोर्ट ने कहा, उपराज्यपाल के पास ख़ुद फ़ैसले लेने का अधिकार नहीं है. उपराज्यपाल के पास प्रशासन का स्वतंत्र अधिकार नहीं है. उपराज्यपाल मंत्रीमंडल के फैसले लेने की प्रक्रिया में बाधा नहीं डाल सकते. उपराज्यपाल उन शक्तियों को नहीं हड़प सकते जो संविधान में उन्हें नहीं दी गई है. हर मामले में उपराज्यपाल की सहमति ज़रूरी नहीं है. राज्य को बिना किसी दखल के काम करने की आज़ादी हो. उपराज्यपाल को मंत्रिपरिषद के साथ सदभावनापूर्ण तरीके से काम करना चाहिए. उपराज्यपाल और कैबिनेट के बीच राय के अंतर को आपसी चर्चा से सुलझाएं. उपराज्यपाल मेकेनिकल तरीके से सारे मामले राष्ट्रपति को नहीं भेजेंगे. उपराज्यपाल मशीनी तरीके से फैसलों को नहीं रोक सकते हैं. सरकार के प्रतिनिधियों को सम्मान दिया जाना चाहिए.

इस फैसले के बाद उपराज्यपाल के दिमाग़ में यह बात साफ हो जानी चाहिए कि वे दिल्ली के उपराज्यपाल तो हैं मगर दिल्ली उनकी नहीं हैं. जनता ने उन्हें नहीं चुना है, बल्कि उनका चुनाव कैसे हुआ है, ये बेहतर वही जानते हैं. दो-दो उपराज्यपालों के ज़रिए दिल्ली की चुनी हुई सरकार को गर्वनर के मातहत काम करने वाली सरकार बनाने का खेल खेला गया है. उम्मीद है खिलाड़ी अब कुछ दूसरा खेल खेलेंगे, ये वाला बंद कर देंगे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ होता है कि दिल्ली की जनता ने इंडिया गेट पर तफ़रीह करते हुए विधायकों को नहीं चुना था कि वोट देंगे राजनीतिक दल को और राज करेंगे उपराज्यपाल.

सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि भूमि, पुलिस और कानून व्यवस्था पर केंद सरकार का अधिकार है. इन मामलों को छोड़कर लेफ्टिनेंट गवर्नर को दिल्ली सरकार की राय मानने के लिए बाध्य हैं. उसकी मदद लेने के लिए बाध्य हैं. दिल्ली सरकार को अन्य मामलों में कानून बनाने और प्रशासन करने की इजाज़त दी जानी चाहिए. संविधान की किताब पलटिए, सुप्रीम कोर्ट ने वही कहा जो संविधान में शब्दश कहा गया है. 239 ए में साफ साफ लिखा है कि उपराज्यपाल को उन विषयों के संबंध में जिनकी बाबत विधानसभा को विधि बनाने की शक्ति है, अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जो विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 10 प्रतिशत से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी. जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा.मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरादायी होगी.

पता नहीं लेफ्टिनेंट गवर्नर ने संविधान की कौन सी किताब पढ़ ली थी, जिसमें लिखा था कि प्रधान मुख्यमंत्री उपराज्यपाल होगा. आज सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ ने संविधान की सही किताब और सही व्याख्या पकड़ा दी है. फाइलों को लेकर काफी विवाद हुआ था. हाल ही में एलजी के दफ्तर में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री ने धरना दिया था, उपराज्यपाल मिलने तक नहीं आए. इस फैसले में लिखा है कि किसी मुद्दे पर मतभेद होने पर उपराज्यपाल अपने पास फाइल नहीं रख सकते थे, उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजना होगा और ये मतभेद छोटे मोटे मुद्दे पर नहीं होने चाहिए. फैसले में एक जगह साफ-साफ लिखा है कि मंत्रिपरिषद द्वारा लिए गए कार्यकारी फैसले पर उप राज्यपाल को पर्याप्त शक्ति है कि असहमति की स्थिति में राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेज दें, लेकिन संवैधानिक योजना यह कभी नहीं कहती है कि मंत्रिपरिषद को अपने फैसले के लिए उपराज्यपाल की सहमति लेनी होगी.

विघानसभा चुने हुए प्रतिनिधियों के मत का प्रतिनिधित्व करती है, उनके मत और फैसले का हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए. उप राज्यपाल को सभी फैसले और प्रस्तावों की सूचना दी जानी चाहिए, ताकि संवाद बना रहे, लेकिन इस संवाद का यह मतलब नहीं है कि उपराज्यपाल की मंज़ूरी लेनी है. 

एक ही संविधान है. उसमें लिखी हुई बातें भी स्थायी रूप से छपी हैं. इसके बाद भी दो साल पहले अगस्त 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट की व्याख्या और 2018 में सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या में ज़मीन आसमान का अंतर है. ऐसा कैसे हो सकता है कि संविधान की समझ में इतना अंतर आ सकता है. 4 अगस्त 2016 के अपने फैसले में जस्टिस जयंत नाथ ने लिखा है कि दिल्ली सरकार का कहना है कि दिल्ली के उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह मानने के लिए बाध्य हैं, उन मामलों में जिनमें विधानसभा को 239 ए के उपबंध (3)(a) के तहत कानून बनाने का अधिकार हासिल है. इसमें कोई दम नहीं है और स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

मैं आपको उस वक्त के अखबारों की सुर्खियां भी दिखाना चाहता हूं ताकि आप दर्शक बुनियादी रूप से यह बात समझ लें कि संविधान की व्याख्या जजों की अपनी-अपनी समझ पर भी निर्भर करती है. वरना यह कैसे हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ भी मानती है कि दिल्ली यूनियन टेरीटरी है, हाईकोर्ट भी मानता है कि दिल्ली यूनियन टेरिटरी है. मगर हाईकोर्ट कहता है कि एलजी बॉस हैं, सुप्रीम कोर्ट कहता है कि मुख्यमंत्री बॉस हैं. 

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इन सारी हेडलाइन को आप देखिए याद कीजिए उन दिनों को जब टीवी की बहस में यह दिखाया गया और अखबारों में यह छपा कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार का मुखिया कोई हैसियत ही नहीं रखता है. हाईकोर्ट के फैसले में लिखा है कि सर्विसेज के मामले में लेफ्टिनेंट गवर्नर केंद सरकार की तरह एक्ट कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा जाता है कि जिन तीन चार मामलों में दिल्ली विधानसभा का अधिकार नहीं बनता है, उसके अलावा लेफ्टिनेंट गवर्नर का कोई दखल नहीं बनता है. वे प्रशासक हैं, राज्यपाल नही हैं.

दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है, ये फैसला पहले की संविधान पीठ ने भी दिया है और इस संविधान पीठ ने भी दिया, मगर आज के फैसले के बाद से उपराज्यपाल की सीमा साफ हो गई है. मुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री होने का अधिकार मिला है. जब-जब अरविंद केजरीवाल ने इस दखलंदाज़ी का विरोध हुआ, वे इस प्रोपेगैंडा के शिकार हुए कि दिल्ली का काम नहीं कर रहे हैं. बहाने बना रहे हैं. अब साफ हो गया कि काम जिसे करना था उसे नहीं करने दिया जा रहा था और जिसे नहीं करना वो करने की कोशिश कर रहा था या काम ही नहीं होने दे रहा था.



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