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आप को महंगी न पड़े आपकी अराजकता

अराजकता कई बार आकर्षक होती है। जब वह किसी जड़ता के व्यवस्थागत संरक्षण को तोड़ती है, जब वह गुज़रे ज़मानों के क़ानूनों को अंगूठा दिखाती है, जब वह विरोध में जेल जाने और गोली खाने का दुस्साहस दिखाती है तो वह बदलाव का रास्ता खोलती है, क्रांति का बिगुल बन जाती है।

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आप को महंगी न पड़े आपकी अराजकता
अराजकता कई बार आकर्षक होती है। जब वह किसी जड़ता के व्यवस्थागत संरक्षण को तोड़ती है, जब वह गुज़रे ज़मानों के क़ानूनों को अंगूठा दिखाती है, जब वह विरोध में जेल जाने और गोली खाने का दुस्साहस दिखाती है तो वह बदलाव का रास्ता खोलती है, क्रांति का बिगुल बन जाती है। लेकिन अराजकता शासन का मूल्य बन जाए, सरकार चलाने की रणनीति बन जाए, राजनीतिक दल की विचारधारा बन जाए तो वह फिर ख़तरनाक हो उठती है। कई बार अंदेशा होता है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ऐसी ही अराजकता की शिकार हो रही है।

आम आदमी पार्टी की इस अराजकता का सबसे नया उदाहरण मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास पर दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ हुई बदसलूकी है। यह सच है कि हमारी विशेषाधिकारसंपन्न अफ़सरशाही ख़ुद को सर्वोपरि मानती है। वह यथास्थिति बनाए रखना चाहती है। वह उस औपनिवेशिक विरासत की देन है जिसमें अफ़सर को जनता का मालिक माना जाता है और जनता को क़ायदे-कानून के तहत रखना उसका काम माना जाता है।

लेकिन  इस अफ़सरशाही का मुक़ाबला क्या हम सड़कछाप मारपीट से करेंगे? हमारी आज़ादी की लड़ाई का जनादेश साफ़ है- आंदोलन या बदलाव के लिए किसी तरह की हिंसा जायज़ नहीं है। 1922 के चौरीचौरा कांड के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। असेंबली में बम फेंकने वाले भगत सिंह ने भी कहा था कि उनका बम किसी की हत्या के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश राज के बहरे कानूनों को सुनाने के लिए धमाका करने की युक्ति भर था। हमारे यहां कई तरह के हिंसक आंदोलन- अपने बहुत साफ़-सुथरे मक़सद के बावजूद इसलिए ख़त्म हो गए क्योंकि जनता ने उन्हें व्यापक समर्थन नहीं दिया। इसके विपरीत इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के ख़िलाफ़ जनता ने जो अहिंसक लड़ाई लड़ी, उससे तख़्तापलट हो गया। खुद आम आदमी पार्टी का आंदोलन अपनी सारी अराजकता के बावजूद इसलिए परवान चढा कि उसमें हिंसा और मारपीट के लिए जगह नहीं थी।

हालांकि आंदोलन के दिनों में भी यह बात दिखती थी कि केजरीवाल और उनके समर्थकों के भीतर बदलाव की चाहत तो है- भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और बराबरी के लिए लड़ने का इरादा तो है, लेकिन इसका कोई वैचारिक नक्शा नहीं है। भारतीय राजनीति में यह चाहत भी इतनी कम बची है कि लोगों ने केजरीवाल के आंदोलन को हाथों-हाथ लिया और उन्हें दिल्ली सौंप दी।

लेकिन दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी केजरीवाल उसे आंदोलनकारी की तरह ही चलाना चाहते हैं। यही नहीं, उनके सरकारी और सांगठनिक फ़ैसलों के पीछे उनके निजी पूर्वग्रहों की छाया भरपूर दिखाई पड़ती है। हाल के दिनों में वे जिस तरह अपने विधायकों का बचाव करते देखे गए हैं, वह उनकी पुरानी छवि के साथ मेल नहीं खाता। वे जिस साहस के साथ दूसरों पर आरोप लगाते हैं, उससे कहीं ज़्यादा दुस्साहस के साथ अपने लोगों का बचाव करते हैं।

शायद यही वह कार्यसंस्कृति है जिसकी वजह से दिल्ली में बहुत सारी सकारात्मक पहलक़दमियों के बावजूद उनकी सरकार लगभग पूरे तंत्र से उलझी दिखाई पड़ती है। चुनाव आयोग उनके विधायकों पर कार्रवाई करता है तो यह भी बीजेपी की साज़िश होती है और मुख्य सचिव उन पर मारपीट का आरोप लगाते हैं  तो यह भी बीजेपी की ही साज़िश है। इस पूरी कार्य संस्कृति में आत्मचिंतन के लिए जगह नहीं है, ख़ुद पर संशय करने का अवकाश नहीं है।

अगर होता तो केजरीवाल न सिर्फ अंशु प्रकाश का बचाव करते, बल्कि आगे बढ़कर अपने विधायकों के दुर्व्यवहार के लिए उनसे माफ़ी मांगते। बताया जा रहा है कि जिस बैठक में यह बदसलूकी हुई, वह केजरीवाल सरकार के विज्ञापनों पर उठे विवाद को लेकर की गई थी। यह सवाल पहले भी उठता रहा है कि एक चुनी हुई सरकार को इतने सारे विज्ञापनों की ज़रूरत क्यों पड़ रही है। सरकार का जवाब था कि वह लोगों तक सरकार का काम पहुंचाना चाहती है। लेकिन जिस पार्टी को बिना संसाधनों के, बिना विज्ञापनों के दिल्ली में 67 सीटें मिलीं, उसके कार्यकर्ता कहां चले गए? क्या वे अब जनता से दूर हो गए हैं? या वे यह मानने लगे हैं कि चूंकि अब उनकी सरकार है, इसलिए उन्हें भी इसके प्रचार के लिए पैसा मिलना चाहिए? 

अगर ये कार्यकर्ता पार्टी के साथ बने होते, अगर पार्टी के विधायक अपने मतदाताओं के साथ जुड़े होते तो उन्हें न विज्ञापनों की ज़रूरत पड़ती न अफ़सरों पर सहारे की या उनके साथ बदसलूकी की। यही नहीं आप के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने पर पूरी दिल्ली खड़ी हो गई होती। आखिर उनके चुने हुए जन प्रतिनिधियों को इतनी आसानी के साथ कैसे हटाया जा सकता है?

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लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। संदेश साफ़ है- आप जिस क्रांति का भरोसा देकर ख़ड़ी हुई थी, उस पर शायद उसे ही भरोसा नहीं रह गया है। राजनीति की अलग संस्कृति बनाने की बात करने वाली पार्टी वे सारे तौर-तरीक़े सीख रही है जो दूसरी जगहों पर दिखाई पड़ते हैं। यही वजह है कि जनता अब उन्हें उसी उदासीनता से देखने लगी है जैसे दूसरों को देखती है और उसके विधायक वैसा ही अराजक व्यवहार कर रहे हैं जैसा दूसरे करते हैं। 

केजरीवाल इस संस्कृति को नहीं बदलेंगे तो लोग उन्हें बदल डालेंगे। 


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