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दो साल बाद सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक...

एक बहुत संक्षिप्त सैन्य कार्रवाई को राष्ट्रीय जलसे में बदलने की ऐसी कवायद न होती कि यूजीसी जैसे संस्थान को इसके लिए विश्वविद्यालयों को सर्कुलर जारी करना पड़ता.

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दो साल बाद सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक...

अब यह लगभग स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के लिए दो साल पहले हुई सर्जिकल स्ट्राइक के निशाने पर जितने सीमा पार बैठे आतंकी थे, उससे कहीं ज़्यादा भारतीय लोकतंत्र था. अन्यथा एक बहुत संक्षिप्त सैन्य कार्रवाई को राष्ट्रीय जलसे में बदलने की ऐसी कवायद न होती कि यूजीसी जैसे संस्थान को इसके लिए विश्वविद्यालयों को सर्कुलर जारी करना पड़ता. सर्जिकल स्ट्राइक निस्संदेह भारतीय सेना की वीरता और क्षमता का उदाहरण थी. सीमा पार जाकर पाक शिविरों में बैठे आतंकियों और उनके आकाओं को तबाह करना और बिना कोई नुक़सान उठाए सुरक्षित लौट आना आसान नहीं था. यह असंभव लगता कारनामा भारतीय सेना ने इतने अचूक ढंग से किया कि पाकिस्तान हैरान रह गया.

भारतीय सेना के लिए यह आतंकवादियों द्वारा किए गए उड़ी हमले का बदला था. ठीक 11 दिन पहले 18 सितंबर को आतंकवादियों ने उड़ी में भारतीय सेना के ब्रिगेड मुख्यालय पर हमला किया और 17 सैन्यकर्मियों को शहीद कर दिया. इसके बाद सबक सिखाने की बारी भारतीय सेना की थी, जिसने 29 सितंबर को यह काम पूरा किया. भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान के जानकार बताते हैं कि अतीत में भी भारतीय सैनिकों ने ऐसी अचूक कार्रवाइयां की हैं, लेकिन नई बात यह थी कि पहले गोपनीय ढंग से की गई ऐसी कार्रवाइयों को इस बार सरकार ने बिल्कुल सार्वजनिक करने का फ़ैसला किया. बताया गया कि इस सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान आतंकी कार्रवाइयों की हिम्मत नहीं करेगा, पाक सेना आतंकियों की मदद करना भूल जाएगी.


पिछले दो साल का अनुभव बताता है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. पाकिस्तान की ओर से युद्धविराम उल्लंघन भी बढा और आतंकियों का प्रोत्साहन भी. उल्टे सरकार द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक की सार्वजनिक घोषणा के बाद इस पर राजनीति शुरू हो गई और यह सवाल भी उठा कि यह तकनीकी तौर पर सर्जिकल स्ट्राइक थी या नहीं. जाहिर है, सेना की अपने ढंग से की गई एक कार्रवाई के राजनीतिकरण ने इसे सवालों के घेरे में ला दिया. अब दो साल बाद इस सर्जिकल स्ट्राइक को किसी विजय दिवस की तरह मनाने का फ़ैसला बताता है कि इस सरकार को एक गंभीर सैन्य पहल को अपनी सैन्यवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा का उपकरण बनाने में भी गुरेज नहीं है. सरकार की दलील है कि वह छात्रों को देशभक्ति सिखाना चाहती है, उनमें सेना के प्रति सम्मान पैदा करना चाहती है.

लेकिन क्या इस देश के लोगों या छात्रों में देशभक्ति कम है? इस देश ने तब अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ी जब बीजेपी की पितृ-संस्था आरएसएस ने खुद को आधिकारिक तौर पर उस लड़ाई से दूर कर रखा था. 200 साल की गुलामी से संघर्ष के बाद इस देश ने बिल्कुल अपने दम पर वह लोकतांत्रिक प्रयोग किया जो उस दौर में आज़ाद हुए किसी और देश में नहीं दिखता. आरएसएस इस लोकतांत्रिक प्रयोग से भी अलग रहा. इस देश ने नाराज़ और निराश होने पर सरकारें बदलीं. किसी युद्ध या आपदा के समय यह देश एक साथ खड़ा होना जानता है. तो फिर ये लोग किसको देशभक्ति सिखाना चाहते हैं? या इनका मक़सद कुछ और है? क्या वे कुछ लोगों की देशभक्ति पर सवाल खड़े करना चाहते हैं जैसा वे पहले भी करते रहे हैं? यह एक वास्तविक अंदेशा है. दुनिया भर में सरकारें इस कोशिश में रहती हैं कि उनके विरोध को देश के विरोध में बदल दिया जाए, उनकी नीतियों का विरोध देशहित का विरोध करार दिया जाए. भारत में यह इन दिनों कुछ ज़्यादा ही हो रहा है. नोटबंदी का विरोध करने वाले भी देशद्रोही हैं. पाकिस्तान के साथ अच्छे रिश्तों की वकालत करने वाले भी देशद्रोही हैं, उद्योगों के नाम पर लोगों की ज़मीन लिए जाने का विरोध करने वाले भी देशद्रोही हैं और गोरक्षा के नाम पर सड़क पर होने वाली हिंसा का विरोध करने वाले भी देशद्रोही हैं.

जल्द ही इन देशद्रोह वाले कामों की सूची में एक और बात जुड़ जाएगी. सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर राष्ट्रीय दिवस का विरोध करने वाले भी देशद्रोही कहलाएंगे. बताया जाएगा कि उन्हें देश की जीत से ख़ुशी नहीं है, उन्हें सेना के कारनामे पर गर्व नहीं है, उन्हें आतंकियों के ख़ात्मे पर संतोष नहीं है. यह बात चालाकी से छुपा ली जाएगी कि राष्ट्रवाद और सैन्यवाद का विरोध करना देश और सेना का विरोध करना नहीं है, यह उस मानसिकता का विरोध करना है जिसमें देश के नाम पर लोगों के वाजिब अधिकार दांव पर लगाए जाएं और सेना के नाम पर लोगों के लोकतांत्रिक हक़ छीने जाएं. जाहिर है, शुरुआत जेएनयू से होगी. वहां के नितांत अलोकप्रिय कुलपति घोषणा कर चुके हैं कि वहां सर्जिकल स्ट्राइक दिवस मनाया जाएगा. अब वहां के छात्र इसका विरोध करेंगे तो इन्हें देशद्रोही कहा जाएगा, अफ़ज़ल गैंग पुकारा जाएगा, इन्हें पाकिस्तान जाने की सलाह दी जाएगी- बिना यह विचारे कि ऐसी सलाह में छुपा जो सांप्रदायिक पहलू है वह देश के लिहाज से कितना ख़तरनाक है और अपने चरित्र में कितना देशद्रोही है.

जाहिर है, यह सारा जलसा उन लोगों के हाथ में सिमट जाएगा जो भारत माता को समझे बिना भारत माता की जय के नारे लगाते हैं. इस पूरी कवायद का एक पहलू और है. हमारे लगातार ख़स्ताहाल होते विश्वविद्यालयों में देशभक्ति और धार्मिकता के ऐसे पाखंडपूर्ण कार्यक्रम बढ़ते जा रहे हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत का कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में शुमार नहीं है. भारत का जो बेहतरीन विश्वविद्यालय माना जाता है, उसको बाक़ायदा खराब करने की क़वायद जारी है. लेकिन भारत के विश्वविद्यालयों की यह हालत क्यों है? क्या इसलिए कि यहां सिर्फ़ संसाधन कम हैं? या फिर इन विश्वविद्यालयों में पठन-पाठन की, विचार-बहस की, देश और समाज को समझने की संस्कृति ख़त्म होती जा रही है? 50 बरस पहले भी भारत के विश्वविद्यालय भी बहुत संसाधनों वाले नहीं थे, मगर वहां फिर भी बहस-मुबाहिसे और पठन-पाठन की एक संस्कृति विकसित थी जिसने आने वाले दौर का बेहतर भारत बनाया.

आज हालत यह है कि शिक्षा में जिसे उत्कृष्टता कहते हैं, वह अविवेकी ढंग से कुछ पेशेवर पढाइयों और निजी क्षेत्र के हवाले कर दी गई है. इस निजी क्षेत्र के महंगे शैक्षणिक संस्थानों में वे 'देशभक्त' छात्र दाख़िला लेते हैं जो महंगी कोचिंग करके आते हैं, आंख-कान दाएं-बाएं किए बिना इंजीनियरिंग या प्रबंधन की डिग्री हासिल करते हैं और पहला मौक़ा मिलते देश छोड़कर अमेरिका के नागरिक होना चाहते हैं. सर्जिकल स्ट्राइक जैसे जलसे से ऐसे ही लोगों का राष्ट्रवाद तृप्त होता है. सर्जिकल स्ट्राइक को राष्ट्रीय दिवस के तौर पर मनाने का खयाल सरकारी स्तर पर व्याप्त कल्पनाशून्यता को भी रेखांकित करता है. इतने बड़े देश में इतने सारे त्योहारों के बीच और बाज़ार द्वारा प्रायोजित-चर्चित हो चुके अलग-अलग दिवसों के साथ यह सर्जिकल स्ट्राइक दिवस महज सोशल मीडिया पर बधाई लेने-देने के एक और मौक़े में बदलता जाएगा और अपने राष्ट्रवाद में तृप्त आत्माएं देश के वास्तविक सवालों पर बहस करना भूल जाएंगी.

सरकार के निर्देश पर यूजीसी द्वारा जारी सर्कुलर दरअसल ऐसे संस्थानों के भीतर बढ़ रही जड़ता और इनकी पतनशीलता का एक और चिंताजनक सबूत है. आत्ममुग्धता की चाशनी में लिपटी और आत्मप्रदर्शन के दर्प की मारी ऐसी तथाकथित देशभक्ति जितनी मज़बूत होगी, वास्तविक लोकतंत्र उतना ही कमज़ोर होता जाएगा. 

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है. 


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