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कश्मीर और सेनाप्रमुख जनरल विपिन रावत की राय

थलसेनाध्यक्ष जनरल विपिन सिंह रावत बिल्कुल ठीक कहते हैं. कश्मीर के आतंकवादी भारतीय सेना का मुकाबला नहीं कर सकते.

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कश्मीर और सेनाप्रमुख जनरल विपिन रावत की राय
थलसेनाध्यक्ष जनरल विपिन सिंह रावत बिल्कुल ठीक कहते हैं. कश्मीर के आतंकवादी भारतीय सेना का मुकाबला नहीं कर सकते. दरअसल मुकाबले की यह बात ही बेमानी है, दोनों में कोई बराबरी नहीं. भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित और सक्षम सेनाओं में गिनी जाती है. वह हमारी सरहदों की रक्षा में पूरी तरह समर्थ है.

लेकिन क्या यह बात कश्मीरी आतंकवादी नहीं समझते, या वे नादान लड़के नहीं समझते, जो आज़ादी जैसी किसी चीज़ की मांग करते हैं और गोली खाते हैं...?

दरअसल, यह भारतीय सेना नहीं है, जिससे कश्मीर लड़ रहा है. यह सौतेलेपन का एहसास है, जिससे कश्मीरी लड़ रहे हैं. जब वे आज़ादी जैसी किसी चीज़ की मांग करते हैं, तो दरअसल वे सौतेलेपन के इसी एहसास से आज़ादी चाहते हैं. संभव है, उनमें से कई को लगता हो कि भारत से अलग होकर उन्हें यह आज़ादी मिलेगी, कुछ को लगता हो कि पाकिस्तान में जाकर यह आ़ज़ादी मिलेगी. बेशक, इसके पीछे कुछ पाकिस्तान का प्रचार होगा और कुछ तथाकथित इस्लामपरस्त फ़िरकापरस्तों की भूमिका, लेकिन अगर एक देश के नागरिक ऐसा कुछ सोचते हैं, तो उन्हें सही रास्ते पर लाना भी देश का ही काम है.

लेकिन क्या यह सही रास्ता सेना के जनरल द्वारा की गई यह गर्वोक्ति है कि कश्मीरी भारतीय सेना का मुकाबला नहीं कर सकते और वे आज़ादी का ख़याल छोड़ दें...? जब सेना का जनरल 'आज़ादी' शब्द का इस्तेमाल करता है, तो दरअसल वह अनजाने में कुछ लोगों के भीतर गुलामी का एहसास भी भरता है. जब वह कहता है कि सेना उन्हें 'आज़ादी' हासिल नहीं करने देगी, तो उसका एक छिपा हुआ अर्थ यह भी होता है कि उन्हें 'गुलाम' रहना पड़ेगा. अनजाने में हमारे जनरल ने वह शब्दावली इस्तेमाल कर ली है, जो अलगाववादियों को रास आती है. आज़ादी का संदर्भ भारत का संदर्भ नहीं है. वह उन लोगों का संदर्भ है, जो कश्मीरियों को बताना चाहते हैं कि वे गुलाम हैं, स्वतंत्र देश के नागरिक नहीं. हो सकता है, हमारे जनरल का यह आशय न रहा हो, लेकिन उनकी टिप्पणी से कुछ ऐसा ही ध्वनित होता है कि सेना अपने 'दुश्मनों' को जीतने नहीं देगी.

क्या कश्मीर के नागरिक हमारे दुश्मन हैं...? क्या कश्मीर कोई उपनिवेश है, जिसे सेना की ताकत से अपने साथ जोड़े रखा जाना है...? यह सच है कि सेना कश्मीर को अपनी पकड़ से छूटने नहीं देगी, लेकिन क्या वह कश्मीर के भीतर पैदा हो रहे परायेपन के एहसास को भी दूर कर पाएगी...? यह काम सिर्फ़ राजनीतिक-सामाजिक पहल से हो सकता है, सेना के जनरल की चेतावनी से नहीं. दुर्भाग्य से हमारे थलसेनाध्यक्ष की यह बयानबाज़ी इस राजनीतिक पहल की गुंजाइश कम करती है और कश्मीर की इस तकलीफ को कुछ और गाढ़ा करती है कि उसे बंदूकों के साये में रहना पड़ रहा है.

सेना की गरिमा बहुत बड़ी होती है. एक राष्ट्र की सर्वोच्च प्रतिष्ठा उसके साथ जुड़ी होती है. उसकी ओर से राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं होनी चाहिए. दुर्भाग्य से जनरल विपिन रावत एकाधिक बार यह काम करते देखे गए हैं. कश्मीर के संदर्भ में यह बात इसलिए भी गंभीर है कि वहां सेना पर ज़्यादतियों के आरोप लगते रहे हैं. राज्य में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून - यानी अफस्पा - ख़ासा विवादास्पद है. कश्मीर ही नहीं, पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में भी सुरक्षाबलों की ज़्यादतियां कहानी में बदली हुई हैं. मणिपुर की इरोम शर्मिला ने ऐसी ही एक हत्या अपनी आंखों के सामने देखी और 16 बरस बिना खाए काट दिए.

राजनीति विज्ञान में शक्ति की एक परिभाषा यह भी है कि शक्लि बलप्रयोग की योग्यता होती है, उसका वास्तविक प्रयोग नहीं. भारतीय सेना के पास यह शक्ति है, लेकिन जब कोई जनरल इस शक्ति का बड़बोला प्रदर्शन करता है, तो वह सेना की गरिमा और अंततः इस शक्ति को कम करता है. जनरल विपिन रावत ने जो कहा, उससे कश्मीर में भारत की राजनीतिक पहल की गुंजाइश क्षतिग्रस्त होती है. दुर्भाग्य से यह बात ठीक से न समझने वाला भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान ऐसे बयानों की अनदेखी कर एक तरह के सैन्यवाद को तुष्ट और पुष्ट करता है. यह लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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