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मजबूत सरकार बनाम मजबूर सरकार- नकली बहस की कोशिश

क्या मज़बूत सरकारों से देश भी मज़बूत होता है? क्या मज़बूत सरकारों से जनता भी मज़बूत होती है? क्या वाकई 'मजबूत सरकारें' देश के ज़्यादा काम आती हैं?

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मजबूत सरकार बनाम मजबूर सरकार- नकली बहस की कोशिश
बीजेपी बार-बार यह कह रही है कि विपक्ष मजबूत सरकार नहीं दे सकता. गठबंधन की मजबूरी में बनी सरकारें मज़बूत नहीं हो सकतीं. आज भी यह बात बीजेपी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कही. एक हद तक यह बात सच है. बीजेपी के अकेले बहुमत और एनडीए के समर्थन के साथ नरेंद्र मोदी बेहद मज़बूत प्रधानमंत्री हैं. यह मज़बूती उनकी अपनी छवि का भी नतीजा है. उनकी सरकर इतनी मज़बूत है कि बड़े से बड़े फ़ैसले ले सकती है. विपक्ष की साझा सरकार का प्रधानमंत्री कोई भी हो, उसे बहुत सारे दलों को भरोसे में लेना होगा. लेकिन क्या मज़बूत सरकारों से देश भी मज़बूत होता है? क्या मज़बूत सरकारों से जनता भी मज़बूत होती है? क्या वाकई 'मजबूत सरकारें' देश के ज़्यादा काम आती हैं?

कांशीराम कहा करते थे कि वे मज़बूत नहीं, मजबूर सरकारें चाहते हैं. मज़बूत सरकारों के दौर में दलित ज़्यादा पिटते हैं. क्या इत्तिफाक है कि इतिहास भी मजबूत सरकारों के पक्ष में बहुत दलील नहीं जुटा पाता. मज़बूत सरकारों ने अक्सर ग़लत फ़ैसले किए हैं. 1971 में गरीबी हटाओ का नारा देकर चुनाव जीतने वाली और उसके बाद पाकिस्तान को युद्ध में मात कर बांग्लादेश जैसा नया मुल्क बनवाते हुए दुर्गा कहलाने वाली इंदिरा गांधी बेहद मज़बूत प्रधानमंत्री थीं- उनकी सरकार बहुत मज़बूत सरकार भी थी. लेकिन तीन साल के भीतर उस सरकार के खिलाफ़ जनांदोलन खड़ा हो गया और चार साल के भीतर वह सरकार इमरजेंसी ले आई. अगर इंदिरा कुछ कम मज़बूत प्रधानमंत्री होतीं या उनकी सरकार कुछ कम ताकतवर होती तो वे शायद इतना घातक फ़ैसला नहीं कर पातीं.

सांसदों की संख्या के लिहाज से राजीव गांधी की सरकार सबसे मज़बूत सरकार थी. लेकिन अपने उत्तरकाल में वह सरकार लगातार विवादों से घिरी रही. उसके कई फ़ैसले आत्मघाती साबित हुए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत मज़बूत हैं. इस मज़बूती के बिना नोटबंदी जैसा बड़ा फ़ैसला वे नहीं ले सकते थे. लेकिन नोटबंदी का फ़ायदा क्या हुआ- यह वे अब तक देश को नहीं बता पाए. जिस रात उन्होंने नोटबंदी की घोषणा की. उस रात उन्होंने कश्मीरी आतंकवाद, नक्सलवाद, काला धन सब ख़त्म होने का दावा किया था- यह बताया था कि इतनी सारी नगदी दुबारा नहीं लौटेगी. लेकिन सब कुछ जस का तस चलता रहा और नगदी भी एक लाख करोड़ ज़्यादा होकर लौट आई. प्रधानमंत्री को गोल पोस्ट बदलना पड़ा. अचानक उन्होंने ऑनलाइन ट्रांजैक्शन पर ज़ोर देना शुरू किया. ऑनलाइन लेनदेन की पहले से चल रही प्रक्रिया में सरकार के इस हस्तक्षेप ने बस दो काम किए- अपनी राष्ट्रीय मुद्रा के प्रति एक अवमानना का भाव पैदा किया और कुछ गिनी चुनी कंपनियों के पौ-बारह होने का अवसर मुहैया कराया.
 
बहरहाल, यह विषयांतर है. बात मज़बूत बनाम मजबूर सरकारों की चल रही थी. मजबूर सरकारों ने भी बड़े फ़ैसले किए हैं. जिस मंडल कमीशन ने भारतीय राजनीति और समाज की धारा हमेशा-हमेशा के लिए मोड़ दी, उसे लागू करने का फ़ैसला एक मजबूर सरकार का ही था. सीपीएम और बीजेपी के बाहरी समर्थन से सरकार चला रहे वीपी सिंह इस एक फ़ैसले से एक तबके के लिए फ़कीर हो गए, दूसरे के लिए विलेन. जिस आर्थिक उदारीकरण पर आज अखिल भारतीय सर्वानुमति है, उसकी शुरुआत नरसिंह राव की अल्पमत सरकार के राजनीतिक तौर पर कमज़ोर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने ही की थी. नरसिंह राव की अल्पमत सरकार ने ही पंचायती राज क़ानून पास किया. संयुक्त मोर्चे की मजबूर सरकार के वित्त मंत्री चिदंबरम ने जो बजट बनाया था उसे उद्योग जगत ने ड्रीम बजट कहा था. 2004 की मनमोहन सरकार कोई बहुत मज़बूत सरकार नहीं थी. संख्या बल के लिहाज से वह अपने सहयोगियों पर बुरी तरह निर्भर थी. लेकिन इस मजबूर सरकार ने आरटीआई और मनरेगा जैसे ऐसे बड़े फ़ैसले किए कि उसके बाद राजनीति भी बदल गई, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता भी चली आई. बल्कि मनमोहन सरकार का दूसरा कार्यकाल, जो मज़बूती के लिहाज से पहले से कहीं ज़्यादा समर्थ था, पहले कार्यकाल के मुक़ाबले कमज़ोर रहा.

मजबूत प्रधानमंत्री कैसे कम़ज़ोर फ़ैसले करते हैं- इसकी मिसाल अटल बिहारी वाजपेयी हैं. अपनी हैसियत की वजह से वे बहुत मज़बूत रहे, उनके उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और ज़्यादा सख़्त रहे. लेकिन आतंकियों को सीमा पार छोड़ने का फ़ैसला इसी मजबूत नेतृत्व का फ़ैसला था. तो बात मज़बूत या मजबूर सरकारों की नहीं, उनके द्वारा होने वाले फैसलों की है. बेशक, मजबूर सरकारों ने भी गलत फ़ैसले किए हैं, जैसे मज़बूत सरकारें करती रही हैं. लेकिन चूंकि मजबूर सरकारों को अपने बहुत सारे सहयोगियों को भरोसे में लेना पड़ता है, इसलिए वे एक हद से ़ज़्यादा स्वेच्छाचारी नहीं हो सकतीं. हम याद कर सकते हैं कि किस तरह 2004 से 2008 तक लेफ्ट फ्रंट केंद्र सरकार को समर्थन देता हुआ भी उस पर अंकुश रखता था- उसकी वजह से अरसे तक तेल के दाम नहीं बढ़ पाए जिस पर अब कांग्रेसी अपनी पीठ थपथपाते रहे हैं.

भारत की जिस सवा अरब जनता का प्रधानमंत्री बार-बार हवाला देते हैं, वह सत्ता परिवर्तन करना जानती है. यूपीए-2 के नेतृत्व से उसका मोहभंग हुआ तो उसने एनडीए को ऐसा विराट बहुमत दिया कि वह मनचाहे फैसले कर सके. कल यह मज़बूत सरकार उसे स्वेच्छाचारी लगेगी तो वह उसे पलट कर पुराने या अलग साझा गठजोड़ पर भी लौट सकती है. भारत के बहुमत से चुनी जो भी सरकार हो- दरअसल वह मज़बूत सरकार ही कहलाएगी. यही ताकत तथाकथित मजबूर सरकारों को भी मज़बूती और हैसियत देती रही हैं. जो मजबूर और मज़बूत नेतृत्व का तर्क रखता है, वह दरअसल लोगों को झांसे में रखना चाहता है.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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