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आख़िरकार चले गए नामवर सिंह..

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आख़िरकार चले गए नामवर सिंह..

नामवर सिंह ने आलोचना की एक पूरी संस्कृति खड़ी की जिसमें वाद-विवाद और संवाद की महती भूमिका थी

बीते एक साल से मृत्यु नाम की चील जैसे हिंदी साहित्य के आकाश पर मंडरा रही है. बीते साल 19 मार्च को केदारनाथ सिंह के निधन से लेकर आज, यानी 19 फरवरी को नामवर सिंह (Namvar Singh)के निधन तक हम अपने कई मूर्द्धन्यों को खो चुके हैं. इस तारीख़ को पीछे खिसकाएं तो यह सिलसिला 2017 में कुंवर नारायण और चंद्रकांत देवताले के निधन तक चला जाता है. इस बीच राजकिशोर, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अर्चना वर्मा के नाम बरबस याद आते हैं.

नामवर सिंह को ही शायद इस सिलसिले की कड़ी होना था. क्योंकि यह पूरा युग, जिसमें ये तमाम मूर्द्धन्य हुए, एक तरह से हिंदी साहित्य का नामवर युग है- और यह युग अब पूरा हो चुका है. कायदे से यह 20वीं सदी का वह उत्तरार्द्ध है जिसमें आज़ादी के बाद एक लोकतांत्रिक भारत ने अपने होने और बने रहने की शर्तें गढ़ीं, अपने सोचने और विचार करने के मानक बनाए, अपने शिक्षण संस्थान विकसित किए, अपना मीडिया खड़ा किया.

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निर्माण की इस विराट प्रक्रिया में जिन लोगों ने हाथ बंटाया, उनमें नामवर सिंह (Namvar Singh)भी एक रहे. हिंदी के पुराने पाठ को उन्होंने नई शक्ल दी. छायावाद को प्रगतिशील नज़र से पढ़ना सिखाया. नई कविता के प्रतिमान गढ़े, दूसरी परंपरा की खोज की, आलोचना की एक पूरी संस्कृति खड़ी की जिसमें वाद-विवाद और संवाद की महती भूमिका थी. देश के नए बनते विश्वविद्यालयों में उन्होंने अध्यापन के मानक तैयार किए. सागर और जोधपुर के विश्वविद्यालयों में उनकी कोशिशों का विरोध भी किया गया. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन्होंने भाषा का एक बिल्कुल नया पाठ्यक्रम तैयार किया जो अपनी तरह से अब तक मानक बना हुआ है. करीब सात दशक में पसरे अपने सक्रिय रचनात्मक जीवन में उन्होंने न जाने कितनी पीढ़ियों को पढ़ाया, कितने तेजस्वी आलोचक तैयार किए. आज हिंदी की बौद्धिक परंपरा के कई तेजस्वी नाम सीधे नामवर सिंह से जुड़ते हैं. हिंदी साहित्य में जो वाम, प्रगतिशील और प्रतिरोध की परंपरा है, वह नामवर सिंह की उपस्थिति और उनके सान्निध्य में ही फूली-फली.

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हिंदी की आलोचना परंपरा में जो चीज़ नामवर सिंह को विशिष्ट और अद्वितीय बनाती है, वह उनकी सर्वसुलभ सार्वजनिकता है. वे किन्हीं अध्ययन कक्षों में बंद और पुस्तकों में मगन अध्येता और विद्वान नहीं थे, वे सार्वजनिक विमर्श के हर औजार का जैसे इस्तेमाल करते थे. उन्होंने किताबें लिखीं, अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख लिखे, साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया, व्यावसायिक समूह सहारा समय के प्रधान संपादक बनाए गए और टीवी पर भी साहित्य चर्चा में हिस्सा लेते रहे. इस सर्वसुलभता के अपने दुष्परिणाम भी थे जिसके छींटे नामवर जी के दामन पर यदा-कदा दिखते थे, लेकिन यह शायद उस सार्वजनिकता का अनिवार्य बाई-प्रोडक्ट था जिसके जरिए उन्होंने हिंदी का एक विराट मानस तैयार किया. नए लोगों को पढ़ने, उनकी किताबों पर बोलने, उनके कार्यक्रमों में जाने में नामवर कभी हिचक नहीं दिखाते रहे.

हिंदी के संभवतः हर लेखक के पास नामवर सिंह से जुड़े अनुभव होंगे. मेरे पास भी हैं. 1993-94 में मैंने जनसत्ता में लिखना शुरू किया था, 1996 में वहां नौकरी शुरू की. मैं संपादकीय लिखा करता था. नामवर जी उन संपादकीयों  को बहुत पसंद करते थे. उन्होंने पता किया कि यह संपादकीय कौन लिखता है. इसके बाद मेरी कुछ टिप्पणियां भी उन्होंने देखीं. जब पहली बार उनसे मुलाकात हुई तो वे मेरे बारे में सारी सूचनाओं से लैस थे. यह मुझ पर उनकी कोई अलग कृपा नहीं थी, उनका स्वभाव था. वे युवा लोगों को पढ़ने और जानने में जुटे रहते थे. बाद में मेरे पहले कहानी संग्रह 'उसके हिस्से का जादू' के लोकार्पण के अवसर पर वे आए. उन्होंने कुछ कहानियों की आने वाले दिनों में भी चर्चा की. 2008 में मैं पुस्तक मेले से एक कार्यक्रम पुस्तकों पर कर रहा था. मेरे आग्रह पर नामवर जी उस कार्यक्रम में शामिल हुए. यह सिलसिला आने वाले दिनों और कई दूसरे मौक़ों पर भी जारी रहा. वे जब भी मिलते, असीम उत्साह से मिलते और हमेशा कुछ नया लिखने का आग्रह करते.

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यह वह दौर था जब नामवर जी लिख नहीं बोल रहे थे. टीवी पर उन्होंने साप्ताहिक पुस्तक चर्चा शुरू की. पहले मुकेश कुमार और फिर मदन कश्यप के साथ हर हफ़्ते एक किताब की चर्चा करते. हिंदी के संसार में अचानक यह कार्यक्रम महत्वपूर्ण हो उठा. नामवर जी जिस किताब पर पांच मिनट बोल देते, उसका लेखक कृतकृत्य हो उठता. यह सच है कि नामवर जी हाल के वर्षों में लगातार शिथिल पड़ते जा रहे थे. उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था, उनकी स्मृति उनका साथ नहीं दे रही थी. इस लिहाज से युग का अवसान पहले ही शुरू हो चुका था. 93 साल को छूती उम्र में उन्होंने सिर पर चोट खाई थी और मृत्यु से लोहा ले रहे थे. सबको मालूम था कि अब बहुत दिनों तक उनका सथ नहीं मिलना है.

लेकिन जब मृत्यु पर्दा गिरा चुकी है तब शोक से ज़्यादा एक रिक्ति का एहसास है. यह एहसास इस बात से कुछ और बड़ा हो गया है कि यह दौर लगातार विचारविहीन बर्बरता की तरफ़ बढ़ रहा है. देश और धर्म के नाम पर एक डरावना उत्साह जैसे विचार और संवेदना के सारे रसायन नष्ट कर देने पर तुला है. ऐसे में जिन वृक्षों से हमें कुछ प्राणवायु मिलती थी, वे हमसे दूर होते जा रहे हैं. नामवर की जाना इस बात की ओर भी ध्यान खींचना है कि हमें अपनी वैचारिक लड़ाइयां ख़ुद लड़नी होंगी, उसके औजार नए सिरे से गढ़ने होंगे.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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