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धोनी को रिटायर होने की जो सलाह दी जा रही है, वह कितनी जायज़ है?

बहुत संभव है महेंद्र सिंह धोनी इस विश्व कप के बाद खुद संन्यास ले लें, लेकिन जब तक धोनी ऐसा फ़ैसला नहीं करते, उनको हटाने या उनसे संन्यास ले लेने की मांग करने का कोई औचित्य नहीं

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धोनी को रिटायर होने की जो सलाह दी जा रही है, वह कितनी जायज़ है?

विश्व कप के कुछ मैचों में दूसरों की उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाने की वजह से जो लोग महेंद्र सिंह धोनी को रिटायर होने की सलाह दे रहे हैं, उन्हें कुछ बातें याद दिलाना ज़रूरी है.  2005 के बाद से लगातार सचिन तेंदुलकर को सलाह दी जाती रही कि वे रिटायर हो जाएं. 2007 के विश्व कप के बाद सचिन ने लगभग तय कर लिया था कि अब वे नहीं खेलेंगे. उन तीन मैचों में वे बस 60-70 रन बना पाए थे. लेकिन तब विवियन रिचर्ड्स ने उन्हें कहा कि वे खेलते रहें, किसी की सुनने की जरूरत नहीं है. सचिन ने यह बात मानी- वनडे और टेस्ट क्रिकेट को मिलाकर सौ शतक पूरे किए, 2011 का वर्ल्ड कप टीम के साथ उठाया और अंततः एक अविश्वसनीय क्रिकेट करिअर पूरा कर बल्ला रखा.

चाहें तो कुछ और पीछे लौट सकते हैं. 1983 में महान बल्लेबाज सुनील गावसकर के बारे में कहा गया कि वे चुक गए हैं. वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ कानपुर टेस्ट में मैल्कम मार्शल के ख़िलाफ़ वे बिल्कुल नहीं चल पाए. उनको भी संन्यास ले लेने की सलाह लगातार दी जाती रही. सुनील गावसकर ने दिल्ली टेस्ट में अपना रुख बदला. बल्लेबाजी का अपना सुरक्षात्मक अंदाज़ छोड़ा और गेंदबाज़ों की जम कर पिटाई की. उन्होंने सिर्फ़ 94 गेंदों में सेंचुरी बना डाली जो उन दिनों खेले जाने वाले टेस्ट मैचों के लिहाज़ से बेहद तेज़ थी. संभवतः वह तब तक किसी सलामी बल्लेबाज़ की ओर से लगाई गई सबसे तेज़ सेंचुरी भी थी. यही नहीं, इस सेंचुरी के साथ उन्होंने डॉन ब्रैडमैन के 29 शतकों की बराबरी भी की और कुछ ही दिन बाद मद्रास टेस्ट में 236 रन बनाकर सबसे ज़्यादा टेस्ट शतक लगाने वाले बल्लेबाज हो गए. उनके 236 रन तब तक टेस्ट मैचों में भारत की ओर से एक पारी के सर्वाधिक रन का रिकॉर्ड भी थे. 4 साल बाद जब गावसकर ने बल्ला टांगा, तब तक वो दस हज़ार से ज्यादा रन पूरे कर चुके थे.


ऐसे अतिरेकी उदाहरण और भी हैं जब खिलाड़ियों को उनके करिअर के बीच ही संन्यास लेने की सलाह दी जाती रही.  सौरव गांगुली को भी यह मलाल रहा कि उन्हें टीम से ऐसे समय बाहर किया गया जब उनका खेल ठीकठाक था और दूसरों से बेहतर था. जहां तक महेंद्र सिंह धोनी का सवाल है, इस विश्व कप में भी उनका प्रदर्शन बुरा नहीं रहा है. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ उन्होंने आख़िरी ओवरों में जीत की कोशिश नहीं की- इसको लेकर उनकी बहुत शिकायत की जा रही है. लेकिन हार्दिक पांड्या के आउट होने के बाद इंग्लैंड की धारदार गेंदबाज़ी के सामने जीत की कोशिश करना हाराकिरी करने के बराबर होता. चूंकि हाल के वर्षों में हम ऐसी ही हाराकिरी को क्रिकेट का रोमांच समझने लगे हैं, इसलिए यह पचाना मुश्किल हो रहा है कि कोई बल्लेबाज़ विकेट न गंवाने की शर्त पर खेलता रहे और मैच हार जाए. वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ एक मुश्किल पिच पर महेंद्र सिंह धोनी ने जिस तरह 56 रन बनाए, वह भी काबिले तारीफ़ था. इस विकेट पर कोहली के अलावा कोई दूसरा बल्लेबाज़ करीने से नहीं खेल पाया. लेकिन धोनी से कुछ और करने की उम्मीद उनकी आलोचना की वजह बन गई. लोग यह भूल गए कि धूम-धड़ाके भरी बल्लेबाज़ी के शूरमा माने जाने वाले युवा हार्दिक पांड्या और ऋषभ पंत भी इन मैचों में बल्ला भांजने के अलावा कोई बड़ा जादू नहीं कर सके. वेस्ट इंडीज के ख़िलाफ़ पांड्या का स्ट्राइक रेट धोनी से भी कम रहा.

इसमें शक नहीं कि महेंद्र सिंह धोनी पहले के मुक़ाबले धीमे पड़े हैं. उनको आंख जमाने में समय लगता है. लेकिन महेंद्र सिंह धोनी अगर सिर्फ धूम-धड़ाका करने वाले बल्लेबाज़ होते तो उनकी बल्लेबाज़ी की उम्र इतनी नहीं हो पाती. वे अपनी पीढ़ी के सबसे सयाने क्रिकेटरों में हैं. शुरुआती दो-तीन वर्षों की लप्पेबाज़ी के बाद उन्होंने संभल कर बल्लेबाजी करने का अपना एक व्याकरण विकसित किया है. यह अनायास नहीं है कि वनडे मैचों में 5000 से ज़्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाजों में सबसे ज्यादा नाबाद पारियां उनके ही खाते में हैं. वे 84 बार नाबाद रहे हैं जबकि इस मामले में दूसरे नंबर पर खड़े मार्क बेवेन 67 पारियों में नाबाद रहे हैं और तीसरे स्टीव वॉ 58 पारियों में. धोनी मैच को बिल्कुल अपने बूते ख़त्म करते रहे हैं और इसमें अमूमन उनके 'कैलकुलेशन' की अहम भूमिका रही है. जब उनकी समझ में आ गया कि मैच उनके हाथ से निकल गया तो जबरन बल्ला घुमा कर विकेट गंवाने की हीरोगीरी उन्होंने नहीं दिखाई है. लेकिन ऐसे ढेर सारे मौक़े आए हैं जब आख़िरी ओवरों में ख़ुद अपने कंधों पर ज़िम्मेदारी  लिए रहने के लिए उन्होने एक-एक रन छोड़े हैं और अंत में लंबे शॉट लगाकर लक्ष्य हासिल किया है. ऐसा भी नहीं कि यह बहुत पुरानी कहानी है. उल्टे बीते एक बरस से महेंद्र सिंह धोनी का बल्ला जमकर बोलता रहा है. साल 2019 में उन्होंने अब तक 16 मैच खेले हैं और इनमें उनका औसत 61 पार रहा है. विराट कोहली को छोड़ दें तो कोई उनके आसपास नहीं है.

इस बात को याद किया जा रहा है कि 2007 में धोनी ने ही भारतीय क्रिकेट की वरिष्ठ त्रिमूर्ति को धीरे-धीरे विदा किए जाने की वकालत की थी. बताया जा रहा है कि 2007 के धोनी होते तो 2019 के धोनी को टीम से बाहर कर देते. लेकिन 2007 में धोनी का तर्क फिटनेस और फील्डिंग था. कहने की जरूरत नहीं कि इस कसौटी पर धोनी आज भी खरे उतरते हैं. वे भारत के सबसे फिट और चुस्त-चपल खिलाड़ियों में तो हैं ही, सबसे अच्छे विकेटकीपर भी हैं.

धोनी 38 साल के हो गए हैं. उनके पास वैसे भी खेलने को बहुत साल नहीं बचे हैं. बहुत संभव है, इस विश्व कप के बाद वे ख़ुद संन्यास ले लें. आख़िर टेस्ट मैच भी उन्होंने बहुत अप्रत्याशित ढंग से छोड़े थे. लेकिन जब तक धोनी ऐसा फ़ैसला नहीं करते, उनको हटाने या उनसे संन्यास ले लेने की मांग करने का कोई औचित्य नहीं है. खेल को सबसे बारीकी से पढ़ने वाले एक वरिष्ठ खिलाड़ी के तौर पर वे विराट कोहली के मददगार तो हैं ही, किसी भी समय मैच का पासा पलटने की उनकी क्षमता अब भी असंदिग्ध तौर पर दूसरों से ज़्यादा है.लेकिन शायद हम अतियों में जीने वाले क्रिकेट प्रेमी देश हैं. इस देश में कभी कपिलदेव को 432 विकेटों का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने देने के लिए कम से कम 25 टेस्ट अतिरिक्त खिलाए गए. अब धोनी की कुछ नाकाम पारियां लोगों को भारी पड़ रही हैं.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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