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राहुल का उपवास या उपवास का उपहास?

राहुल गांधी राजघाट पर एक बजे अनशन के लिए पहुंचे. थोड़ी देर बाद उनका अनशन ख़त्म हो गया. अनशन का अंतराल बस उतना ही था जितना नाश्ते और खाने के बीच होता है.

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राहुल का उपवास या उपवास का उपहास?
क्या एक घंटे या चंद घंटों के उपवास को उपवास मानेंगे? दलित उत्पीड़न के विरुद्ध देश भर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं से उपवास रखने की अपील करने वाले राहुल गांधी राजघाट पर एक बजे अनशन के लिए पहुंचे. थोड़ी देर बाद उनका अनशन ख़त्म हो गया. अनशन का अंतराल बस उतना ही था जितना नाश्ते और खाने के बीच होता है या खाने और शाम के नाश्ते के बीच. यह अनशन नहीं, अनशन का मज़ाक था. इस ढंग से तो पूरा हिंदुस्तान अनशन करता है. कुछ लोग तो रोज़ इससे भी लंबा उपवास रखते हैं. इस मजाक से जुड़ी त्रासदी को समझना हो तो याद करना उचित होगा कि कुछ को उनकी जीवन स्थितियां दिन भर के अनशन के लिए मजबूर करती हैं. इस देश के करोड़ों बच्चे रोज़ रात को भूखे सोते हैं.

चंद घंटों का यह अनशन इन सबका अपमान था. इससे ज्यादा वह उपवास की उस धारणा का अपमान था जो गांधी ने जोड़ी थी. गांधी जी का उपवास किसी राजनीतिक प्रदर्शन या प्रतिशोध के लिए नहीं होता था. वे अपनी बात मनवाने के लिए अनशन नहीं करते थे. उपवास उनके लिए आत्मशुद्धि का यज्ञ था. इस बात को उन्होंने एक बार नहीं, बार-बार दुहराया था. उनका पूरा राजनीतिक जीवन ऐसे ही उपवासों से पटा पड़ा था. आख़िरी उपवास उन्होंने मृत्यु से कुछ रोज़ पहले किया था. 

13 जनवरी, 1948 को यह उपवास शुरू करने से पहले उनकी ओर से एक वक्तव्य जारी किया गया. उन्होंने कहा था, 'मैं उम्मीद करता हूं कि मुझमें उपवास करने लायक पवित्रता होगी. उपवास कल सुबह (मंगलवार) पहले खाने के बाद शुरू होगा. उपवास कब तक चलेगा, यह अनिश्चित है. नमक या खट्टे नींबू के साथ, या इन चीज़ों के बिना पानी पीने की छूट मैं लूंगा. मैं अपना उपवास तब तोड़ूंगा जब मुझे यक़ीन हो जाएगा कि सब क़ौमों के दिल मिल गए हैं और वह बाहर के दबाव के कारण नहीं, बल्कि अपना धर्म समझने के कारण ऐसा कर रहे हैं.' साफ है कि गांधी जी किसी पर दबाव नहीं बना रहे थे. जनता से उनकी अपेक्षा थी कि वह अपने-आप को बदले और अंततः अपने अंतःकरण को इतना शुद्ध करे कि उसमें इस झगड़े की गुंजाइश नहीं रह जाए. इसके लिए गांधी जी ख़ुद को भी कसौटी पर कसते थे. 

यही वजह थी कि गांधीजी के अनशन को यह देश बिल्कुल अपनी देह पर महसूस करता था. उनके साथ इस अनशन पर हज़ारों लोग बैठ गए. अगले चार दिन तक उनकी अपील को लेकर जगह-जगह सभाएं चलती रहीं. 18 तारीख़ को अलग-अलग हिंदू और मुस्लिम संगठनों के सौ से ज़्यादा लोग उनसे मिले. इसके बाद उन्होंने उपवास तोड़ा. गांधी की यह निष्ठा उनको बिल्कुल पूरी सेना के बराबर बनाती थी. 1947 के जलते दिनों में वे आज़ादी का जश्न बनाने के लिए दिल्ली में नहीं, ज़ख़्मों पर मलहम लगाने के लिए बंगाल में थे. उनकी भूमिका को लेकर माउंटबेटन ने उनको तार किया था, 'प्रिय गांधी जी, पंजाब में हमारे पास 55,000 सैनिक थे और बड़े पैमाने पर दंगे हुए. बंगाल में हमारी ताक़त बस एक आदमी की थी और दंगे नहीं हुए.'

बहरहाल, मौजूदा अनशन पर लौटें. दलितों के विरुद्ध अत्याचार के सवाल पर उपवास की राजनीति अपने-आप में बुरी नहीं है. लेकिन इस उपवास के लिए ज़रूरी था कि कांग्रेस या राहुल गांधी यह भरोसा दिलाएं कि वे इस उपवास और दलित उत्पीड़न को लेकर संजीदा हैं. राहुल ने इसके पहले कई अवसरों पर दलित-संघर्ष के प्रति अपने संवेदनशीलता जाहिर की है. यही नहीं, दलित उत्पीड़न के मामलों में वे अपनी सरकारों को भी घेरते रहे हैं. मिर्चपुर में दलितों के घर जलाए जाने पर उन्होंने हरियाणा के दलित विधायकों से बात की और अपनी ही तत्कालीन सरकार के लिए असुविधाजनक स्थितियां पैदा कर दीं. हाल में संपन्न हुए गुजरात चुनावों में भी कांग्रेस ने दलित एजेंडा साथ लिया और जिग्नेश मेवाणी के लिए सीट छोड़ी. 

इस बार भी एससी-एसटी ऐक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई ढिलाई के तत्काल बाद कांग्रेस सक्रिय हुई और उसने सरकार से पुनर्विचार याचिका दायर करने की मांग की. कुल मिलाकर यह नज़र आता है कि दलितों के उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ाई में नेतृत्व के स्तर पर वह पहले से कहीं ज़्यादा ईमानदार है. सोमवार का राष्ट्रव्यापी अनशन भी कांग्रेस की इसी दलितोन्मुख राजनीति का ही विस्तार था. लेकिन राजघाट पर अनशन के नाम पर जो तमाशा हुआ, उसने याद दिलाया कि कांग्रेस को अपनी कार्यशैली और कार्यसंस्कृति को फिर से बदलने की ज़रूरत है. हर विरोध या प्रदर्शन को सिर्फ़ दिखावे और प्रतीक तक बदलने की राजनीति अमूमन आत्महंता साबित होती है. क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि ऐसी राजनीति करने वालों को अपने मक़सद पर ही यक़ीन नहीं है. कांग्रेस ने आज लगभग यही साबित किया. उसके नेताओं ने अनशन से पहले छोले-भटूरे खाए और फिर कुछ घंटे के लिए राजघाट पर बैठ गए. जब सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर वहां पहुंच गए तो उनको मंच से हटाया गया. लेकिन सच यह है कि अब तक कांग्रेस अपने इन दो नेताओं को लेकर अपनी नीति तय नहीं कर सकी है.

कुल मिलाकर इन सबके बीच यह पूरा अनशन एक राजनीतिक तमाशे में बदलता दिखा. बीजेपी भी ऐसे तमाशे करती रही है, लेकिन वह ज़्यादा सयाने तरीक़े से ऐसे काम करती है. कांग्रेस और राहुल अगर वाकई 2019 में बीजेपी को रोकना चाहते हैं तो उन्होंने कहीं ज़्यादा फौलादी इरादे दिखाने होंगे, कहीं बेहतर और सुचिंतित रणनीति पर विचार करना होगा और उपवास भी ऐसा करना होगा जो उपवास की तरह लगे, उपहास की तरह नहीं.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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