श्रद्धांजलि : वैद उर्फ जाएं तो जाएं कहां?

हिंदी की दुनिया में अब किसे फ़ुरसत है कि वह अपने ऐसे किसी मूर्द्धन्य के पास भी जाए. अंततः जब वे चले गए तो खयाल आया कि एक वह जगह चली गई जहां जाया जा सकता था. अब जाएं तो जाएं कहां.

श्रद्धांजलि : वैद उर्फ जाएं तो जाएं कहां?

'विमल उर्फ़ जाएं तो जाएं कहां' कृष्ण बलदेव वैद के उन उपन्यासों में है जिनके शीर्षक को सबसे ज़्यादा चर्चा मिली. लेकिन 'जाएं तो जाएं कहां' उनके लिए बस एक किताब का नाम नहीं था शायद अपने होने की वह कशमकश थी, वह कैफ़ियत ढूंढने की कोशिश थी जिससे वे ताउम्र उबर नहीं पाए. शायद 'जाएं तो जाएं कहां' का यह सवाल उनके लिए कोई आध्यात्मिक सवाल नहीं था. उनके लिए वह व्यक्तिगत चुनाव का सवाल भी नहीं था. वह उनके लिए एक लेखकीय सवाल था जिसका वास्ता जितना अस्तित्ववादी व्यााख्याओं से था, उससे ज़्यादा निजी और सामाजिक के बीच, व्यक्तिगत और सार्वजनिक के बीच के उस द्वंद्व से, जिसमें आप किसी न किसी पहचान से ख़ुद को जोड़ने को मजबूर या अभिशप्त पाते हैं. लेखक ऐसे हर मौकों पर ख़ुद को अकेला पाता है- पूछता हुआ- जाएं तो जाएं कहां.

किसी पहचान से खुद को न जोड़ पाने की, अपने लेखकीय अंतर्द्वंद्व में बार-बार अपने हिस्से को सच को पहचानने और उलटने-पलटने की एक बेचैनी उनके लेखन में हमेशा दिखती रही. उनका जीवन भी कई फांकों में बंटा रहा. वे हिंदी के लेखक रहे, अंग्रेज़ी पढ़ाते रहे- संभवतः उर्दू सहित कई भाषा-संस्कृतियों के गहरे जानकार भी रहे. महाद्वीपों के आरपार उनका घर रहा जो दरअसल उनको हर जगह अनवस्थित करता रहा.

हालांकि एक जगह थी, जहां वे लगभग स्थायी ढंग से अवस्थित रहे- अपने लेखन में. उनको पढ़ना अक्सर वैचारिक समृद्धि के बोध से गुज़रना होता था. उनके पास अक्सर कुछ कहने को हुआ करता था. हर बात वे एक नफ़ासत से कहते थे और लगभग इतने स्पष्ट ढंग से कि लगता ही नहीं था कि यह बात किसी और ढंग से कही जा सकती है. उनका लेखन जैसे बार-बार ख़ुद के आत्मनिरीक्षण का लेखन था. यह अनायास नहीं था कि उनके एक उपन्यास का नाम 'मेरा बचपन' है तो एक अन्य उपन्यास का नाम 'एक नौकरानी की डायरी'. वैसे इस आत्मनिरीक्षण को उनकी दूसरी कृतियों 'नर-नारी', 'माया लोक', 'गुजरा हुआ ज़माना', उनकी कहानियों, उनकी डायरियों, उनके संवादों- हर जगह देखा जा सकता है. उनके कृतित्व का संसार वैसे इतना विपुल है कि हैरान करता है.

वे हिंदी के विलक्षण आधुनिक लेखकों में थे. बेशक, हिंदी की दुनिया उनको लेकर बहुत उदार नहीं रही. इस दुनिया ने जितना प्यार वैद के मित्र (और किन्हीं अर्थों में प्रतिस्पर्द्धी भी) निर्मल वर्मा पर लुटाया, उतना कृष्ण बलदेव वैद पर नहीं. निश्चय ही इसकी वजह निर्मल वर्मा की वह बेहद संप्रेषणीय भाषा और कथा शैली रही जो विचार के आवरणों को तोड़ कर सीधे अनुभव का हिस्सा बनती रही. दूसरी तरफ़ वैद अपने बहुविध लेखन के बावजूद कुछ जटिल रहे. हिंदी के सार्वजनिक विमर्श से कुछ हद तक बाहर भी. वे न दक्षिणपंथियों के काम के थे, न वामपंथियों के काम के. बेशक, उनके पास 'भूख आग है' जैसे टिपिकल वामवादी शीर्षक वाला नाटक भी था जिसे भारतीय रंगमंच पर कई बार खेला और सराहा गया.

लेकिन यह बताना बहुत मुश्किल है कि वह कौन सी चीज़ थी जिसकी वजह से हिंदी में अपनी तरह के अनूठे विद्वान, विचारक और लेखक कृष्ण बलदेव वैद अपने ही समाज में वैसे समादृत नहीं हो सके जैसे कई दूसरे लेखक हैं. शायद इसलिए कि उन्होंने सहज-संप्रेषणीय कथा-प्रविधियों के बने-बनाए खांचों को तोड़ने और प्रचलित मुहावरों को अस्वीकृत करने का साहस दिखाया. इस साहस में अगर अस्वीकृति नहीं तो अकेलापन सहज-संभाव्य है. यह अकेलापन उनके हिस्से भी आया.

दिल्ली में उनसे कुछ छिटपुट मुलाकातें रहीं- लेकिन ऐसी नहीं जिसका अलग से उल्लेख कर सकूं. यह जरूर है कि शायद 20-22 साल पहले पंजाबी की वरिष्ठ लेखिका अजित कौर के सौजन्य से होने वाली मासिक गोष्ठियों में एक बार जब बहुत दिलचस्प ढंग से जब मुझे कविता पाठ का अवसर मिला तो उस आयोजन के मुख्य अतिथि वैद साहब थे. बाद में उन्होंने अलग से मेरी कविताओं की तारीफ़ की. इसके भी कुछ समय बाद 'जनसत्ता' के दिनों में कुछ अवसरों पर कार्यक्रमों के दौरान उनसे मिलना होता रहा. एक बार मैंने जनसत्ता में चंपा वैद की कविताएं छापीं तो फिर कुछ बात हुई. लेकिन यह छिटपुट बातचीत कुछ मेरे संकोच और कुछ उनकी व्यस्तता दोनों की वजह से कभी किसी बड़ी या मेरे लिए यादगार मुलाकात में नहीं बदल सकी.

मगर एक अवसर आया जब मैं उनके लिए खड़ा हो सका. साल 2009 में हिंदी अकादमी के पुरस्कारों की घोषणा हुई थी. निर्णायक समिति ने उस वर्ष शलाका सम्मान के लिए कृष्ण बलदेव वैद का चयन किया था. मगर जब सम्मानों की घोषणा हुई तो कृष्ण बलदेव वैद का नाम गायब था. पता चला कि किसी लेखक की सलाह पर दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने उनका नाम हटा दिया था. आरोप उनके लेखन में अश्लीलता का‌ था. बाकी सम्मानित कई लेखकों ने इस फैसले का विरोध करते हुए अपने पुरस्कार लौटा दिए. पहल पुरुषोत्तम अग्रवाल ने की थी. पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों में मैं भी शामिल था- हालांकि मेरे हिस्से का पुरस्कार सिर्फ ₹11000 का था. जहां तक मुझे याद आता है, उस वर्ष कुल 7 लेखकों ने पुरस्कार वापस किए थे.

इस प्रसंग का उल्लेख इसलिए भी कि इस घटना के कई साल बाद जब कुछ लेखकों‌ की हत्या पर साहित्य अकादेमी के उदासीन रवैये के विरोध में कई लोगों ने अपने पुरस्कार वापस किए तो सरकार ने उसका बहुत बुरा माना और इसे पुरस्कार वापसी गैंग का काम बता दिया. यह गैंग आज तक बीजेपी सरकार को डराता है. जबकि कायदे से इसके कई वर्ष पहले एक साथ कई लेखकों ने कांग्रेस शासित दिल्ली सरकार के पुरस्कार वापस किए.

कृष्ण बलदेव वैद पर लौटे. इस पुरस्कार वापसी प्रकरण से वे परिचित रहे होंगे. हालांकि इस बारे में मेरी उनसे कभी कोई बात नहीं हुई. वे मुझे हमेशा ऐसे प्रकाश स्तंभ की तरह लगते रहे जो कहीं दूर हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर जिनके लेखन के पास जाया जा सकता है. लेकिन हिंदी की दुनिया में अब किसे फ़ुरसत है कि वह अपने ऐसे किसी मूर्द्धन्य के पास भी जाए. अंततः जब वे चले गए तो खयाल आया कि एक वह जगह चली गई जहां जाया जा सकता था. अब जाएं तो जाएं कहां.

(प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...)

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